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नामवर सिंह के मायने

आज 19 फरवरी नामवर सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष

19 February, Today in History | 19 फरवरी, इतिहास में आज का दिन

Today special on the death anniversary of Namvar Singh

बुद्धिजीवी और कलाकार के लिए मुख्य चीज है उसके आदर्श। वह उनके साथ कोई समझौता नहीं करना चाहता। सवाल यह है नामवर सिंह के आदर्श क्या थे ?

What were the ideals of Namwar Singh?

नामवर सिंह की जीवन शैली और विश्वदृष्टि के साथ आदर्शों की अंतर्क्रिया की प्रक्रिया किस तरह चलती है। नामवर सिंह धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी आलोचक हैं। आलोचना में इस परंपरा की नींव रवीन्द्रनाथ नाथ टैगोर ने रखी। उनकी आलोचना का मुख्य क्षेत्र वर्तमान समाज और आधुनिक साहित्य है।

वे हिंदी के कम्प्लीट आलोचक हैं, आलोचक होने के लिए बेहतरीन भाषाशास्त्री होना जरूरी है, वे अकेले ऐसे आलोचक हैं जिनकी बुनियाद भाषाविज्ञान ने बनायी।

आज जो मौजूद है और जो होना चाहिए ,इसके बारे में फर्क करने का विवेक आलोचक में होना जरूरी है। ऐसा करने के लिए आपको यथार्थ को जानना जरूरी है।” राजनीतिक तौर पर सही” का अर्थ है दार्शनिक तौर पर गलत का अर्थ जानना जरूरी है। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से उनके लेखन और कर्म को देखा जाना चाहिए।

पेशेवर आलोचक की तरह सोचते, बोलते और लिखते थे नामवर सिंह

नामवर सिंह ने आलोचना में नई बात कहने के लिए बार बार जोखिम उठाया है, आलोचना में नए का प्रवेश जोखिम उठाए बिना नहीं होता। इसलिए उनके साहस की बार बार प्रशंसा हुई है। साहस बहुत बड़ी चीज है। साहस का यही अर्थ नहीं है कि चीजों को भिन्न रूप में पेश किया जाए, साहस का अर्थ है समझौताहीन अवधारणाओं को प्रस्तुति। अपनी इसी शैली के कारण वे जनप्रियता बनाए रखने में सफल रहे हैं। वे बार-बार कहते थे हमें यथार्थ समझना चाहिए और पाठ को भी समझना चाहिए। उनकी कठिनाईयों को समझना चाहिए। इसके बाद विजन होना चाहिए और उसे लागू करने का पूरी तरह साहस होना चाहिए। वे पेशेवर आलोचक की तरह सोचते, बोलते और लिखते थे। वे जो सोचते थे उसे लागू करने की क्षमता रखते थे।

कक्षा के बारे में नामवर सिंह के विचार

 नामवर सिंह का मानना था कक्षा सिर्फ कक्षा है। उनका ज्यादातर समय कक्षाओं और सेमीनार में ही गुजरा। वे यह भी मानते थे कि कक्षा को राजनीतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति की जगह नहीं बनाया जाना चाहिए। सातवें दशक में जब विश्वविद्यालयों का राज्य के प्रति ठंडा रूख था तब जेएनयू में कक्षाओं को वैकल्पिक सामाजिक स्थान के तौर पर विकसित किया गया। तब कक्षाओं में सभी किस्म की मुक्ति की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया गया। विभिन्न किस्म के राजनीतिक विचारों को अभिव्यक्त किया । यही वो परिवेश है जिसको उन्होंने समृद्ध किया।

नामवर सिंह की विशेषता

नामवरजी की ख़ूबी है कि वे अपने निजी जीवन को निजी रखते हैं और उसको कभी सार्वजनिक बहस में नहीं आने देते। निजी के वे ही पहलू सामने आते हैं जो सार्वजनिक कर्म का हिस्सा रहे हैं। निजी और पब्लिक में नामवरजी का यह संतुलन देखने योग्य है।

नामवरजी ने बड़े ही तरीक़े से दिल्ली में कुछ साल पहले हुए एक कार्यक्रम में बताया कि वे कैसे पढ़े, उन्होंने किससे भाषा सीखी, किनका उनके ऊपर असर था, साथ ही बेबाकी के साथ यह भी बताया कि किस तरह उन्होंने तीन सप्ताह के अंदर भारत भूषण अग्रवाल के कहने पर ‘कविता के नए प्रतिमान’ किताब लिखी, जिसे बाद में साहित्य अकादमी से पुरस्कृत किया गया। उन्होंने साफ़ कहा कि यह किताब तो मैंने साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए लिखी थी। यह किताब पांडित्यपूर्ण ज़्यादा है और इसमें आलोचना कम है।

नामवरजी की इस घटना से मुझे यह सवाल उठाने की इच्छा हो रही है कि हम कैसे जीएँ ? और किस तरह जीते रहे हैं ?

हर लेखक को इन दोनों सवालों को अपने तरीक़े से खोलना चाहिए। नामवरजी ने कैसे जीएँ ? सवाल का हल कैसे निकाला इसका उत्तर उनके लंबे दैनन्दिन जीवन में फैला हुआ है जिसमें अनेक बातें हैं जिनको सीखने की ज़रुरत है मसलन् भाषा पर उनका जो अधिकार है वह चीज़ सीखने की है। वे बेहतर हिन्दी गद्य लिखते और बोलते हैं। उदात्त, उत्तेजक और मधुर काव्यात्मक गद्य के उन्होंने बेहतरीन मानक बनाए हैं। इसके अलावा व्यक्तिगत जीवन में वे भ्रष्ट नहीं रहे हैं। उनके ऊपर पक्षपात और आत्मगत फ़ैसले लेने के आरोप लगते रहे हैं और हो सकता है इनमें से कई फ़ैसले ग़लत रहे हों लेकिन वे निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं हैं। बौद्धिक ईमानदारी का उन्होंने भरसक पालन किया है।

ज्ञान को पढ़कर हासिल करना और अपडेट रखना उनकी महत्वपूर्ण विशेषता है। इसके अलावा उनकी जीवनशैली संगठित और सुनियोजित रही है। इसमें सुबह चार बजे उठना, पढ़ना और टहलना नियमित कार्य हैं। कोई भी घर आए तो आने देना कोई भी बुलाए तो उसके कार्यक्रम में जाना यह उनकी मिलनसारिता के गुण हैं। वे निजीतौर पर कभी किसी से ख़राब नहीं बोलते चाहे वो जितना ही ख़राब बोलता रहा हो। व्यवहार में उदात्तता को नामवरजी ने जिस तरह ढाला है वह सीखने लायक चीज़ है। नामवरजी के जीवन की धुरी उदात्त व्यवहार और उदार मूल्यों से बनी है। इसमें गाँव के किसान का बोध है, इसमें महानगरीय जीवन की ध्वनियाँ हैं और बातें करेंगे तो इसमें ग्लोबल नागरिक का विश्वबोध भी है। वे लोकल और ग्लोबल एक ही साथ नज़र आते हैं। पहनावे और जीवनशैली में लोकल और नज़रिए में ग्लोबल या यों कहें खाँटी मार्क्सवादी की तरह विश्वदृष्टि से ओतप्रोत नज़र आते हैं।

नामवरजी के आसपास या दूर रहने वाले लोग यह सोचते हैं कि वे अपने छात्रों को रचते रहे हैं, बनाते रहे हैं, लेकिन सच यह नहीं है। नामवरजी ने किसी को नहीं बनाया। निर्मित करना उनकी पद्धति और नज़रिए का अंग कभी नहीं है। यह बात मैं इसलिए उठा रहा हूँ क्योंकि अनेक लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि नामवरजी ने क्या निर्मित करके दिया ? कैसा विभाग दिया ? कितने मेधावी तैयार किए?

असलमें , नामवरजी ने हमें यह बताया कि कैसे जिएँ। इससे यह निष्कर्ष न निकालें कि वे निर्मित करते रहे हैं। किताब कैसे पढें? किताबों और जीवन के विविध आयामों से जुड़े सवालों को कैसे देखें ? यह उनकी अकादमिक शिक्षा का हिस्सा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बंदे तैयार करते रहे हैं। एक अच्छे शिक्षक का काम है बताना, समझाना न कि निर्मित करना। परिवार, परंपरा, साहित्य, कला, राज्य, पति-पत्नी संबंध, प्रेम, राजनीति आदि के विभिन्न जटिल पक्षों को वे विभिन्न बहानों के ज़रिए छात्रों के सामने रखते रहे हैं। इसमें ही जीवन जीने की कला के सूत्र भी देते रहे हैं यानी कैसे जीएँ के मंत्र बताते रहे हैं।

इस समूची प्रक्रिया में सवाल यह भी उठा कि हम ज्ञान के लिए जी रहे हैं या सामाजिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के लिए जी रहे हैं? किसके लिए पढ़ रहे हैं ? ज्ञानार्जन के लिए या समाज को बदलने के लिए ? नामवरजी का एक ही उत्तर होता था कि शिक्षा का लक्ष्य है सामाजिक परिवर्तन न कि ज्ञानार्जन। कैसे जिएँ और कैसे मरें, यह कला हमें सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल होकर सीखनी चाहिए।

नामवरजी पर बातें करते समय उनके आलोचक और बाग़ी भाव की ख़ूब बातें होती हैं लेकिन जो बात उनकी रचना से लेकर व्यवहार तक फैली है और जिसका ज़िक्र नहीं होता वह है उनका मानवाधिकारवादी नज़रिया।

नामवरजी स्वभाव से मानवाधिकारों के कट्टर पक्षधर हैं और मैंने अनेक बार उनको बहुत क़रीब से जानने और समझने की कोशिश की है तो पाया है कि मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में रहने के कारण वे अनेक बार अपनी विचारधारा का, मार्क्सवाद का भी अतिक्रमण कर जाते हैं।

आपातकाल की चूक के अलावा वे समूचे जीवनकाल मानवाधिकारों के पक्ष में बोलते और लिखते रहे। उनकी समीक्षा को मार्क्सवाद की कसौटी पर कसने की बजाय मानवाधिकार के पैमानों पर देखा जाए तो ज़्यादा बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं।

 वे जीवन की निरंतरता को साहित्य की निरंतरता में खोजते हैं ,जिसे वे परंपराओं की खोज कहते हैं। उनका मानना है कि भारत में एक नहीं अनेक परंपराएँ हैं। परंपरा की खोज का अर्थ मृत तत्वों की खोज करना नहीं है बल्कि जीवंत तत्वों की खोज करना है यही वह बिंदु है जहाँ से वे जीवंत के साथ जुड़ने का नज़रिया देते हैं। जीवन जीने की कला का एक नया मंत्र देते हैं कि जीना है तो जीवंत रहो और जीवंत से जुड़ो।यही जीवंतता असल में आलोचना में मानवाधिकार है।

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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