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Amit Shah Narendtra Modi

बहुमत के दम पर मनमानी करते नेताओं को जनता ने दिखा दिया कि वह मूर्ख नहीं हैं

विरोध का दौर और हम Round of protest and we

सीएए और एनआरसी की आग देश में ऐसी लगी है कि सारा देश जल रहा है। हर तरफ एक आक्रोश है जो दिखा रहा है कि पूरा देश सरकार के ऑटोक्रेटिक रवैये के खिलाफ है (The entire country is against the autocratic attitude of the government), उस सोच के खिलाफ है जो अकड़ में है कि उसके हर कदम पर लोग चुपचाप सहमति दे देंगे। उस हर विचार वाले के खिलाफ है जो हिन्दू व मुसलमान के नाम पर लोगों में अलगाव की आग भड़का कर अपनी सत्ता चला रहे हैं।

बहुमत के दम पर मनमानी करते नेताओं को जनता ने दिखा दिया कि वे मूर्ख नहीं हैं, युवाओं ने कॉलेज, संस्थानों में जो प्रदर्शन किए वो इतिहास में हमेशा याद किए जाएँगे।

जामिया की छात्राओं से लेकर हर उस संस्थान के छात्र-छात्राओं ने स्टूडेंट्स की ताकत को दिखाया जहाँ विरोध प्रदर्शन किए गए। वे सभी अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी के लिए जाने जाएँगे।

ये विरोध इस लिए भी याद किए जाएँगे कि शायद अंग्रेज़ी हुकूमत के दिनों की तरह पुलिस ने जामिया जैसे संस्थानों में घुसकर स्टूडेंट्स को पीटा। यहाँ तक कि लाइब्रेरी और हॉस्टल भी नहीं छोड़े।

The face of vandalism that the police showed also raises questions on our democracy.

हिंसक प्रदर्शन के आरोपों की ओट में पुलिस ने बर्बरता का जो चेहरा दिखाया वो भी हमारे लोकतंत्र पर सवाल उठाता है। जिन लोगों ने पुलिस पर हिंसा की वह भी निंदनीय है पर ये प्रदर्शन हिंसक कैसे और क्यों हुए यह भी जांच का विषय है। क्योंकि जिस तरह से पुलिस के तमाम वीडियो सामने आए हैं और सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं जिनमें कहीं खाली हाथ प्रदर्शन करती भीड़ पर पुलिस पीछे से लाठियां बरसाती है, कहीं अंधाधुंध बच्चे बूढों पर लाठी चलाती है, कहीं खुद बाइक और गाड़ियाँ तोड़ती फोड़ती, घरों दुकानों में मारती पीटती और फायरिंग करती दिख रही है। और उस पर पुलिस के आला आधिकारियों के भिन्न-भिन्न तरह के बयान आते हैं जिसमें कभी वे पुलिस की फायरिंग को मना करते हैं तो कभी कितने पुलिस वाले घायल हुए यह बताते गिनाते दिखते हैं और जस्टिफाई करते दिखते हैं कि पुलिस ने सब कुछ बचाव में किया। क्या खड़ी गाड़ियों को तोड़ना भी पुलिस के बचाव का हिस्सा था? क्या खाली हाथ चलते लोग भी हिंसक प्रदर्शन में शामिल थे? ऐसे तमाम सवाल हैं जो लोगों के दिल में उठते रहेंगे। और सरकार के हिंसक चेहरे को भी उजागर करते रहेंगे।

Mohammad Zafar मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत
Mohammad Zafar मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत

पर इन सब के बीच एक बात आशावादिता को बढ़ाती है, और वो है लोगों की एकता, बच्चे, बूढ़े, हिन्दू, मुस्लिम, अमीर गरीब सब मिल कर प्रदर्शनों में आए।

दिल्ली से लेकर, मुंबई, बैंगलोर, हैदराबाद, बरेली, भोपाल, चेन्नई, लखनऊ, अहमदाबाद और जाने कितने शहरों में प्रदर्शनों में हज़ारों-लाखों की संख्या में लोग सामने आए। प्रोफेसरों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, विद्यार्थियों, बॉलीवुड के कलाकारों सभी ने अपनी उपस्थिति विरोधों में दर्ज कराई। विरोध का ये दौर अभी थमा नहीं है। यह चल रहा है और चलता रहना चाहिए जब तक कि सरकार लोगों की बात नहीं सुनती है। अभी भी लोग सड़कों पर हैं, जो जैसे कर सकता है विरोध कर रहा है। कोई चित्रों, कार्टूनों के द्वारा अपना विरोध दर्शा रहा है, तो कोई कविता और लेखों के माध्यम से। कोई पैसे भेजकर तो कोई वीडियो के माध्यम से प्रदर्शनों को मज़बूत करने में अपनी भूमिका निभा रहा है। ऐसी सूरत में जो जहाँ है उसे अपने तरह से विरोध दर्ज कराना चाहिए। ये दौर अलगाओं और निराशा का नहीं है। ये दौर है अपने विचारों को खुलकर शांतिप्रिय ढंग से सामने लाने का। ये दौर है कि हम अपना विरोध हुक्मरानों तक किसी भी तरह से दर्शाएँ।

अपनी बात मैं कुछ पंक्तियों के साथ ख़त्म करूंगा जो इन्हीं सब उलझनों के दौर में विरोध के एक रूप में लेखनी से निकली हैं।

रग रग में वतन के ज़र्रों की ख़ुशबू समाई है,

यहाँ का हूँ, ये कोई काग़ज़ क्या साबित करेगा।

होता है रोज़ वास्ता वतनपरस्ती से अपना,

कोई दूजा हमें इस जज़्बे से क्या वाक़िफ़ करेगा।

तुम शक्ल, रंग-ओ-लिबास से पहचानते रहो,

कोई नादाँ भी ना इस बात को वाजिब कहेगा।

हम इक दूजे की ख़ुशी, गम के साथी-हमराह हैं,

हम पे नफ़रतों का ज़ोर कहाँ क़ाबिज़ रहेगा।

वो जिसने तुमको आसमाँ की राह दिखलाई,

अवाम है वो, ना देर तक ग़ाफ़िल रहेगा।

मोहम्मद ज़फ़र

An article with a poem on protests on CAA and NRC

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