भारतीय मनीषा का सर्वोच्च उपहार : वर्ण व्यवस्था का अर्थशास्त्र

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  

अपने पिछले लेख में मैंने बताया था कि कोरोना ने जिस तरह धर्मों को संकटग्रस्त किया है, उससे जिन तबकों की प्राण-शक्ति धर्मों में निहित है, वे काफी चौंकन्ने हो गए हैं और धर्मों से मोह-मुक्त लोगों को नए सिरे से आस्थाशील बनाने का उपक्रम शुरू कर दिये है। साक्ष्य के तौर पर मैंने 28 मार्च से नए सिरे से शुरू रामायण – महाभारत के प्रसारण के साथ 29 मार्च को देश के सबसे बड़े हिन्दुत्ववादी अखबार मे छपी एक विशेष रिपोर्ट का उल्लेख किया था, जिसमें बड़े दावे के साथ कहा गया था कि विश्व गुरु भारत के परा विद्या की अनदेखी के कारण ही दुनिया कोरोना की महामारी झेलने के लिए अभिशप्त हुई है।

बहरहाल पिछले लेख में विज्ञान के समक्ष मज़ाक बनते धर्मों के लाभार्थी वर्गों द्वारा लोगों को नए सिरे से अस्थाशील बनाने का उपक्रम चलाये जाने की जो आशंका जाहिर किया था, वह सही साबित होती नजर आ रही है।

31मार्च को देश के सबसे बड़े हिंदुत्ववादी अखबार ने अपने संपादकीय पेज पर लीड आर्टिकल के तौर पर ‘अपनी विशिष्टताओं को पहचानने का सही समय’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित कर 29 मार्च को ‘सचमुच विश्व गुरु ! भारतीय गर्वित, दुनिया चकित’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट की ही बातों को आगे बढ़ाने का बलिष्ठ प्रयास किया है। इसमें लेखक गाय, गोबर, गोमूत्र के साथ हल्दी और ताम्र पात्रों मे छिपी रोग-प्रतिरोधक क्षमता का भूरि-भूरि गुणगान करने के साथ ही हिन्दू ऋषि-मुनियों के ज्ञान की प्रशंसा में पंचमुख होते हुये निष्कर्ष दिया है- ‘हमें अपनी ज्ञान- परंपरा और धर्म-संस्कृति से विमुख करने की कोशिशों का लंबा इतिहास है। औपनेशिक काल से आज के वामपंथी पत्रकारों और मीडिया तक का। इसलिए हमारे बच्चों, युवाओं को हिन्दू धर्म – संस्कृति की समुचित शिक्षा देना आवश्यक है। यही विश्व हित में है।

‘अतः एक ऐसे समय मे जबकि भाजपा सरकार और उसकी समर्थित मीडिया द्वारा, हिन्दू धर्म-संस्कृति और ज्ञान-परंपरा से जोड़ने की एक नई मुहिम ज़ोर पकड़ती दिख रही है, मानवतावादियों का अत्याज्य कर्तव्य बनता कि वे मानवता विरोधी ज्ञान परंपरा के सत्योंमोचन के लिए सामने आयें।

भारतीय हो या गैर-भारतीय, किसी भी ज्ञान-परंपरा पर कुछ टीका-टिप्पणी करने के पहले यह बुनियादी बात बात ध्यान में रखनी होगी कि प्रकृति का रहस्य सदा से ही मानव के कौतूहक का विषय रहा है और वह धूप-गर्मी, अग्नि-वृष्टि, जंगल-पहाड़, चाँद-सितारों का रहस्य जानकर प्रकृति को अपने अनुकूल करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहा है।

कोपरनिकस, जियार्दानों ब्रूनों, गैलेलिओ, लियोनार्डो विंसी, जीरोलामो फ़्रांकास्टोरो, विलियम हार्वे, जेम्स वाट, जार्ज स्टीफ़ेंशन इत्यादि ने यही काम किया।

