सलमान रुश्दी पर जानलेवा हमला : अमरीकी खुफिया निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई है

सलमान रुश्दी पर जानलेवा हमला : अमरीकी खुफिया निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई है

Deadly attack on Salman Rushdie: US intelligence surveillance and security system exposed

न्यूयार्क में विवास्पद कृति सैटेनिक वर्सेज के रचनाकार सलमान रुश्दी पर जानलेवा हमला (The deadly attack on Salman Rushdie, the author of the controversial work Satanic Verses, in New York.)। उनकी गर्दन पर चाकू भोंक दी गई है। स्थिति अभी चिंताजनक है। हम इस हमले की निंदा करते हैं लेकिन पूरे प्रकरण पर हमें सोच विचार जरूर करना चाहिए।

salman rushdie author of “the satanic verses” stabbed on stage in new york at a literary event…his book enraged ayatollah khomeini so much so that he issued a fatwa in 1989 calling for his death…salman has been under the protection of uk’s secret service eversince…a suspect was larer apprehended…

साहित्यिक आयोजन के मंच पर हुए इस हमले से अमेरिकी पुलिस उन्हें नहीं बचा सकी। अमरीकी खुफिया निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई है।

न्यूयार्क में twin tower हमले के बाद इराक और अफगान युद्ध और सम्पूर्ण पश्चिम एशिया, लीबिया को ध्वस्त कर देने के आतंकवाद के अमेरिकी युद्ध के बाद हमला बताता है कि कट्टरपंथ और आतंकवाद से निपटने के अमेरिकी दावे कितने खोखले हैं।

1989 में अयातुल्ला खुमैनी ने सैटेनिक वर्सेज की वजह रुश्दी के खिलाफ मौत का फरमान जारी किया था। तब से अब तक दुनिया बदल जाने के बावजूद यह फतवा अभी जारी है। उनके सर पर 30 लाख डॉलर के इनाम का एलान जारी है।

रुश्दी बेनाम कैद की जिंदगी जीते रहे अमेरिकी और पश्चिमी सुरक्षा के घेरे में। मिडनाइट चिल्ड्रन के लेखक अब 75 साल के हैं। उन पर काफी पहले जर्मनी में एक बार कातिलाना हमला हुआ था। सैटेनिक वर्सेज के जर्मन अनुवादक की लेकिन हत्या कर दी गई है।

बोरिस पस्तरनक, soljeletsin और शोलोखोव जैसे सोवियत विरोधी अमेरिकापरस्त लेखकों को नोबेल पुरस्कार मिले, लेकिन उनकी कृतियां साहित्यिक कसौटी पर भी खरी उतरी।

सिर्फ विवादास्पद लेखन से बाजार में बने रहने की जगत के बाद अमेरिकी सुरक्षा भी काफी नहीं होती, यह हमला यह भी साबित करता है।

जनपक्षधर साहित्यकार और कलाकार भगोड़े नहीं होते। अपनी कृति के लिए किसी भी तरह का अंजाम भुगतने को तैयार रहते हैं। उन्हें किसी महाबली के रक्षकवच की जरूरत नहीं होती। खुमैनी के अवसान के बाद 2001 में तेहरान ने रुश्दी के खिलाफ फतवा वापस लेने का एलान जरूर किया था, जो दरअसल वापस नहीं हुआ। लेकिन रुश्दी भूमिगत जीवन से निकलकर अमेरिका में बस गए और पिछले 20 साल से वे न्यूयार्क के बाशिंदे हैं। इसी पनाहगाह में अमेरिकी ईगल की नजर से बचकर घात लगाए इंतजार में थे मौत के सौदागर।

लेखकीय स्वतंत्रता और सुरक्षा का तो कोई सवाल नहीं उठता। सत्ता, धर्म सत्ता और मुक्त बाजार की विश्व व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध है। यह चिंता का विषय जरूर है।

राष्ट्र, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद लेखकीय स्वतंत्रता की गारंटी नहीं दे सकते। जनता ही रचनाकार की रक्षा कर सकती है। जनता से अलगाव और बाजार के लिए लेखन आत्मघाती होता है।

पलाश विश्वास

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