पर्यावरण असंतुलन जिम्मेदार कौन ?

पर्यावरण असंतुलन जिम्मेदार कौन ?

पर्यावरण असंतुलन : कारण और समाधान

आज के युग में बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन के क्या कारण हैं?

आवश्यकताएं तथा उपभोक्तावृत्ति | needs and consumerism

पर्यावरण के असंतुलन के दो प्रमुख कारण (Two main causes of environmental imbalance) हैं। एक है बढ़ती जनसंख्या और दूसरा बढ़ती मानवीय आवश्यकताएं तथा उपभोक्तावृत्ति। इन दोनों का असर प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है और उनकी वहनीय क्षमता लगातार कम हो रही है। पेड़ों के कटने, भूमि के खनन, जल के दुरूपयोग और वायुमंडल के प्रदूषण (pollution of the atmosphere) ने पर्यावरण को गभीर खतरा पैदा किया है, इससे प्राकृतिक आपदाएं भी बढ़ी हैं।

पर्यावरण असंतुलन कारण एवं प्रभाव | environmental imbalance cause and effect in Hindi

दुनिया में पर्यावरण को लेकर चेतना में वृद्धि तो हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणति होती दिखाई नहीं दे रही है। चारों ओर पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर लीपा-पोती हो रही है। पर्यावरण आज एक चर्चित और महत्वपूर्ण विषय है जिस पर पिछले दो-तीन दशकों से काफी बातें हो रहीं हैं। हमारे देश और दुनियाभर में पर्यावरण के असंतुलन और उससे व्यक्ति समाज और राष्ट्र के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा भी बहुत हो रही है और काफी चिंता भी व्यक्त की जा रही है लेकिन पर्यावरण असंतुलन अथवा बिगाड़ को कम करने की कोशिशें उतनी प्रभावपूर्ण नहीं हैं, जितनी अपेक्षित और आवश्यक हैं।

काफी बातें हो चुकी हैं पर्यावरण के पक्ष में

पर्यावरण के पक्ष में काफी बातें कहीं जा चुकी हैं। मैं इसके बिगाड़ से बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं के कारण जन-धन की हानि (Loss of public and money due to natural calamities) के लगातार बढ़ते आंकड़ों पर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा ताकि आप अनुभव कर सकें कि पर्यावरण असंतुलन तथा प्राकृतिक प्रकोपों की कितनी कीमत भारत तथा अन्य देशों को चुकानी पड़ रही है।

पर्यावरण असंतुलन के प्रमुख कारण क्या हैं?

पर्यावरण के असंतुलन के दो प्रमुख कारण हैं। एक है बढ़ती जनसंख्या और दूसरा बढ़ती मानवीय आवश्यकताएं तथा उपभोक्तावृत्ति। इन दोनों का असर प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है और उनकी वहनीय क्षमता लगातार कम हो रही है। पेड़ों के कटने, भूमि के खनन, जल के दुरूपयोग और वायु मंडल के प्रदूषण ने पर्यावरण को गभीर खतरा पैदा किया है। इससे प्राकृतिक आपदाएं भी बढ़ी हैं।

पेड़ों को काटने के दुष्प्रभाव | पेड़ की कटाई के नुकसान | पेड़ काटने से क्या हानि होती है?

पेड़ों के कटने से धरती नंगी हो रही है और उसकी मिट्टी को बांधे रखने, वर्षा की तीक्ष्ण बूदों में मिट्टी को बचाने, हवा को शुद्ध करने और वर्षा जल को भूमि में रिसाने की शक्ति लगातार क्षीण हो रही है। इसी का परिणाम है कि भूक्षरण, भूस्खलन (landslide) और भूमि का कटाव बढ़ रहा है जिससे मिट्टी अनियंत्रित होकर बह रही है। इससे पहाड़ों ओर ऊँचाई वाले इलाकों की उर्वरता समाप्त् हो रही है तथा मैदानों में यह मिट्टी पा नी का घनत्व बढ़ाकर और नदी तल को ऊपर उठाकर बाढ़ की विभीषिका को बढ़ा रही है।

खनन की वजह से भी मिट्टी का बहाव तेजी से बढ़ रहा है। उद्योगों और उन्नत कृषि ने पानी की खपत को बेतहाशा बढ़ाया है। पानी की बढ़ती जरूरत भूजल के स्तर को लगातार कम कर रही है, वहीं उद्योगों के विषैले घोलों तथा गंदी नालियों के निकास ने नदियों को विकृत करके रख दिया है और उनकी शुद्धिकरण की आत्मशक्ति समाप्त् हो गई है। कारखानों और वाहनों के गंदे धुएं और ग्रीन हाउस गैसों (green house gases) ने वायु मंडल को प्रदूषित कर दिया है। यह स्थिति जिस मात्रा में बिगड़ेगी, पृथ्वी पर प्राणियों का जीवन उसी मात्रा में दूभर होता चला जाएगा।

