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जानिए आधार को मतदाता पहचान पत्र कार्ड से जोड़ना क्यों घातक है?

Electoral reforms linking Aadhar card with voter ID card

क्या मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड को लिंक करना उचित है? आधार को मतदाता पहचान पत्र कार्ड से जोड़ना क्यों  एक अच्छा रास्ता नहीं है? क्यों यह जनता के अधिकारों को कुचलने का एक ऐसा रास्ता (way to trample on the rights of the people) है जिसे बहुत ही सावधानी से चुना गया है, इस लेख में आधार कार्ड को मतदाता पहचान पत्र से जोड़ने वाले चुनाव सुधार के कई पहलुओं पर चर्चा कर रहे हैं डॉ. अजीत रानाडे

संसद और राज्य विधानसभाओं के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी संभालने वाले भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) पर भारत को गर्व है। चुनाव आयोग, स्वतंत्र और निष्पक्ष होने के लिए प्रतिष्ठित है जो सुनिश्चित करता है कि चुनाव में भाग लेने प्रत्याशियों को समान अवसर मिलें तथा लोग बिना किसी डर के मतदान करें।

भारत के निर्वाचन आयोग की स्थापना कब की गई?

चुनाव आयोग की स्थापना (establishment of election commission of india) भारत गणराज्य की घोषणा के एक दिन पहले यानी 25 जनवरी 1950 को हुई थी। चुनाव आयोग, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (रिप्रेजेन्टेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट-आरपीए) में निहित कानूनी ढांचे के भीतर कार्य करने के लिए बाध्य है।

केवल संसद को ही आरपीए में संशोधन करने का अधिकार है जो समय-समय पर किया जाता रहा है। पिछले 70 वर्षों में इसमें कई बार संशोधन किया गया है। एक उल्लेखनीय संशोधन अधिकरणों से उच्च न्यायालयों में चुनाव याचिकाओं का हस्तांतरण था। यही वजह थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की चुनाव याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई जहां 1975 में उनके चुनाव को शून्य और अवैध घोषित कर दिया गया था। फिर भी आरपीए में बड़े संशोधन बहुत लंबे समय से लंबित हैं।

विधि आयोगों की विभिन्न सिफारिशें पिछले कई वर्षों से लागू नहीं की गई

उदाहरण के लिए पिछले कई वर्षों से विधि आयोगों की विभिन्न सिफारिशें (Various Recommendations of Law Commissions) लागू नहीं की गई हैं। खुद चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री और भारत सरकार को पत्र लिखकर यह सुनिश्चित करने को कहा है कि कुछ महत्वपूर्ण चुनाव सुधार कानून (Important Electoral Reform Act) संसद से पारित किए जाएं लेकिन इस पर कोई सुनवाई नहीं हो रही है। आयोग के सबसे महत्वपूर्ण सुझावों में से एक आपराधिक उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराना रहा है। आरपीए में अयोग्यता का मापदंड बहुत कमजोर है और वह गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना करने वाले निर्वाचित सांसदों की बढ़ती संख्या पर रोक लगाने में विफल रहा है।

संसद कोई कार्रवाई करने में असमर्थ रही

संसद द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने के कारण उच्चतम न्यायालय ने कुछ विसंगतियों को दूर करने के लिए कदम उठाए हैं। उसके आदेश की वजह से इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम)/ मतपत्र पर नोटा (नन ऑफ दी एबोव- उपरोक्त में से कोई भी नहीं) बटन आया। इस तरह हम सजायाफ्ता सांसदों को संसद में बैठने से तत्काल रोक सकते हैं भले ही उन पर चल रहा आपराधिक मामला अपील के लिए उच्च न्यायालय में गया हो।

संसद द्वारा नहीं लाया गया कोई भी महत्वपूर्ण चुनाव सुधार

इसी तरह 2003 के निर्णय की बदौलत मतदाताओं को उम्मीदवारों के शपथ पत्र के कारण उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि का पता चल जाता है। इनमें से कोई भी सुधार संसद द्वारा नहीं लाया गया था लेकिन उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिकाओं (Public interest litigations in the Supreme Court) के माध्यम से ये सुधार किए हैं।

राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की जनता की इच्छा आज भी अदालतों में लंबित है। यह भी एक महत्वपूर्ण सुधार है।

संदेह के घेरे में है अपारदर्शी चुनावी बांड (Opaque electoral bonds are under suspicion)

जब संसद ने खुद चुनाव सुधार करने का काम किया है तो उसने अक्सर संदिग्ध इरादे से ऐसा किया है। इसका उदाहरण राजनीतिक वित्तपोषण की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए चुनावी बांड (Electoral bonds to increase transparency of political funding) शुरू करने का है। यह कानून दानदाता या प्राप्तकर्ता की पहचान बताने को पूरी तरह से नकारता है। शब्द ‘पारदर्शिता’ का प्रयोग सरकार द्वारा जनता की सार्वजनिक व निजी गतिविधियों पर लगभग रोक लगाने के अर्थों में किया गया है।

बिना चर्चा के पारित हुआ मतदाता पहचान पत्र के साथ आधार का लिंकेज

आरपीए पर संसद की कार्रवाई का एक और ताजा उदाहरण पिछले महीने पारित संशोधन है। यह चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता पहचान पत्र के साथ आधार का लिंकेज (Linkage of Aadhaar with Voter ID Card issued by Election Commission) है। इसे 20 दिसंबर को लोकसभा में बिना किसी चर्चा के पारित कर दिया गया। अगले दिन राज्यसभा में इस पर मतदान की जोरदार मांग के बावजूद इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। ध्वनिमत से पारित किए जाने के समय के वीडियो में विधेयक के जबरदस्त मुखर विरोध को स्पष्ट रूप से दिखाया गया है फिर भी यह पारित किया गया। जो भी हो, आधार कार्ड को मतदाता परिचय पत्र से जोड़ना कई कारणों से बहुत सी समस्याओं को जन्म दे सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के फैसले का स्पष्ट खंडन करता है Election Laws (Amendment) Bill 2021 | क्या आधार कार्ड जरूरी है?

पहली बात तो यह है कि यह संशोधन सीधे तौर पर 2018 के सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का स्पष्ट खंडन करता है जिसमें साफ कहा गया था कि सभी नागरिकों के लिए आधार अनिवार्य नहीं है (Aadhaar is not mandatory)। केवल कल्याणकारी लाभ प्राप्त करने वालों के लिए व सिर्फ सीमित उद्देश्य के लिए आधार की अनिवार्यता की जा सकती है। यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुना गया दूसरा सबसे लंबा मामला था जिसमें यह ऐतिहासिक निर्णय दिया गया था।

क्या आधार कार्ड नागरिकता का सबूत है? |

Aadhaar Card आपकी नागरिकता का प्रमाण है या नहीं?

दूसरा, आधार कार्ड नागरिकता का नहीं बल्कि पहचान का सबूत होने के लिए बनाया गया है। यह कभी भी एक नागरिक होने का सबूत तथा मतदान की पात्रता रखने का सबूत नहीं था।

मतदाता सूची बनाना किसकी जिम्मेदारी है?

दरअसल, मतदाता सूची बनाना चुनाव आयोग की अहम जिम्मेदारी है (Voter list preparation is an important responsibility of the Election Commission.) और इसके दायरे से बाहर किसी दूसरी एजेंसी को आउटसोर्स नहीं किया जा सकता। आधार अथॉरिटी, चुनाव आयोग के नियंत्रण में नहीं है। मतदाता रिकॉर्ड को जोड़ने, हटाने और संशोधित करने की शक्ति निर्वाचक रजिस्ट्रेशन अधिकारी के पास है तथा भौतिक सत्यापन की अनिवार्यता से जुड़ा है। यह यूनिक आइडेंटिटी अथॉरिटी (unique identity authority) यानी आधार जैसे अथॉरिटी को आउटसोर्स नहीं किया जा सकता।

जब चुनाव आयोग ने आधार को वोटर आईडी से लिंक करने के लिए 2015 में एक पायलट प्रोजेक्ट ‘शुद्धि’ कार्यक्रम शुरू किया तो इसे सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया लेकिन उस पायलट परियोजना में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कुछ नुकसान हुआ था। ‘राष्ट्रीय मतदाता सूची शुद्धिकरण- एक प्रमाणीकरण कार्यक्रम’ के हिस्से के रूप में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता फोटो पहचान पत्र ( इलेक्ट्रॉनिक फोटो आईडेंटिटी कार्ड- ईपीआईसी) और आधार को लिंक करने का काम किया गया तो लाखों मतदाता प्रभावित हुए। तेलंगाना में लगभग 30 लाख और आन्ध्रप्रदेश में 21 लाख मतदाताओं के नाम ‘डुप्लीकेशन’ की कवायद के कारण मतदाता सूची में दर्ज नहीं हुए जिससे बड़ा विवाद हुआ। इनमें से किसी भी मतदाता को सुनवाई का मौका नहीं दिया गया और न ही नाम काटने या दर्ज न होने के मुद्दे को सत्यापन की कड़ी जांच कवायद के अधीन रखा गया, जैसा कि सामान्य ईसी प्रक्रियाओं के तहत किया जाता है।

आधार नंबर का सत्यापन कैसे होगा? | How to Verify Aadhar Number?

तीसरा, भले ही मौजूदा संशोधन में कहा गया है कि आधार को जोड़ना स्वैच्छिक है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इसका क्या मतलब है। क्या लिंकिंग (आधार कार्ड के लिए नामांकन) नामांकन के मौके पर या मतदान के समय किया जाएगा? यदि बायोमेट्रिक पद्धति से नहीं किया जाएगा तो आधार नंबर का सत्यापन कैसे होगा? इस बात को स्पष्ट रूप से नकार दिया गया है। क्या चुनाव अधिकारी सिर्फ मतदाता सूची पर मतदाता के नाम के सामने ‘टिक मार्क’ डाल देंगे या आधार नंबर दर्ज होगा? आधार नंबर की निजता (privacy of aadhar number) की एक बहुत ही बुनियादी आवश्यकता का उल्लंघन करने के मामले में इसकी क्या स्थिति होगी? इस कानून की वर्तमान शब्दावली में कहा गया है कि निर्वाचन अधिकारी के समक्ष केवल किसी ‘पर्याप्त कारण’ की वजह से आधार नंबर प्रस्तुत करने से इंकार किया जा सकता है। इसका तात्पर्य यह है कि साधारण या सामान्य कारण से आधार नंबर पेश करने से इंकार करने की अनुमति नहीं दी जायेगी।

खुद सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष हलफनामे के जरिए कहा है कि औसतन 12 फीसदी समय पर आधार बायोमेट्रिक पहचान (aadhar biometric identification) विफल हो जाती है। गलती की गुंजाईश का यह एक बहुत बड़ा अंतर है, खासकर जब चुनावों में कांटे की टक्कर होती है और जीत का अंतर इकाई के आंकड़े तक हो सकता है। झारखंड में यह पाया गया कि आधार सत्यापन में विफलता के कारण रद्द किए गए राशन कार्डों में से 88 प्रतिशत मामले वास्तविक थे। इसलिए आधार सत्यापन की विफलता (Aadhaar Verification Failure) हमेशा एक समस्या रहेगी जिसका असर काफी हद तक गरीबों, कमजोर, दरिद्र वर्ग पर पड़ता है जो अक्सर पिछड़े क्षेत्रों में रहते हैं और जहां बिजली या कनेक्टिविटी के बुनियादी ढांचे की कमी है।

अंत में, असली डर इस बात का है कि आधार लिंकेज का डेटाबेस जिनके हाथों में है उनके लिए यह मतदाता प्रोफाइलिंग, गटठा मतदान, मतदान की अयोग्यता और सभी प्रकार की चुनावी शरारत के लिए एक शक्तिशाली उपकरण बन सकता है। आधार को मतदाता पहचान पत्र कार्ड से जोड़ना एक अच्छा रास्ता नहीं है या जनता के अधिकारों को कुचलने का एक ऐसा रास्ता है जिसे बहुत ही सावधानी से चुना गया है।

डॉ. अजीत रानाडे

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