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इस अग्निपथ पर हमसफ़र मिलना मुश्किल

पलाश विश्वास

कल हमारे छोटे भाई और रिटायर्ड पोस्टमास्टर समीर चन्द्र राय (Retired Postmaster Sameer Chandra Rai) हमसे मिलने दिनेशपुर में प्रेरणा अंशु के दफ्तर (Prerna Anshu’s office in Dineshpur) चले गए। रविवार के दिन मैं घर पर ही था। हाल में कोरोना काल के दौरान गम्भीर रूप से अस्वस्थ होने की वजह से उसे जीवन में सबकुछ अनिश्चित लगता है।

इससे पहले जब वह आया था, रूपेश भी हमारे यहां था। उस दिन भी उसने लम्बी बातचीत छेड़ी थी।

उस दिन उसने कहा था कि गांवों में स्त्री की कोई आज़ादी नहीं होती। हमें उन्हें आज़ाद करने के लिए हर गांव में कम से कम 5 युवाओं को तैयार करना चाहिए।

हम सहमत थे।

उस दिन की बातचीत से वह संतुष्ट नहीं हुआ। उसके भीतर गज़ब की छटपटाहट है तुरन्त कुछ कर डालने की। आज हमारे बचपन के मित्र टेक्का भी आ गए थे। बाद में मुझसे सालभर का छोटा विवेक दास के घर भी गए।

बात लम्बी चली तो मैंने कहा कि मैं तो शुरू से पितृसत्ता के खिलाफ हूँ और इस पर लगातार लिखता रहा हूँ कि स्त्री को उसकी निष्ठा, समर्पण, दक्षता के मुताबिक हर क्षेत्र में नेतृत्व दिया जाना चाहिए। लेकिन पितृसत्ता तो स्त्रियों पर भी हावी है। इस पर हम सिलसिलेवार चर्चा भी कर रहे हैं।

जाति उन्मूलन, आदिवासी,जल जंगल जमीन से लेकर सभी बुनियादी मसलों पर हम सम्वाद कर रहे हैं ज्वलन्त मसलों को उठा रहे हैं।

हमारे लिए सत्ता की राजनीति में शामिल सभी दल एक बराबर हैं। विकल्प की राजनीति तैयार नहीं हो सकी है। न इस देश में राजनैतिक आज़ादी है।

सामाजिक सांस्कृतिक सक्रियता के लिये भी गुंजाइश बहुत कम है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है।

स्त्री आज़ादी के नाम पर पितृसत्ता के लिए उपभोक्ता वस्तु बन रही है। क्रयक्षमता उसका लक्ष्य है और वह गांव और किसान के पक्ष में नहीं, बाजार के पक्ष में है या देह की स्वतंत्रता ही उसके लिए नारी मुक्ति है तो मेहनतकश तबके की, दलित आदिवासी और ग्रामीण स्त्रियों की आज़ादी, समता और न्याय का क्या होगा?

समीर अम्बेडकरवादी है।

हमने कहा कि अम्बेडकरवादी जाति को मजबूत करने की राजनीति के जरिये सामाजिक न्याय चाहते हैं, यह कैसे सम्भव है?

साढ़े 6 हजार जातियों में सौ जातियों को भी न्याय और अवसर नहीं मिलता।

संगठनों, संस्थाओं और आंदोलनों पर, भाषा, साहित्य, सँस्कृति, लोक पर भी जाति का वर्चस्व।

फिर आपके पास पैसे न हो तो कोई आपकी सुनेगा नहीं। कोई मंच आपका नहीं है।

समीर हरिदासपुर प्राइमरी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ता था और उसका मंझला भाई सुखरंजन मेरे साथ। उनका बड़ा भाई विपुल मण्डल रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता थे। जिनका हाल में निधन हुआ।

70 साल पुराना वह हरिदासपुर प्राइमरी स्कूल बंद है। इलाके के तमाम प्राइमरी स्कूल रिलायंस को सौंपे जा रहे हैं। क्या यह कोई सामाजिक राजनीतिक मुद्दा है?

नौकरीपेशा लोगों के लिए समस्या यह है कि पूरी ज़िंदगी उनकी नौकरी बचाने की जुगत में बीत जाती है। चंदा देकर सामाजिक दायित्व पूरा कर लेते हैं। नौकरी जाने के डर से न बोलते हैं और न लिखते हैं। कोई स्टैंड नहीं लेते। लेकिन रिटायर होते ही वे किताबें लिखते हैं और समाज को, राजनीति को बदलने का बीड़ा उठा लेते हैं।

सामाजिक काम के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है। जैसे मेरे पिता पुलिन बाबू ने खोया। हासिल कुछ नहीं होता।

राजनीति से कुर्सी मिलती है लेकिन सामाजिक सांस्कृतिक काम में हासिल कुछ नहीं होता। इसमें सिर्फ अपनी ज़िंदगी का निवेश करना होता है और उसका कोई रिटर्न कभी नहीं मिलता।

समाज या देश को झटपट बदल नहीं सकता कोई। यह लम्बी पैदल यात्रा की तरह है। ऊंचे शिखरों, मरुस्थल और समुंदर को पैदल पार करने का अग्निपथ है।

इस अग्निपथ पर साथी मिलना मुश्किल है।

जो हाल समाज का है, जो अधपढ अनपढ़ नशेड़ी गंजेड़ी अंधभक्तों का देश हमने बना लिया, युवाओं को तैयार कैसे करेंगे।

मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर भी सार्वजनिक सम्वाद जरूरी है।

मेरे भाई, समीर, निराश मत होना। हम साथ हैं और हम लड़ेंगे। लेकिन यह लड़ाई सामाजिक मोर्चे की है और यह संस्थागत लड़ाई है, जिसे जारी रखना है।

तुम्हारे मेरे होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

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