जेल से लिखे डॉ. कफ़ील का ख़त पढ़कर, दिल रखने वाला कोई भी इंसान रो पड़ेगा…

जेल से लिखे डॉ. कफ़ील का ख़त पढ़कर, दिल रखने वाला कोई भी इंसान रो पड़ेगा…

पिछले कई महीनों से डॉक्टर कफ़ील मथुरा जेल में हैं। इसी जेल से उन्होंने ने चार पन्नों वाला एक ख़त (Dr. Kafil’s letter written from jail) खुद अपने हाथों से लिखा है। ख़त पढ़कर कोई भी सीने में दिल रखने वाला इन्सान रोये बगैर नहीं रह सकता है। आखिर एक काबिल और जनता के डॉक्टर को जेल में बंद कर, सरकार क्या हासिल करना चाहती है?

आखिर डॉ. कफ़ील को इस बात के लिए तो सज़ा नहीं मिल रही है कि वे एक समुदाय विशेष में पैदा हुए हैं?

“किस बात की सज़ा मिल रही है मुझे?”—डॉक्टर कफ़ील ने उपर्युक्त पत्र में यह प्रश्न पूछा है। आखिर किस बात के लिए उन्हें अपने घरवालों से दूर कर दिया गया है। क्या सरकार को चलाने वाले लोग कभी यह नहीं सोचते होंगे कि बगैर डॉ. कफ़ील के उनके घर में ईद कैसे गुज़री होगी? आखिर कब तक डॉ. कफ़ील के घरवालों का हर रोज़ मुहर्रम में तब्दील होता रहेगा? ज़रा उनके इन शब्दों का दर्द तो महसूस कीजिए: “कब अपने बच्चे, बीबी, माँ, भाई, बहन, के पास जा पाऊँगा?”

घर की याद उनको ज़रूर सता रही है, मगर एक डॉक्टर के नाते वे खुद को जनता की सेवा न कर पाने की वजह से भी दुखी हैं। भारत में वैसे भी डॉक्टर और मरीज़ का अनुपात कम है। उस में भी एक बेहतरीन डॉक्टर को जेल में क़ैद कर सरकार कौन सा जनकल्याण कर रही है?

अपने पत्र के आखिरी जुमले में डॉ. कफ़ील कहते है कि “कब कोरोना की लड़ाई में अपना योगदान दे पाउँगा?”

विडम्बना देखिये कि जहाँ एक तरफ कोरोना महामारी फैलने के बाद विश्व जगत कैदियों को छोड़ने की बात कर रहा है, वहीँ भारत की सरकार इसी महामारी के दौरान अपने विरोधियों को जेल के अन्दर ठूंस रही है। कोरोना महामारी के बीच पुलिस ने बहुत सारे विद्वान, लेखक, मानवाधिकार से जुड़े कार्यकर्ता, छात्र नेता, मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए समाजी और राजनीतिक कार्यकर्ता पर राष्ट्रद्रोह और आतंकवाद से सम्बंधित केस लगा कर सलाखों के पीछे धकेल दी है।

जहाँ बाबा साहेब अम्बेडकर के रिश्तेदार एक्टिविस्ट स्कॉलर डॉ. आनंद तेलतुंबडे और मानवाधिकार के कार्यकर्ता गौतम नवलखा, मीरान हैदर, सफ़ूरा ज़रगर की गिरफ़्तारी हुई है, वहीँ  दानिश और उमर खालिद के ख़िलाफ़ यूएपीए जैसा भयानक केस थोप दिया गया है।

भारत सरकार को इस बात की ज्यादा सरोकार नहीं है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन, सयुक्त राष्ट्रसंघ जुड़े जानकर और मानवाधिकार कार्यकर्ता ने कहा है कि  जेल में कैदियों की भीड़ को कम करने की दिशा में क़दम उठाये जाएँ। सयुक्त राष्ट्रसंध के मानवाधिकार कमीशन ने अपने एक बयान में कहा है कि बहुत सारे मुल्कों में जेल की हालत ख़राब है और वहां कैदियों की भीड़ एक खतरा पैदा कर सकती है। अगर इस दिशा में क़दम नहीं उठाये गये तो नतीजे तबाही से भरे होंगें।

