क्या भारत को 2030 की माँग को पूरा करने के लिए नई कोयला खदानों की वास्तव में आवश्यकता है?

Coal

Does India really need new coal mines to meet the 2030 demand?

पहले से आवंटित कोयला ब्लॉकों की न्यूनतम क्षमता 2030 में अपेक्षित मांग की तुलना में लगभग 15 से 20% अधिक है

– आवश्यकता से ज़्यादा कोयला उत्पादन बढ़ाने से अधिक आपूर्ति के कारण वित्तीय तनाव पैदा होगा और फंसी हुई संपत्ति में बदल जाएगा

– भारत सरकार कोयले के आयात को समाप्त करने के लिए मौजूदा खानों में कोयला का उत्पादन बढ़ा सकती है

नई दिल्ली, 28 जुलाई 2020. कोयले के व्यावसायिक उपयोग के लिए निजी कंपनियों को कोयला ब्लॉक की नीलामी करने की केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में की गई घोषणा (कोयले के व्यावसायिक उपयोग के लिए निजी कंपनियों को कोयला ब्लॉक की नीलामी करने की केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में की गई घोषणा) ने विभिन्न हितधारकों से मिश्रित प्रतिक्रियाएँ हैं। कुछ ने इसे एक काफी समय से प्रतीक्षित प्रमुख सुधार कहा। परन्तु, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की राज्य सरकारों ने पत्र या कानूनी चुनौती के माध्यम से अपनी चिंता दर्ज करके नीलामी का विरोध किया है। कोयला खदान यूनियनों ने कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) पर नकारात्मक प्रभाव के डर से निजीकरण का विरोध किया। इसके साथ ही पर्यावरणविदों और मानवाधिकार समूहों ने चिंता व्यक्त की कि कोयला खनन के विस्तार से हजारों हेक्टेयर से अधिक वन भूमि नष्ट हो सकती है और भारत के अंतिम शेष जंगल में स्वदेशी लोगों का विस्थापन हो सकता है।

इन ब्लॉकों की नीलामी का मुख्य कारण “बढ़ती मांग को पूरा करने और देश की आयात निर्भरता को कम करने के लिए घरेलू कोयला खनन क्षमता में विस्तार की आवश्यकता” बताया गया है।

यह देखते हुए कि देश एक वर्ष से अधिक समय से आर्थिक संकट से गुजर रहा है और कोविड-19 की स्थिति ने इसे और कठिन बना दिया है, भारत में कोयले के आयात में कमी आने से राजकोष पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी। इसके बावजूद यह समीक्षा करना महत्वपूर्ण है कि क्या वास्तव कोयला खदान का विस्तार अर्थव्यवस्था को जंपस्टार्ट/शुरू करने का सबसे अच्छा तरीका है ?

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA), जो एक स्वतंत्र अनुसंधान संगठन है और जो वायु प्रदूषण के समाधानों के साथ-साथ प्रवृत्तियों, कारणों और स्वास्थ्य प्रभावों का खुलासा करने पर केंद्रित है, ने तर्क को बेहतर ढंग से समझने के लिए, कोल इंडिया लिमिटेड और सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी द्वारा विभिन्न कोयला मांग अनुमानों को देखने का प्रयास किया है।

2017 में CIL द्वारा निर्मित कोल विज़न 2030[1] के अनुसार, 2020 में भारत में कुल कोयले की मांग 900-1,000 MTPA (मिलियन टन प्रति वर्ष) और 2030 तक 1,300-1900 MTPA होने की उम्मीद है। कोयले की मांग के स्पेक्ट्रम का ऊपरी सिरा सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 8 प्रतिशत[2] से मेल खाता है। कोयले की मांग के स्पेक्ट्रम का निचला छोर एक ऊर्जा कुशल परिदृश्य से मेल खाता है। दस्तावेज में यह भी उल्लेख किया गया है कि 2030 में समग्र थर्मल कोयले की मांग 1,150–1,750 MTPA होने का अनुमान है और शेष राशि कोकिंग कोल की मांग है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि 2017 में आवंटित / नीलामी की गई कुल खदानों की कुल क्षमता (कोल इंडिया लिमिटेड, सिंगारेनि कोलियरीज कंपनी लिमिटेड और नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन सहित) मौजूदा रेटेड क्षमता पर लगभग 1,500 MTPA है। संभावित मांग (बेस केस परिदृश्य) के मद्देनजर, पहले से नीलाम / आवंटित किए गए कोयला खदानों के आलावा नई कोयला खदानें शुरू करने की सीमित आवश्यकता है। (

इसके अलावा, वित्त वर्ष 2018-19 के लिए कोयला उत्पादन और आयात 964 मीट्रिक टन और कोयले का उठाव 911 मीट्रिक टन रहा, जिसकी तुलना में पिछले दो दशकों में CIL द्वारा कोयला उत्पादन पहली बार गिर गया है, उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2020 के लिए कुल कोयला उठाव सपाट रहा।

सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) द्वारा जारी एक अन्य रिपोर्ट, ऑप्टिमल जनरेशन कैपेसिटी मिक्स 2029-30[3], ने उल्लेख किया कि, “कोयला बिजली संयंत्रों से सकल उत्पादन वर्ष 2029-30[4] के लिए 1358 BU होने का अनुमान है। वर्ष 2029-30 के लिए कोयले की आवश्यकता को विशिष्ट कोयला 0.65 kg/kWh + 1% परिवहन हानि पर विचार करते हुए लगभग 892 मिलियन टन अनुमानित किया गया है।”

कोल विजन 2030 यह भी नोट करता है कि,

“कुल कोयला मांग के लगभग 70 प्रतिशत के साथ बिजली क्षेत्र प्रमुख उपभोक्ता खंड बना हुआ है।” दस्तावेज़ में आगे कहा गया है, “2030 तक गैर-विनियमित क्षेत्र से कोयले की मांग में अनुमानित वृद्धि ~ 6% CAGR (चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर), विनियमित क्षेत्र में अनुमानित मांग वृद्धि (~ 3% CAGR) से अधिक है। तथापि, विनियमित क्षेत्र दो-तिहाई योगदान के साथ सबसे बड़ा कोयला उपभोक्ता बना रहेगा। “

उपरोक्त संख्याओं के आधार पर यह स्पष्ट है कि वित्त वर्ष 2029-30 में कुल कोयले की आवश्यकता 1188 से 1273 मिलियन टन (MT)[5] की सीमा में होने वाली है।

ऊपर की गणना की गई कोयले की मांग 1300 मीट्रिक टन के नीचे आती है, जो कि CEA द्वारा ऑप्टिमल जनरेशन कैपेसिटी मिक्स 2020-30 के तहत, सबसे व्यवहार्य परिदृश्य के हिसाब से कोयले की मांग के समान है।

कोल इंडिया लिमिटेड, सिंगारेनि कोलियरीज कंपनी लिमिटेड और कैप्टिव (बंदी) कोल ब्लॉक सहित अन्य संस्थाओं को आवंटित कोयला खदानें के हिसाब से भारत में वर्तमान में 1500 मीट्रिक टन से ऊपर की क्षमता है, इसलिए पहले से आवंटित ब्लॉकों की न्यूनतम क्षमता 2030 में अपेक्षित मांग की तुलना में लगभग 15 से 20% अधिक है। यह नए कोयला ब्लॉकों की आवंटित या नीलामी करने की आवश्यकता पर एक प्रश्न उठाता है।

CIL का वर्तमान उत्पादन वित्त वर्ष 2019-20 के लिए लगभग एक बिलियन टन (BT) की खनन क्षमता के मुकाबले 602 मीट्रिक टन पर है, अगर अगले 10 वर्षों में CIL का उत्पादन साल दर साल 5% बढ़ता है, तो भारत में ~ 400 मीट्रिक टन अतिरिक्त कोयला CIL द्वारा होगा और राज्य और निजी संस्थाओं के साथ और 500 मीट्रिक टन क्षमता जो वित्त वर्ष 2019-20 में लगभग 60 मीट्रिक टन है। यह क्वांटम अगले दशक में आयात निर्भरता की जगह लेते हुए भारत में कोयले की मांग में वृद्धि को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

इसलिए उपरोक्त अनुमानों से यह स्पष्ट है कि भारत में पहले से ही 2030 तक खनन के लिए पर्याप्त भंडार है और यदि CIL, अन्य सार्वजनिक उपक्रम (PSU), कैप्टिव (बंदी) निजी और निजी वाणिज्यिक कोयला खनन, सभी अगले तीन से पांच वर्षों में अपने कोयला उत्पादन में वृद्धि करते हैं तो कोयला खनन क्षेत्र बड़े पैमाने पर ओवर सप्लाई (अधिपूर्ति) की स्थिति का सामना करेगा।

CREA के मुताबिक  ऊपर प्रस्तुत अनुमान एक रूढ़िवादी परिदृश्य के तहत हैं क्योंकि वास्तविक बिजली की मांग 19-वीं इलेक्ट्रिक पावर सर्वे (EPS 19) के तहत अपेक्षित बिजली की मांग से कम है, जिसे 2029-30 की कोयले की मांग की गणना के लिए आधार के रूप में उपयोग किया जाता है और पिछले तीन वर्षों के आंकड़े दर्शाते हैं कि वित्त वर्ष 2018-19 और 2019-20 में वास्तविक मांग की तुलना में EPS19 में अनुमानों को ओवर स्टेट किया गया है, जैसे के नीचे दी गई तालिका में दर्शाया गया है। EPS19 में मांग के इस बढ़े हुए प्रक्षेपण से 2029-30 में कोयला की वास्तविक खपत में और कमी आ सकती है।

Title 2017-18 2018-19 2019-20
       
EPS 19 Projections(MU) 1240760 1317962 1399913
       
Actual Energy Demand (MU) 1213240 1274564 1291010
       
Difference Between Projections and -3.2% -3.3% -7.8%
Actual Energy Demand (MU)      
       

