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Demonstrations in Germany protesting against restrictions imposed in COVID's name

कोविड-19 : कथित कांस्पीरेसी थ्योरी किसके खिलाफ है?

समाज कर्मी मेधा पाटकर ने पिछले दिनों जर्मनी में  कोविड के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों (Demonstrations in Germany protesting against restrictions imposed in COVID‘s name) को ‘प्रेरणादायक खबर’ (inspirational news) बताया, जिस पर राजनीति-शास्त्री जानकी श्रीनिवासन (Political scientist Janaki Srinivasan) ने उन्हें याद दिलाया कि यह प्रदर्शन  दक्षिणपंथियों द्वारा आयोजित किया गया था, जो एक भयावह कांस्पिरेसी-थ्योरी पर आधारित है। इसमें कुछ भी प्रेरणादायक नहीं है।यह बातचीत बुद्धिजीवियों, समाज-कर्मियों व संपादकों के हमारे ऑनलाइन संवाद-समूह “Jan/जन” में चल रही है।  मेरी यह टिप्पणी उसी क्रम में है : प्रमोद रंजन

कोविड-19 : कथित कांस्पिरेसी थ्योरी किसके खिलाफ है?

30 अगस्त को सामने आई रिर्पोटों के अनुसार, जर्मनी में कोरोनावायरस  की रोकथाम के लिए लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। 300 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार 29 अगस्त को  बर्लिन शहर की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए करीब 38,000 लोग उतरे। बाद में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने जर्मनी के संघीय संसद भवन रिचस्टैग पर धावा बोलने की कोशिश भी की।

इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने 1871-1981 के जर्मन रीच के झंडे लहराए और नाजी प्रतीकों को दिखाया। टीवी  फुटेज में ऐसे कुछ लोगों को रिचस्‍टैग बिल्डिंग की और दौड़ते हुए देखा जा सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना वायरस प्रतिबंधों का विरोध (Oppose Corona Virus Sanctions) करने वाले लोगों ने कई रैलियां निकाली हैं। ऐसे प्रदर्शन कई दूसरे यूरोपीय शहरों में भी हुए हैं, जिनमें प्रदर्शनकारियों ने वायरस को एक धोखा बताया है।

दरअसल, ऐसे प्रदर्शन छोटे-छोटे अनेक देशों में हो रहे हैं, जिनकी ख़बरें हम तक नहीं पहुंच रही हैं। हां, कोविड का वायरस है ही नहीं, ऐसा मानने वालों की संख्या बहुत कम है। हां, कुछ लोग यह आवश्यक मानते हैं और इसके प्रमाण देते हैं कि यह वायरस बायो-इंजीनियरिंग का नतीजा है।

कोरोना के कारण लगाए गए प्रतिबंधों और 5 जी सहित दूसरे मुद्दों के विरोध में लंदन के ट्राफलगर स्क्वायर में हजारों लोग एकत्र हुए थे। इसी तरह का विरोध प्रदर्शन पेरिस, वियना और ज्यूरिक में भी हुआ था। प्रदर्शनकारी  मास्क पहनने के कानून का विरोध कर रहे हैं तथा कोविड के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों को एक वैश्विक षडयंत्र मान रहे हैं।

Some powers are tapping the world fear in the name of COVID-19.

इन प्रदर्शनों का मूल स्वर यह है कि कुछ शक्तियां कोविड के नाम पर दुनिया भयादोहन कर रही हैं।

लेकिन भारत व अन्य देशों में कुछ बुद्धिजीवीगण इस विरोध प्रदर्शन को दक्षिपंथ द्वारा प्रायोजित “कांस्पिरेसी थ्योरी” पर आधारित कह रहे हैं। क्या इन बुद्धिजीवियों का  विरोध महज नाजी प्रतीकों से है? अगर ऐसा है तो यह उचित है, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं।

