लोकतंत्र की तरफ बढ़ते अफ्रीका में कोविड-19

Novel Coronavirus SARS-CoV-2 Credit NIAID NIH

COVID-19 in Africa, moving towards democracy

कोविड-19 के जनवरी में विश्वव्यापी प्रसार के समय से वैज्ञानिकों और सामाजिक वैज्ञानिकों का अनुमान था कि यदि यह अफ्रीका तक पहुंचा तब वहां के छोटे और गरीब देशों को इससे निपटना मुश्किल होगा और भारी तबाही होगी. कोविड-19 अफ्रीका पहुँच तो पर, अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. जिस दिन भारत में एक लाख का आंकड़ा पार कर रहा था और लगभग साढ़े तीन हजार लोगों की मौत हो चुकी थी, उस समय पूरे अफ्रीका महाद्वीप पर संक्रमितों की संख्या (Number of infected on the continent of Africa) भी एक लाख थी और लगभग 3000 मौतें हुईं थीं.

Testing for COVID-19

कुछ अफ्रीकी देशों को अपनी लचर स्वास्थ्य व्यवस्था का अहसास था, इसलिए जनवरी में विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहली चेतावनी के साथ ही ये देश हरकत में आ गए, और सीमित संसाधनों से ही टेस्टिंग और मरीजों के लिए आइसोलेटेड वार्ड, कांटेक्ट ट्रेसिंग इत्यादि की व्यवस्था शुरू कर दी. अमेरिका और यूरोप के कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने अफ्रीका के हरेक देश में पीपीई किट को पंहुंचा दिया था. सरकारों ने लॉकडाउन की नीतियाँ तैयार कीं और लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में जागरूक किया.

सेनेगल के स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने मिलकर एक स्वदेशी टेस्टिंग किट (Corona’s indigenous testing kit) भी तैयार की है, जिसमें प्रति टेस्ट की लागत एक डॉलर से भी कम है, जबकि यूरोपीय देशों में यह लागत लगभग 300 डॉलर प्रति टेस्ट है.

Difference between Suriname’s Corona Testing Kit Saliva and European Testing Kit

यूरोपीय टेस्ट पोलीमरेज चैन रिएक्शन पर आधारित होते है जबकि सूरीनाम की किट सैलिवा में एंटीजन या एंटीबाडीज की जांच करती है. इसके परिणाम भी 10 मिनट में आ जाते हैं. सेनेगल ने जनवरी में ही विदेशों से आने वाले विमानों को रोक दिया था, कांटेक्ट ट्रेसिंग शुरू कर दिया था और अस्पतालों और स्वाश्य केन्द्रों में कोविड-19 के मरीजों के लिए अलग इंतजाम कर दिया था. सेनेगल की आबादी लगभग 1 करोड़ 60 लाख है और वहां पिछले सप्ताह तक कोविड-19 से केवल 30 मौतें हुई थी. हरेक मौत को सरकार द्वारा बताया गया और सरकार द्वारा हरेक मृतक के घर शोकसन्देश भेजा गया.

