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Donald Trump

इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट को धमकाते डोनाल्ड ट्रम्प

Donald Trump threatening International Criminal Court

दुनिया का कोई भी देश अंतर्राष्ट्रीय समझौतों या फिर संयुक्त राष्ट्र के संगठनों के साथ उतना बुरा वर्ताव नहीं करता, जितना डोनाल्ड ट्रम्प की अगुवाई में अमेरिका कर रहा है. जो भी संगठन, संस्थान या फिर समझौता केवल उनकी बात नहीं मानता तो ट्रम्प उसे धमकाते हैं और अमेरिका को उससे अलग कर देते हैं, या फिर उसके काम में रुकावट पैदा करते हैं. यह एक लम्बी सूची है, पर हाल में ही उन्होंने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (international criminal court in hindi) के भी काम में बाधा पहुँचाई है.

हेग इंटरनेशनल कोर्ट की ताज़ा ख़बर

इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश फाटू बेन्सौदा अफगानिस्तान में वर्ष 2003 से 2014 के बीच बड़े पैमाने पर नागरिकों की ह्त्या से सम्बंधित मुकदमा देख रही हैं और इस सम्बन्ध में उन्हें तालिबानी नेताओं, अफगानिस्तान सरकार, अमेरिका सरकार और सीआईए के बयान लेने हैं.

जब अमेरिका सरकार को न्यायाधीश ने मार्च में नोटिस भेजा तब शुरू में ट्रम्प प्रशासन ने कोई जवाब नहीं दिया, पर हाल में ही सरकार ने एक आदेश जारी कर दिया जिसके तहत इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट से जुड़ा कोई भी व्यक्ति अमेरिका में प्रवेश नहीं कर सकता, इनका वीसा रद्द कर दिया गया है और यदि किसी भी कर्मचारी की संपत्ति अमेरिका में है तो उसे भी जब्त कर लिया जाएगा. यही नहीं, आदेश के मुताबिक़ इस कोर्ट को इन मामलों में मदद करने वालों के साथ भी ऐसा ही सलूक किया जाएगा.

अमेरिका द्वारा उठाये गए इस कदम की भर्त्सना इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के प्रमुख ने की है. इसके बाद कोस्टारिका और स्विट्ज़रलैंड की पहल पर लगभग 67 देशों ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के साथ एकता का इजहार किया है. इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, मेक्सिको, नीदरलैंड्स, न्यूज़ीलैण्ड, साउथ अफ्रीका, स्पेन, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं.

अमेरिका की इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट से नाराजगी केवल अफगानिस्तान के कारण ही नहीं है, बल्कि फिलिस्तीनियों के विरुद्ध नरसंहारों में शामिल इजराइल से पूछताछ (Interrogation of Israel involved in massacres against Palestinians) के कारण भी है. इजराइल की हरेक अमानवीय गतिविधियों के अमेरिका ही बढ़ावा देता है, इसलिए ट्रम्प प्रशासन हरेक जांच के दायरे से इजराइल को बचाता है.

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय | International Criminal Court

इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट एक स्थाई न्यायिक संस्थान है, जिसकी स्थापना वर्ष 1998 के रोम अंतर्राष्ट्रीय समझौते (Rome International Agreement of 1998,) के तहत की गई है. इसका मुख्यालय नीदरलैंड के शहर द हेग में है. इसी शहर में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस भी स्थित है, जो दो देशों के बीच के मतभेदों को सुलझाता है. इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट की स्थापना एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते के तहत की गई है, जिसका काम उन व्यक्तियों को सजा देना या उनके विरुद्ध निर्णय देना है जो नरसंहार, युद्ध अपराध या मानवता के विरुद्ध अपराधों से जुड़े हैं. इस न्यायालय में दो देशों के बीच मतभेद नहीं सुलझाए जाते बल्कि व्यक्तियों पर मुक़दमा चलता है. इस समझौते पर लगभग 120 देशों ने हामी भरी थी और 1 जुलाई 2002 तक इसपर 60 देशों ने हस्ताक्षर कर दिए थे. समझौते के तहत इसी तारीख से इस कोर्ट का कामकाज शुरू किया गया, और यह न्यायालय 1 जुलाई 2002 के बाद के ही सामूहिक हिंसा या नरसंहार की सुनवाई कर सकता है.

इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट, उन सामूहिक नरसंहार या मानवता के विरुद्ध अपराध करने वालों के विरुद्ध मुक़दमा दायर करने का आख़िरी पड़ाव है, जिनपर सम्बंधित देशों की सरकारें कार्यवाही नहीं करतीं. इस कोर्ट में समझौते में शामिल सभी देशों के विरुद्ध या फिर गैर-सदस्य देशों के उन नागरिको पर मुक़दमा दर्ज करने का अधिकार है, जो सदस्य देशों द्वारा किये गए अपराधों में शामिल हैं. इसका उदाहरण अमेरिकी सेना और अधिकारियों के विरुद्ध अफगानिस्तान में नरसंहार का मामला है. अमेरिका रोम समझौते से अलग हो चुका है, पर अफगानिस्तान इसका सदस्य है, इसलिए इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट अफगानिस्तान के मामले में अमेरिका से भी पूछताछ करने को स्वतंत्र है.