कैदियों को रिहा करने की दिशा में चलते हुए  चीन ने फरवरी में 555 कैदियों को रिहा किया था। ईरान ने भी 85 हज़ार लोगों को जेल से छोड़ा। तुर्की ने संसद में कानून पास कर 45 हज़ार कैदियों को आज़ाद किया। इंडोनेशिया ने कम से कम 30 हज़ार लोगों को बाहर निकला। हालाँकि मई के महीने में महाराष्ट्र की शिव सेना-कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस सरकार ने आर्थर जेल से 17 हज़ार कैदियों को अस्थाई रूप से रिहा किया था। मगर देश में बिगड़ते हुए हालात को देखते हुए इतना सब कुछ काफी नहीं था, क्यूंकि जेल के अंदर कोविड-19 के बहुत सारे केस सामने आये हैं।

‘नेशनल क्राइम ब्यूरो’ ने भारत के जेलों में बढ़ती भीड का आंकड़ा पेश करते हुए कहा कि साल 2018 में देश के 13 हज़ार 361 जेलों में 4 लाख 66 हज़ार कैदी बंद हैं जो उनकी झमता से तकरीबन 75 हज़ार से ज्यादा है।

हर प्रचार प्रसार का इस्तेमाल कर सरकार ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ की बात पर जोर दे रही है। लॉकडाउन भी इसी मकसद से सही ठहराया गया।

मोबाइल फ़ोन पर कोई भी नंबर डायल करने से पहले उपभोक्ता को यह नसीहत दी जा रही है कि वे अपने नाक पर रूमाल रखें और लोगों से दूरी बनायें। वहीँ दूसरी तरफ जेल में बंद लोगों की भीड़ को कम करने की दिशा में कोई भी बड़ा फैसला नहीं लिया जा रहा है। क्या डॉ. कफ़ील खान और उनके जैसे बाकी कैदियों की जान की कोई कीमत नहीं है?

तभी तो डॉ. खान अपने ख़त में लिखते हैं कि मैं “मगरिब (की नमाज़) पढ़ने के बाद ‘नावेल’ (उपन्यास) ले कर बैठ जाता हूँ। मगर वहां का माहौल ऐसा दम घुटने वाला होता है जिसे बयान नहीं किया जा सकता है। अगर बिजली चली गयी तो हम पढ़ नहीं सकते। फिर हम पसीने से सराबोर हो जाते हैं। रात भर कीड़े, मच्छर हमला करते हैं। पूरा बैरक मछली बाज़ार की तरह लगता है। कोई खास रहा है, कोई छींक रहा है, कोई पेशाब कर रहा है, कोई ‘स्मोकिंग’ कर रहा है…पूरी रात बैठ कर गुजारनी पड़ती है”।

याद रहे कि डॉ. कफ़ील पर ‘नेशनल सिक्यूरिटी एक्ट’ लगाया गया है। उन पर इलज़ाम यह है कि उन्होंने 13 दिसंबर को अलीगढ़ के एक (सीएए-विरोधी) मीटिंग में भड़काऊ भाषण दिया था। हालाँकि मानवाधिकार कार्यकर्ता इस करवाई को आदित्यनाथ योगी सरकार की ज्यादती करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि सीएए विरोधी करवाई के दौरान जिन्होंने कानून को अपने हाथों में लिया था वे आज़ाद घूम रहे हैं। दूसरी तरफ शांतिपूर्ण तरीके से नागरिकता कानून का विरोध करने वालों को ही ‘टारगेट’ किया जा रहा है।

साल 2017 में डॉक्टर कफ़ील देश विदेश की मीडिया में बड़ी खबर बनकर उभरे थे। तब राज्य की योगी ने उन पर लापरवाही का केस थोपकर सस्पेंड कर दिया था। उस वक्त वे बीआरडी अस्पताल गोरखपुर में कार्यरत थे, जहाँ ऑक्सीजन की कमी की वजह से 60 बच्चों की जान चली गयी थी। इस मामले को लेकर जब योगी सरकार घिर गई तो उनसे डॉ. कफ़ील को दोषी पाया। फिर उन्हें 9 महीने तक जेल काटनी पड़ी थी। मगर दो साल बाद सरकार द्वारा गठित जाँच टीम ने डॉ. कफ़ील खान को “क्लीन चीट” दे दिया।

(अभय कुमार एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। इससे पहले वह ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ काम कर चुके हैं। हाल के दिनों में उन्होंने जेएनयू से पीएचडी (आधुनिक इतिहास) पूरी की है।)

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner