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हृदय परिवर्तन का दलितवादी संस्करण : संक्रमण

जापान के लेखक यासुनारी कबावाता की एक प्रसिद्ध कहानी है – ‘धूप का टुकड़ा’. इस कहानी में अव्यवस्थित पात्र किस तरह से व्यवस्थित होकर असामान्य से सामान्य स्थिति को प्राप्त करता है, इसका नायाब उदाहरण देखने को मिलता है. किसी भी स्थिर या अस्थिर पात्र का स्वाभाविक स्वीकार लेखन की क्षमता को जाहिर करता है. इस कहानी का पात्र घूरने की आदत का शिकार है और वह अपनी इस आदत के प्रति सतर्क भी है. भारतीय समाज के तथाकथित सुधारवादी कानूनों की दृष्टि के आलोक में यदि इस कहानी को देखा जाए तो इसके बड़े दिलचस्प परिणाम देखे जा सकते हैं. अजय नावरिया की कहानी जिसे विदेश (जापान) के धरातल पर लिखी पहली दलित कहानी की घोषणावादी समीक्षा भी की गई, के संदर्भ में इस जापानी कहानी का उदाहरण इसलिए आवश्यक है क्योंकि यहाँ पात्रों की स्वाभाविक स्वीकृति का प्रश्न उभर कर सामने आता है.

‘संक्रमण’ के मुख्य पात्रों के विश्लेषण से इस प्रश्न को ठीक ठीक समझा जा सकता है. उदाहरण के तौर पर हम श्वेता पात्र की बुनावट को देखते हैं.

श्वेता पी-एच.डी कर रही है. होटल में पार्ट टाइम रूम क्लीनिंग – बिस्तर से लेकर टॉयलेट तक साफ़ करने का काम करती है. वह शराब भी पीती है. पोर्क और बीफ भी खाती है. सेक्स की शुरुआत भी करती है और इस तरह की बनावट के साथ वह सवर्णवादी भी है.

सवर्णवादी होना क्या परंपरा और मान्यताओं से इस तरह अलग-थलग होना है कि किसी के अंदर सवर्ण होने का इतना गहरा बोध भी हो और उस व्यवस्था की मान्यताओं से वह मुक्त भी हो? अगर इस प्रश्न की उपेक्षा भी कर दी जाए तब भी श्वेता की बनावट पर दो अहम प्रश्न सामने आता है. पहला यह कि क्या होटल का संबंध वर्ग संरचना से जुड़ा हुआ नहीं है? दूसरा और मुख्य सवाल जो स्वयं कहानी अपने भीतर से पैदा करती है कि – श्वेता सेक्स की शुरुआत कर यह तो साबित कर देती है कि उसके लिए शारीरिक संबंध में नैतिकता का प्रश्न मायने नहीं रखता है. लेकिन कहानी का नायक मिलिंद सेक्स-कंट्रोल इस सोच के साथ करता है कि ‘यहाँ विदेश में उसे इज्जत से बुलाया गया है’. अब यहाँ सेक्स को इज्जत से जोड़कर कौन देख रहा है? श्वेता या मिलिंद?

लेखक के साथ दिक्कत यह है कि वह श्वेता पात्र की बुनावट में जितना अधिक लापरवाह है ठीक उसके उलट मिलिंद को लेकर अतिगंभीर भी है. वह वाकई इतना भोला-भाला पात्र है या  विसंगतियां उसे छू भी पाए उसके सारे मार्ग लेखक ने अपनी निष्ठा से बंद कर रखा है.   दरअसल मिलिंद के साथ लेखक खड़ा है और इतनी मजबूती के साथ खड़ा है कि तुलसी का रामराज्य भी उनके पात्र के सामने फीका पड़ने लग जाता है.

लेखक ने जीतेन्द्र विसारिया की जिस टिप्पणी को प्रेम-पूर्वक स्वीकारा है भले वह किसी नावरिया-चालीसा से कम न हो लेकिन एक बात तो विसारिया ने सही पकड़ी है – ‘औदात्य का वैभव जो कहीं से भी कम नहीं’. नावरिया वास्तव में इसी औदात्य और वैभव के शिकार हुए हैं.  

आलोचना जब प्रक्रिया मुक्त हो तो उसका स्वाभाविक रूप से कृति मुक्त होना भी तय हो जाता है. इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि क्या कृति को उसके समय और उस समय के यथार्थ से उसे काटकर आलोचना की जानी चाहिए? बिलकुल भी नहीं. ये दोनों बिंदु महत्वपूर्ण हैं लेकिन इन बिन्दुओं के आलोक में कृति की बुनावट को देखना या कृति की उपस्थिति के साथ वहां तक पहुंचना, प्रक्रिया से गुजरते हुए कृति की आलोचना करना है. अन्यथा कृति मुक्त होकर विषयगत आलेखों द्वारा आलोचना का मार्ग साहित्य में अभी भी बाधित नहीं हुआ है.

जितेन्द्र विसारिया इन समस्याओं से अपरिचित होने के कारण ही चालीसा के शिकार हुए हैं. आइये उनके कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार करें. वे लिखते हैं कि – ‘यह कहानी एक पूर्व लिखित जवाब भी है सहानुभूति के नाम पर ‘तांडव’ मचाए उन गौरव सोलंकियों को भी…..’.  दरअसल यह मसला जुड़ा हुआ है ‘तांडव’ नाम के वेब सीरीज के दो दृश्य से. संक्षेप में उस दृश्य को जान लेते हैं फिर आगे बढ़ते हैं. पहले दृश्य में प्रोफ़ेसर अपनी उस प्रोफ़ेसर पत्नी से लौट आने को कहता है जो एक दलित नेता कैलाश के साथ प्रेम संबंध में है और अपने पति से तालाक चाहती है. वह नहीं लौटेगी, यह निर्णय प्रोफ़ेसर को सुनाती है. प्रोफ़ेसर कहता है – ‘क्या दे रहा है तुम्हें वो ऐसा’. वह जवाब देती है – ‘वह समझता है मुझे’.

 सवाल जवाब आगे बढ़ता है और महिला प्रोफ़ेसर जवाब देती है – ‘ही इज ग्रेट इन बेड’. प्रोफ़ेसर कहता है – ‘ सुनो, जब एक छोटी जात का आदमी, ऊँची  जात की औरत को डेट करता है न, तो वो बदला ले रहा होता है. सदियों के अत्याचारों का. सिर्फ उस एक औरत से’.  

दूसरे दृश्य में महिला प्रोफ़ेसर दलित नेता कैलाश को उसके घर पर बताती है – ‘मैं प्रेग्नेंट हूँ कैलाश’.

कैलाश महिला प्रोफ़ेसर पर झल्लाता है – ‘ सबको इस प्रेग्नेंसी का पता कैसे चला? सारे मीडिया वाले मुझसे जवाब चाहते हैं..ओह..’. महिला प्रोफ़ेसर –‘ तो क्या मैं अकेले प्रेग्नेंट हुई थी’?

कैलाश चिल्लाता है – ‘मेरा पूरा करियर…महिला – ‘तो हम लोग क्यों छुपा रहे हैं? बता देते हैं सबको. अब तो मेरा डिवोर्स भी हो चुका है’. कैलाश कहता है कि –‘लेकिन मेरा नहीं हुआ है’.

महिला प्रोफ़ेसर चौंक जाती है क्योंकि उसे यह बताया गया था कि वह डिवोर्स ले चुका है. वह कहती है – ‘मेरी तबियत भी नहीं पूछोगे’? कैलाश उसे अपने घर से फिलहाल के लिए जाने को कहता है. जैसे ही वह सामने के दरवाजे से जाने को होती है कैलाश कहता है – ‘पीछे के गेट से जाओ’.

