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मुंह मत मोड़िए अफगानों की आर्थिक हालत से, जानिए तालिबान नेतृत्व के मानवाधिकारवादी मुखौटे की असल वजह

The economic condition of the Afghans | What Is the Future of Afghanistan?

इस्लामिक अमीरात को मान्यता कौन दे रहा है, नहीं दे रहा है, इस सवाल पर मंथन चलता रहेगा। बुनियादी प्रश्न खजाने का है। अफगानिस्तान में शासन चलाने और रोजमर्रे के लिए पैसा चाहिए, जिसपर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान शायद बहुत बाद में जाए। वो छोड़ गये हैं, 23 फीसद बेरोज़गार और ग़रीबी रेखा से नीचे आधी अफगान आबादी। 20 साल अमेरिका-यूरोप वाले क्या सिफ़र् बंदूक की नली घुमाते रहे, या उसकी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने की सोची? ख़ुद का पेट भरा, एनजीओ वालों को पाला-पोसा, लाखों की संख्या में लोग मरे, और बचे हुए बहादुर बोरिया-बिस्तर समेट निकल गये। कूड़े का अंबार इतना छोड़ दिया कि उसकी सफाई के वास्ते लाखों डॉलर चाहिए। अफगानिस्तान के जिन इलाकों में फोर्स की तैनाती थी, क्या वहां लगाये गये लैंड माइन साफ कर गये हैं? इस प्रश्न का उत्तर नाटो और पेंटागन को देना चाहिए।

दोहा समझौते में क्या छिपाया गया ?

724 मिलियन वर्गमीटर जमीन का कितना हिस्सा यूएक्सओ (अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस) से मुक्त है, इसका ब्लूप्रिंट अंतरराष्ट्रीय सेनाओं के पास होना चाहिए। दोहा समझौते में ये सूचनाएं साझा नहीं की गई हैं। तालिबान ने किन इलाकों में लैंडमाइन लगाये थे, इसका उन्हें पता है। हेरात, कंधहार में सबसे अधिक भूमिगत विस्फोटक लगाये गये थे। फराह, पाकतिया, क़ाबुल, जाबुल, गजनी और 2670 किलोमीटर लंबी पाक-अफगान सीमा को बांटती डुरंड लाइन जो क्वेटा, पिशिन, स्वात, घीर, चितरल, ख़ैबर पख्तूनख्वा जैसे सीमाई इलाकों को छूती है, वहां लैंडमाइन न लगे होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। बहुत से विस्फोटक सोवियत काल में लगाये गये थे। 1980 में अमेरिकंस ने मुज़ाहिद्दीनों को बड़ी संख्या में विस्फोटक दिये थे।

50 different types of explosives have been planted inside Afghan :

ह्यूमन राइट्स वॉच (human rights watch) ने जानकारी दी है कि अफगान भूमि के भीतर 50 अलग-अलग किस्म के विस्फोटक लगाये गये हैं, जिस वास्ते बेल्जियम, चीन, चेकोस्लोवाकिया, ईरान, इटली, पाकिस्तान, ज़िम्बाब्वे, सिंगापुर, यूके, युगोस्लोवाकिया जैसे देशों का वैध-अवैध योगदान रहा है। क्या इन्हें मानवाधिकार हनन का ज़िम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए? ये कुतर्क करेंगे, ‘यु़द्ध में सब जायज़ है।

तालिबान ने 1998 में बयान दिया था, ‘लैंड माइन लगाना इस्लाम के विरूद्ध है। हमने ऐसा करना बंद कर दिया है।ऐसे बयान पर क्या भरोसा कर लें?

