बेरोज़गार भूखी जनता के लिए रोज़ नए दुश्मन पैदा किये जा रहे हैं

Everyday new enemies are being created for the unemployed hungry masses.

हम भारत में अंध राष्ट्रवाद का रोना रोते हैं। यकीन मानिए, अमेरिकियों के अमेरिकावाद (Americanism of Americans) ने दुनियाभर में तबाही मचाई है और कोरोना ने बाजी पलट दी है।

यही युद्धक अमेरिकीवाद पलटवार करने वाले हथियार की तरह अमेरिका का ही विध्वंस कर रहा है।

हमारे पश्चिम का यह नेशन और नेशनलिज्म नहीं था कहीं। हमारा तो देश था। रवीन्द्र नाथ ने पश्चिम के इस नेशनालिज़्म और नेशन का पुरजोर विरोध किया था, जिसमे प्रेम भाईचारा संस्कृति मातृभाषा परम्परा विविधता वहुलता और लोकतंत्र की कोई जगह नहीं होती। ज्ञान विज्ञान की भी नहीं।

टॉलस्टाय, रवींद्र, गांधी और आइंस्टीन इस उग्र नेशन और नेशनालिज़्म के खिलाफ थे, जो अपनी ही ही जनता का धर्म, जाति, नस्ल, वर्ग, क्षेत्र के हिसाब से सफाया कर दें।

गांधी इसीलिए केंद्र की मजबूत सत्ता और शहरिकरण के बजाय ग्राम स्वराज की बात करते थे।

न्यूयार्क से डॉ पार्थ बनर्जी के ताजा अपडेट में यही लिखा हैं कि गरीबों और मेहनतकशों के नस्ली नरसंहार में भारत और अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया बजरंगियों के हवाले है।

पूंजीवाद, मुक्तबाजार की साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था को बचाएगी यह बजरंगी पैदल सेना, जो अंधी है।

दुनिया भर में अमेरिका में खासकर टीवी पर भारत की तरह चीखकर एंकर जनता को उत्तेजित करने के लिए नस्ली ध्रुवीकरण के मकसद से हिंसा और घृणा फैलाने के लिए मनगढ़ंत सनसनीखेज खबरें, शोध, पैनल वगैरह के जरिये नरसंहार को जायज ठहराने और इसे राष्ट्र हित में बताने का काम कर रहे हैं।

अखबारों की चीखती सुर्खियां भी लोगों को बजरंगी बना रही है।

कोरोना संक्रमण और मृत्यु के लिए भारत और अमेरिका में भी न सही जानकारी है और न लोगों को बचाने की कोशिश है। बेरोज़गार भूखी जनता के लिए रोज़ नए दुश्मन पैदा किये जा रहे हैं।

यह द एरा आफ़ पोस्ट रीज़न है यानी तर्क विज्ञान यथार्थ मनुष्यता और लोकतंत्र खत्म।

पलाश विश्वास

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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