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Ek Nazm Safoora Zargar ke liye

यह ज़ुल्मतों का है दौर कैसा !

यह ज़ुल्मतों का है दौर कैसा !

(एक नज़्म सफ़ूरा ज़रगर के लिये)

मोहम्मद ख़ुर्शीद अकरम सोज़

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यह ज़ुल्मतों का है दौर कैसा !

कि जिस ने हक़ की सदा बुलंद की

उसी को मुजरिम बना दिया है

क़लम की सच्ची वो इक सिपाही

वो हक़-परस्ती की इक निशानी

गोया कि सुक़रात की कहानी

सफ़ूरा ज़रगर ! सफ़ूरा ज़रगर !!

वतन के दस्तूर की हिमायत में

सदायें अपनी बुलंद करना

सफ़ूरा ज़रगर  का जुर्म ठहरा

सफ़ूरा ज़रगर जो गर्भवती है,

वो क़ैद-ओ- बंद की

सऊबतों से गुज़र रही है

उसे ज़मानत नहीं मिली है

यह ज़ुल्मतों का है दौर कैसा !

कि जिस ने हक़ की सदा बुलंद की

उसी को मुजरिम बना दिया है

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यह ज़ुल्मतों का है दौर कैसा !

हज़ारों ख़ूनी , दरिंदे, ज़ानी

वतन से ग़द्दारी करने वाले

यहाँ पे आज़ाद फिर रहे हैं

यह हमारे सिस्टम की बे-बसी है ,

या और कुछ है ?

कि इन दरिंदों को जान कर भी

इन ही के आगे वो सर-नगूँ है, और

न जाने कितने जराएम-पेशा

हमारी संसद में भर चुके हैं !

यह हमारे सिस्टम की बे-बसी है ,

या और कुछ है ?

कि जिस ने हक़ की सदा बुलंद की

उसी को मुजरिम बना दिया है !

सफ़ूरा ज़रगर जो गर्भवति है,

उसे ज़मानत नहीं मिली है !

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शब्दार्थ :- 1. ज़ुल्मतों = अंधेरों, 2. हक़ = सच, 3. सदा = आवाज़, 4. हक़-परस्ती = सत्यवादिता,

  1. ज़ानी = बलात्कारी, 6. सर-नगूँ = नतमस्तक, 7. जराएम-पेशा = अपराधी , 8.सऊबतों = तक्लीफ़ों

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