यूनाइटेड फ्रंट के नेता बुरहानुद्दीन रब्बानी ने भी ऐसा ही बयान दिया था। मगर, जितने लोग भूमिगत विस्फोटकों के फटने से मरे, अथवा विकलांग हुए, उसके आंकड़े-तस्वीरें देखकर आप सिहर जाएंगे। लैंड माइन की गाथा काफी लंबी है, इसे यहीं छोड़ते हैं।

बात मानवाधिकार पर ज़ेरे बहस है। जो विकसित देश, संगठन अफगानिस्तान की जमा-पूंजी को फ्रीज कर चुके हैं, उसे सही मानें या ग़लत? विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि अफगान सरकार जो सार्वजनिक ख़र्च करती रही है, उसका 75 फीसद दान के पैसे से संचालित होता है। यह आदत आज से नहीं, 2001 से बिगड़ी हुई है। दिसंबर 2001 के बॉन कांफ्रेस को कवर करते समय मुझे अच्छी तरह वह दृश्य याद है, जब हामिद करज़ई दाता देशों के समक्ष याचक की भूमिका में थे। वही करज़ई क़ाबुल स्थित प्रेसिडेंशियल पैलेस में किस अज़ीमों शान से रह रहे थे, उसके विजुअल्स देखकर मुझे हैरानी हुई थी। अफग़ान शासकों में दान के बूते सत्ता चलाने और रईसी झाड़ने की आदत तब से पड़ी हुई है।

दुनिया के मुख्तलिफ हिस्सों में अफग़ान डोनर कांफ्रेंस (afghan donor conference) होता रहा है। 23-24 नवंबर 2020 को जेनेवा में जो अंतरराष्ट्रीय दाता सम्मेलन हुआ, उसमें यह बात निकल कर आई कि जो देश किस्तों में आर्थिक सहयोग करते रहे, 2016 के बाद एकमुश्त रकम भेजकर अफग़ानिस्तान से छुटकारा पाने लगे थे। मतलब, आप हमसे एक बार ख़ैरात लीजिए, और हमें माफ कीजिए। उस कांफ्रेंस में भारतीय दल का नेतृत्व विदेश मंत्री एस. जयशंकर कर रहे थे। वहीं पर भारतीय विदेश मंत्री अहद कर रहे थे कि अफग़ानिस्तान को संवारने में हम कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। अफग़ानिस्तान में भारत, 400 से अधिक परियोजनाओं पर काम कर रहा है, उनमें से सौ ऐसी परियोजनाएं हैं, जिनपर आठ अरब डॉलर का खर्चा आएगा। भारत पहले ही तीन अरब डॉलर अफग़ानिस्तान में ख़र्च कर चुका है।

Which country build Shahtoot dam? | Which dam is built by India in Afghanistan?
एस. जयशंकर ने खु़सूसन फुल-ए-खु़मरी ट्रांसमिशन लाइन का ज़िक्र किया, जिससे क़ाबुल शहर को जगमग करना है। शहतूत बांध परियोजना (Shahtoot Dam) भी उन अधूरी परियोजनाओं में से एक है, जिससे क़ाबुल शहर के कोई 20 लाख निवासी जल समस्या से राहत पा सकेंगे। कोरोना काल में भारत ने 75 हज़ार टन गेहूं अफग़ानिस्तान को भेजे थे। भारत के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में 65 हज़ार अफ ग़ान छात्र आए, और पढ़े। इन तमाम सहयोग का ज़िक्र एस. जयशंकर ने जेनेवा सम्मेलन में किया था।

मगर, सवाल है कि भारत ने अपने कंधे पर इतना सारा बोझ किस वास्ते उठा लिया? आप कभी अपने देश के टैक्स पेयर्स से पूछते नहीं कि किस देश में कितना आर्थिक सहयोग करें?

अफगान संसद का निर्माण किसने किया?

अंतरराष्ट्रीय भूगर्भ शास्त्रियों का अनुमान है कि अफगानिस्तान में एक ट्रिलियन डॉलर के खनिज भंडार हैं। तो क्या भारत को उसके खनन में कोई हिस्सेदारी मिल रही थी? या केवल वाहवाही लूटने, व्हाइट हाउस द्वारा पीठ ठोके जाने के जोश में यह सब हो रहा था? अच्छा है, भारत ने अफगा़न संसद का निर्माण किया। विश्व के वृहदाकार लोकतांत्रिक देश द्वारा यह सब करना सुखद लगता है। लेकिन उस संसद में भारतीय मानस और दक्षिण एशियाई एकता के विरूद्ध रूढ़िवादी सोच वाले लोग दोबारा से सत्तारूढ़ होंगे, उसकी परिकल्पना तो की होती, और अपनी कूटनीति को उस दिशा में ले गये होते।

2008 में चीन ने अफग़ानिस्तान के सबसे बड़े तांबा अयस्क भंडार कहे जाने वाले मेस आयनक माइंस का ठेका लिया था। 28 वर्गमील वाले इस इलाके से ताम्र अयस्क के खनन व वहां से माल उठाने में तेज़ी लाने के वास्ते चीन ने रेल लिंक स्थापित कर दी। यह तालिबान के प्रभाव वाला क्षेत्र है, यहां स्थानीय कबीलाई सरदारों से लेकर तालिबान नेतृत्व तक को चीन ने यदि अपने आइने में उतारा, तो उसकी रणनीतिक कुशलता व दूरदर्शिता की हमें दाद देनी होगी।

What kind of economic relations will India have with the Islamic Emirate of Afghanistan?

अभी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि भारत, इस्लामिक अमीरात अफग़ानिस्तान से किस तरह के आर्थिक संबंध रखेगा? पाकिस्तान-अफ ग़ान सीमा सील है। चुनांचे, जो कारोबार वाया कराची लैंड रूट से होता रहा, वह रुका पड़ा है। भारतीय बाज़ारों में सूखे मेवे की क़ीमतें चढ़ने लगी हैं। विगत वित्त वर्ष में 826 मिलियन डॉलर का सामान भारत ने अफग़ानिस्तान को निर्यात किया था, और वहां उसी अवधि में 509 मिलियन डॉलर की वस्तुएं आयात हुई थीं।

भारतीय चीनी का दूसरा बड़ा ख़रीदार है अफग़ानिस्तान

अफग़ानिस्तान, भारतीय चीनी का दूसरा बड़ा ख़रीदार है। 30 सितंबर 2020 से 31 मार्च 2021 तक अफग़ानिस्तान ने 6 लाख 24 हज़ार टन चीनी भारत से आयात किये थे। क्या उभयपक्षीय आयात-निर्यात यथावत रहना है? अभी इसपर कोई टिप्पणी प्रीमैच्योरहोगी।

अफग़ानिस्तान इस समय पेमेंट की हालत में भी नहीं है। विश्व मुद्रा कोष का अनुमान है कि अभी अफग़ानिस्तान की जमा-पूंजी 3 करोड़ 70 लाख एसडीआर रह गई है। इसे सवा पांच करोड़ डॉलर मानकर चलिये। अफग़ानिस्तान को अपनी आर्थिक गाड़ी चलाने के वास्ते 323.08 मिलियन एसडीआर (460 मिलियन डॉलर) चाहिए, जिसपर आईएमएफ ने रोक लगा रखी है। वेनेजुएला और म्यांमार भी ऐसे ही प्रतिबंध से गुज़र रहे हैं। ये दोनों देश मानवाधिकार हनन की वजह से एसडीआर का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

एसडीआर (स्पेशल ड्राविंग राइट्स) क्या है ? | What is SDR (Special Drawing Rights)?

एसडीआर (स्पेशल ड्राविंग राइट्स) अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था है, जिसमें अमेरिकी डॉलर, ब्रिटिश पौंड, यूरो, जापानी येन और चीनी मुद्रा युआनसमाहित कर विभिन्न सरकारें विनिमय के वास्ते इस्तेमाल करती हैं। एसडीआर का नियंत्रक-संचालक विश्व मुद्रा कोष (आईएमएफ ) है।

बुधवार को आईएमएफकी प्रवक्ता गैरी राइस ने बयान दिया, ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय अबतक ऊहापोह में है कि नये अफ ग़ान शासन को मान्यता दें, या नहीं। ऐसी स्थिति में यह देश विश्व मुद्रा कोष से एसडीआरकी सुविधाएं नहीं ले सकता।

इस हफ्ते की शुरूआत में यूएस कांग्रेस के 18 सदस्यों ने अमेरिकी वित्त मंत्री जेनेट येलेन को आगाह किया था कि वे तालिबान नियंत्रित शासन के लिए 50 करोड़ डॉलर रिलीज न करें, क्योंकि ये लोग उसका दुरूपयोग कर सकते हैं। अफग़ानिस्तान की अपनी जमा-पूंजी जो अमेरिकी फेडरल रिजर्व में सुरक्षित है, उसपर भी रोक लग चुकी है। दा अफगान बैंक (डीएबी) वहां का रिज़र्व बैंक है, उसके कार्यकारी गवर्नर अज़मल अहमदी ने 18 अगस्त 2021 को बयान दिया है कि 2020 के आख़िर तक न्यूयार्क स्थित फेडरल रिज़र्व में हमारे देश का लगभग 9 अरब डॉलर जमा था, जिसमें 1.2 अरब डॉलर का सोना भी शामिल है। उसे भी देने से अमेरिका मना कर रहा है। अमेरिका ने इसकी पुष्टि की है कि अफग़ानिस्तान के 9.5 अरब डॉलर जमा-पूंजी को हमने फ्रोजेन असेट‘(अवरूद्ध परिसंपत्ति) मान लिया है।

सही कहा जाये तो अफग़ानिस्तान कंगाली की तरफ तेज़ी से बढ़ चुका है। बैंकों के आगे भीड़ एक तय रकम ही निकाल सकती है। इससे संकेत मिलता है कि ख़ज़ाना ख़ाली है। काबुल स्थित प्रेसिडेंशियल पैलेस के कोष्ठ में 1 लाख 59 हज़ार 600 डॉलर के गोल्ड बार और चांदी के सिक्के रखे गये थे। क्या वो सुरक्षित हैं, या राष्ट्रपति ग़नी अपने साथ लेते गये? यह स्पष्ट नहीं है। तालिबान के पास अपनी फॉरेन करेंसी 362 मिलियन डॉलर की बताई जाती है। कुछ महीने वो शायद उस रकम के कुछ हिस्से से सरकार चला लें, मगर यह अंतिम उपाय नहीं है।

तालिबान नेतृत्व मानवाधिकारवादी बनने को क्यों तैयार है ?

नये शासन को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मान्यता मिले, उसके लिए तालिबान नेतृत्व मानवाधिकारवादी चोला पहनने को तैयार दिख रहा है। तालिबान इस वास्ते मानसिक रूप से तैयार होने लगे हैं कि देश की महिलाएं शिक्षण संस्थानों में जाना जारी रखें। पिछले शासन के नौकरशाहों को अमनेस्टीदेना उदारता की तरफ उनकी उन्मुखता को दर्शाता है। मगर, घर-घर सर्च ऑपरेशन भय भी पैदा करता है। इन्हें भूखा-नंगा न छोड़ना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ज़िम्मेदारी है। ज़्यादा पाबंदी आयद की, तो ये फिर से अफीम उत्पादन, फिरौती, हथियार तस्करी, अवैध खनिज उत्खनन जैसे कामों में लग जाएंगे।

पुष्परंजन

(लेखक ई-यू एशिया न्यूज़ नेटवर्क के दिल्ली स्थित संपादक, वरिष्ठ पत्रकार एवं विदेश मामलों के जानकार हैं। उनका यह लेख मुलतः देशबन्धु में प्रकाशित हुआ है। देशबन्धु में प्रकाशित आलेख का संपादित रूप साभार)

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