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1857 first freedom struggle of india

1857-भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के प्रति स्वतंत्र भारत के कर्णधारों का शर्मनाक और आपराधिक रवैया

Criminal betrayal of the martyrs of India’s First War of Independence 1857 by the Indian rulers.

1857 के महान स्वतंत्रता संग्राम को 164 वर्ष बीत चुके हैं। दुर्भाग्य से वर्तमान पीढ़ी इस महान संग्राम की घटनाओं, सच्चाइयों और क़ुरबानियों से लगभग अपरिचित है। इसमें इस पीढ़ी का कोई दोष नहीं है, क्योंकि हमारे देश के कर्णधारों ने इसकी महान विरासत को सरकारी दफ़्तरों में बस्तों में बन्द कर रखा है। आज़ादी की इस लड़ाई की 100 वीं और 150 वीं वर्षगाँठ पर करोड़ों  रुपये ख़र्च करके, कुछ प्रोग्राम करके रस्म निभाई गई। जबकि इन अवसरों पर इस महान संग्राम की साझी शहादत और साझी विरासत से लोगों को अवगत कराना चाहिए था।

दरअसल इस महान संग्राम की विरासत के साथ धोखा देश की आज़ादी के साथ ही शुरू हो गया था, जबकि इस संग्राम को बीते केवल 90 वर्ष हुए थे।

आज़ादी मिलने के तुरंत बाद देश के शासकों को सबसे पहले 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने, क़ुरबानियाँ देने और अपने प्राणों की आहुति देने वाले लोगों की पहचान करनी चाहिए थी और अंग्रेज़ों के उन भारतीय  दलालों की शिनाख़्त करनी चाहिए थी जिन्होंने गोरे  शासकों का साथ दिया था। 

बदक़िस्मती से इस महान संग्राम से जुड़े दो बुनियादी मुद्दे एैसे है जिनके बारे में एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र के तौर पर हमने भयानक लिजलिजेपन का सबूत दिया है और चाहे जो भी कारण रहा हो लगातार उनसे कन्नी काटने की कोशिश करते रहे हैं।

पहला संगीन मामला फ़िरंगीयों से संबंधित है।

1857 से 1859 तक चले इस स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने जिस तरह के दिल दहलाने वाले अत्याचार ढाए, भारतवासियों के जगह-जगह जनसंहार किए, तबाही और लूट मचाई उसकी मिसालें इतिहास के समस्त साम्राज्यवादी काल में शायद ही मिलें। समकालीन अंग्रेज़ों के सरकारी दस्तावेज़ (गॅज़ट, आदेश-पत्र, चिट्ठियां, रपट इत्यादि), अंग्रेज़ प्रत्यक्षदर्शियों के संस्मरण, फ़िरंगी इतिहासकारों और पत्रकारों के लेख, जिनके विशाल भंडार भारत समेत विश्वभर के अभिलेखागारों और पुस्तकालयों में आज भी मौजूद हैं, लगातार 1857-59 में फ़िरंगियों की बरबरता और पाशविकता की ख़ौफ़़नाक दास्ताने बयान करते हैं।

विलियम रसल [William Russell] ने, जो लंदन से छपने वाले ‘द टाइम्स’ के युद्ध संवाददाता के रूप में भारत आया था, 26 फ़रवरी 1858 को भेजी एक रपट में लिखा कि जब अंग्रेज़ी सेना का कमांडर, नील इलाहाबाद से लखनऊ सेना के साथ कूच कर रहा था तो

“उन्होंने रास्ते में इतने हिंदुस्तानियों को फाँसी दी या गोली मारी कि अंग्रेज़ी सेना के एक अन्य अफ़सर को नील से यह कहना पड़ा कि अगर इसी तरह से आबादी का ख़ात्मा किया गया तो आगे चलकर अंग्रेज़ी सेना को भरती के लिए कोई इंसान ही नहीं मिलेगा।”

रसल जो 1858-59 में अंग्रेज़ी सेना के साथ विभिन्न मोर्चों पर तैनात रहा, उसकी एक और रपट से यही पता लगता है कि अंग्रेज़ी सैनिक कमांडरों का बहुत स्पष्ट आदेश था कि जिस हिंदुस्तानी को भी सफ़ेद कपड़ों में देखो उसको मौत के घाट उतार दो। 14 मार्च, 1858 को लखनऊ में दाख़िल हुई अंग्रेज़ सेना ने जो जनसंहार किया और तबाही मचाई उसके बारे में रसल ने लिखा-

“यह सब दहला देनेवाला अमानवीय और शर्मनाक था, लेकिन इसको रोकने की किसको परवाह थी।”

रसल की रपटें लगातार यह बताती हैं कि अंग्रेज़ सैनिकों ने अपने कमांडरों की मौजूदगी में सिर्फ़ लखनऊ शहर में हज़ारों निहत्थे बच्चें, बूढ़ों और महिलाओं को मौत के घाट उतारा। रसल से ही यह जानकारी भी मिलती है कि बीसियों जगह विद्रोहियों को लकड़ी के अलाव पर रखकर सार्वजनिक रूप से जलाया गया। पूर्वी भारत में कितने गाँवों को चारों तरफ़ से घेरकर आग के हवाले कर दिया गया, उसकी गिनती करना मुश्किल है” ।

विलियम केए  [John William Kaye], एक अंग्रेज़ समकालीन इतिहासकार था, जिसने 1864 में ‘बग़ावत’ के अपने संस्मरणों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। उसने 20 सितंबर सन 1857, जब अंग्रेज़ी सेना दिल्ली में दाखिल हुई और उसने कैसे दिल्ली के आम नागरिकों का क़त्लेआम किया, उसका हाल बयान करते हुए लिखा कि

“वे लोग जिन्होंने हमारे ख़िलाफ़ कभी आवाज़ नहीं उठाई थी और जो स्वयं विद्रोहियों के अत्याचारों का शिकार हुए थे, हमारी बंदूक़ों और तलवारों का शिकार हुए। काले व्यक्‍ति को देखते ही हमारा राष्ट्रीय जोश पागलपन की हद को छूने लगता था। सब काले रंग के लोग हमारे नस्ल के दुश्मन मान लिए गए थे। दिल्ली पर क़ब्ज़े के पहले कई दिनों तक अंग्रेज़ सेना ने दिल्ली के लोगों का जनसंहार जारी रखा”।

दिल्ली पर नियंत्रण होने के बाद विलियम केए  ने शहर में जो देखा उसके बारे में लिखा कि

“बड़े पैमाने पर किया गया क़त्लेआम अंग्रेज़ी कैम्प में हर व्यक्‍ति की ज़ुबान पर था।”

22 सितंबर 1857 को हॅडसन [Hodson] ने बहादुरशाह ज़फ़र के बेटों को हुमायूँ के मक़बरे से गिरफ़्तार किया और दिल्ली गेट के पास उनके कपड़े उतारकर गोली मार दी और उनकी लाशों को चाँदनी चौक में कोतवाली के बाहर सार्वजनिक नुमाइश के लिए एक चबूतरे पर डाल दिया। यह लाशें एक हफ़्ते से भी अधिक समय तक वहाँ पड़ी सड़ती रहीं। अंग्रेज़ी सेना के अफ़सरों के बीच बाग़ी सैनिकों को सज़ा देने के लिए सबसे पसंदीदा सज़ा थी तोप के मुँह पर बाँधकर उड़ा देना। हज़ारों हिंदुस्तानियों को इस बरबरता से मौत के घाट उतारा गया। अंग्रेज़ों के सरकारी दस्तावेज़ो में, केवल पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में 200 से ज़्यादा गाँवों को जलाकर राख करने का ब्यौरा मिलता है।

फ़िरंगी सेनाओं ने किस तरह से दिल्ली और लखनऊ पर क़ब्ज़ा करने के बाद, इन दोनों शहरों को लूटा, उसका विस्तृत ब्यौरा भी स्वयं अंग्रेज़ों द्वारा लिखे समकालीन दस्तावेज़ों में उपलब्ध है।

20 सितंबर (1857) से 25 सितंबर तक अंग्रेज़ी सेना के गोरे और काले अफ़सरों और आम सैनिकों ने जिसतरह दिल्ली में लूट मचाई उसका क़िस्सा स्वयं दिल्ली के मोर्चे पर तैनात एक अंग्रेज़ कमांडर चार्ल्स जॉन ग्रिफ़िथस ने अपनी एक पुस्तक में बयान किया है। यह ब्यौरा रोंगटे खड़े करने वाला है। उन्होंने लिखा,

 “दिल्ली में घर-घर को खोद  दिया। इस लूट में गोरे, हिंदुस्तानी, अफ़सर सैनिक सभी शामिल थे…इस लूट का अच्छा ख़ासा हिस्सा इंग्लैंड मे जौहरियों की दुकानों की शाभा बना। लखनऊ पर भी अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े के बाद किस तरह की लूट हुई उसका ब्यौरा रसल की भेजी गई रपटों में आज भी देखा जा सकता है। रसल के अनुसार “इस लूट के हाल को बयान करना मुश्किल है।”

आज़ादी के समय और न ही 1857 के महान संग्राम की 100 वीं एवं 150 वीं वर्षगाँठ पर हमने अंग्रेज़ों से इस बरबरता और लूट के लिए न तो माफ़ी की माँग की, न ही मुआवज़ा भरने को कहा और न ही लूट के सामान को लौटाने को कहा। इस संग्राम की 150 वीं वर्षगाँठ पर तो कम-से-कम हमें इन माँगों को उठाना चाहिए। साम्राज्यवाद में इतिहास ने जो कुकर्म किए हैं, उसके लिए विश्‍व के कई देश गुनहगार देशों को माफ़ी माँगने पर मजबूर कर चुके हैं। अफ़्रीकी देशों के लोगों को गुलाम बनाने के लिए इंग्लैंड अफ़्रीकी देशों से माफी माँग चुका है। इसी तरह अमेरिका ने दूसरे विश्‍वयुद्व के दौरान जापान एवं कोरिया की महिलाओं के शारीरिक शोषण को लेकर सार्वजनिक माफ़ी माँगी है। यही समय है जब हमें अंग्रेज़ों को माफ़ी माँगने के लिए बाध्य करना चाहिए।

1857 के संग्राम का एक और शर्मनाक पहलू यह है कि इस लड़ाई में अंग्रेज़ों ने जो जीत हासिल की थी उसकी वजह अंग्रेज़ों की महानता नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी ग़द्दारों का योगदान था जो कुछ चाँदी के टुकड़ों के लिए अंग्रेज़ों के पिट्‍ठू बन गए थे। विलियम केए  ने अंग्रेज़ों की जीत के कारणों को गिनवाते हुए लिखा था-

“सच तो यह है कि हिंदुस्तान में हमारी जीत का सेहरा हमारे हिंदुस्तानी हमदर्दों के सिर पर जाता है जिनकी हिम्मत और बहादुरी ने हिंदुस्तान को अपने हम-वतनों से छीनकर हमारे हवाले कर दिया।”

सैकड़ों समकालीन सरकारी दस्तावेज़ इस बात के गवाह हैं कि किस तरह पटियाला, नाभा, जींद, कपूरथला, पटौदी, कश्मीर, हैदराबाद, ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, कोटा इत्यादि के राजघरानों ने दिल्ली लखनऊ ही नहीं, बल्कि पूरे देश को अंग्रेज़ों के हत्थे चढ़वाने में पूरी मदद की। इन राजघरानों की ग़द्दारियों की कहानी कहते समकालीन दस्तावेज़ों का पूरा भंडार मौजूद है।

इन ग़द्दारों के कुकर्मों से संबंधित सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि वे इंक़िलाबी राजघराने जिन्होंने अंग्रेज़ों से लोहा लिया और जो भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक थे वे अंग्रेज़ों से लड़ते हुए फाँसी के फंदों पर झूल गए।

उनकी हार के बाद उनकी रियासतें और संपत्ति अंग्रेज़ो ने ग़द्दार हिंदुस्तानी राजाओं और नवाबों को सौंप दीं। उदाहरण के लिए पटियाला, जींद, कश्मीर, नाभा, कपूरथला के महाराजाओं को अवध, गुड़गांव, रुहेलखंड और फ़ारूक़ नगर के इलाक़े मिले, पटौदी के नवाब को झज्जर की रियासत मिली, सिंधिया को झाँसी मिली।

ऐसे सैकड़ों मामले हैं, जिनमें 1857 के संग्राम में हिस्सा लेनेवालों की जान ही नहीं गई, बल्कि उनका सब कुछ छीनकर अंग्रेज़ों द्वारा ग़द्दार शासकों को उनकी सेवाओं से ख़ुश होकर सौंप दिया गया।

1857 के संग्राम से संबंधित सबसे शर्मनाक बात यह है कि न ही आजा़दी के समय, हमने यह जानने की कोशिश नहीं की कि जिन लोगों ने संग्राम का बीड़ा उठाया था उनके परिवारों का क्या हुआ। हम सब इस बात को लेकर भी उदासीन रहे कि इस संग्राम में जिन ग़द्दारों ने विद्रोहियों की संपत्ति हड़प ली थी उसका भी हिसाब-किताब हो।

इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है कि स्वतंत्रता के बाद जो देश का संवैधानिक शासन विकसित हुआ उसमें ग़द्दार राजघरानों से जुड़े लोगों का बोलबाला रहा और उन्होंने वाह-वाही लूटी। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 164 वीं वर्षगाँठ का कोई भी आयोजन तभी सार्थक हो सकता है जब इस देश के सामने यह ब्यौरा भी रखा जाए कि इस संग्राम में जो लोग और परिवार लड़े थे उनकी बाद की पीढ़ियों का क्या हुआ।

इसके साथ-ही-साथ देश को यह भी पता लगना चाहिए कि जिन लोगों और परिवारों ने इस संग्राम से ग़द्दारी की थी क्या उन्हें स्वतंत्रता के बाद कोई सज़ा दी गई या किसी तरह का जवाब तलब किया गया। देश पर मर-मिटनेवाले लोगों को सही श्रद्धांजलि यही होगी कि कम-से-कम इस सब पर राष्ट्रीय पैमाने पर एक वाइट-पेपर पेश किया जाए।

शम्सुल इस्लाम

11-05-2012

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

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