किसी की आपदा, किसी का अवसर! मेहनत-मजदूरी करने वालों की आपदा को कार्पोरेटों के लिए अवसर बनाने की धोखाधड़ी नहीं चलेगी

महामारी के बीचो-बीच और वास्तव में देशव्यापी लॉकडाउन के बीच (Amidst nationwide lockdown), प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब ‘आपदा को अवसर’ बनाने का आह्वान किया था, उस समय तो उनके कटु आलोचकों ने भी नहीं सोचा होगा कि वह सचमुच, कोविड-19 महामारी की आपदा को, कार्पोरेटों की सेवा के अपने असली एजेंडा को पहले से भी तेजी से आगे बढ़ाने का अवसर बना लेंगे। जाहिर है कि उस समय तो प्रधानमंत्री के ज्यादातर आलोचकों ने भी इसे ‘शब्द क्रीड़ा’ का ही मामला माना था।

आत्मनिर्भर भारत’ के नये नारे के उछाले जाने ने, वास्तव में इसके ‘शब्द क्रीड़ा’ का मामला होने धारणा को बल देने का ही काम किया था।

बहरहाल, महामारी के बीचो-बीच और वास्तव में भारत में इस महामारी के ज्वार के प्रचंड से प्रचंडतर होने के बीच, नरेंद्र मोदी ने इस आपदा को सचमुच कार्पोरेट खिलाड़ियों की लंबे समय से चली आ रही मांगों को पूरा करने के, असाधारण अवसर में तब्दील कर के दिखा दिया।

          कोविड-19 की आपदा के चलते, काट-छांट के साथ कराए गए संसद के संक्षिप्त मानसून सत्र (Brief Monsoon Session of Parliament) में कृषि तथा मजदूरों के अधिकारों संबंधी छ: विधेयकों पर जिस तरह संसदीय अनुमोदन की मोहर लगवायी गयी है, किसानों व मजदूरों और आम तौर पर सभी मेहनतकशों की आपदा को, कार्पोरेटों के हित साधने का अभूतपूर्व अवसर बनाए जाने की ही कहानी कहती है।

जाहिर है कि इस घातक महामारी की आपदा  में कार्पोरेटों की सेवा के अवसर तलाशने की विधिवत शुरूआत तो मानसून सत्र से काफी पहले तभी हो गयी थी, जब लॉकडाउन के बाद ‘अनलॉक’ (‘Unlock’ after lockdown) शुरू करने की तैयारियों के हिस्से के तौर पर, आठ घंटे के श्रम दिन की व्यवस्था समेत, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाले तमाम श्रम कानूनों को निरस्त/स्थगित करने की होड़, राज्यों के बीच शुरू करायी गयी थी।

          जाहिर है कि मोदी सरकार के इशारे पर, भाजपायी राज्य सरकारें इस होड़ में आगे-आगे थीं। वैसे प्रधानमंत्री ने सीधे भी, कोविड-19 के दौर में चुनौतियों से निपटने के लिए उठाए गए ‘अच्छे कदमों’ के लिए, राजस्थान की गैर-भाजपा सरकार की प्रशंसा (Non-BJP government of Rajasthan praised) करने के जरिए, इस होड़ को बढ़ावा दिया था। याद रहे कि राजस्थान की सरकार ऐसी अकेली गैर-भाजपा सरकार थी, जिसके महामारी के दौर में उठाए गए श्रम कानूनों को स्थगित या कमजोर करने के कदम प्रधानमंत्री मोदी को, कोविड का मुकाबला करने के कदमों के तौर पर ‘सार्वजनिक प्रशंसा लायक’ लगे थे! यह दूसरी बात है कि इसके बाद भी, उसी राजस्थान सरकार को बड़े पैमाने पर दलबदल के खेल के जरिए गिरवाने की खुल्लमखुल्ला मुहिम छेडऩे में, जो अंतत: कामयाब नहीं हो पायी, मोदी सरकार के मंत्रियों समेत सत्ताधारी भाजपा को, ज्यादा समय नहीं लगा।

मजदूर-हितकर कानूनों को खत्म या कमजोर करने की इस मुहिम को, मानसून सत्र में तीन कथित श्रम संहिताओं पर मोहर लगवाने के जरिए, अपने नतीजे तक पहुंचा दिया गया है, जो तीन दर्जन से ज्यादा श्रम कानूनों का स्थानापन्न होंगी। जाहिर है कि श्रम-कानूनों में मजदूर विरोधी बदलावों (Anti-labor changes in labor laws) की यह मुहिम महामारी से पहले से और वास्तव में मोदी सरकार के पहले कार्यकाल (First term of Modi government) के दौर से ही शुरू  हो गयी थी और महामारी से पहले के संसद के सत्र में, इसी शृंखला की एक और संहिता पर संसद से मोहर भी लगवायी जा चुकी थी। बहरहाल, महामारी ने मोदी सरकार को अभूतपूर्व तेजी से और बिना किसी रोक-टोक के, इस मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने का मौका दे दिया।

The second front of the campaign to convert disaster into an opportunity was opened in the field of agriculture.

