दिल्ली दंगा : एक पूर्व-घोषित नरसंहार का रोजनामचा, गुजरात-2002 की पुनरावृत्ति

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Delhi Riot: A Pre-Announced Massacre Journal, Gujarat-2002 Recap

सबसे पहले तो एक पछतावा। दिल्ली के चुनाव नतीजों पर अपनी टिप्पणी, ‘‘फिर भी…दिल्ली अभी दूर है’’ के निष्कर्ष में यह कहकर कि ‘‘दिल्ली अभी भी दूर है–सांप्रदायिकतावादियों के लिए भी और सांप्रदायिकताविरोधियों के लिए भी’’; मैंने इसका इशारा तो किया था कि भाजपा की चुनावी हार से, दिल्ली को सांप्रदायिकता के और बेशक मुख्यत: बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के खतरे से निजात नहीं मिल गयी है। लेकिन, उसी टिप्पणी में दिल्ली के ‘‘सांप्रदायिकतावादियों के लिए भी’’ दूर होने का जो दावा किया गया था, वह क्या शर्मिंदा करने वाले तरीके से गलत साबित नहीं हुआ है?

जाहिर है कि उस टिप्पणी में दूर-दूर तक इसका एहसास नहीं था कि दिल्ली वास्तव में ऐसे सांप्रदायिक विस्फोट के कगार पर खड़ी थी, जो 1984 के बाद का भारत की राजधानी का सबसे बड़ा सांप्रदायिक विस्फोट साबित होने जा रहा था।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली पर केंद्रित इस सांप्रदायिक विस्फोट में, चौथे दिन की दोपहर में ये पंक्तियां लिखे जाने तक, मरने वालों का आंकड़ा 35 तक पहुंच चुका था और घायलों का दो सौ से ऊपर। मकानों, दुकानों, गाड़ियों व अन्य सामानों के नुकसान का अंदाजा लगाने की तो फुर्सत ही किसे थी! और कई प्रभावित इलाकों में बड़ी संख्या में पुलिस की मौजूदगी तथा धारा-144 से लेकर कथित रूप से कर्फ्यू लगाए जाने तक की पाबंदियों के बावजूद, अब तक हिंसा व आगजनी का सिलसिला थमा नहीं है।

हां! खुद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के मैदान में उतर कर सीधे पुलिस तथा अन्य बलों की कमान संभालने के बाद, हिंसा के जोर में काफी कमी जरूर आयी है। लेकिन, इतनी राहत के लिए भी देश की राजधानी को पूरे तीन दिन इंतजार करना पड़ा है। एक दिन, महाराजा ट्रम्प की अगवानी की तैयारी का और दो दिन, महाराज के स्वागत-सत्कार के।

एक क्रोनोलॉजी खासतौर पर याद रखने वाली है।

इस पर आम तौर पर दिल्ली के हालात की मामूली सी जानकारी भी रखने वाले सभी लोग एक राय हैं कि हिंसा को भड़काने का काम, विधानसभा चुनाव में हार गए भाजपा नेता, कपिल मिश्र ने किया था। 23 फरवरी की दोपहर को भाजपा नेता ने जाफराबाद में धरना दे रहे सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों से भिड़ने के लिए, अपने समर्थकों व आम तौर पर संघ-परिवारियों को इकट्ठा किया था और एक पुलिस उच्चाधिकारी की मौजूदगी में इसकी धमकी दी थी कि अगर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नहीं हटाया, तो हिंदुत्ववादी उन्हें बलपूर्वक हटा देंगे।

हां! कपिल मिश्र ने प्रकटत: इसका आश्वासन भी दिया था कि ट्रम्प के भारत में रहने तक तो वे अपनी ताकत नहीं दिखाएंगे, लेकिन उसके जाते ही कानून अपने हाथ में ले लेंगे।

यह एक जाना-माना तथ्य है कि उसकी जुटाई भीड़, अपने नेता के मौके से हटने के बाद भी कोई वापस नहीं चली गयी। इसके बजाए उसने उग्र जवाबी प्रदर्शन से होते हुए, हमलावर भीड़ों का रूप ले लिया। ये हमलावर भीड़ें और-और उग्र तथा हमलावर होती गयीं। उन्हें सीएएविरोधी प्रदर्शनकारियों से, जिनमें महिलाएं ही ज्यादा थीं, सीधे टकराने का मौका तो पुलिस की मौजूदगी में नहीं मिला, लेकिन शाम होते-होते दोनों पक्षों के बीच कुछ दूरी के साथ पत्थरबाजी के कई मोर्चे खुल चुके थे।

सीएएविरोधी प्रदर्शनकारियां को सीधे हमले से बचाए रखने के अलावा, पत्थरबाजी के मैदान में पुलिस अक्सर परोक्ष तथा कहीं-कहीं प्रत्यक्ष रूप से, कथित सीएए-समर्थकों के पाले में थी।

सोमवार की सुबह तक ये कथित सीएए समर्थक जगह-जगह हथियारबंद दंगाइयों में बदल चुके थे, जो घूम-घूमकर ओर धार्मिक पहचान पता कर, मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर हमले कर रहे थे और उनके घरों, दुकानों, वाहनों आदि को जला रहे थे, जबकि पुलिस आम तौर पर या तो मौके से गायब ही थी या तमाशा देखने से लेकर, हमलावरों की मदद करने तक की भूमिका में थी। इस बीच, हिंसा बढ़ने के साथ दोनों समुदायों के लम्पट और अपराधी तत्व, अपने-अपने समुदायों के रखवाले बनकर सांप्रदायिक युद्ध के मैदान में कूद चुके थे।

दोपहर में, महाराज ट्रंप के अभूतपूर्व स्वागत-सत्कार के लिए अहमदाबाद के मोंटेरा स्टेडियम तक पहुंचने तक, दिल्ली पुलिस के सब-इंस्पेक्टर समेत, कई मौतों की खबर आ चुकी थी।

क्रोनोलॉजी का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भाजपा नेता कपिल मिश्र के उकसावे पर कथित सीएए-समर्थक भीड़ों के, सीएएविरोधी प्रदर्शनकारियों को लाठी के जोर से हटाने के लिए सड़कों पर उतारने और पथराव के कई मोर्चे खुलने के बाद, जब यह साफ-साफ दिखाई दे रहा था कि ऐन विदेशी मेहमान के सामने दिल्ली में सांप्रदायिक आग भडक़ सकती है, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, जिनके पास सीधे दिल्ली में कानून व व्यवस्था की मशीनरी का नियंत्रण है, अमरीकी राष्ट्रपति की अगले दिन की यात्रा के लिए इंतजामात के चाक-चौबंद होने की जांच करने के लिए, अहमदाबाद जाकर बैठ गए।

इतवार की नाजुक रात में ही नहीं, सोमवार को पूरे दिन भी देश के गृहमंत्री को, दिल्ली में सुलगती, फैलती आग की चिंता करने की फुर्सत नहीं थी या शायद इच्छा ही नहीं थी। सोमवार की रात को लौटने के बाद ही शाह को दिल्ली का ध्यान आया, जब तक हालात बहुत बिगड़ चुके थे और मौतों का आंकड़ा दर्जन से ऊपर निकल चुका था। सांप्रदायिक भीड़ों के बेरोक-टोक हमले करते घूम रहे होने के वीडियो, समाचार चैनलों व सोशल मीडिया में इस तरह छा चुके थे कि ताकतवर विदेशी मेहमान की उन पर नजर पड़े बिना नहीं रह सकती थी। उधर दिल्ली में अधिकारहीन सत्ता में बैठी आम आदमी पार्टी सरकार ने तथा विपक्ष ने, दंगे रुकवाने के लिए अपनी पुकारें तेज कर दी थीं।

मंगलवार के दिन, ट्रम्प के दिल्ली में रहते-रहते भी, अतिम शाह ने दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल व राज्यपाल समेत अधिकारियों के साथ और कुछ राजनीतिक पार्टियों के साथ, बैठकें करने समेत कुछ सक्रियता जरूर दिखाई। यह सक्रियता संभवत: इसलिए भी जरूरी समझी गयी कि विदेशी मीडिया में दिल्ली का दंगा छाया हुआ था और अमरीकी राष्ट्रपति के अपनी यात्रा के औपचारिक हिस्से के बाद प्रैस के साथ अपनी बातचीत में, इस संबंध में कुछ न कुछ टिप्पणी करने की आशंका थी।

बहरहाल, तब तक काफी देर हो चुकी थी। उसके ऊपर से सारे सुरक्षा ताने-बाने का ध्यान, अमरीकी राष्ट्रपति की सुरक्षा की व्यवस्थाओं में ही लगा हुआ था। मंगलवार में दंगे की आग सबसे ज्यादा भडक़ी। पुलिस अगर थी भी तो मुख्य सडक़ों पर ही और वहां भी मूक दर्शक बनी हुई, जबकि गलियों में आग भडक़ती रही।

हिंदू दंगाइयों को इसका भरोसा होने ने भी आग को और भडक़ाया कि पुलिस उनके साथ है। जगह-जगह ये दंगाई पुलिस हमारे साथ है के नारे लगाते नजर भी आए।

दंगाइयों का बोलबाला इतना ज्यादा था कि दंगा-पीडि़त इलाके के एक छोटे से निजी अस्पताल के डाक्टरों की अपील पर कि, उनके यहां पहुंच रही घायलों की भीड़ को समुचित उपचार के लिए सुविधासंपन्न जीटीबी अस्पताल नहीं जाने दिया जा रहा था, दिल्ली हाई कोर्ट की एक बैंच को मध्य रात्रि में एक जज के आवास पर सुनवाई कर के पुलिस को आदेश देने पड़े कि मरीजों को निकालने के लिए, सुरक्षित रास्ता मुहैया कराया जाए।

