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कोविड-19 : मोदी सरकार की विफलताओं की दूसरी लहर

COVID-19: Modi government’s second wave of failures

अब जबकि कोविड-19 महामारी की कथित दूसरी लहर के रूप में जबर्दस्त वापसी हो चुकी है, मोदी सरकार उसी घोर अक्षमता, निर्ममता और एकाधिकारवृत्ति को दोहराने पर आमादा है, जिनका बहुत ही नुकसानदेह प्रदर्शन उसने महामारी की पहली लहर (Corona virus In India) के दौरान पिछले साल के बड़े हिस्से में किया था।

महामारी की पहली लहर के साथ इस सरकार के सलूक की घोर विफलताओं को दुहराए जाने में अगर कोई कसर रहती भी थी, तो उसे दो चीजों के दुहराए जाने ने पूरा कर दिया है। इनमें पहला है, संक्रमणों में भारी तेजी तथा उसके चलते रात के कर्फ्यू तथा माइक्रो लॉकडाउन (Night curfew and micro lockdown) समेत विभिन्न पाबंदियों की वापसी से आशंकित और पिछली लहर के अपने भयावह अनुभव से आतंकित, प्रवासी मजदूरों के अपने घर-गांवों की ओर पलायन के सिलसिले का शुरू होना।

पिछली बार की तरह, इस सिलसिले की शुरूआत, ट्रेनों में तथा बसों में भी घर-वापसी की भारी भीड़ों के साथ हुई है। अभी तक यह शुरूआत ही है, लेकिन इसके पीछे पिछली बार के कटु अनुभव का अतिरिक्त दबाव भी है, जब ये गरीब प्रवासी मजदूर हर प्रकार के साधनों से वंचित होकर और परिवहन के साधनों ही नहीं घर वापसी की यात्रा की इजाजत भी नहीं होने के चलते, परायी जगहों पर फंसकर रह गए थे।

लॉकडाउन के कमजोर से अंदेशों से ही उठ रही, प्रवासी मजदूरों की अंधाधुंध ‘घर वापसी’ की लहर, पहली लहर के प्रवासी मजदूरों के कडुए अनुभवों पर अपने आप में पर्याप्त टिप्पणी है।

यह लहर यह भी दिखाती है कि मौजूदा सरकार से इन मेहनत-मजदूरी करने वालों की अपेक्षा शून्य है।

खबरों के अनुसार, इस बार के पलायन में अगर कोई बात गनीमत की है, तो यही कि इस बार इन मजदूरों के साथ औरतें-बच्चे काफी कम हैं। पिछली बार के अनुभव से सीखकर, जिसमें बिना किसी पूर्व-चेतावनी के अचानक लॉकडाउन थोप दिए जाने और आवाजाही के साधन ही नहीं आवाजाही मात्र बंद कर दिए जाने और बिना संसाधनों के छोड़ दिए जाने का अनुभव शामिल है, रोजगार के लिए दूसरे शहरों-कस्बों में लौटे मजदूर ज्यादातर अकेले ही आए थे, औरतों-बच्चों को गांव-घर की न्यूनतम सुरक्षा में छोडक़र।

जाहिर है कि यह गनीमत, मेहनतकशों-मजदूरों द्वारा बरती गयी इस सावधानी का ही नतीजा है, न कि सरकार के पिछली बार के अनुभव से सीखकर ऐसा कुछ भी करने का, जिससे इन मजदूरों को अपना ख्याल रखे जाने का कोई भरोसा होता।

इसके बाद भी अगर कोई कसर रह गयी थी तो उसे दूसरी लहर के जोर पकड़ने के बाद, मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की पहली बैठक में पेश की गयी, चार दिन के ‘‘टीका उत्सव’’ की घोषणा ने पूरा कर दिया है।

अचरज की बात नहीं है कि टीका उत्सव के विचार को, देश में कोरोना के विस्फोट की शुरूआत के दौर में पहले ताली-थाली बजाने के कार्यक्रम और आगे चलकर दीया-बत्ती के कार्यक्रम तथा अंतत: फौजी हैलीकोप्टरों आदि से कृतज्ञता पुष्पवर्षा के कार्यक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।

वैसे ईमानदारी की बात यह है कि ‘‘टीका उत्सव’’ का विचार कोविड-19 की चुनौती का सामना करने के लिहाज से, कम से कम, ताली-थाली बजाने या दीया-बाती के आयोजनों जितना बेतुका तो नहीं ही है।

चार दिन के इस टीका उत्सव में उत्सव पर चाहे कितना ही जोर क्यों न हो, टीकाकरण का अभियान तो चलाया ही जा रहा होगा, जोकि मौजूदा दौर में इस महामारी का मुकाबला करने के लिए इकलौता करने वाला काम है। तब क्यों न हम यह मानें कि इससे ‘‘उत्सव’’ से टीकाकरण के काम में कुछ न कुछ तेजी ही आएगी, जो ‘‘टीका उत्सव’’ को कम से कम ताली-थाली आदि के आयोजनों से भिन्न और उद्देश्यपूर्ण बनाता है। लेकिन, काश ऐसा होता! 

दुर्भाग्य से टीकाकरण के तेज किए जाने की जरूरत के सब के स्वीकार करने के बावजूद, इससे टीकाकरण में कोई तेजी नहीं आने जा रही है। लेकिन, क्यों?

इस क्यों का जवाब, उस ठोस पृष्ठभूमि में है, जिसमें नये उत्सव का यह एलान किया गया है। कोविड की उछाल पर मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की जिस बैठक में टीका उत्सव की योजना का एलान किया गया, उससे एक दिन पहले देश के स्वास्थ्य मंत्री, डॉ हर्षवर्द्धन ने कोविड महामारी के दौर का ही नहीं, शायद स्वास्थ्य मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल का भी सबसे हमलावर बयान दिया था। जैसाकि मोदी सरकार में कायदा ही हो गया है, स्वास्थ्य मंत्री ने यह असाधारण रूप से हमलावर बयान महाराष्ट्र, पंजाब तथा कुछ अन्य राज्यों द्वारा टीकों की उपलब्धता की स्थिति को लेकर सवाल उठाए जाने तथा मौजूदा हालात पर असंतोष जताए जाने के जवाब में दिया था। संबंधित राज्यों के लिए टीकों की आपूर्ति, जो पूरी तरह से केंद्र द्वारा नियंत्रित है, सुधारने का कोई भरोसा दिलाना तो दूर, खुद को मोदी का सच्चा मंत्रिमंडलीय सहयोगी साबित करते हुए, हर्षवर्द्धन ने विपक्षी राज्य सरकारों के सवालों का जवाब जबर्दस्त हमले से दिया। उन्होंने पलट कर संबंधित राज्य सरकारों पर ही आरोप लगा दिया कि वे संक्रमणों को रोकने से लेकर टीकाकरण तक में अपनी ‘‘घोर विफलता’’ पर पर्दा डालने के लिए ही, टीकों की उपलब्धता का सवाल उठा रही थीं!

बेशक, प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के साथ अपनी बैठक में अपने स्वास्थ्य मंत्री के उक्त हमले को आगे नहीं बढ़ाया। इतना ही नहीं, न सिर्फ उन्होंने इस पूरे विवाद को अनदेखा ही कर दिया बल्कि प्रत्यक्ष रूप से जिक्र किए बिना ही अपने स्वास्थ्य मंत्री की खासतौर पर महाराष्ट्र, पंजाब आदि राज्यों की इसके लिए आलोचना से खुद को अलग भी किया कि वहां, पॉजिटिव केसों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी।

उल्टे प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि केसों की संख्या ज्यादा निकलने को किसी राज्य के कोविड से निपटने के प्रयासों की सफलता-विफलता का पैमाना मानना गलत होगा। उल्टे चूंकि प्रधानमंत्री विशेष रूप टैस्टिंग बढ़ाने पर जोर देना चाहते थे, वह पॉजिटिव केसों की बढ़ती संख्या को, टैस्टिंग में बढ़ोतरी का स्वाभाविक परिणाम मानने का ही आग्रह करते नजर आए। और इस लिहाज से टैस्टिंग में पॉजिटिव केसों की संख्या का बढ़ना, कोविड-19 से निपटने के संबंधित राज्यों के प्रयत्नों की गंभीरता के ही साक्ष्य के तौर पर देखा जाना चाहिए न कि गंभीरता में कमी के संकेतक के रूप में।

जाहिर है कि कम से कम महाराष्ट्र के मामले में यह नजरिया, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के आक्षेपों से ठीक उल्टा बैठता है।

लेकिन, प्रधानमंत्री टैस्टिंग के महत्व पर विशेष जोर देने पर ही नहीं रुक गए। इससे आगे बढक़र प्रधानमंत्री ने टीकाकरण पर ज्यादा जोर दिए जाने को, टैस्टिंग तथा कांटैक्ट ट्रेसिंग व ट्रीटमेंट से ध्यान घटने के लिए और इसलिए, महामारी के तेजी से फैलने के लिए भी जिम्मेदार बना दिया। जाहिर है कि इसके लिए कोविड की पाबंदियों के पालन में जनता की ‘‘ढि़लाई’’ को भी उन्होंने, उससे ज्यादा नहीं तो उतना ही जिम्मेदार तो जरूर ही माना। अचरज की बात नहीं है कि यहां से आगे प्रधानमंत्री ने न सिर्फ राज्यों को पर्याप्त संख्या में टीके उपलब्ध कराने में अपनी सरकार की विफलताओं को चर्चा से ही बाहर कर दिया बल्कि एक प्रकार से इसका भी इशारा किया कि टीकों में कमी को, महामारी को संभालने में केंद्र सरकार के कदमों और फैसलों की किसी कमी का संकेतक नहीं माना जा सकता है। नतीजा यह कि टीकों के संबंध में टीकों की खरीद व वितरण से लेकर, टीकाकरण की प्राथमिकताओं व प्रक्रियाओं तक, सब कुछ और अक्षरश: केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाने के बावजूद, देश के अनेक राज्यों में पैदा हो गए गंभीर टीका संकट की किसी भी तरह की अर्जेंसी, प्रधानमंत्री की मुख्यमंत्रियों के साथ इस बैठक में दिखाई नहीं दी। और यह तब था जबकि इस बैठक के शुरू होने के समय तक, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई व महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों से लेकर, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अनेक हिस्सों तक, टीकों की आपूर्ति की कमी से टीकाकरण केंद्रों पर ‘‘आउट ऑफ स्टॉक’’ के बोर्ड लटकाए जाने का सिलसिला शुरू हो चुका था। ‘‘टीका उत्सव’’ तक इस संकट के दूर होने के कोई आसार तो नजर नहीं आ रहा हैं। ऐसे में ‘‘टीका उत्सव’’ के मोदी सरकार का ताली-थाली पिटवाने जैसा एक और टोटका बनकर रह जाने के ही आसार ज्यादा हैं

टीकाकरण की धीमी गति के लिए, मोदी सरकार की नीतियां और निर्णय जिम्मेदार | The Modi government’s policies and decisions are responsible for the slow pace of vaccination.

         जैसाकि हमने पहले ही कहा, टीकाकरण की धीमी गति और अब टीका संकट की ही नौबत आ जाने के लिए, मोदी सरकार की नीतियां और निर्णय ही जिम्मेदार हैं क्योंकि सारे निर्णय उसने अकेले और बिल्कुल इकतरफा तरीके से लिए हैं, जिनमें राज्यों की बात सुनने से साफ तौर पर इंकार किया जाता रहा है। विकलांगों व अशक्तों को घर जाकर टीका लगाने से लेकर, कार्यस्थलों पर टीके लगाने तथा टीका लगवाना चाह रहे सभी लोगों के टीका लगाने तक के, अनेक विपक्षी राज्य सरकारों के ठोस सुझावों को, बड़ी हिकारत के साथ केंद्र सरकार ने ठुकराया है।

सिर्फ टीकाकरण तक ही सीमित नहीं मोदी सरकार की विफलता

बहरहाल, मोदी सरकार की विफलता टीकाकरण तक ही सीमित नहीं है। रेमडेसिविर जैसी कोविड रोगियों के लिए कारगर दवाओं से लेकर आक्सीजन सिलेंडरों तथा अस्पतालों में वेंटीलेटर की सुविधाओं तक का दूसरी लहर के पहले की धक्के में कम पड़ जाना, इस तरह की महामारी से निपटने के लिए इस सरकार की तैयारियों की भारी कोताही को ही दिखाता है।

उधर, बढ़ते संक्रमण के सामने विभिन्न पाबंदियों की वापसी का असर, प्रवासी मजदूरों के उलट पलायन के रूप में तो सामने आ ही रहा है, पर आम तौर पर मेहनत-मजदूरी करने वालों की पहले ही खराब माली हालत के और भी बिगड़ जाने के रूप में सामने आएगा। लेकिन, मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की बैठक में इसका कोई संकेत नहीं था कि सरकार का इस ओर भी कोई ध्यान है। उल्टे, कोविड की पहली लहर के बीच पांच किलोग्राम मुफ्त राशन की जो व्यवस्था शुरू की गयी थी, उसे भी नवंबर से बंद किया जा चुका है। अतिरिक्त नकदी सहायता तो खैर नाममात्र को दी गयी थी और वह कभी की बंद की जा चुकी है।

इस मामले में दूसरी लहर में मोदी सरकार, पहली जितनी ही लापरवाह तथा निष्ठुर साबित होने जा रही है। बस, शायद इस दूसरी लहर में मोदी सरकार अर्थव्यवस्था के बैठ जाने के अंदेशे से देश भर में ‘‘पूर्ण लॉकडाउन’’ को दुहराने से बचना चाहेगी। लेकिन, टीकाकरण समेत विभिन्न मोर्चों पर उसकी विफलताओं के दुहराए जाने का अर्थ यह भी तो है कि अर्थव्यवस्था के पहिए चलते रखने की कीमत, केंद्र से किसी भी वास्तविक मदद के अभाव में, मजदूर और अन्य मेहतनकशों को ही चुकानी होगी।  

राजेंद्र शर्मा

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राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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