महिला प्रोफ़ेसर को अपमान बोध होता है. वह रोते हुए कहती है कि उसके प्रोफ़ेसर पति ने उससे कहा था कि – ‘जब एक छोटी जात का आदमी, ऊँची  जात की औरत को डेट करता है न, तो वो बदला ले रहा होता है. सदियों के अत्याचारों का. सिर्फ उस एक औरत से’.  वह रोते हुए चली जाती है.

इन दोनों दृश्यों में दलित संबंधी जो संवाद हैं उसकी अपनी अपनी व्याख्या है. संभव है कि यह दलित समाज के लिए अपमानजनक मसला भी हो लेकिन प्लाट के नजरिए से देखें तो यह कथन अचानक से पेश नहीं कर दिया जाता है बल्कि उसके लिए लेखक जरूरी दृश्य और स्थितियां भी पेश करता है. इसलिए यहाँ मान्यताओं के आधार पर जरूर शिकायत हो सकती है लेकिन प्लाट की बुनावट के आधार पर तो कम से कम बिलकुल भी नहीं. यहाँ इस बात को भी समझने की जरुरत होनी चाहिए कि ‘तांडव’ सीरीज के शुरूआती हिस्से में ही प्रधानमंत्री दलित नेता कैलाश को दलित होने का बोध कराता है और वह दलित होने के कारण प्रधानमंत्री के सामने उपेक्षित नजर भी आता है. लेकिन महिला प्रोफ़ेसर के सामने क्या वह वैसा ही शोषित दलित है जैसा कि प्रधानमंत्री के सामने है?

उस प्रोफ़ेसर महिला और कैलाश दोनों के बीच शोषक और शोषित कौन है? कहने का अर्थ यह है कि ‘तांडव’ के पास कम से कम प्लाट तो है. 

‘तांडव’ के संदर्भ के साथ ही ‘संक्रमण’ कहानी और विसारिया जी की आलोचना के एक अंश को देखें तो स्थितियां और भी स्पष्ट हो जाती है. वे कहते हैं कि – ‘श्वेता स्त्री है, सब से ज्यादा शोषित, हर जगह, हर जाति, धर्म, और देश में, फिर भी….. ये फिर भी क्या है? मतलब स्त्री को तो कम से कम एक शोषित को समझना ही चाहिए. शायद दोनों किसी जगह एक जैसे हैं.

अब यहाँ एक दूसरी समस्या यह है कि ‘संक्रमण’ कहानी जिस चर्चित पत्रिका ‘हंस’ में प्रकाशित हुई है, उसी ‘हंस’ में राजेन्द्र यादव के संपादन में एक चर्चित बहस भी हुई थी. उस बहस का विषय था – ‘स्त्री, दलित और दलित स्त्री’. गंभीरता की दृष्टि से इस बहस को छोड़ भी दें और स्त्री और दलित के शोषण के कारण एक जगह पर होने के पक्ष विपक्ष को भी देख लें तो स्थितियां साफ़ हो जाती है. मृदुला गर्ग, नीलम कुलश्रेष्ठ, प्रभा खेतान (कोटि), मैत्रेयी पुष्पा ऐसी कई स्त्रीवादी लेखिका हैं जिन्होंने अपने अपने हिसाब से दलितों की कोटि में स्त्रियों को जोड़ने का विरोध किया है. इसका क्या अर्थ हुआ? हम हवाई बातें जितनी भी कर लें विमर्श के धरातल पर तो दोनों अलग अलग हैं. अब यह विमर्श की सीमाएं हैं या नहीं इसपर अलग से विचार किया जा सकता है लेकिन फिलहाल हम जिस संदर्भ पर विचार कर रहे हैं वहां तो स्थितियां भिन्न है.

