रामायण, महाभारत नहीं रोटी, रोजगार दो, मजदूरों की मौत पर मनोरंजन : सत्ता में बैठे धृतराष्ट्र को जनता की ‘त्राहिमाम’ दिखाई नहीं दे रहा

Entertainment on the death of workers

याद रखिये महाभारत होगा, न तो आपका हस्तिनापुर बचेगा और न ही सोने की लंका बचेगी। सिंहासन पर बैठे धृतराष्ट्रों- मन की बात नहीं, जन की बात करो।

जब देश को दवा और खाना की जरूरत है तो उसे 28 मार्च, 2020 से रामायण और महाभारत दिखाया जा रहा है। मंत्री प्रकाश जावेडकर बोलते हैं कि जनता की मांग पर हम रामायण और महाभारत दिखा रहे हैं।

After all, who is the public for this minister who is demanding Ramayana and Mahabharata?

आखिर इस मंत्री के लिए कौन सी जनता है जो रामायण और महाभारत की मांग कर रही है। भूख से होने वाली मौत (Death due to hunger) के डर से बच्चे, बूढ़े, विकलांग, महिला, पुरुष 400 से लेकर 1000, 1200 कि.मी. की दूरी पैदल चल कर घर पहुंचने के लिए सड़कों पर निकल पड़े हैं।

जनता चाहती है कि उसे रोटी, बस-ट्रेन, दवाई मिले लेकिन मंत्री जी कहते हैं कि हम तुमको मनोरंजन कराएंगे। वह जनता जिनके पास रहने के लिए घर, खाने के लिए रोटी और बीमारी होने पर इलाज नहीं है, अभी वह जनता मनोरंजन कैसे करेगी मंत्री जी?

1987 में रामायण 1988 में महाभारत की शुरूआत हुई थी तो उस समय लोगों के पास मनोरंजन के साधन ज्यादा उपलब्ध नहीं था। तब भी दूरदर्शन उस समय एक हफ्ते में एक बार, एक समय ही रामायाण और उसके खत्म होने के बाद 1988 में महाभारत दिखाया गया था।

जनता के पास आज जब कई तरह के साधन और अपनी-अपनी पसंद के मनोरंजन के साधन हैं तो मोदी सरकार उनको रामायण और महाभारत दोनों वह भी दो समय दिखा रही है। सत्ता में बैठे धृतराष्ट्र को जनता की ‘त्राहिमाम’ दिखाई नहीं दे रहा है।

रामायण सीरियल की शुरूआत जब हुई थी, उसी दशक में गांव से पलायन कर लोग शहरों की तरफ आ रहे थे और प्रवासी मजदूरों का मुख्य केन्द्र दिल्ली था। प्रवासी मजदूरों के आने से दिल्ली में झुग्गी-बस्तियों और कच्ची कॉलोनियों की संख्या बढ़ने लगी।

1991 की आर्थिक नीति के बाद गांव से पलायन और तेज हो गया और झुग्गी-बस्तियों की संख्या में काफी तेजी से वृद्धि हुई। जहां मजदूरों के लिए झुग्गी-बस्तियां, कच्ची कॉलोनियों का विस्तार हो रहा था उसी समय दिल्ली में रोहणी और द्वारका जैसे मध्यमवर्गीय इलाकों का विकास हुआ। दिल्ली और उसके आस-पास गगनचुम्बी इमारतें, कमर्शियल इमारतें बनीं। इन इमारतों में मध्यम और उच्च मध्यम वर्गीय लोगों के लिए रिहाईश तथा देशी-विदेशी कारपोरेट दफ्तर खुलें। नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद, जैसे इलाके विकसित हुए, मानेसर, बवाना, नरेला, कुंडली जैसे औद्योगिक इलाकों का विकास हुआ। इनकी सहुलियतों के लिए सड़कें, फ्लाइओवर, मेट्रो का जला बिछाया गया। बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पताल, प्राइवेट कॉलेजों का निर्माण हुआ, जिसमें नौकरशाही, थैलीशाहों, मंत्री, सांसदों, विधायकों का इलाज होता है और उनके बच्चे पढ़ने आते हैं। उन्हें खाने-पीने, मनोरंजन में कोई दिक्कते नहीं हो उनके लिए हास्टल, मॉल का निर्माण हुआ। उनके बूट पर धूल नहीं आ जाये इसके लिए सफाई का ध्यान रखा गया और सफाई कर्मचारी नियुक्त किये गये, जिनका पोशाक और नाम बदल कर स्वीपर की जगह हाउसकीपिंग रख दिया गया। लेकिन इन कामों को करने वालों की आर्थिक स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया।

आज सबसे बड़ी मुसीबत है तो उन्हीं लोगों पर है जिन्होंने इस शहर को बनाया,  जिन्होंने रोहणी और द्वारका जैसी कॉलोनियों,  सड़कें और फ्लाइओवरों का निर्माण किया। आज इन्हीं के पास इस शहर में रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं है।

जिन मजदूरों ने दिल्ली को चमचमाती दिल्ली बनाया, मेट्रो लाईनें बिछाईं, सड़कें बनाईं, ऑटो, ई रिक्शा, टैक्सी चला कर यातायात को सुगम बनाया, आज वे पैदल फटेहाल भागने को विवश हैं।

कारखाने, फैक्ट्रियां जिऩ मजदूरों के खून-पसीने से दिन-रात चलती थीं आज वह शहर इन मजदूरों के लिए मौन है। जो मालिक एक कार से दूसरी कार, तीसरी कार, एक फैक्ट्री से दूसरी, तीसरी बनाया वह आज अपने आप को लाचार दिखा रहे हैं।

फैक्ट्रियों में ताला इसलिए लगाया जाता था कि मजदूर बाहर नहीं चला जाये, लेकिन आज ताला इसलिए लगाया गया है कि मजदूर कहीं अन्दर न आ जायें। जहां पर मजदूरों का रहना मालिक की सम्पत्ति को सुरक्षा देता था और मजदूरों की जान चली जाती थी, वह अनाज मंडी या बवाना की कहानी बन जाते थे। आज वहां पर मजदूर मालिक के लिए असुरक्षित बन गया है।

जिन घरों में इंतजार होता था मेड का- वह आएगी, बर्तन साफ करेगी, खाना बनायेगी, घर का कोना-कोना साफ करके, घर को कीटाणु मुक्त करेगी आज वही मैड कीटाणु नज़र आने लगी। घरों में क्या सोसायटी के गेट तक भी आना प्रतिबंधित हो गया। जिन बच्चों को सुबह वह स्कूल बस तक छोड़ कर आती थी, शाम को पार्क में टहलाती थी उन बच्चों के लिए वह वायरस नजर आने लगी। जिस घर में समय से एक मिनट पहले नहीं जाने दिया जाता या एक दिन के नहीं आने पर उनके घरों पर फोन चला जाता था कि तुम आई क्यों नहीं, चलो अभी से आ जाओ। उन घरों में जाने के लिए पैर तिलमिला रहे हैं कि कहीं गये तो हमारे साथ पता नहीं क्या सलूक किया जाएगा। चलो फोन ही कर लेते हैं अपना पैसा ही मांग लेते हैं लेकिन फोन उठाये नहीं जाते, अगर कभी उठा लिये भी गये तो अपनी लाचारी की अधूरी बात में ही काट दिया जाते हैं।

यही वह लोग थे जो 22 तारीख को शंख, घड़ियाल, थाली, लोटा, गिलास पीट-पीट कर देशभक्त बन रहे थे, आज वह देश से मुंह छिपा रहे हैं।

सफेद चमचमाते वस्त्रों में अपनी कोठियों से ताली पीटने वाले लोग ताली पीट कर घर के अन्दर चले गये। यह वही लोग हैं जिनको मंत्री जी जनता बोलते हैं और कहते हैं कि घर में रामायाण और महाभारत देखो।

आखिर उस विकलांग सलीम (50) का क्या कसूर था जो कि अपने बैसाखियों पर चलते हुए गाजियाबाद से निकल पड़ा है 500 कि.मी. दूर अपने घर के लिए।

उस बच्ची का क्या कसूर जिसके चलने से पैर में, तो भूख से पेट में दर्द होता है।

दिल्ली रेस्तरां में काम करने वाले 39 वर्षीय रणवीर सिंह जब दिल्ली से मुरैना अपने गांव के लिए पैदल जा रहे थे तो 200 कि.मी. की दूरी तय करने के बाद मौत हो गई।

उन मजदूरों का क्या जो मुम्बई से अपने गृह प्रदेश गुजरात जाते समय थक कर सड़क किनारे सो रहे थे। सोते समय टैम्पू उन पर चढ़ गया और चार की मौत हो गई, तीन गंभीर रूप से घायल हैं। यह उसी राज्य के मजदूर हैं जिससे देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री हैं।

उत्तराखण्ड की 2013 में आई आपदा के समय तो कहा गया कि गुजरात के मुख्यमंत्री ने गुजरातियों को बचा लिया तो आखिर यह गुजराती कैसे मर गये?

हापुड़ का सुशील अपने परिवारों को कोरोना का टेस्ट कराने के लिए पत्र लिख कर ब्लेड से गला काट कर सुसाइड कर लेता है। इन मौतों का जिम्मेवार किसे माना जाये?

भाजपा के पूर्व राज्य सभा सदस्य बलबीर पुंज ने मजदूरों के जले पर नमक छिड़कते हुए कहा कि ये मजदूर अपने परिवारों से मिलने के लिए घर जा रहे हैं, रोटी के लिए नहीं।

भारत सरकार ने जनता से सोशल डिस्टेंस (सामाजिक दूरी) की बात कही थी, सरकार अब जनता से सोशल डिस्टेंस के साथ-साथ अपनी जिम्मेवारी से भी दूरी बना ली है उसे जनता की परेशानी से कोई लेना-देना नहीं। वह लॉकडाउन और पुलिस की पिटाई की परवाह किये बिना बूढ़े, बच्चों, महिलाओं के साथ घर के लिए निकल पड़े हैं।

इस जनता का कसूर यही है कि उसने महाभारत के अर्जुन की तरह लड़ना नहीं सीखा। रामायण के राम की तरह नहीं सीखा कि जब कोई आपके रास्ते में रूकावट पैदा करे तो हथियार उठाने से भी मत चूको। राम ने अपने लंका प्रस्थान के दौरान रूकावट बनी समुद्र को ही सुखा कर रास्ता बनाने के लिए हथियार उठा लिया था। हां इस जनता का यही कसूर है कि उसने अर्जुन और राम से अपने हकों के लिए लड़ना नहीं सिखा।

यही कारण है कि सिंहासन पर बैठा धृतराष्ट उनके कष्टों को नहीं देख पा रहा है। धृतराष्ट का संजय (गोदी मीडिया, अफसरशाह) उनको अच्छे दिन की कहानी सुनाने में लगी है।

‘संजय’ बता रहा है कि भारत में गरीबों की संख्या घट रही है लोग मौज-मस्ती करना चाहते हैं। ‘संजय’ के बातों पर यकीन करने वाले धृतराष्ट यह क्यों नहीं देख पा रहा है कि तीन दिन के लॉक डाउन के बाद ही जनता के पास खाने के लिए कुछ नहीं है। वह भयभीत है कि भूख से मौत हो जायेगी। माथे पर गठरी, गोद में बच्चा तो कोई लंगड़ाता हुआ रोता-बिलखता अपने घर के लिए निकल पड़ा है। कई लोग तो रास्ते में ही अलग-अलग कारणों से अपनी जान गंवा सकते हैं, गुजरात के मजदूरों की तरह। धृतराष्ट्र मन की बात सुना रहा है जन की नहीं।

एक मां का लालच कि उनका पुत्र राजा बने इसलिए राम को वनवास हुआ। अदानी, अम्बानी राजा बने इसलिए लोगों को जल-जंगल-जमीन से उजाड़ा गया, उसके बाद शहरों में उनके खून-पसीने को निचोड़ा गया। राम बनवास के बाद जब अयोध्या लौटे तो पुष्पक विमान से लाया गया क्योंकि वह राजकुमार थे। यहां के राजकुमारों, राजकुमारियों के लिए भी पुष्पक विमान भेजा गया और वानर सेना की तरह जनता को सड़क पर छोड़ दिया गया। उनके साथ अगर कुछ है तो पुलिस का डंडा, बेचारगी और भूख।

महाभारत का युद्ध इसलिए लड़ा गया कि लालची कौरव, पांडवों का अपना हक नहीं देना चाहता था। इसके लिए धोखे से जुए में राज-पाट छीना गया और वनवास भेजा गया। आज जनता को जाति-धर्म की घुट्टी पिलाकर उनका स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार का हक छीना गया है। जब यही जनता एक दिन वापस अपना अधिकार मांगेगी तो महाभारत होगा।

याद रखिये महाभारत होगा, न तो आपका हस्तिनापुर बचेगा और न ही सोने की लंका बचेगी। सिंहासन पर बैठे धृतराष्ट्रों- मन की बात नहीं, जन की बात करो।

सुनील कुमार

 

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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