परवर्तीकाल में प्रकृति के रहस्योंमोचन की उनकी ज्ञान- परंपरा को आगे बढ़ाते हुये उनकी भावी पीढ़ी ने धरती को धर्मशास्त्रों मे वर्णित स्वर्ग जैसा स्वरूप प्रदान कर दिया। इस मामले में प्रकृति की गोद मे बैठकर चिंतन करने वाले भारतीय ऋषि – मुनि भी पीछे नहीं रहे: उन्होंने भी प्रकृति का रहस्योंमोचन करने में भरपूर ऊर्जा लगाया। प्रकृति का रहस्योद्घाटन करते हुये हमारे ऋषि- मुनियों ने बताया चाँद पर दाग ऋषि गौतम द्वारा फेंककर मारे गए मृगछाला से बना है; ये तारें, मृत्यात्माओं की योनि रूप मे विद्यमान हैं। सूर्य का आकार उन्हें इतना ही बड़ा नजर आया कि उसे हनुमान द्वारा लीलने की कल्पना बिल्कुल ही अविश्वासनीय नहीं लगी। यह उनके प्रकृति के रहस्योंमोचन और वैज्ञानिक चिंतन की चंद बानगियाँ हैं।

प्रकृति अनुकूलन में भारतीय ऋषि-मुनियों का सबसे अनूठा अवदान 33 कोटि देवताओं का आविष्कार रहा। उन्होंने सिर्फ 33 कोटि देवताओं का आविष्कार ही नहीं किया, बल्कि उन्हे संतुष्ट कर अपने अनुकूल करने के लिए पूजा-पाठ, यज्ञ इत्यादि का असंख्य सूत्र भी रचा। भारतीय ऋषि-मुनियों के उस ज्ञान- परंपरा का अनुसरण करते हुये आज भी जब संकट का समय आता है, हिन्दू देवी-देवताओं के शरणागत होते हुये ऋषि-मुनियों के रचित अजस्र मंत्रों के सहारे उनका कृपा- लाभ जय करने का उपक्रम चलाते हैं। कोरोना की महामारी में इसका साक्ष्य फिर देखने को मिला।

चूंकि हमारे ऋषि-मुनियों के लिए पार्थिव जगत मिथ्या तथा परलोक के अदृश्य अजाने जगत में सुख- सुविधाए संरक्षित करना ज्यादे चिंता का विषय रहा, इसलिए वे परा-विद्या निगूढ़ ज्ञानार्जन को प्राथमिकता दिये। पराविद्या द्वारा विदेशी आक्रमण, वर्षा, आँधी, प्राकृतिक प्रकोपादि के

पूर्वानुमान लगाने की क्षमता प्रकृति प्रेमी ऋषि-मुनियों ने अपनी मुट्ठी में कर ली थी। यह भारत-भूमि का दुर्भाग्य है कि यहाँ विदेशी आक्रमणों का सैलाब आता रहा, महामारियों के प्रकोप से हजारो-लाखों लोग मृत्यु का शिकार बनकर परलोक गमन करते रहे : तूफान,बाढ़, भूकंपादि से अपार जन व धन का नुकसान होता रहा, किन्तु उनकी भावी पीढ़ी ने उस ज्ञान-परंपरा का सदुपयोग करना मुनासिब नहीं समझा। कारण, ऐसे कार्यो से लोगों का महज पार्थिव कल्याण होता, जबकि उनका परम लक्ष्य मरणोपरांत परलोक सुख सुलभ करना रहा। इसलिए प्राचीन हिन्दू मनीषा को लोगों को आत्म- ज्ञान अर्जन के पथ पर परिचालित करना, मानवता के हित में श्रेयष्कर कार्य लगा।

हिन्दू ज्ञान-परंपरा में जिसे सर्वोच्च वरीयता मिली उसका नाम है ‘आत्म-ज्ञान’; जिसने आत्म-ज्ञान लाभ नहीं किया, उसका जीवन ही वृथा है। यही कारण है कि आत्म-ज्ञान से समृद्ध होने के कारण ही अनपढ़ ब्राह्मण और साधू-संत ज्ञान के मामले में बड़े से बड़े डिग्रिधारियों को भी करुणा का पात्र समझते हैं: यही कारण है हजारों साल से उच्च से लेकर निम्न वर्ण के हिन्दू ‘आत्म-ज्ञान लाभ’ को जीवन का सर्वोच्च कार्य मानकर, इसके अर्जन मे जुटे रहे। आत्म-ज्ञान द्वारा ‘परमात्मा’ का साक्षात्कार होता है और उस साक्षात्कार से ईश्वर मे विलीन होने अर्थात मोक्ष-लाभ का मार्ग प्रशस्त होता है; जिसने खुद को आत्म-ज्ञान से विरत रखा, उसे जीवन का चरम मोक्ष पाने के लिए 84 लाख योनियों अर्थात प्रकृति में विद्यमान मनुष्य, पशु- पक्षी, कीड़े-मकोड़े इत्यादि असंख्य प्राणियों में जन्म लेने के बाद ही मोक्ष मयस्सर होगा, ऐसा मानना था ऋषि-मुनियों का। बहरहाल हजारों वर्षों से हिन्दू मनीषा की जो यात्रा आत्म-ज्ञान से शुरू हुई, वह आज भी उसी जगह स्थिर है। जिस तरह पश्चिम का चिंतन आध्यात्म से शुरू होकर विज्ञान की ओर अग्रसर हुआ तथा कोपरनिकस, ब्रुनो, गैलेलिओ, न्यूटन ,जेम्सवाट, विलियम हार्वे इत्यादि की ज्ञान-परंपरा को आगे बढ़ाते हुये उनकी भावी पीढ़ी ने आज मानव जाति को रोग-व्याधि से काफी हद तक मुक्त कर धरती पर स्वर्ग जैसी सुख-सुविधाओं मुहैया करा दिया है, वैसा कुछ भारतीय ज्ञान-परंपरा में नहीं बिल्कुल ही नहीं दिखता, जबकि चमत्कारिक परिणाम लाजिमी था। कारण, प्राचीन हिन्दू आध्यात्मिक मनीषियों को चिंतन का जितना उपयुक्त अवसर मिला, वैसा विश्व इतिहास में कहीं के भी मनीषियों को सुलभ नहीं रहा। देश का अधिकाधिक धन आश्रमों, देवालयों में आध्यात्मिक हस्तियों के चिंतन मे निवेश हुआ।

भूरि-भूरि सेवक-सेविकायेँ, देवदासियाँ इनकी सेवा लगाई गईं, ताकि छोटे-मोटे कामों से बाधित होकर इनके चिंतन में खलल न पड़ जाए। सुख-सुविधाओं के प्राचुर्य मे रहकर मोक्ष को ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य घोषित करने वाले हिन्दू मनीषियों को ऐसा कुछ उपाय जरूर विकसित कर देना चाहिए था, जिससे महज मोक्ष-लाभ के एकमेव कार्य में मानव जाति को अपनी अधिकतम ऊर्जा न लगानी पड़े।

बहरहाल सहस्रों वर्षों से बहुजनों के खून-पसीने की कमाई जिन मनीषियों के निर्विघ्न चिंतन में खर्च होती रही, उसके विनिमय मानव जाति को मिला बस लाख टके का ज्ञान: आत्म-ज्ञान ! और मिला हिन्दू धर्म-दर्शन की महान खोज,’ जगत मिथ्या और ब्रह्म ही सत्य है !’

हाँ, लौकिक कष्टों के निवारण की भी एक विरल वस्तु मिली, पराविज्ञान, जिसका सदुपयोग न कर पाने के कारण ही वेद-पुराणों के ज्ञाता ब्राह्मणों के अनुसार मानव जाति कोरोना की महामारी झेलने के लिए अभिशप्त हुई है।

कुल मिलाकर देखा जाय तो ऐसा लगेगा कि अपार सुख-सुविधाओं में रहकर चिंतन करने वाले प्राचीन प्राचीन मनीषियों ने कुछ नहीं दिया: उनका सारा ज्ञान व्यर्थ रहा। लेकिन ऐसा नहीं है, उन्होने मोक्ष की आड़ मे शासक वर्गों के हित में एक ऐसा अर्थशास्त्र विकसित किया, जिसे मानव जाति के चिंतन के इतिहास की अद्भुत घटना कही जा सकती है।

ज्ञात इतिहास में शासक वर्ग के हित में अर्थशास्त्र रचने का सबसे पहला व बड़ा काम किया था ई.पू. 380 में प्लेटो ने। उन्होंने यह सत्य स्थापित किया था कि मनुष्य की आत्मा में तीन तत्त्वों- तृष्णा यह क्षुधा- साहस- ज्ञान- की विद्यमानता रहती है।

ये तीनों गुण कमोवेश सब में रहते हैं, लेकिन प्रत्येक में इन तीनों में से किसी एक विशेष गुण की प्रधानता रहती है। इसलिए राज्य में इन तीन गुणों के आधार पर तीन वर्ग मिलते हैं। पहला, उत्पादक- आर्थिक कार्य (तृष्णा), दूसरा, सैनिक- रक्षा कार्य(साहस) और तीसरा, शासक वार्ग – दार्शनिक कार्य संपादित करने वाला।तीन गुणों के आधार त्रि-वर्ग सिद्धांत प्रस्थापित कर उन्होंने एथेंस के शासक वर्ग के हित में अपनी मनीषा का अभूतपूर्व इस्तेमाल किया था। किन्तु उन्होंने यह कार्य स्वेच्छा से नहीं, प्राण- भाय से किया था ।

प्लेटो प्राचीन विश्व के क्रांतिकारी मनीषी उस सुकरात के योग्यतम शिष्य रहे, जिस सुकरात ने अपने दौर के युवाओं को अपने विचारों के नशे में मतवाला कर दिया था, एवं इसके लिए जिसे शासकों के द्वाब मे विष-पान कर प्राण त्याग करना पड़ा था। उनकी मृत्यु के बाद प्लेटो प्राण बचाने के लिए देश छोडने के लिए विवश हुये थे प्लेटो। बाद में पकड़े जाने पर प्राण-भय से उन्होंने शासक वर्ग के हित मे त्रि-वर्ग का सिद्धान्त रचा,जिसे एथेंस की जाग्रत जनता ने विफल कर दिया।

इसकी विफलता का एक बड़ा कारण यह यह था कि उन्होंने अपने त्रि- वर्ग के सिद्धान्त को ईश्वर सृष्ट प्रमाणित का प्रयास नहीं किया था। यह काम भूरि-भूरि मात्रा में किया था विदेशागत आर्य मनीषियों ने। उन्होंने प्राण-भय से नहीं, बल्कि स्व- समुदाय के हित में शक्ति के समस्त स्रोत- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक- चिरस्थाई तौर पर ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों से युक्त सवर्णों के लिए आरक्षित करने तथा मूलनिवासियों(शूद्रातिशूद्रों) को उनका निःशुल्क दास बनाए रखने के लिए जिस वर्ण-व्यवस्था को जन्म दिया, उसे ईश्वर सृष्ट प्रमाणित करने में अपने अपनी मनीषा का जैसा इस्तेमाल किया, उसकी मिसाल मानव जाति के समग्र इतिहास मे मिलनी मुश्किल है: वैदिक साहित्य में जो हजारों –लाखों पन्नें रंगे गए हैं, वह मुख्यतः वर्ण-व्यवस्था को ईश्वर-सृष्ट प्रमाणित करने के लिए ही रंगे गए हैं।

हिन्दू धर्म का प्राणाधार वर्ण-व्यवस्था में एक हिन्दू का धर्म वर्ण-शुद्धता अर्थात धर्मशास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट निज-निज वर्ण के पेशे/कर्मों का अनुपालन रहा।इसमें ब्राह्मण का धर्म(कर्म) पठन-पाठन, पूजा-पाठ और राज्य संचालन में मंत्रणा- दान; क्षत्रिय का धर्म(कर्म) राज्य – संचालन, सैन्य- संचालन और वैश्य का धर्म पशुपालन, व्यवसाय- वाणिज्यादि रहा। वर्ण-व्यवस्था में शूद्रातिशूद्रों(दलित-आदिवासी-पिछड़ों) का धर्म(कर्म) तीन उच्चतर वर्णों की निष्काम सेवा रहा। इस सेवा के बदले उन्हे पारिश्रमिक मांगने का कोई अधिकार नहीं रहा। वर्ण-धर्म में किसी भी वर्ण का व्यक्ति किसी भी सूरत मे निज-वर्ण का कर्म/पेशा छोड़कर अन्य धर्मो का पेशा/ कर्म अपनाने के लिए स्वतंत्र नहीं रहा। ऐसा करने पर कर्म-संकरता की सृष्टि होती, जिसके विनिमय मे इहलोक मे राज-दण्ड तो परलोक मे नरक का सामना करना पड़ता। पेशों के विचलनशीलता(professional mobility) की निषेधाज्ञा के फलस्वरूप जहां शूद्रातिशूद्र 85 प्रतिशत जनता चिरकाल के लिए निःशुल्क दास(दैविक-सर्वस्वहारा) मे तब्दील होने के लिए अभिशप्त हुई, वहीं सवर्ण शक्ति के स्रोतों के दैविक-अधिकारी वर्ग के रूप मे चिन्हित हुये।

काबिलेगौर है कि ईश्वर-विश्वासी तमाम धर्मों ने ही जागतिक अर्थात पार्थिव सुखों को तुच्छ बताते हुये मरणोपरान्त पारलौकिक (जन्नत-पैराडाइज़-स्वर्ग) सुख को तरजीह दिया है। इस परलौकिक सुख के लिए जहां इस्लाम मे जकात, पाँच वक्त का नमाज; ईसाइयत मानव सेवा का उपाय सुझाया गया है, वहीं हिन्दू धर्म में इसके लिए स्व-धर्म पालन का निदेश दिया गया है।

स्व- धर्म पालन का मतलब यह रहा कि प्रत्येक वर्ण के लोग वर्ण- शुद्धता अर्थात अर्थात शास्त्रादेशों द्वारा निर्दिष्ट करते रहें। चूंकि गुण-कर्म के आधार पर हिंदुओं के बेहद पॉपुलर भगवान श्री कृष्ण गुण-कर्म के आधार वर्ण- व्यवस्था के निर्माण की स्वंय दांभिक घोषणा की है इसलिए सवर्ण जहां शक्ति के समस्त स्रोतों का भो अपना जन्मजात अधिकार समझते रहे हैं, वहीं शूद्रातिशूद्र आशक्त व विशुद्ध गुलाम बने रहकर भी जन्म-जात शोषकों के खिलाफ विद्रोह न कर वर्ण- व्यवस्था के प्रावधानों का अनुपालन यह सोचकर करते रहे कि इससे अगले जन्म मे सवर्ण के रूप में जन्म लेकर शक्ति के स्रोतों का भोग करने का अवसर पाएंगे।

वर्ण-व्यवस्था की इन खूबियों के कारण विवेकानंद जैसे कथित क्रांतिकारी संत इसे मानव जाति को ईश्वर प्रदत सर्वश्रेष्ठ उपहार करार देते रहे। वर्ण-व्यवस्था की खूबियों से अभिभूत रहने के कारण ही महात्मा गांधी इसके खात्मे की बात सुनकर काँप उठाते थे। आर्य मनीषियों द्वारा विकसित वर्ण- व्यवस्था से सिर्फ विवेकानंद और गांधी ही नहीं प्राचीन भारत के अनाम ऋषि-मुनि; मध्य युग के शंकराचार्य, सुर-तुलसी लेकर आधुनिक भारत के तमाम बामा क्षेपा- तैलंग स्वामी-श्यामाचरण लाहिड़ी, निगमानंद सरस्वती जैसे साधु-संत, गांधी-तिलक इत्यादि जैसे असंख्य नेता नेता और बंकिम- शरत चटर्जी- प्रेम चंद- औरून शौरी जैसे लेखक- पत्रकार तक ही सवर्णों को समस्त जागतिक सुख सुलभ कराने वाली ज्ञान-परंपरा को आगे बढ़ाने में अपने स्तर पर प्रयास रहे।

चूंकि कोरोना ने सभी धर्मों के भगवानों की सीमाबद्धता को उजागर कर दिया है, इसलिए वर्ण-व्यवस्था का सुविधाभोगी वर्ग भारत की की प्राचीन ज्ञान परंपरा के जयगान में नए सिरे से जुट गया है।

एच. एल. दुसाध              

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

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