ऊपर कहानी से उद्धृत अंश का एक दूसरा अर्थ भी है – जब कहानीकार और आलोचक दोनों स्त्रियों के संदर्भ में मानते हैं कि ‘वह सबसे ज्यादा शोषित है’ तो फिर ‘तांडव’ प्रसंग में महिला प्रोफ़ेसर दलित नेता कैलाश की तुलना में अधिक शोषित है, इस बात की अप्रत्यक्ष सहमति तो वे दे ही रहे हैं. फिर तांडव के उस प्रसंग से दिक्कत कैसी? क्या कहने की आवश्यकता है कि न तो लेखक अपने कहे के प्रति गंभीर है और न उनके आलोचक. इस बात की पुष्टि एक और अंश से की जा सकती है.

आलोचक ने कहा कि – ‘प्रेम में आदमी – औरत भले ही वह सवर्ण हो या दलित बतौर मनुष्य वह प्रेम ही करता है’. मतलब प्रेम को जाति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. तो क्या जहाँ प्रेम होगा वहां जाति, वर्ग और लिंग का महत्व खत्म माना जाएगा? क्या ऐसा कहना तब भी स्वाभाविक लगेगा जब पुरुष पात्र सवर्ण हो और महिला पात्र दलित? और फिर इसी क्रम में यदि मित्रता को भी ले लिया जाए जिसे प्रेम के नजदीक ही महत्व प्राप्त है, तो क्या वहां भी जातिगत स्वरुप से परहेज की छूट होगी?

कहानी का प्लाट एक हद तक विश्वविद्यालयों से भी संबंधित है. ऐसे में वहीं का उदाहरण लिया जाए और ऐसे माहौल जहाँ स्वाभाविक रूप में लड़ाईयां भी होती है और साथ रहने खेलने की भी व्यवस्था होती है, तो क्या यह छूट आलोचक वहां भी देना चाहेंगे? उदाहरण के तौर पर खेल के कई जटिल नियमों और उसकी रफ़्तार के कारण दोनों टीम में निर्णय को लेकर लड़ाई की संभावना अधिक रहती है.

यथार्थ यह है कि खेल के मैदान में पॉइंट को लेकर होने वाली लड़ाइयों या बहसों में यदि एक दलित और दूसरा सवर्ण है तो विश्वविद्यालय में वह विवाद एस.सी. एक्ट के तहत दर्ज होता है. कहने का अर्थ यह है कि आलोचक के बयान को यदि विस्तार रूप में अध्ययन किया जाए तब तो वे कम से कम अस्सी प्रतिशत मामलों से एट्रोसिटी एक्ट ही हटवा देंगे. यदि वे इन प्रसंगों से परिचित होते हुए यह बयान दे रहे हैं तो शायद अन्य जातिवादी संस्थाओं के लिए वे स्वागत योग्य भी हो सकते हैं. क्योंकि जब वे यह कहते हैं कि – ‘पश्चाताप और आत्म-स्वीकार पर उतना ही वह भी उदार होता है जितना दुनिया का कोई अन्य श्वेत या सवर्ण’, तो यह उस समूचे समूह का सच नहीं होता है. इस मसले को यथार्थ रूप में हम अपने आस पास भी महसूस कर सकते हैं.

इस आलेख के आरंभ में ही जिस नोबेल सम्मानित जापानी लेखक की कहानी का जिक्र किया गया है यदि उसके पात्र को जटिल परिस्थिति से द्वंद करते हुए सामान्य तक की प्रक्रिया तक पहुँचने की बनावट से लेखक आलोचक परिचित होते तो निश्चित रूप से वे अपनी विसंगतियों और लापरवाही से जरुर बच जाते.

