क्या प्रियंका के रणनीतिकार सपा-भाजपा पर भारी पड़े हैं?

लखनऊ से रीना मिश्रा

कोरोना महामारी के बाद काफ़ी कुछ बदलने वाला है। समाज, अर्थव्यवस्था के साथ ही देश-प्रदेश की राजनीति भी अब पहले जैसी नहीं रहेगी। महामारियां चूंकि राजनीतिक नेतृत्व का परीक्षा भी लेती हैं इसलिए मुद्दे भी बदलेंगे और लोगों का मुद्दों को देखने का नज़रिया भी बदलेगा। वो अब इन कसौटियों पर नेतृत्व को परखेंगे। ऐसे में अगर हम उत्तर प्रदेश की सियासत को परखें तो भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस चारों पार्टियों के नेतृत्व को यहां की जनता इस चुनौती के बरक्स परखेगी की किसने उसे कोरोना से बचाने में क्या किया। उनके सेवाभाव, उनके नीतिगत गम्भीरता और दूरंदेशी को परखेगी।

अगर इस बिसात पर हम प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को परखें तो हम उसे इस महामारी से निपटने में पूरी तरह विफ़ल पाते हैं। ख़ास कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशासनिक अक्षमता और अदूरदर्शिता पूरी तरह खुल कर सामने आ गयी है। न तो वो मज़दूरों और प्रवासियों को ही समय पर वापस ला पाए न ही किसी तरह लौटने में सफल रहे प्रवासियों को क्वारंटाइन (quarantine of migrants) करने का ही इंतज़ाम कर पाए, जिसके चलते यह महामारी अब गांव तक में पहुँच चुकी है। जबकि अगर योगी जी समय रहते इन इंतज़ामों को वरीयता देते तो गांव बच सकते थे।

आम लोग भी यह कहते सुने जाने लगे हैं कि योगी सरकार की पूरी प्राथमिकता इस महामारी को मीडिया मैनेज करके हराने की थी, जो अंततः विफ़ल होने को अभिशप्त थी। उन्हें लगता है कि सरकार और सरकारी तंत्र को जितनी तत्परता और योजनाबद्ध तरीके से काम करना चाहिए था वो नहीं कर पाई।

वहीं मुख्यमंत्री का यह बयान कि वह लौटे हुए प्रवासियों को मनरेगा के तहत गांव में काम देंगे भी राजनीतिक तौर पर परिपक्व बयान नहीं माना गया, क्योंकि इससे यह संदेश लोगों में गया कि इस सरकार और 6 साल से चल रही केंद्र की मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में ऐसी कोई योजना ला पाने में विफ़ल रहे हैं जो गांव में ही लोगों को रोज़गार दे सके।

ग़ौरतलब है कि मनरेगा कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की देन है और 2014 में मोदी ने सरकार बनाने के बाद उसे कांग्रेस की विफ़लता का प्रतीक बताया था। मनरेगा के तहत रोज़गार देने की घोषणा के राजनीतिक साइड इफ़ेक्ट को शायद योगी सरकार ने भांपते हुए अपनी गलती को दुरुस्त करने की कोशिश के तहत फ़िर घोषणा कर दी कि वो मज़दूरों को फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) के सहयोग से रोज़गार दिलवाएंगे। कांग्रेस को माइलेज़ न मिले इस लिए मनरेगा को पीछे किया तो गया लेकिन योगी यह भूल गए कि अप्रवासी श्रमिक, औद्योगिक श्रमिक नहीं हैं जिन्हें आप फिक्की के ज़रिए रोज़गार दे देंगे।

वहीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी द्वारा बसों के प्रस्ताव को जिस तरह योगी सरकार ने राजनीतिक द्वेष के तहत ठुकराया उससे भी आम जनमानस में अच्छा संदेश नहीं गया। आम तौर पर लोग यह मानते दिखे कि जितनी भी बसें थीं उनसे काम लिया जा सकता है। भारतीय जनमानस की मानसिक बुनावट को यहाँ भी योगी समझने में विफ़ल रहे। वहीं रही सही कसर बस प्रकरण पर बसपा सुप्रीमो मायावती के कांग्रेस पर हमलावर बयानों ने पूरा कर दिया, जिससे यह संदेश गया कि भाजपा के साथ ही बसपा भी कांग्रेस को घेरने में एक साथ आ गयी है। इससे आम लोगों में यह संदेश गया कि भले ही राजनीति के तहत ही प्रियंका ने प्रस्ताव दिया था, लेकिन उससे ख़राब राजनीति का प्रदर्शन कर उसे ठुकराना ठीक नहीं था। इस पूरे मामले में भाजपा से दुखी सवर्ण मतदाता और बसपा की बढ़ती अप्रासंगिकता को देख पाने वाले दलित वर्ग में कांग्रेस को लेकर सकारात्मक संदेश गया।

यहां यह याद रखना भी ज़रूरी होगा कि यूपी से पलायित मज़दूरों का बड़ा हिस्सा दलित और कमज़ोर तबके से ही आता है और प्रियंका के बसों के प्रस्ताव से सबसे ज़्यादा फ़ायदा भी इन्हें ही होना था। इसीलिए मायावती जी को टीम प्रियंका की इस मूव से ज़्यादा दिक़्क़त हुई।

वहीं इस पूरे प्रकरण में प्रियंका की तरफ़ से उनके निजी सचिव संदीप सिंह (Priyanka Gandhi’s personal secretary Sandeep Singh,) और योगी के प्रमुख सचिव अवनीश अवस्थी के बीच जिस तरह पत्र युद्ध चला उसमें न सिर्फ़ प्रियंका और उनके रणनीतिकार बीस नज़र आये उन्होंने भाजपा के खेमे में बसपा को लाकर एक तीर से दो निशाना साध लिया। वहीं पूरे प्रकरण पर सपा की चुप्पी और लॉक डाउन के 58 वें दिन सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी के हाईवे पर आकर श्रमिकों को खाना बांटना भी अखिलेश के रणनीतिकारों के सही समय पर निर्णय न ले पाने की कमज़ोरी को उजागर किया।

वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को जेल भेजा जाना (Ajay Kumar Lallu sent to jail) भी योगी सरकार का एक ग़लत फैसला (a wrong decision of Yogi government) साबित होता लग रहा है। क्योंकि अव्वल तो उनकी छवि एक संघर्षशील नेता की है और इस मामले में भी जनमानस में यह संदेश गया है कि वो प्रवासियों का सवाल उठाने के कारण जेल भेजे गए हैं। इससे उनके प्रति सहानुभूति बढ़ी है। सबसे अहम की लोगों में उनकी यह छवि मुख्यमंत्री के बरक्स बनी है। यानी वो चौथे नम्बर की पार्टी के नेता होते हुए भी सीधे नम्बर 1 की पार्टी के नेता से लड़ते दिखे। यानी यहां पर भी कांग्रेस के रणनीतिकार संदीप सिंह सपा और बसपा से रणनीतिक तौर पर बीस साबित हुए।

यहां यह याद रखना ज़रूरी होगा कि अजय लल्लू पिछड़ी जाति के कान्दू, जो बनिया समाज की उपजाति है उससे आते हैं। अगर मिथकों के आधार पर देखें तो यह लंबे समय बाद हुआ है कि कोई पिछड़ी जाति का नेता सवर्ण मुख्यमंत्री को सीधे चुनौती देते दिखा हो। एक ज़माने में ऐसा पूर्व मुख्यमंत्री और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव करते हुए दिखते थे।

इस तरह, सामाजिक समीकरण भी साधने में यहां प्रियंका और उनके सलाहकार सपा पर बीस पड़े हैं।

इन छोटी-छोटी, प्रतीकात्मक घटनाओं को लोग अभी संपूर्णता में नहीं देखेंगे क्योंकि अभी उसका वक़्त नहीं है, लेकिन इस प्रक्रिया से नए राजनीतिक विमर्श पैदा होने निश्चित हैं। क्योंकि चुनाव के वक़्त   जब बहुत कुछ कोरोना के कारण बदल चुका होगा, गांव, ग़रीब, अर्थव्यवस्था लंबे समय बाद फिर से राजनीति के केंद्र में आ चुके होंगे तब यही विमर्श निर्णायक तय होंगे।

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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