अमरीकी मेहमान की रवानगी की अगली ही सुबह, अलग-अलग प्रकरणों में दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की दो बैंचों ने राजधानी के हालात को लेकर कानून-व्यवस्था के तंत्र को तथा परोक्ष रूप से इस तंत्र के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार को, कड़ी फटकारें भी लगायीं।

जहां सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने, सरकारी वकील के विरोध के बावजूद, पुलिस में निर्णय की स्वतंत्रता तथा प्रोफेशनलिज्म के अभाव पर खेद जताया, वहीं हाई कोर्ट के न्यायाधीशों ने 1984 के सिख विरोधी नरसंहार को याद करते हुए कहा कि उसे, दोहराने नहीं दिया जाएगा। यहां तक कि हाई कोर्ट के बैंच ने पुलिस के प्रतिनिधि को मिश्रा तथा अन्य भाजपायी नेताओं के भडक़ाऊ भाषणों के वीडियो भी दिखाए और उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया। यह दूसरी बात है कि उसी रात को केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के न्यायाधीश, मुरलीधर के चंडीगढ़ हाई होर्ट के लिए तबादले के आदेश जारी कर दिए, ताकि वह अगले दिन की सुनवाई में हाजिर न रह सकें, जिसमें पुलिस को एफआइआर करने के संबंध में उक्त निर्देश का जवाब देना था।

बहरहाल, इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री समेत विपक्ष ने हालात को संभालने में पुलिस के पूरी तरह से विफल रहने को देखते हुए, फौज को बुलाए जाने की मांग तेज कर दी थी। इसी सब की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को हालात संभालने में पुलिस का नेतृत्व करने के लिए रोबिनहुड की मुद्रा मैदान में उतारा, जिन्होंने प्रभावित इलाकों के लोगों तक पहुंचने की कोशिश भी शुरू की।

इसके साथ ही पुलिस ने कुछ मामले भी दर्ज किए तथा कुछ लोगों को दंगों के सिलसिले में हिरासत में लेने की शुरूआत की। उधर दोपहर बाद प्रधानमंत्री ने भी अपना लगभग 70 घंटे या तीन दिन का मौन तोड़ते हुए, नागरिकों से शांति बनाए रखने की अपील जारी की, हालांकि उन्होंने मृतकों के लिए कोई संवेदना तक जताने की जरूरत नहीं समझी, जबकि यह आंकड़ा दो दर्जन तक पहुंच चुका था। बहरहाल, प्रधानमंत्री के ट्विटर संदेश के जरिए और उससे बढ़कर गृहमंत्री को किनारे कर, एनएसए को पुलिस के ऑपरेशनों का नेतृत्व सौंपने के जरिए बोलने के बाद से, हिंसा का ज्वार धीमा पड़ऩा शुरू हो गया है। यह इस क्रोनोलॉजी का आखिरी महत्वपूर्ण चरण है।

दिल्ली-2020, गुजरात-2002 की पुनरावृत्ति है या 1984 की, इस पर बहस होती रहेगी। लेकिन, 1984 और 2002 की महत्वपूर्ण साझा विशेषता, दिल्ली-2020 में भी साफ देखी जा सकती है। सत्ताधारियों का सोच-समझकर एक समय तक हिंसा होने देना और पुलिस का बहुसंख्यक दंगाई भीड़ों का हिस्सा बन जाना या कम से कम इन भीड़ों को मनमानी करने देना। सत्ताधारियों की भूमिका, ऊपर की क्रोनोलॉजी से बिल्कुल स्पष्ट है।

रही पुलिस की भूमिका की बात तो टीवी तथा सोशल मीडिया में वाइरल इसके वीडियो की भरमार है कि किस तरह पुलिस वाले खुद दंगाइयों को पथराव करने के लिए उकसा रहे हैं, उनको हमला करने के लिए कवर मुहैया करा रहे हैं, सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को सांप्रदायिक गालियां दे रहे हैं, जगह-जगह लगे कैमरे तोड़ रहे थे। इस सब में सबसे भयानक है वह वीडियो जिसमें पुलिस वाले, पीट-पीटकर जमीन पर गिरा दिए और लहूलुहान पांच-छ: लोगों से, डंडे मार-मार कर राष्ट्र गान गवा रहे हैं।

सीएए के विरोध को सिर्फ मुसलमानों का मामला बनाकर, हिंदू विराधी/ राष्ट्र विरोधी और इसलिए ‘‘शत्रु’’ बनाने और उसे कुचलने के लिए शासन से लेकर भीड़ तक की हरेक ताकत का सहारा लेने की जो मुहिम पिछले दो महीने से ज्यादा से देश भर में चल रही है और जिसे उत्तर प्रदेश में दिल्ली के भाजपा के चुनाव प्रचार में उत्कर्ष पर पहुंचाया गया था, उसके बाद दिल्ली-2020 तो होना ही था।

हां ट्रम्प की मौजूदगी में उसका होना योजना के अनुरूप था या नहीं, यह एक दूसरी ही बहस है।

0 राजेंद्र शर्मा

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