इस समझौते से अलग होने के पहले अमेरिका ने शर्त रखी थी कि, यदि दुनियाभर में फैले उसके शांति सैनिकों या अधिकारियों के विरुद्ध इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट सुनवाई करता है तब वह अपने शांति सैनिकों वापस बुला लेगा. इस मांग को रोम समझौते के तहत इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट की निगरानी के लिए बनाए गए असेंबली ऑफ़ स्टेट पार्टीज ने नकार दिया था, उसके बाद अमेरिका इससे अलग हो गया. रूस, चीन और भारत इस समझौते में शामिल नहीं थे. इस समझौते में भारत चाहता था कि नरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के विरुद्ध अपराध की परिभाषा वही रखी जाए जैसा भारत चाहता है, पर इस मांग को अस्वीकृत कर दिया गया था.

इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में पहली सुनवाई 2006 में की गई थी. मामला था, सामूहिक नरसंहार और बच्चो के सेना में भर्ती करने के मामले में कांगो के पूर्व सेनाध्यक्ष थॉमस लुबेंर्गा के विरुद्ध मुकदमे को स्वीकार किया जाए या नहीं.

इस सुनवाई में यह मुक़दमा स्वीकार किया गया, और वर्ष 2009 से इसकी लगातार सुनवाई शुरू की गई. इस मामले में थॉमस लुबेंर्गा दोषी करार दिए गए और मार्च 2012 में उन्हें 14 वर्षों के कारावास की सजा सुनाई गई.

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वर्ष 2007 में इस न्यायालय ने सूडान के ही एक तत्कालीन मंत्री और एक हिंसक समुदाय के मुखिया अली कोशेइब के विरुद्ध अरेस्ट वारंट जारी किया था. उनपर बलात्कार और सामूहिक नरसंहार का आरोप था, उन्हें भी इसी वर्ष 9 जून को सजा सुनाई गई है.

वर्ष 2009 में इस कोर्ट ने सूडान के तत्कालीन राष्ट्रपति ओमर हसन अहमद अल-बशीर के खिलाफ वारंट जारी किया था. यह पहला मौका था जब किसी राष्ट्राध्यक्ष के खिलाफ इस कोर्ट ने वारंट जारी किया था.

इस समय इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में कुल 28 मुकदमे दायर हैं, जिसमें से 13 पर कार्यवाही की जा रही है, और शेष पर अभी प्रारम्भिक विचार किया जा रहा है. कार्यवाही जिन देशों से जुड़ी है, उनके नाम हैं – कोस्टा डीआइवरी, माली, लीबिया, जॉर्जिया, सूडान, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो, बुरुंडी, यूगांडा, केन्या, अफगानिस्तान और बांग्लादेश/म्यांमार. इसी तरह फिलीपींस, इराक, उक्रेन, नाइजीरिया, गिनी, वेनेज़ुएला और कोलंबिया से सम्बंधित मामलों पर प्रारम्भिक विचार किया जा रहा है.

इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ही अकेली संस्था नहीं है जिसके साथ डोनाल्ड ट्रम्प का व्यवहार इस तरह का है. अपने पूरे शासन काल में अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और संस्थानों की उपेक्षा करने या फिर उनसे अमेरिका के अलग होने की एक लम्बी लिस्ट है.
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

अब तक अमेरिका ट्रांस पसिफ़िक पार्टनरशिप, पेरिस क्लाइमेट ऐग्रीमेंट, यूनेस्को, ग्लोबल कॉम्पैक्ट फॉर माइग्रेशन, ईरान न्यूक्लियर डील, यू एन ह्यूमन राइट्स काउंसिल, यू एन रिलीफ एंड वर्क्स एजेंसी, आर्म्स कण्ट्रोल ट्रीटीज विथ रसिया और वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन से अपने आप को अलग कर चुका है. इसके अतिरिक्त ट्रम्प ने अनेकों बार वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन और नाटो से भी अलग होने की धमकी दी है.

इंटरनेशनल जस्टिस नामक संस्था के निदेशक रिचर्ड डीकर के अनुसार यात्रा पर प्रतिबन्ध और संपत्ति जब्त करने जैसी कार्यवाही तो मानवाधिकार का हनन करने वालों पर की जाती है, पर ट्रम्प प्रशासन तो अब उन पर कार्यवाही कर रहा है जो मानवाधिकार हनन के आरोपियों को सजा देने के लिए प्रयासरत हैं.

ट्रम्प प्रशासन अब स्वयं वैश्विक कानूनों और समझौतों और मानवाधिकार का लगातार उल्लंघन कर रहा है, मानवता के विरुद्ध अपराध (crimes against humanity) कर रहा है और ऐसे अपराधों को ढंकने का प्रयास करने लगा है. 

महेंद्र पाण्डेय

 

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