 

कोविड 19 के कारण वर्तमान में चल रही अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं और बिजली के क्षेत्र में व्यवधान के साथ सस्ते रिन्यूएबल ऊर्जा में तेजी से वृद्धि को देखते हुए, निजी बिजली क्षेत्र के समान कोयला खनन क्षेत्र में स्ट्रेन्डेड एसेट्स (फंसी संपत्ति) की संभावना है।

 निष्कर्ष

यह देखते हुए कि पूर्ण क्षमता का उत्पादन करने के लिए नीलाम किए गए कोयला ब्लॉकों को तीन से पांच साल लगेंगे, यह अनुमान लगाना ठीक है कि कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) भी उसी समय के आसपास एक बिलियन लक्ष्य उत्पादन तक पहुँच जाएगा। इसलिए वर्ष 2025 तक 100-200 मिलियन मीट्रिक टन के दर से कोयले की बड़े पैमाने पर ओवर सप्लाई  की समस्या बनेगे, भले ही राज्य PSU और अन्य निजी कोयला खानों से उत्पादन समान रहे।

यहां तक ​​कि अगर हम मानते हैं कि CIL 2024-25 तक केवल 800 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच जाएगा, तो देश अतिरिक्त कोयला आवश्यकता के लिए पहले से आवंटित / नीलाम किए गए कोयला ब्लॉकों से उत्पादन आसानी से बढ़ा सकता है।

कोयले की नीलामी का केवल एकमात्र तरीका लाभदायक हो सकता है, अगर यह बात साफ़ हो कि मौजूदा कोयला ब्लॉक निकट भविष्य में पर्याप्त कोयला उत्पादन करने में असमर्थ हैं। यदि यह सच है, तो CIL और अन्य आवंटियों द्वारा यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित करने और यथार्थवादी ईंधन आपूर्ति समझौतों (FSA) पर हस्ताक्षर करने के पक्ष में मामला बनता है। इसके अलावा, आवंटित किए गए ब्लॉक जिन्हें विकसित नहीं किया जा सकता है, उन्हें भी निपटाना होगा।

अन्य बाजारों में कोयले के निर्यात का तर्क भी संदिग्ध है क्योंकि भारतीय कोयला इंडोनेशिया से उच्च गुणवत्ता वाले कोयले का मुकाबला नहीं कर पाएगा। कोयले की वर्तमान कीमत लगभग $50/टन है, जिस औसत लागत के करीब CIL अपना कोयला बेचता है। परन्तु इस तथ्य के कारण कि भारतीय कोयले का ताप मूल्य कम है, उससे आयातित कोयले के मुक़ाबले में ऊर्जा की समान मात्रा का उत्पादन करने के लिए दोगुनी मात्रा की आवश्यकता होगी, जिससे बहुत कम आयातित कोयले से उत्पादित किया जा सकता है। इस वजह से भारतीय कोयले से निवेश पर वापसी पड़ोसी देशों के लिए कम मोह रखती है। इसके अलावा, महामारी के बाद से कोयले की मांग में कमी आ रही है और जापान और उत्तर कोरिया में कोयला फेजआउट नीतियों के कारण इसमें और गिरावट आने की संभावना है। अंतर्राष्ट्रीय कोयले की कीमतों में गिरावट और भारतीय कोयले की कम गुणवत्ता को देखते हुए, भारतीय कोयले के लिए शायद कोई बाजार नहीं हो।

कोयला आयात को कम करना और आत्मनिर्भरता बढ़ाना एक अच्छा उद्देश्य है, लेकिन शायद इन उद्देश्यों को हजारों हेक्टेयर वन भूमि का त्याग किए बिना और स्वदेशी लोगों के विस्थापन के बिना हासिल किया जा सकता है। सरकार के अपने अनुमानों और मौजूदा कोयला खदानों की संचयी क्षमता के अनुसार, भारत को नई कोयला खदानों की आवश्यकता नहीं है।

[1]https://www.coalindia.in/DesktopModules/DocumentList/documents/Coal_Vision_2030_document_for_Coal_Sector_Stakeholde rs_Consultation_27012018.pdf

[2] पिछले 2 वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.1 और 4.2 रही है वित्त वर्ष 2018-19 और 2019-20 के लिए क्रमशः।

[3] http://cea.nic.in/reports/others/planning/irp/Optimal_mix_report_2029-30_FINAL.pdf

[4] 2019-20 में 961 BU की वास्तविक कोयला आधारित बिजली उत्पादन के आधार पर उपयोगिता पैमाने के बिजली क्षेत्र के लिए कोयला खपत लगभग 631 मिलियन टन थी।

[5] यह मानते हुए के उपयोगिता पैमाने की बिजली उत्पादन में कुल कोयला मांग का 75% और 70% योगदान है, जैसा कि कोल इंडिया विजन में अपेक्षित है। पृष्ठ 12, https://www.coalindia.in/DesktopModules/DocumentList/documents/Coal_Vision_2030_document_for_Coal_Sector_Stakeholders_Consultation_27012018.pdf

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें