Home » Latest » क्यूबा और फिदेल कास्त्रो सही मायनों में अंतरराष्ट्रीयतावादी थे और हैं, जिन्होंने अनेक देशों के मुक्ति संग्रामों की मदद की
Fidel Castro

क्यूबा और फिदेल कास्त्रो सही मायनों में अंतरराष्ट्रीयतावादी थे और हैं, जिन्होंने अनेक देशों के मुक्ति संग्रामों की मदद की

Cuba and Fidel Castro were truly internationalists and have helped the liberation struggles of many countries.

इंदौर (मध्य प्रदेश), 18 अगस्त 2020. अखिल भारतीय शान्ति और एकजुटता संगठन द्वारा महान क्रांतिकारी एवं क्यूबा क्रांति के प्रणेता कॉमरेड फिदेल कास्त्रो की 94वीं जयंती (Comrade Fidel Castro’s 94th birth anniversary) पर गूगल मीट के जरिये एक वेब परिचर्चा (A web discussion through Google Meet)हमारे फिदेल, हमारा क्यूबा” का आयोजन किया।

कार्यक्रम के आरम्भ में संगठन के महासचिव कॉमरेड पल्लव सेनगुप्ता ने रिकॉर्डेड वीडियो द्वारा भेजे गए सन्देश में कहा कॉमरेड फिदेल ने क्यूबा जैसे छोटे से देश में असम्भव को सम्भव कर दिखाया। अमेरिका जैसा देश जो विश्व की सबसे बड़ी पूंजीवादी ताकत है उसके एकदम नजदीक होने के बावजूद क्यूबा जैसे छोटे से देश में समाजवाद को स्थापित करके लागू करना असम्भव को सम्भव करने जैसा ही है।

क्यूबा और फिदेल सही मायनों में अंतरराष्ट्रीयतावादी थे और हैं। जिन्होंने अनेक देशों के मुक्ति संग्रामों की मदद की और आज भी कोविड 19 के वक़्त में करीब 50 देशों में अपने डॉक्टर्स मदद के लिए भेजे हुए हैं।

जामिया मिलिया की प्रोफेसर और एप्सो के राष्ट्रीय सचिव मण्डल की सदस्य सोनिया सुरभि गुप्ता ने कहा कि आज यदि फिदेल होते तो वे 94 वर्ष के होते, हमें फिदेल को केवल क्रांतिकारी के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि एक राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता की दृष्टि से भी देखना चाहिए।

फिदेल लोगों से खूब मिलते-जुलते थे, वे जानते थे कि जनता से बेहतर कोई अपनी समस्याएं नहीं समझा सकता और समस्याएँ ठीक से समझे बिना उनका सही समाधान नहीं ढूंढा जा सकता। तब फिदेल ने, चे गुआरा और उनके अन्य साथियों के साथ (जो क्रांति में हिस्सेदार रहे) इस बहस में हिस्सा लिया। जनता के बीच भी इस मुद्दे को लेकर सार्वजनिक रूप से बहुत बहसें हुईं कि क्यूबा में किस तरह के समाज की रचना की जाए?

प्रो सोनिया ने कहा कि आज जब विश्व के तमाम देश नस्लवाद और रंगभेद का शिकार हैं क्यूबा इन सब से मुक्त एकमात्र देश है। वर्त्तमान समय में यूनाइटेड स्टेट में जिस तरह रंगभेद विरोधी आंदोलन ने एक बाद फिर जोर पकड़ा है वह साबित करता है कि अमेरिका जैसा बड़ा देश भी नस्लवाद या रंगभेद से आज़ाद नहीं हुआ है। सन 1776 में आज़ाद होने के बाद से आज तक ब्लेक अमेरिकन नागरिकों को बराबरी का हक हासिल नहीं हुआ है और वे आज तक दोयम दर्जे के नागरिक की तरह रह रहे हैं।

आज जब हम लोग समाज की एक नई संरचना के बारे में सोचते हैं और भारत में एक तरफ धर्म के नाम पर लोगों को बांटे जाते और दूसरी तरफ जातीय श्रेष्ठता के नाम पर (दलितों-आदिवासियों) को तरह-तरह से प्रताड़ित किये जाते देख रहे हैं, तब हम क्यूबा को ही एकमात्र ऐसे देश के रूप में पाते हैं, जिसने हर तरह की गैरबराबरी को खत्म कर दिया है। क्यूबा में किसी भी तरह के नस्लवाद का न होना मेरे लिए एक बहुत ही खास तरह का अनुभव रहा कि, वहां किस तरह से बराबरी के सवाल को आइडेंटिटी से जोड़ कर नया समाज बनाया गया।

वरिष्ठ अर्थशास्त्री, डॉ जया मेहता (जोशी एवं अधिकारी इंस्टिट्यूट, दिल्ली)  ने फिदेल के जीवन संघर्षों को तीन सोपान में विभाजित करते हुए बताया कि फिदेल का पहला संघर्ष बतिस्ता को अपदस्थ करके क्यूबा की आज़ादी दिलाना, दूसरा समाजवाद की स्थापना था (जिसके दौरान उन्होंने क्यूबा के समाज को एक समाजवादी व्यवस्था के रूप में विकसित किया) और फिदेल कास्त्रो के संघर्ष का तीसरा एवं अहम भाग है, क्यूबा में विकसित की गई समाजवादी व्यवस्था को 1991 में सोवियत संघ के पतन के प्रभाव से  बचाते हुए, समाजवाद की क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाना (जब पूर्व योरेपियन देशों ने समाजवादी व्यवस्था को नष्ट कर दिया था), “और यह वही 1991 का समय था जब मैं क्यूबा गई थी।“

सोवियत यूनियन का विघटन के समय फिदेल से एक साक्षात्कार के दौरान पूछा गया कि “जब दुनिया के सारे मुल्कों ने समाजवाद को नकार दिया है तो क्या ऐसे में केवल क्यूबा समाजवाद के रास्ते पर आगे बढ़ पायेगा?” जवाब में फ़िदेल ने कहा कि “क्या सही है और क्या गलत है वह इस पर निर्भर नहीं होता कि क्या सफल हुआ है या क्या असफल, सही और कामयाब होने में अंतर होता है। भले ही दुनिया में वर्तमान में समाजवाद नाकाम होता दिख रहा हो लेकिन उससे वह ग़लत साबित नहीं हो जाता। बल्कि अब क्यूबा के ऊपर यह जिम्मेदारी है कि वह समाजवादी व्यवस्था को कायम रखते हुए आगे ले जाये।”

डॉ जया ने कहा  कि फिदेल का यह जवाब मेरी जिन्दगी का आदर्श जवाब है।

1994 से 1996 क्यूबा के लिए विशेष पीरियड था जिसे इतिहास में ‘मुश्किल दौर’ कहा जाता है,क्योंकि सोवियत संघ की सरकार गिर चुकी थी। सोवियत संघ के बिखरने से क्यूबा को भी बड़ा आघात पहुंचा था और सोवियत संघ से आने वाली हर मदद बन्द हो गई थी। क्यूबा ईंधन के लिए पूरी तरह सोवियत संघ से प्राप्त होने वाले पेट्रोल पर आश्रित रहता था, और सोवियत संघ के टूटने के बाद पेट्रोल आना बंद हो गया और रासायनिक खाद की आपूर्ति मिलना बंद हो गई। लेकिन फिदेल ने क्यूबा को बिखरने नहीं दिया और इसमें क्यूबा की जनता ने उनका साथ दिया । अपने देश के लोगों की मदद से फिदेल ने अपने देश में समाजवाद को कायम रखा। फिदेल ने चाइना से साइकिल मंगवाईं, उस वक्त फिदेल की उम्र करीब 65 साल रही होगी इस उम्र में फिदेल ने स्वयं भी साइकिल चलाना सीखा। उसके बाद क्यूबा के सारे लोग जो आवागमन के लिए मोटर पर निर्भर थे वे साइकिल का प्रयोग करने लगे, इस तरह क्यूबा की जनता ने भी इस चुनोती को स्वीकारा और फिदेल की उम्मीदों पर खरी उतरी।