घाना की आबादी लगभग 3 करोड़ है और वहां भी पिछले सप्ताह तक केवल 30 मौतें दर्ज की गई थीं. यहाँ भी कांटेक्ट ट्रेसिंग को सघन किया गया और बड़ी संख्या में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को कोविड-19 से निपटने के लिए तैयार किया गया. घाना के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने व्यक्तिगत टेस्टिंग से अधिक पूल टेस्टिंग पर जोर दिया, और अब इस व्यवस्था की खूबियों का अध्ययन विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कर रहा है. कुछ ऐसे भी देश हैं जहां स्थानीय उपलब्ध वनस्पतियों से इसकी दावा तैयार की जा रही है. मेडागास्कर के राष्ट्रपति अन्द्री राजोएलिना तो अर्तेमेसिया एन्युरा नामक वनस्पति से इसकी दवा तैयार करने के दावे के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध हो चुके हैं. इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उन्हें चेताया है, पर इस दवा की लोकप्रियता का आलम यह है कि अब तक 20 से अधिक अफ्रीकी देश इसकी मांग कर चुके हैं. गेर्मानी स्थित मैक्स प्लांक इंस्टिट्यूट ऑफ़ कोलोइड्स एंड इन्टरफेसेस के वैज्ञानिक भी कोविड-19 की दवा के खोज के क्रम में इस पौधे पर अध्ययन कर रहे हैं और इसके उत्साहवर्धक परिणाम सामने आये हैं. अब यह संस्थान इस दवा का मनुष्यों पर परीक्षण की योजना बना रहे हैं. अन्द्री राजोएलिना के अनुसार अफ्रीका के विज्ञान को कोई समझना नहीं चाहता, पूरी दुनिया के लिए विज्ञान वहीं है जो यूरोप, अमेरिका या फिर कुछ एशियाई देशों में खोजा जाता है और यदि यही दवा किसी यूरोपीँयन देश ने आगे की होती तो दुनिया इसपर ध्यान देती.

अफ्रीका के अधिकतर देश पिछले दशक से लोकतंत्र की तरफ बढ़ रहे हैं और युवा आबादी भी यही चाहती है. इससे पहले प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर यह महाद्वीप विकास के पैमाने पर लगभग उपेक्षित ही रहा और तानाशाही, राजशाही और निरंकुश शासकों की अधीन रहा. अब, पिछले दशक से अधिक देशों में चुनाव होने लगे हैं और यही लोकतंत्र की पहचान भी है. ये चुनाव कानूनन सही होते हैं, पर इनमें धांधली भरपूर की जाती है.

अफ्रीकी देशों की सबसे बड़ी समस्या है, प्राकृतिक संसाधन और जिसकी लूट में औद्योगिक देश भागीदारी निभाते हैं. जाहिर है, औद्योगिक देशों का वहां की सरकारों में बहुत दखल रहता है और ये देश निरंकुश शासक चाहते हैं, जो उनके अनुसार हरेक चीज को नियंत्रित कर सके. इसी कारण से लोकतंत्र होने के बाद भी, अधिकतर शासक निरंकुश और भ्रष्ट हैं. वर्तमान में भी अधिकतर अफ्रीकी देशों के शासकों के पसंदीदा शासक अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प हैं.

यूगांडा में छठी बार चुने गए राष्ट्रपति तो सार्वजनिक तौर पर आई लव ट्रम्प का नारा लगा चुके हैं. इनके अनुसार अमेरिका में आज तक जितने भी राष्ट्रपति बने हैं, उनमें ट्रम्प सर्वश्रेष्ठ हैं.

ट्रम्प को निरंकुश शासक इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि राष्ट्रपति अपने शासनकाल में कितने भी घपले करे, वह हरेक अभियोग से बच निकलेगा.

अफ्रीका के कुल 54 देशों में से 10 में स्वतंत्र लोकतंत्र है, 15 में दोषपूर्ण लोकतंत्र है, 19 में निरंकुश शासन है और शेष में तानाशाही या फ़ौज का शासन है. सबसे अच्छा लोकतंत्र सेनेगल, घाना, बेनिन, नामीबिया, बोट्सवाना, साउथ अफ्रीका, मॉरिशस, तुनिशिया और जिबोटी जैसे देशों में है. कुछ स्वतंत्र लोकतंत्र माली, गिनी, आइवरी कोस्ट, ज़िम्बाब्वे और लेसोथो जैसे देशों में है. दोषपूर्ण लोकतंत्र वाले देशों में मॉरिटानिया, गैबन, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, बुरुंडी, यूगांडा और इथियोपिया हैं.

लम्बे शीत युद्ध के बाद वर्ष 1991 में अधिनायकवाद के बाद सबसे पहले बेनिन और ज़ाम्बिया ने पार्टी के आधार पर चुनाव को आरम्भ कर लोकतंत्र की नीव रखी थी. इसके बाद धीरे-धीरे अन्य देशों में लोकतंत्र स्थापित होना आरभ हुआ. लोकतंत्र की सफलता चुने गए प्रतिनिधियों पर बहुत निर्भर करती है. आज के दौर में अंगोला और इथियोपिया की सरकारें अपने देश को एक सफल लोकतंत्र देने की और अग्रसर हैं.