लगता है कि  दक्षिणपंथ, नाजी प्रतीक आदि एक आड़ है, जिनके पीछे छुप कर हम अपने नव-सृजित भय के संसार का आनंद ले रहे हैं। जैसे कभी-कभी विशालकाय वातानुकूलित अंधेरे हॉल में, कुछ स्नैक्स (अल्पाहार) के साथ किसी भूतहा फिल्म का आनंद लेते हैं। हम जानते हैं कि वहां से बाहर निकलते ही रोशनी होगी, जीवन सामान्य होगा। लेकिन आज जो कुछ घटित हो रहा है वह सिनेमा हॉल के पर्दा नहीं है। अर्थ-व्यवस्था और  तकनीक पर काबिज होकर कुछ लोगों ने विश्व को ही सिनेमा हॉल बना दिया है। और यह साफ तौर पर बिना योजना के नहीं हुआ है।

कोविड नामक बीमारी, कोरोना –2 नामक वायरस भले ही मौजूद हो, लेकिन उसके भय को जिस प्रकार सयास अनुपातहीन बनाया गया है, वह एक कांस्पिरेसी का हिस्सा है।

उनकी कोशिश है कि इस रंग-पटल पर सिर्फ उनकी फिल्में चले। हो सकता है कल यह फिल्म बदल जाए। भूतहा के बाद आपको कोई रोमांटिक फिल्म दिखाई जाए। लेकिन आजादी के प्रकाश वाली हमारी वह असली जगह खत्म हो चुकी होगी।

सवाल यह है कि अगर कोविड के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध  “कांस्पिरेसी थ्योरी” पर आधारित है तो यह थ्योरी क्या कहती है?

क्या यह उन लोगों के खिलाफ है, जो लॉकडाउन के कारण भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं? क्या यह भारत, नेपाल, बांग्लादेश की उन छात्राओं के खिलाफ है, जिनकी पहली पीढ़ी स्कूल में पहुंची थी? जिनके माता पिता का रोजगार खत्म हो गया और जिनपर  देह-व्यापार के दलाल डोरे डाल रहे हैं? क्या यह उन लाखों लोगों के खिलाफ कांस्पिरेसी है जो किडनी, हृदय रोग, कैंसर आदि रोगों से पीड़ित थे, और  लॉकडाउन के कारण इलाज नहीं मिलने से मर गए?  क्या यह उन लोगों के खिलाफ कांस्पिरेसी है, जिन्होंने भारत जैसे देशों में पहली बार गरीबी रेखा को पार किया था, लेकिन लॉकडाउन के कारण वापस अपनी जगह पर धकेल दिए गए हैं?  क्या यह मध्यम वर्ग के उन लोगों के खिलाफ कांस्पिरेसी है जो एक मनुष्य के रूप में अपनी आजादी से इश्क करते हैं?

इन प्रतिबंधों का विरोध करने वालों की राजनीति चाहे जो भी हो, लेकिन हमें यह तो देखना ही चाहिए कि यह किसके खिलाफ है? और साथ ही यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि  एक वैचारिक समूह के रूप में हम किसके पक्ष में खड़े हो रहे हैं?
Pramod ranjan प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन, आधुनिकता के विकास और ज्ञान के दर्शन में रही है। ‘साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ और ‘शिमला-डायरी’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उनके द्वारा संपादित दक्षिण भारत के सामाजिक-क्रांतिकारी ईवी रामासामी पेरियार के प्रतिनिधि विचारों पर केंद्रित तीन पुस्तकों का प्रकाशन हाल ही में हुआ है। रंजन इन दिनों असम विश्वविद्यालय के रवींद्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज में प्राध्यापक हैं।
प्रमोद रंजन

ऐसा कोई भी बुद्धिजीवी जो जनता से जुड़ा हो, जो उनके दुखों को समझता हो, इन प्रतिबंधों के पक्ष में नहीं हो सकता। चाहे वह किसी भी राजनीतिक धारा में विश्वास रखता हो।

यह कौन सी चेतना है जो हममें से कई लोगों को बिग टेक, बिग फर्मा और डिजिटल तकनीक के सहारे अपना वैश्विक राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक साम्राज्य बनाने वालों के सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित कर रही है?

[विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व प्रकाशन संस्थानों से संबद्ध  रहे प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन और आधुनिकता के विकास  में रही है। पेरियार के लेखन और भाषणों का उनके द्वारा संपादित संकलन तीन खंड में हाल ही में प्रकाशित हुआ है। संप्रति, असम विश्वविद्यालय के रवींद्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज में सहायक-प्राध्यापक हैं।

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