क्यूबा की खेती भी रासायनिक उर्वरकों पर आधारित थी, क्योंकि आज़ाद होने के पहले खेती पूंजीवादी पद्धतियों से हो रही थी। तब फिदेल ने जैविक उर्वरकों को बढ़ावा दिया। कृषिउन्नति के क्षेत्र में क्यूबा ने जो शुरुवात 1990 में की थी, उसकी सहायता से क्यूबा आज समूची दुनिया में कृषिउन्नति में सबसे ऊपर है। व्यवस्थित एवं छोटे-छोटे किचन गार्डन के जरिये खेती में जो काम करके दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की है जो वाकई सराहनीय है।

कॉमरेड जया ने बताया कि जब वे क्यूबा गयीं तब जून का महीना था। वे क्यूबा की राजधानी हवाना में करीब बीस दिन रही। वहाँ की इमारतें, लोगों और माहौल उन्हें हिंदुस्तान जैसा ही लगा, लेकिन एक बात जो हिंदुस्तान से भिन्न थी कि वहां हिंदुस्तान कि माफिक दोपहर के समय गलियों में खेलते बच्चों के झुण्ड कहीं दिखाई न दिए और इस बात की चर्चा उन्होंने स्थानीय साथी से की जिस पर उसने बड़े ही गर्व के साथ जवाब देते हुए कहा “हमारे बच्चे स्कूल में हैं।”

इस मुश्किल दौर में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को तरीके से कायम रखना फिदेल के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण था जिसका उन्होंने बहुत ही बुद्धिमत्ता एवं सहस के साथ सामना  किया और इसमें उनका  साथ दिया उनके देश क्यूबा कि जनता ने।

भोपाल से वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया भी इस परिचर्चा में शरीक हुए। हरदेनिया जी ने क्यूबा के संस्मरणों को बांटते हुए बताया कि क्यूबा में सन 1971 के दशक में एक पत्रकार सम्मलेन में भाग लेने के लिए पत्रकारों के एक दल के साथ सम्मेलन के लिए क्यूबा गए थे, जिसमें एशिया, अफ्रीका, यूरोप और नार्थ अमेरिका से प्रतिनिधि मण्डल शामिल हुआ था।

वहाँ आम लोगों से मिलकर लगा कि वे इस समाजवादी व्यवस्था से संतुष्ट एवं खुश हैं, क्यूबा की जनता ने जितना प्यार फिदेल को दिया इतिहास गवाह है कि दुनिया में किसी और शासक को यह नहीं मिला। फिदेल का कहना था कि क्रांति का आयात-निर्यात नहीं किया जा सकता। जब सोवियत सँघ के साथ यूरोप के अनेक देशों में समाजवादी व्यवस्था ध्वस्त हो गई उस समय फिदेल का यह सिद्धांत सही साबित हुआ। फिदेल दुनिया के महानतम वक्ताओं में से एक थे। उनकी एक बैठक में शामिल होने का हमें भी मौका मिला। उस बैठक में वे साढ़े तीन घण्टे तक बोले और उनके श्रोता तालियाँ बजाकर एवं नृत्य करते हुए उन्हें सुनते रहे। उस मीटिंग में फिदेल ने बहुत सारी बातें कहीं लेकिन दो बातें ने मुझे बहुत आकर्षित किया, पहली यह कि क्यूबा में प्रत्येक महिला बेख़ौफ़ होकर रहती है और अपने को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करती है। दूसरी बात फिदेल ने क्यूबा की जनता को उम्दा शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाई हैं जो बहुत महत्त्वपूर्ण बात है। जब हम क्यूबा में थे उस समय लिगेसी पर कैम्पेन चल रहा था जिसमें क्यूबा का फोकस केवल शिक्षा पर था। जिसमें फिदेल से लेकर साधरण जनता तक अपने आस-पास लोगों को तरह-तरह से शिक्षित कर रहे थे। जिसके परिणाम यह हुआ कि एक महीने के अंदर पूरा का पूरा क्यूबा साक्षर हो गया। इस तरह का चमत्कार दुनिया में क्यूबा के अलावा और कहीं नहीं हुआ। उन्होंने युवाओं को आगे बढ़ाया और युवाओं ने भी अपने देश के लिए अपने को समर्पित कर दिया। हरदेनिया जी ने “द मोटर साइकिल डायरी” किताब का जिक्र करते हुए कहा कि फिदेल ने मोटर साईकिल से अनेक देशों की यात्राएँ की।

