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अंधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे

एक बात तय है कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के क्रम में देश की राजनीति और सम्पूर्ण समाज को ही विपक्षविहीन बना देने को मैदान में उतरे मोदी-शाह एक भी ऐसा मौका नहीं छोड़ते जब वे दूसरों के प्रति अपनी घृणा का खुलकर प्रदर्शन न करते हों।

अब कल नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के कार्यालय में पहले ऑडिट दिवस को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम देश की पुरानी सरकारों के बारे में जानते हैं और उनकी हकीकत भी जानते हैं। एक समय था जब ऑडिट को बड़े डर और चिंता की नजर से देखा जाता था। कैग बनाम सरकार की एक सामान्‍य सोच बन गई थी। कुछ को लगता था कि कैग को हर जगह गलत ही दिखाई देता है लेकिन आज इस सोच में बदलाव आ गया है। ऑडिट को आज वैल्‍यू एडिशन के रूप में देखा जाता है। कुछ ही संस्‍थान समय के साथ मजबूत और अधिक मैच्‍योर होते जाते हैं। बीते कुछ दशकों में कई संस्‍थानों ने अपनी अहमियत को खो दी थी लेकिन कैग ने हमेशा ही अपनी चमक को बरकरार रखा है। यह बड़ी जिम्‍मेदारी है।

जबकि हकीकत इसके एकदम उलट है।

आरटीआइ के तहत मिली जानकारी के अनुसार कैग ने 2015 में 55 ऑडिट रिपोर्ट्स पेश की थीं, परतु 2020 में उनकी संख्या घटकर एक चौथाई यानी सिर्फ 14 ही रह गई। अर्थात पिछले पांच सालों में केंद्र सरकार पर कैग रिपोर्ट्स में 75 फीसदी की कमी आई। क्या मोदी इसे ही वैल्‍यू एडिशन, मैच्‍योरिटी और जिम्‍मेदारी कह रहे हैं?

अब जब तत्कालीन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय द्वारा 2010 में प्रस्तुत ऑडिट रिपोर्ट का भांडा फूट चुका है कि उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के विरुद्ध एक षड्यंत्र के तहत भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाये गये थे जो न्यायालय में गलत साबित हो चुके हैं और जिसके कारण राय को माफी तक मांगनी पड़ी है, तब भी मोदी का ऐसा कहना उस मुद्दे पर कैग को क्लीन चिट देना है।

उन्‍होंने कहा कि सरकार ने मुद्रीकरण (नोटबंदी) जैसे बड़े फैसले लिए। इसकी वजह से अर्थव्‍यवस्‍था को तेज गति मिली। इसका पूरी दुनिया ने स्‍वागत भी किया।

इस बात पर पूरी दुनिया एक तरफ और मोदी जी एक तरफ।

सारी दुनिया कह रही है कि नोटबंदी एक गलत फैसला था जिसने भारत की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी लेकिन मोदी जी मानने को तैयार नहीं। ऊपर से तुर्रा यह कि वे अपने भाषण में कह गये कि हमारी सरकार समस्‍याओं का समाधान तभी कर सकी जब हम उन समस्‍याओं की सही तरीके से पहचान कर सके।

तो क्या देश की अर्थव्यवस्था नोटबंदी से पहले की स्थिति में लाई जा चुकी है? इसकी वजह से जो कल-कारखाने बंद हो गये थे, वे खुलवा दिये गये हैं? जो विदेशी कंपनियां अपना काम-धंधा समेटकर वापस चली गईं, उन्हें लौटाया गया है अथवा उनसे भी अधिक पूंजीनिवेश भारत आया?

पीएम मोदी ने इस कार्यक्रम में कहा कि पारदर्शिता न होने की वजह से बैंकिंग सैक्‍टर में पहले दूसरी ही प्रक्रिया इस्‍तेमाल में लाई जाती थी। इसका परिणाम हुआ कि बाद में एनपीए का दायरा बढ़ता ही गया लेकिन हमारी सरकार ने चरणबद्ध तरीके से चीजों को सुधारा।

जबकि रिजर्ब बैंक के ही आंकड़े बता रहे हैं कि 2014 में मनमोहन सरकार ने बैंकों का NPA 2 लाख 64 हजार करोड़ पर छोड़ा था और मोदी राज में यह 9 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। इस प्रकार मोदी सरकार में फरवरी 2021 तक 875 हजार करोड़ रुपए का लोन राइट-ऑफ हो चुका है।

इस कार्यक्रम में उन्‍होंने यह भी कहा कि शुचिता और पारदर्शिता हम सभी के लिए मोरल बूस्‍टर होते हैं लेकिन जब उनकी अपनी डिग्री से लेकर रफाल विमान सौदा, कृषि कानून को राज्यसभा से पारित कराने या मीडिया के सवालों का जवाब देने जैसे असंख्य मामलों की बारी आती है तब उन्हें यह याद नहीं रहता। कांग्रेस शासनकाल में बनाये गये सूचना का अधिकार कानून को कमजोर कर वे आज शुचिता और पारदर्शिता का कीर्तन कर रहे हैं तो इसे क्या लोगों को बेवकूफ बनाना नहीं कहा जायेगा?

कुल मिलाकर मामला सदैव की तरह पिछली सरकारों पर झूठ-कपट के जरिये कीछड़ उछालना और ‘अंधा बाटें रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे’ वाला है।

श्याम सिंह रावत

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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