प्राकृतिक आपदाओं से मरते हैं गरीब

प्राकृतिक आपदा से हो रही जन-धन की हानि के आंकड़े चौंकाने वाले ही नहीं बल्कि गंभीर चिंता का विषय भी हैं।

उल्लेखनीय तथ्य यह रहा कि प्राकृतिक आपदाओं में मरने वाले लोगों में बड़ी संख्या उन निर्बल-निर्धन लोगों की रही, जो अपने लिए सुरक्षित आवास नहीं बना सकते थे अथवा जो स्वयं को सुरक्षित स्थान उपलब्ध नहीं करा सकते थे। फिर वे चाहे समुद्र तटीय मछुआरे हों या वनों-पहाड़ों में रहने वाले गरीब लोग।

तथाकथित विकास बन रहा विनाश की वजह

बीसवीं सदी का अंतिम दशक भूकम्पों का त्रासदी का दशक (decade of earthquakes) भी रहा है। दुनियां में अनेक भागों में भूकम्प के झटकों ने जन-जीवन में भरी तबाही मचाई है। भारत में हिमालय से सह्याद्रि और दण्डकारण्य तथा पूर्वी और पश्चिमी घाटों तक में मिट्टी का कटाव-बहाव तेज होने और उनसे उद्गमित होने वाली नदियों की बौखलाहट बड़ी तेजी से बढ़ी है। हम देख रहे हैं कि हिमालय क्षेत्र में इसके लिए हमारी विकास की अवधारणाएं और क्रियाकलाप भी दोषी हैं। विकास के नाम पर नाजुक क्षेत्रों में भी मोटर मार्ग तथा अन्य निर्माण कार्य किए गए जिनमें भारी विस्फोटकों का उपयोग किया गया। मिट्टी बेतरतीब ढंग से काटी गई और जंगलों का बेतहाशा कटाव किया गया। इस कारण बड़ी संख्या में नए-नए भूस्खलन उभरे ओर नदियों की बौखलाहट बढ़ी। इनमें लाखों टन मिट्टी बह रही है, जिसका दुष्प्रभाव न केवल हिमालयवासियों पर पड़ रहा है, बल्कि मैदानी प्रदेश भी बाढ़ की विभीषिका से बुरी तरह संत्रस्त हैं।

पर्यावरण संतुलन के उपाय (environmental balance measures)

यह सही है कि प्राकृतिक आपदाओं को हम पूरी तरह रोकने में समर्थ नहीं हैं किंतु उन्हें उत्तेजित करने एवं बढ़ाने में निश्चित ही हमारी भागीदारी रही है। इसके लिए हमें तात्कालिक लाभ वाले कार्यक्रमों का मोह छोड़ना होगा। क्षेत्रों में स्थाई विकास की योजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्यावरण के विचार केन्द्र में उस आदमी को प्रतिष्ठापित किया जाना चाहिए जिसके चारों और यह घटित हो रहा है और जो बड़ी सीमा तक इसका कारक एवं परिणामभोक्ता दोनों हैं। उस क्षेत्र की धरती, पेड़, वनस्पति, जल एवं जानवरों के साथ उनके अंर्तसंबंधों को विश्लेषित करके ही कार्यम बनाए जाने चाहिए। उनको इसके साथ प्रमुखता से जोड़ जाना चाहिए।

यह भी जरूरी है कि ऐसे नाजुक क्षेत्रों में आपदाओं के बारे में जानकारी (Information about disasters in vulnerable areas) हासिल करने के लिए उपग्रह के आंकड़ों का अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क आपदाओं की सूचना (डिजास्टर फोरकास्ट) के लिए तैयार किया जाए। इन सूचनाओं का बिना रोक-टोक आदान-प्रदान किया जाना चाहिए।

प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित किया जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्रों की मॉनिटिरिंग एवं निगाह रखने के लिए स्थाई व्यवस्था हो। साथ ही बाढ़ एवं भूकम्प से प्रभावित क्षेत्रों का विकास कार्यों को शुरू करने से पूर्व विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए।

चंडीप्रसाद भट्ट

Topics : पर्यावरण असंतुलन पर निबंध, Essay on Environmental Imbalance.

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