          आपदा को अवसर में बदलने की इस मुहिम का दूसरा मोर्चा, कृषि के क्षेत्र में खोला गया। बेशक, इस हमले की शुरूआत भी ओपनअॅप के बीच हो गयी थी। कृषि के क्षेत्र में कार्पोरेट पूंजी को और वास्तव में देसी बड़ी पूंजी से लेकर, विदेशी साम्र्राज्यवादी एग्री-कार्पोरेशनों तथा साम्राज्यवाद तक के हितों की सेवा करने के लिए, बाकायदा तीन अध्यादेशों से शुरूआत की गयी थी, ताकि आजादी के बाद के इन तमाम दशकों में किसानी-खेती के संरक्षण के लिए जो भी व्यवस्थाएं खड़ी की गयी थीं, उन्हें ध्वस्त किया जा सके। इस मामले में सीधे साम्राज्यवाद की संलिप्तता को याद रखना जरूरी है। सभी जानते हैं कि विश्व व्यापार संगठन के गठन (Formation of World Trade Organization) तथा गैट प्रक्रिया के तहत, भारत में खेती-किसानी को हासिल संरक्षण शुरू से और लगातार, साम्राज्यवादी ताकतों के निशाने पर रहा है।

          इसमें भी दो चीजें खासतौर पर उनके निशाने पर रही हैं। काश्तकारों के लिए एक निश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) सुनिश्चित करने की व्यवस्था। और इसे व्यवहार में लाने के लिए खासतौर पर खाद्यान्न की उल्लेखनीय पैमाने पर सरकारी खरीद और इस खाद्यान्न के सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public distribution system) के जरिए घटी हुई दरों पर वितरण की व्यवस्था। अमरीका तथा योरपीय ताकतों की यह दलील रही है कि भारत की ये व्यवस्थाएं, भारतीय खेतिहरों को कीमतों के स्तर पर अनुचित लाभ दिलाती हैं और बाजार को बहुराष्ट्रीय एग्रीबिजनस फर्मों के खिलाफ और पश्चिमी खाद्यान्न उत्पादकों के खिलाफ झुकाती हैं!

          नवउदारवादी दौर में उचित दर पर सरकारी खरीद और सस्ती दरों पर सरकारी बिक्री की इन व्यवस्थाओं को किस तरह कमजोर किया गया है, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। बहरहाल, मोदी सरकार शुरू से इस मामले में साम्राज्यवादी एजेंडा (Imperialist agenda) को पूरी तरह से लागू करने की हामी रही है। उसने इसका एक तरह से एलान ही कर दिया था, जब उसके द्वारा कथित कृषि सुधारों के लिए गठित शांताकुमार कमेटी (Shantakumar committee) ने, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद और सस्ती दरों पर खाद्यान्न वितरण की पूरी व्यवस्था को ही खत्म किए जाने की सिफारिश की थी।

अपने पहले कार्यकाल के पहले वर्षों में ही, भूमि अधिग्रहण कानून में कार्पोरेटपरस्त बदलावों की कोशिश (Trying to change corporate policy in land acquisition law) में अपने हाथ जला चुकी मोदी सरकार, शांताकुमार कमेटी की सिफारिशों पर तब भले ही अमल नहीं कर पायी, उसने अपनी दिशा नहीं बदली थी और महामारी से अवसर मिलते ही, वह तीन अध्यादेश जारी करने के जरिए, कार्पोरेट एजेंडे पर अमल करने में जुट गयी। अब इन तीनों कृषि अध्यादेशों का स्थान लेने के लिए विधेयक मंजूर किए जाने के साथ, यह कोशिश अपने नतीजे पर पहुंच गयी है।