हमारे समाज में बलात्कार के बाद भी बच निकलने की सच्चाई हो तो हो, हमारे विश्वविद्यालयों में दलित और स्त्री शोषण का स्वरुप हो तो हो लेकिन हमारे इन्हीं विश्वविद्यालयों में भारतीय कानून के तहत किसी लड़की को अधिक देर तक देखने या घूरने पर गंभीर सजा की भी व्यवस्था है. लेकिन उस जापानी कहानी का पात्र जो घूरने की बीमारी से ग्रसित है, क्या वह भारतीय समाज के धरातल पर न लिखे जाने के कारण भी स्वीकार नहीं है? वह किसी भी पाठक को दिलचस्प रूप से प्रभावित कर सकता है और यासुनारी ने ऐसा किया भी.

बिना दावा किए हुए भी यासुनारी की यह कहानी जापान की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए हमारी संवेदना के साथ जुड़ जाता है और दूसरी ओर जापान की धरातल पर ‘पहली दलित कहानी’ की घोषणा के बावजूद नावरिया की यह कहानी अपने ही बिखराव में सिमट कर रह जाता है. यह जापानी कहानी उन लेखकों के लिए भी प्रेरणादायक है जो शोषण पर आधारित कहानियों के स्वरूपगत विकास के पक्ष में विचार रखते हैं. लेकिन ‘संक्रमण’ कहानी का दुर्भाग्य यह है कि न तो उसके अंदर शोषण के नए स्वरुप के लक्षण हैं और न ही परिवर्तन की कोई यथार्थ स्थिति.

इस (संक्रमण) कहानी पर कुछ अन्य विचारकों के पक्ष को जान लेना भी जरुरी है. योगिता यादव लिखती हैं कि – ‘कहानी बनती है, होटल की हाउस कीपिंग स्टाफ श्वेता के मिलिंद के संपर्क में आने के बाद’ और उनकी अगली ही पंक्ति है – ‘श्वेता की बात करने लगेंगे तो मिलिंद की बात रह जाएगी’. अब सवाल यह है कि अगर उनके हिसाब से कहानी के बनने में श्वेता की भूमिका महत्वपूर्ण है तो फिर उसे छोड़ देने से भी क्या प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण रह जाती है? और अगर हाँ तो आलोचकों को योगिता जी से आलोचना की भाषा की इस खास शैली को जरुर सीखने और समझने की आवश्यकता है.

कँवल भारती ने कहा – ‘अजय नावरिया को मैंने एक दशक पहले ही युग प्रवर्तक के रूप में देख लिया था’. ग़ालिब का एक शेर है कि – ‘कतरा में दजला न दिखाई दे और जुज्व में कुल, खेल लड़कों का हुआ, वो दीदा-ए-बीना न हुआ’. स्वाभाविक है कि ग़ालिब के बाद यह ‘दीदा-ए-बीना’ यदि कँवल भारती जी में ही समाहित हुआ हो तो ऐसे में उनकी घोषणावादी समीक्षा पर तर्क वितर्क का तो प्रश्न ही नहीं रह जाता है.

युवा समीक्षक दीबा (शोधार्थी, अलीगढ़) ने कम से कम अपनी प्रतिक्रिया में एक जगह यह तो उल्लेख किया है कि –‘अंत की स्थिति एक आदर्श स्थिति है’. लेकिन दीबा ने यदि इस दृष्टि से सिर्फ अंत ही नहीं बल्कि पूरी कहानी का मूल्यांकन किया होता तो शायद भाव कुछ और अलग निकल सकता था. दीबा ने जिस प्रसंग को आदर्श स्थिति से जोड़कर देखा है वह प्रसंग वाकई अद्भुत है. जो श्वेता शारीरिक संबध के लिए उत्तेजना के शीर्ष पर है वह अनावश्यक ढंग से लाए गए प्रसंग जिसमें नायक उसके कान में कहता है –‘दलित जो हूँ’, सुनते ही शरीर और मन से निष्क्रिय हो जाती है, ढ़ीली पड़ जाती है, लेकिन साथ ही मंत्रबिद्ध युवती सी सब करती भी चली गई. बाद में नायक को बताया जाता है कि श्वेता अब कभी नहीं मिलेगी. वह नायक से घृणा करती है, अछूत और अपने घरों में काम करने वाला मानती है. लेकिन तीन दिनों के भीतर ही उसके अंदर एक जादुई हृदय परिवर्तन की घटना घटित होती है. इन तीन दिनों के भीतर वह दलित समाज की व्यथा से ही परिचित नहीं होती है बल्कि विचारधारा के आधार पर भी वह विकसित स्वरुप का हिस्सा बन जाती है. वह कहती है – “ इन तीन दिनों में मैंने आपकी आत्मकथा पढ़ी और पहली बार उस दुःख और अपमान को जाना….कैसे ग़ुलाम बनाया जाता है?.. औरतें गुलामों की भी गुलाम होती है. पैट्रिआर्क सिस्टम में आप के लोगों जैसी ही हालत हमारी नहीं है?”

इतना बड़ा बदलाव? और इतने बड़े सवर्णवादी में? क्या उत्सुकता नहीं जगती है कि वह कौन सी आत्मकथा है? और आश्चर्य नहीं होता है कि वह पहली बार उस दुःख और अपमान को जान रही है वो भी आत्मकथा के जरिये? जब वो भारत में रहती थी तब पत्र, पत्रिकाएं, रेडिओ, टी.वी. और अपने आस पास से इतनी बेखबर थी? क्या उस आत्मकथा ने इतनी बेखबर लड़की के हृदय को मात्र तीन दिन में परिवर्तित कर दिया जिसे जिसकी पी-एच.डी. नहीं बदल पाई, जिसके कास्ट –थॉट को जापान का तकनीकी समाज नहीं कम कर पाया, जिसे होटल के वर्ग-संरचना का माहौल नहीं बदल पाया? कम से कम इस बात के लिए तो नावरिया जी को माफ़ नहीं किया जा सकता कि उन्होंने उस महान आत्मकथा का नाम तक नहीं लिया. जिस स्त्री और दलित के रूपक पर बहस में राजेन्द्र यादव की हालत ख़राब हो गई उस रूपक को नावरिया जी ने श्वेता को दधिची बनाकर एक झटके में फूंक मारकर तैयार करवा दिया.

यह सब पहली नजर में आदर्शवाद के नजदीक है लेकिन मूल समस्या ‘कास्ट’ के प्रति अतिप्रतिबद्ध रूप में यथार्थ के साथ षडयंत्र का भी है. इसे समझने के लिए हम ओमप्रकाश जी की कहानी ‘प्रमोशन’ को संक्षेप रूप में भी देख सकते हैं. कहानी में है – महानगर, फैक्ट्री, मजदूर, जुलुस, यूनियन और अंत में ‘ब्रह्म सत्य’. यह ब्रह्म सत्य था – ‘जातिवाद’ और राक्षस था ‘वर्ग –संघर्ष’.

ओमप्रकाश जी बड़े रचनाकार होने के बावजूद पूंजीवादी प्लाट पर जाति संरचना को स्थापित करने निकल पड़ते हैं और पूरी कहानी को अवास्तविक कर देते हैं. उन्हें न तो पूंजीवाद नजर आता है, न वर्ग संघर्ष और न वर्ग आधारित शोषण. ठीक उसी तरह ‘संक्रमण’ में है एक तकनीकी देश, निजी संस्था होटल, पार्ट टाइम और अंत में ओमप्रकश जी वाला ‘ब्रह्मसत्य’ मतलब जाति. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं. प्रभा खेतान के ‘तालाबंदी’ में भी यही समस्या है. क्या यह सवाल सहज ही नहीं उठता है कि जाति संरचना को अंतिम सत्य मानने वाला बड़ा से बड़ा लेखक भी आखिर वर्ग संरचना के प्लाट पर पटखनिया कैसे खा जाता है?

यहाँ एक और समानता है जो बड़ा दिलचस्प है – वह है इन सभी कहानियों का ‘हंस’ पत्रिका द्वारा प्रकाशन. लेकिन एक फ़र्क भी है. राजेन्द्र यादव अपनी संपादकीय टिप्पणी में इन कमजोरियों पर चर्चा अवश्य करते थे. कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रयक्ष रूप में. ‘चाँद चाहता था कि धरती रूक जाए’ इसका बड़ा प्रमाण भी है.

‘संक्रमण’ कहानी पर और भी विस्तार के साथ बातचीत की जा सकती है लेकिन एक पक्ष ऐसा भी है जिसपर संक्षेप में ही सही चर्चा जरूरी है. इस कहानी का नायक कहता है कि – ‘दिल्ली हिंदी साहित्य का अब एक शक्ति केंद्र बन चुका है और जो दिल्ली से बाहर है, वे साहित्य की शक्ति को भी उस तरह भोग नहीं पाते जैसे दिल्ली वाले’.यहाँ सर्वेश्वर जी का स्मरण स्वतः ही हो जाता है. वे नव-उपनिवेशवादी शिल्पकारों की चालाकियों से सावधान रहने की जोरदार अपील करते हैं. उस अपील के आधार पर देखें तो जहाँ ‘संक्रमण’ का पात्र कहता है – ‘उस तरह भोग नहीं पाते जैसे दिल्ली वाले’ वहां होना चाहिए था ‘हम दिल्ली वाले’.

कहानी की वास्तविकता या पात्र संबंधी समस्याओं पर ध्यान देने के क्रम में यह जिज्ञासा स्वतः होने लगती है कि मोविज्ञान के आधार पर कहानीकार को भी समझने का प्रयास किया जाए. कम से कम ‘संक्रमण’ कहानी के संदर्भ में. ऐसे में हम देखते हैं कि इस कहानी से संबंधित छोटी बड़ी अनेकों प्रतिक्रिया लेखक अपने सोशल साईट से सार्वजनिक करते हैं. इसमें डॉ.नीलाक्षी फूकन, शरण कुमार लिम्बाले, मणिका मोहिनी, कँवल भारती, दीबा, विजय कुमार भारती, योगिता यादव, डॉ. कौशल पंवार, हिदेआकी इशिदा, अंजलि जोशी, डॉ. सुमित्रा महरोल, रोसिका शर्मा, प्रतिमा प्रसाद, वंदना गुप्ता, शेख सायरा, जितेन्द्र विसारिया, अरविंद सुरवाडे, डॉ. स्वदेशी, हरिराम भारती, डॉ. शक्तिराज, नामदेव, अजीत कुमार पंकज, भीमसेन आनंद, बिभाश कुमार, प्रमोद कुमार, आशा शर्मा मुख्य रूप से हैं. इन सभी विद्वानों की प्रतिक्रिया को सामूहिक करते हुए लेखक कहते हैं कि –‘अब कुछ बेवजह विरोधी बन रहे हैं, इसलिए फेसबुक से अनियतकालीन अवकाश’. मतलब लेखक में रूठने की भी अद्भुत क्षमता है. लेकिन साझा की गई प्रतिक्रियाओं में कम से कम ‘बेवजह विरोध’ से संबंधी तो एक भी प्रतिक्रिया नहीं है. यह आलोचना की स्वीकारोक्ति के लिहाज से भी लेखक के लिए अच्छी बात नहीं होती है. इस आधार पर देखें तो कम से कम यह आलेख लेखक के अंदर आलोचना के स्वीकार के सेकुलर इमेज के लिए सूक्ष्म रूम में ही सही महत्व रख सकता है.

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि चरित्र-चित्रण और घटनाक्रमों के आधार पर यह कहानी बेहद ही कमजोर और अवास्तविक है.

लेखक और पत्रिका परिवार को भविष्य की शुभकामनाओं के साथ धन्यवाद.       

डॉ. संजीव कुमार                        

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