बैंक ट्रेड यूनियन के वरिष्ठ साथी एवं कार्यकर्ता आलोक खरे ने कहा सन 2006 में हवाना में वर्ल्ड्स फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन के सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में मुझे शामिल होने का मौका मिला। उस छोटे से देश में ट्रेड यूनियन की कार्यप्रणाली को देखकर मन आदर से भर गया। क्यूबा में ट्रेड यूनियन की कार्यप्रणाली फिदेल कास्त्रो के मार्गदर्शन में सुदृढ़ आधार पर व्यवस्थित रूप से बनाई गई थी। क्यूबन क्रांति में क्यूबा द्वारा संचालित सेन्ट्रल ट्रेड यूनियन (सीडीसी) की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। फिदेल के नेतृत्व में स्पेन के तानाशाह के विरुद्ध हुए जनसंघर्ष में ट्रेड यूनियनों ने बहुत ही निर्णायक भूमिका अदा की। किसी मजदूर के लिए यूनियन का सदस्य होना अनिवार्य नहीं था लेकिन फिर भी लगभग 98 फीसदी लोग ट्रेड यूनियन से जुड़े थे। ट्रेड यूनियन के नियमित चुनाव एवं बैठक होते थे जिसमेंअपने संगठन के मुद्दों के अलावा नीतिगत मुद्दों पर भी इन बैठकों में विस्तार से चर्चा होती और लिए गए निर्णयों को सम्बंधित मंत्रालय  में भेजा जाता था। 2006 में जब मैं वहां गया उस दौरान ऐसा कानून बनाया जा रहा था की बिना सेंट्रल ट्रेड यूनियन की सहमति के महत्त्वपूर्ण नीतिगत निर्णय क्यूबा की सरकार द्वारा नहीं लिए जा सकते। किस मद में कितना पैसा खर्च होगा, किस तरह की सरकार की नीतियाँ होंगी? इस सब में ट्रेड यूनियन की पूरी भागीदारी रहती थी, “वर्कर्स पार्टिसिपेशन इन गवर्नेंस एंड पॉलिसी मेकिंग” इन बातों को यथार्थ में लागू कैसे किया जा सकता है उसका ज्वलन्त उदाहरण क्यूबा में था।

उस समय भी क्यूबा की स्वास्थ्य व्यवस्था एवं सेवाएँ अत्यंत उन्नत थीं, वहाँ की जनता के लिए निःशुल्क लेकिन उम्दा स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया थीं। लेटिन अमरीका के अन्य देश एवं अफ्रीका के अल्प विकसित देश के विद्यार्थियों के लिए क्यूबा में निःशुल्क मेडिकल प्रशिक्षण दिया जाता जिसकी शर्त यह थी कि प्रशिक्षित होने के बाद वे अपने क्षेत्र या देश के ग्रामीण एवं पिछड़े इलाकों में जाकर वहाँ के लोगों को कम मूल्य पर अपनी सेवाएँ उपलब्ध करवायेंगे। क्यूबा जैसे छोटे मुल्क में सामाजिक क्षेत्र के शिक्षा, स्वास्थ्य, हाउसिंग विभाग में जनसामान्य तक सुविधाएँ मुहैया करवाने का अद्भुत काम किया है। जो दुनिया के तमाम मुल्कों के लिए तब भी और आज भी प्रेरणा का स्रोत है। इसके पीछे फिदेल का प्रेरणादायक व्यक्तित्व है। हम भले फिदेल को प्रत्यक्ष रूप से न देख पाए हों लेकिन उनके व्यक्तित्व का प्रभाव हमने क्यूबा में हर जगह महसूस किया। क्यूबा और फिदेल एकदूसरे के पूरक हैं इन्हें एक दूसरे से अलग नहीं आंका जा सकता।