एफ्रोबैरोमीटर नामक मीडिया हाउस द्वारा कराये गए सर्वेक्षण के अनुसार अफ्रीका की 68 प्रतिशत जनता एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक प्रणाली की पक्षधर है.

एफ्रोबैरोमीटर के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर एमानुएल ग्यिमा बोअडी के अनुसार अफ्रीका की अधिकतर जनता लोकतंत्र से अधिक परिणाम चाहती है, लोग भ्रष्टाचार में कमी चाहते हैं, अधिक पारदर्शिता चाहते हैं और अधिक आर्थिक संभावनाएं भी.

एमानुएल ग्यिमा बोअडी के अनुसार अधिकतर देशों में चुनाव के माध्यम से लोकतंत्र बहाल किया जा रहा है पर समस्या यह है कि चुनाव में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है. कुछ देशों ने टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की पहल की पर इसमें अधिक सफलता नहीं मिली है. दरअसल कुछ देश इतने गरीब हैं कि इन देशों ने सत्ता में बने रहना ही सबसे बड़ा आर्थिक फायदा नजर आता है.

अमेरिका में ट्रम्प के आने के बाद से अफ्रीका के सफल लोकतंत्र बनने की राह और कठिन हो गई है, क्योंकि ट्रम्प निरंकुश शासकों को ही बढ़ावा देते हैं. वर्ष 2018 में उनकी घोषित अफ्रीकी पालिसी में लोकतंत्र, स्वतंत्र चुनाव और मानवाधिकार जैसे मुद्दे थे ही नहीं. अमेरिका के अलावा इस पूरे महादेश में रूस और चीन का भी वर्चस्व है और वर्चस्व स्थापित करने की यही लड़ाई अफ्रीका का पूरा माहौल बिगाड़ देती है.

जाहिर है, कोविड-19 का अब तक अफ्रीका में सफ़र धीमा है, पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि अभी तो बस शुरुआत है, इसके बाद का सफ़र देशों की सरकारों पर निर्भर करेगा. जहां लोकतांत्रिक सरकारें हैं वहां स्वास्थ्य सेवा जैसी जन-कल्याणकारी योजनाओं पर जोर दिया जा रहा है, पर तानाशाही और निरंकुश शासकों वाले देशों में स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता इसलिए यदि कोविड-19 तेजी से फ़ैलने की दशा में संक्रमितों और मौत के आंकड़े भी तेजी से बढ़ेंगे.

महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अफ्रीका ऑफिस के अनुसार कोविड-19 के सन्दर्भ में अफ्रीका का भविष्य भयावह है. इसने अफ्रीका के 47 देशों का इस सन्दर्भ में विस्तृत अध्ययन किया है. इन देशों की सम्मिलित आबादी लगभग एक अरब है. इस अध्ययन के अनुसार अगले एक वर्ष के भीतर अफ्रीका में कोविड-19 के कारण लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु होगी और लगभग 4 करोड़ आबादी इसके संक्रमण की चपेट में होगी.

अफ्रीका में स्वास्थ्य सेवायें (Health Services in Africa) बुरी स्थिति में हैं.

यहाँ प्रति दस लाख आबादी पर मात्र 9 आईसीयू बीएड उपलब्ध हैं, और प्रति दस लाख आबादी पर कोविड-19 के केवल 685 टेस्ट किये गए हैं. साउथ अफ्रीका में बहुत पहले ही कम्युनिटी ट्रांसमिशन फ़ैल चुका है. अनेक देश दुनिया को वास्तविक आंकड़े नहीं बता रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सोमालिया, नाइजीरिया और तंज़ानिया जैसे देशों से अपने आंकड़े दुबारा प्रस्तुत करने को कहा है.

महेंद्र पाण्डेय

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें