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क्या ममता बनर्जी समग्र विपक्ष का प्रतिनिधित्व कर सकेंगी ?

Expectations of opposition from Mamta Banerjee And Limits of Mamta Banerjee

देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के लगातार बढ़ते प्रसार को वैसे तो कई बार अनेक राज्यों में विभिन्न नेताओं ने चुनौतियां दी हैं और कामयाब भी हुए हैं, लेकिन इसी रविवार को निकले पांच राज्यों के चुनावी परिणामों (Five states electoral results) में पश्चिम बंगाल का नतीजा सबसे चर्चित रहा जिसमें तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष व मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने सारे अनुमानों को धता बताते हुए भारतीय जनता पार्टी को तगड़ी शिकस्त दी। इस जीत को करिश्मे की तरह देखा जा रहा है। जिन परिस्थितियों में ममता ने जीता है, वह भाजपा को ऐसा निराश कर गया कि वह असम और पुड्डुचेरी में अपनी जीत पर मुस्कुरा भी नहीं पा रही है।

हाल के वर्षों में यह भाजपा की पहली पराजय नहीं

ऐसा नहीं कि यह भाजपा की हाल के वर्षों में कोई पहली पराजय है, पर यह भी सच है कि पिछले दो-ढाई साल में मोदी एवं भाजपा को ऐसी हड्डियां टूटने वाली पटखनी नहीं मिली थी। हालांकि छत्तीसगढ़, राजस्थान एवं पंजाब में कांग्रेस जीती थी पर कुछ समय बाद विधायकों की पाला बदली के कारण मप्र की सरकार पर वापस भाजपा काबिज हो गई।

यह ममता की चमत्कारिक विजय का ही नतीजा है कि ज्यादातर विपक्षी नेताओं ने उन्हें जिस तरह से बधाइयां दी हैं, उससे देश की राजनीति में एक बार फिर से विपक्षी एकता की बातें होने लगी हैं। अब बंगाल शेरनी से ही अपेक्षा की जाने लगी है कि वे इस विपक्षी मोर्चे का नेतृत्व करें।

बिखरे प्रतिपक्ष और पिछले सात वर्षों से भाजपा के हाथों अलग-अलग पिटते गैर-भाजपायी राजनैतिक दलों द्वारा इसकी उम्मीद करना कोई बेजा बात भी नहीं है।

विपक्षी एकता के लिए लालायित और प्रयासरत अनेक नेताओं और राजनैतिक दलों को ममता में एक ऐसे राजनीतिज्ञ की छवि दिख रही है जो न केवल मोदी-शाह से सीधी टक्कर ले सकती हैं बल्कि विपक्षी दलों का नेतृत्व भी कर सकती हैं। हालांकि ऐसा होना संभव नहीं लगता।   

इस चुनावी परिणाम से सभी के प्रभावित होने के पीछे मूल कारण यह है कि ममता ने बेहद जुझारूपन और रणकौशल से शक्तिशाली भाजपा की हर कुटिल चाल को मात दी। रैलियों का जवाब बड़ी रैलियों से तथा नाटकीयता का जवाब उतनी ही बड़ी नौटंकी से देकर। ‘दीदी ओ दीदी’ जैसे वाक्य का अधिक कटु जवाब स्वयं न देकर सहयोगी से दिलाना एवं भाजपा के कथित ‘सोनार बांग्ला’ बनाने के वादे को कठघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने अपनी राजनीति को सफलतापूर्वक बांग्ला अस्मिता से जोड़ दिया। टैगोर, राजा राममोहन रॉय, विवेकानंद, ईश्वरचंद विद्यासागर, नजरूल और सव्यसाची की जमीन पर भाजपा द्वारा एक भद्र महिला का उपहास भाजपा के बेड़ा गर्क होने का प्रमुख कारण बना।

पश्चिम बंगाल को फतह करने के लिए भाजपा ने पूरी शक्ति लगा रखी थी। कोरोना नियंत्रण का काम छोड़कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और कई मंत्री-नेता वहां चुनाव प्रचार और सामाजिक ध्रुवीकरण करते रहे।

कैलाश विजयवर्गीय लम्बे अरसे से वहां बैठकर टीएमसी के विधायकों और पदाधिकारियों को प्रलोभन से या डराकर अपने खेमे में लाने के मिशन को अंजाम देते रहे। इसी तोड़-फोड़ के भरोसे मोदी व शाह गर्व से कहते रहे कि ‘चुनाव के बाद टीएमसी में केवल दीदी (ममता) रह जायेंगी।’ पीएम ने तो बाकायदे ऐलान कर दिया कि ‘दो मई दीदी गई।’

छात्र जीवन से ही संघर्षों में पली-बढ़ी ममता ने हठीली नायिका की तरह इन सारे हमलों का साहसपूर्ण मुकाबला किया- डरे बिना, झुके बिना। अपने खेमों से एक-एक कर कई नेताओं को उन्होंने धैर्यपूर्वक विदाई दी पर अपना दुर्ग बचाने में कामयाब हुईं।    

बंगाल में तोता का खेला फ्लॉप हो गया

गैर-भाजपायी शक्तियों को यह बात अब समझ में आ गई है कि जो बिखरा विपक्ष पहले कांग्रेस की ताकत थी वही आज भाजपा की शक्ति है। उसे केन्द्र की सत्ता तक लाने और बनाए रखने का माध्यम भी। केन्द्र हाथ में आने के बाद राज्यों को दबाना आसान होता है। प्रदेश का एक हाथ केन्द्र स्तर पर मिलने वाली आर्थिक सहायता यानी फंडिंग से तो दूसरा हाथ जांच एजेंसियों के इस्तेमाल से मरोड़ा जाता है। कांग्रेस द्वारा ईजाद किया गया यह खेल भाजपा ने बहुत जल्दी सीख लिया। इन दो तरीकों से उसने न केवल राज्यों को कमजोर किया वरन सत्तारुढ़ दलों के विधायकों-सांसदों, नेताओं को अपने पाले में लाने की परिपाटी को निस्संकोच मजबूत किया है। केन्द्र अब इस कला का खूब इस्तेमाल तो कर रहा है पर बंगाल में वह खेला फ्लॉप हो गया।

जब लोगों की अपेक्षा है कि ममता समग्र विपक्ष यानी गैर- भाजपायी दलों का नेतृत्व करें, तो कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं। पहले तो यह देखें कि क्या इस जिम्मेदारी के लिए कोई अन्य व्यक्ति उपलब्ध है। सच कहा जाए तो अंतत: नजर टिकती है कांग्रेस पर; और घूम-फिरकर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा पर। बेशक सोनिया अप्रत्यक्ष तौर पर यह भूमिका सीमित अर्थों में निभाती रही हैं परन्तु उनकी बढ़ती उम्र एवं यदा-कदा होने वाली स्वास्थ्यगत परेशानियों के कारण उनसे यह अपेक्षा करना उनके साथ अन्याय होगा क्योंकि पूरे देश में गैर-भाजपा दलों को एक सूत्र में बांधना ऐसे व्यक्ति के लिए ही संभव और उचित होगा जो युवा एवं ऊर्जावान हो। गांधी परिवार से संबद्ध होने के नाते, उनकी कमजोर हिन्दी और विदेशी मूल का होने के कारण विपक्ष द्वारा उन पर हमले तो हुए लेकिन अपनी शालीनता व कर्मठता के अलावा दो बार केन्द्र में सरकार बनवाकर उन्होंने अपनी सूझ-बूझ का परिचय दिया था। आज भी वे अपने संगठन की प्रमुख नाम ही हैं।

बीच में लोगों की निगाहें राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष तेजस्वी यादव की ओर भी गई थीं जिन्होंने बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में मोदी-नीतीश कुमार व भाजपा-जेडीयू को तगड़ी चुनौती दी थी परन्तु पराजय के कारण तेजस्वी के उदय में ठहराव आ गया।

हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री व शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेशनल कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार को समग्र विपक्ष (आशय भाजपा विरोधी दलों से) का संयोजक बनाना चाहिए। समस्या यह है कि खुद शिवसेना और एनसीपी के मौजूदा संबंध तात्कालिक जरूरतों पर आधारित हैं। फिर, पवार बड़ी आयु में पहुंच चुके हैं। अब उनकी दिलचस्पी महाराष्ट्र, वहां की सत्ता, बेटी सुप्रिया व भतीजे अजीत एवं एनसीपी के हितों से अधिक नहीं है। स्वयं उनकी विश्वसनीयता हमेशा संदिग्ध रही है।

मायावती को लगता है जांच से डर

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती की बात करें तो उन्हें जांच के नाम पर इतना डराया जा चुका है कि वे अब भाजपा की गोद में बैठी नजर आ रही हैं। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव की अपनी सीमाएं एवं हित हैं, जिसमें रहकर या उसके इर्द-गिर्द उनकी राजनीति घूमती है। कुल जमा बात इतनी सी है कि पूरी राष्ट्रीय पहचान, पहुंच और स्वीकार्यता वाली एकमात्र पार्टी अब भी कांग्रेस ही होने के कारण भाजपा-विरोधी खेमा बनाने की उम्मीद भी लोग राहुल-प्रियंका से ही रखते हैं। यह तो सच है कि मोदी सरकार के खिलाफ सीधा मुकाबला करते केवल वे दोनों ही नजर आते हैं।

नोटबंदी का मसला हो या राफेल खरीदी, पीएम केयर फंड हो अथवा कोरोना प्रबंधन संबंधी मोदी की चूकें अथवा नागरिकता कानून हों या फिर किसान आंदोलन- भाई-बहन बिना संकोच या डरकर आवाज उठा रहे हैं। फिर भी, गैर-भाजपायी मोर्चा बनाने की पहल उन्होंने कभी नहीं की। संभवत: क्षेत्रीय दलों के साथ उनके विभिन्न राज्यों में चुनावी मुकाबले या मत भिन्नता उन्हें ऐसा करने से रोकती है।

इसमें शक है ममता बनर्जी समग्र विपक्ष का प्रतिनिधित्व कर सकेंगी

ऐसे में एक शानदार जीत के कारण देश की निगाहें ममता बनर्जी की ओर उठनी स्वाभाविक ही हैं। इसमें कोई शक नहीं कि वे इस समय प्रतिरोध की सबसे बड़ी प्रतिनिधि और प्रतीक बनकर स्थापित हुई हैं परन्तु इसमें शक ही है कि वे समग्र विपक्ष का प्रतिनिधित्व कर सकेंगी। पहला कारण तो यही है कि अनेक क्षेत्रीय नेताओं की तरह ही वे भी अपने राज्य में सिमटी हुई हैं क्योंकि वे प्रादेशिक अस्मिता की ही प्रतिनिधि हैं। अपने विचारों और कार्यों को राष्ट्रीय विस्तार देना उनके लिए संभव नहीं है। उन्हें जब रेल मंत्री बनाया गया तो उनका ध्यान सम्पूर्ण भारत में रेल के विकास की बजाय केवल प. बंगाल में ट्रेनें व सुविधाएं बढ़ाने में रहा। स्थानीय मुद्दे उन्हें अन्य नेताओं की तरह संकीर्ण बनाते हैं। अनेक क्षेत्रीय नेताओं की ही तरह राष्ट्रभाषा हिन्दी का उनका ज्ञान बेहद कच्चा है इसलिये उनकी स्वीकार्यता, खासकर हिन्दी पट्टे में शायद ही हो। तुनक मिजाजी के लिए भी वे वखि्यात रही हैं।

सनक में कोई पद लेना या उससे अचानक खुद को अलग कर लेना उनका स्वभाव है जिसके कारण वे विविध राजनैतिक दर्शनों व सामाजिक मान्यताओं वाले संगठनों को लेकर नहीं चल सकतीं। केन्द्र में कभी कांग्रेस तो कभी एनडीए की सरकार में शामिल होना बतलाता है कि वे ढुलमुल भी हैं। इसे देखते हुए ममता द्वारा भाजपा-विरोधी शिविर का सेनापति होने में शक ही है। फिलहाल ऐसे नेता की तलाश जारी रखनी होगी जो सारे गैर- भाजपा दलों को एक सूत्र में पिरो सके।

(लेखक देशबन्धुके राजनीतिक सम्पादक हैं। देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार )

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