फिलाडेल्फिया में शोधकर्ता एवं कार्यकर्ता आर्चिष्मन राजू ने परिचर्चा में भाग लेते हुए अपनी हाल ही की क्यूबा यात्रा का ज़िक्र किया और बताया कि उन्होंने क्यूबा समाज की प्रगतिशीलता और लैंगिक न्याय की संस्कृति का पहला उदहारण हवाना एअरपोर्ट पर देखा जहां सारा इमिग्रेशन स्टाफ़ महिलाओं का था, जो कि दुनिया में और कहीं भी नही दिखाई देता है। उन्होंने आगे कहा कि उन्दिने वहाँ पर क्यूबा और विएतनाम के रिश्तों की 40वीं वर्षगाँठ के अवसर पर वियतनाम बुक फेस्टिवल चल रहा था और उस दौरान क्यूबाई बेले देखने का अवसर मिला जिसका ज़िक्र आम तौर पर नही किया जाता है, उन्होंने बताया कि क्यूबाई बेले दुनिया के सर्वोत्तम बेले में से है और एक बेले डांसर का ज़िक्र करते हुए बताया कि वह भारत आयी थी और वहां उसने परफॉर्म भी किया था।
आर्चिष्मान राजू ने आगे कहा कि क्यूबाई क्रांति की सबसे बड़ी विशेषता उसका व्यापक होना और समाज के विभिन्न हिस्सों पर उसका व्यापक और एक जैसा प्रभाव होना था, उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान एक पुराने क्रन्तिकारी से अपनी मुलाकात के बारे में भी चर्चा की।

रजनी जो इस परिचर्चा में हैदराबाद से शामिल हुई थीं, उन्होंने अपने संस्मरण साझा करते हुए बताया कि वे (रजनी) एक 11 वीं की विद्यार्थी एवं एक्टिविस्ट थीं और तब जीडीआर (जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक) हुआ करता था जिसमें वे स्टूडेंट्स के एक अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में शिरकत करने के लिए क्यूबा गई थीं और फिदेल कास्त्रो ने वहां सब लोगों से आकर मुलाकात भी की और हम लोग इस बात से बहुत रोमांचित थे कि हमने फिदेल कास्त्रो को देखा और उन्होंने हम से हाथ मिलाया।

कार्यक्रम के दौरान फिदेल कास्त्रो और क्यूबा कि जनता के संघर्षों से सम्बंधित वीडियोस भी प्रदर्शित किये गए। जामिया यूनिवर्सिटी की शोधार्थी समर खान ने क्यूबा संगीत से रचा एक स्पेनिश गाना पेश किया।  

कार्यक्रम के संयोजक कॉम. विनीत तिवारी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, निजता और राजनीति का जो फर्क पैदा होता है उस पर मार्क्स ने कहा है कि समाजवाद में व्यक्तित्व का विकास सामूहिक विकास की पहली शर्त है।

कार्यक्रम में अंतरा देवसेन, ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन के अध्यक्ष आफताब आलम, एप्सो के राष्ट्रीय सचिव मण्डल सदस्य अरविंद पोरवाल,  कोल्हापुर से मेघा पानसरे, भरूच से डॉ.  माया वालेचा, तेलंगाना से वली उल्लाह कादरी, इंदौर से सारिका, भोपाल से आरती और मुम्बई से थियेटर और फ़िल्म से जुड़े तरुण कुमार भी सम्मलित हुए।

रिपोर्ट सारिका श्रीवास्तव एवं विवेक मेहता 

 

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें

 

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

Check Also

sumitranandan pant biography in hindi

प्रकृति की सुंदरता को कविताओं में उतारने वाले कवि सुमित्रानंदन पंत

सुमित्रानंदन पंत : व्यक्तित्व और कृतित्व (Sumitranandan Pant: Personality and Creativity) भारत माता ग्रामवासिनी खेतों …

Leave a Reply