          जाहिर है कि इन दोनों ही मोर्चों पर और वास्तव दूसरे भी सभी मोर्चों पर, अपने कार्पोरेट-सांप्रदायिक गठजोड़ के एजेंडा को आगे बढ़ाने में मोदी सरकार को, महामारी की आपदा में से एक और अवसर खोजे जाने से मदद मिली है। यह अवसर था, आपदा के नाम पर, समूची संसदीय व्यवस्था की ही बुरी तरह से काट-छांट कर डालने का अवसर। बेशक, मोदी निजाम हरेक पहलू से संसदीय व्यवस्था को कमजोर करने में तो पहले से ही लगा हुआ था। राज्यसभा और संसदीय कमेटियों की व्यवस्था, तो लगातार ही उसके निशाने पर रही थीं। इसके अलावा आम तौर पर संसद के सामने कार्यपालिका यानी सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली सभी व्यवस्थाएं भी, लगातार उसके हमले के निशाने पर थीं। वास्तव में सत्ताधारी पार्टी के बहुमत और उसके नेता की लोकप्रियता के अतिरंजित दावों को, संसद के सामने कार्यपालिका की जवाबदेही की मांगों को ही खारिज करने या दबाने का हथियार बना दिया गया था। बहरहाल, महामारी के बीच बुलाए जा रहे संसद के पहले ही सत्र को, संसदीय व्यवस्था को ही बुरी तरह से कतर देने का अवसर बना दिया गया।

          सबसे पहले तो सत्र की अवधि मनमाने तरीके से बहुत ही घटाते हुए, दो हफ्ते तक सीमित कर दी गयी।

उस दो हफ्ते में भी दो अलग-अलग पालियों में दोनों सदनों के बैठने की व्यवस्था के जरिए, हरेक कार्य दिन 4 घंटे में समेट दिया गया। फिर इस घटे हुए समय में सरकारी काम-काज को फिट करने के लिए, प्रश्न काल को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया और शून्य काल का समय आधा कर दिया। इसके ऊपर से सत्र को घटे हुए तय समय से भी पहले ही खत्म किए जाने का दबाव और बनाया जा रहा था। इसका नतीजा यह हुआ कि महामारी की चुनौती से लेकर, आर्थिक मंदी की और बेहिसाब बढ़ती बेरोजगारी तक की भारी चुनौतियों पर, संसद में व्यावहारिक मानों में कोई बहस ही नहीं हो सकी। सरकारी काम-काज के हिस्से के तौर पर, तीन कृषि संबंधी विधेयकों पर भी, चर्चा के नाम पर मुश्किल से रस्म-अदायगी ही हुई, जिसमें इतने महत्वपूर्ण तथा कृषि पर दूरगामी प्रभाव डालने वाले बदलावों पर चर्चा के लिए, सदस्यों को समय ही नहीं मिला।

          बिना किसी अर्थपूर्ण चर्चा के संसद से विधेयकों पर मोहर लगवाने की सत्तापक्ष की इसी हड़बड़ी में, राज्यसभा में ऐसी अभूतपूर्व स्थिति देखने को आयी, जैसी इससे पहले शायद ही कभी देखने में आयी होगी। स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार, अपने संशोधन प्रस्तावों पर विभाजन व मतदान की मांग करने वाले राज्यसभा सदस्यों की मांग की ही अनुसुनी नहीं की गयी, ‘अनुशासनहीनता’ के लिए इन सदस्यों को सत्र के आखिर तक के लिए सदन से निलंबित भी कर दिया गया। नतीजा यह कि पहली बार, निलंबित सांसदों ने संसद परिसर में गांधी की प्रतिमा के सामने दिन-रात का धरना ही नहीं दिया, समूचे विपक्ष ने अधिवेशन का बहिष्कार भी कर दिया। अगले ही दिन, लोकसभा में भी विपक्ष ने कार्रवाई का बहिष्कार कर दिया। यह दूसरी बात है कि मोदी सरकार ने इसे भी अवसर बना लिया और श्रम संबंधी तीनों विधेयकों को विपक्ष के बहिष्कार के बीच, बिना किसी चर्चा के ही पारित करा लिया।

          बहरहाल, जनता भी कोई आपदा के निकल जाने का इंतजार कर के, मोदी सरकार को अब कुछ भी करने का अवसर नहीं दे रही है।

23 सितंबर की मजदूरों की देशव्यापी कार्रवाइयों और फिर 25 सितंबर के किसानों के जबर्दस्त प्रदर्शनों ने, जिन्होंने देश के अनेक हिस्सों में चक्का जाम से लेकर बंद तक का रूप ले लिया, मोदी सरकार को नोटिस दे दिया है। मेहनत-मजदूरी करने वालों की आपदा को कार्पोरेटों के लिए अवसर बनाने की धोखाधड़ी नहीं चलेगी। सूट-बूट की सरकार नहीं चलेगी।                    

0 राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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