गलत है उत्सर्जन मानकों के अनुपालन के लिए मोहलत माँगना : विशेषज्ञ

Environment and climate change

Extension for emission compliance unjustified : Experts

नई दिल्ली, जुलाई 17, 2020: उत्सर्जन मानकों के कार्यान्वयन के लिए मोहलत मांगने पर ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने आज, एक वेबिनर के दौरान, एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स Association of Power Producers (APP) की कठोर आलोचना की है।

कोयला बिजली संयंत्रों के लिए उत्सर्जन मानकों के अनुपालन पर आयोजित इस वेबिनार का आयोजन क्लाइमेट ट्रेंड्स और सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) (Climate Trends and Center for Research on Energy and Clean Air) द्वारा किया गया था।

CREA के अनुसार, मौजूदा चरणबद्ध योजना के तहत जितनी क्षमता के लिए बिजली उत्पादन संयंत्रों को उत्सर्जन मानकों का पालन करना है, उनमें से कुल एक प्रतिशत के लिए ही फ्ल्यू-गैस डिसल्फ्रिफिकेशन (एफजीडी) का सामर्थ्य स्थापित किया गया है। साथ ही, एफजीडी कार्यान्वयन के लिए 169.7 गिगा वाट की कुल कोयला बिजली क्षमता  में से मात्र 27 प्रतिशत क्षमता के लिए ही ठेके दिए गए हैं।

इस तथ्य के सापेक्ष, बिजली उत्पादकों का यह कहना कि चीन से आयात पर बंदी उनके लिए एफजीडी लक्ष्य पूरे करने में मुश्किल पैदा करेगी, सरासर गलत है। अभी तो एफडीजी कार्यान्वयन के लिए अधिकांश ठेके दिए ही नहीं गए हैं। और भारत के पास बिना चीन पर आयात के लिए निर्भर हुए एफडीजी का कार्यान्वयन संभव है।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए CREA के विश्लेषक सुनील दहिया कहते हैं,

“यह न सिर्फ़ एक अनुचित तर्क है, यह हास्यास्पद भी है।”

सुनील आगे कहते हैं,

“जब अधिकांश क्षमता के लिए बोलियाँ ही नहीं लगीं हैं, तो देरी के लिए चीन से आयात को आधार बनाने का सवाल ही नहीं उठता।”

ज्ञात हो कि 122857 मेगावाट (72%) क्षमता के लिए अभी तक ठेके प्रदान नहीं किये गए हैं।

आगे, एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स (APP) द्वारा उत्सर्जन मानक अनुपालन समय सीमा पर एक और विस्तार की मांग के जवाब में, सुनील कहते हैं,

“बी.एच.ई.एल जैसी कंपनियों के पास तकनीक है और वे हमारी जरूरतों के लिए उन्हें अनुकूलित कर सकते हैं। और वैसे भी चीन अकेला आपूर्तिकर्ता नहीं है। बल्कि आत्मनिर्भर भारत की पहल के अंतर्गत तो स्थानीय उत्पादन को ही ज़ोर देना है। असल में यहाँ मुद्दा धन का अभाव या तकनीक की आपूर्ति के लिए आयात न कर पाना नहीं, असल मुद्दा तो इच्छाशक्ति की कमी है।”

Role of coal power plant in air pollution

चर्चा को आगे ले जाते हुए वायु प्रदूषण में कोयला बिजली संयंत्र की भूमिका और राष्ट्रीय राजधानी में हवा की हवा में सल्फेट की मात्रा पर टिप्पणी करते हुए, NCAP संचालन समिति के सदस्य और IIT कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग के विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर एसएन त्रिपाठी कहते हैं,

” हमारे शोध के अंतर्गत हमने लॉकडाउन के पहले और दौरान दिल्ली की हवा का विश्लेष्ण किया था। हमने शोध के लिए सल्फर, लेड, सेलेनियम, और आर्सेनिक जैसे तत्वों का चयन इसलिए किया क्योंकि इनकी मदद से सही अंदाज़ मिलता है यह जानने में कि PM 2.5 में बिजली संयंत्रों का कितना योगदान है। दिल्ली की हवा में कुल PM2.5 में बिजली संयंत्रों का योगदान 8 प्रतिशत की सीमा में रहा। इसमें एक महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गयी लेकिन लॉकडाउन के अंत तक ये वापस अपने स्तरों के करीब आ गया।”

कोयला प्रदूषण संयंत्र संचालकों द्वारा 2020 की समयसीमा का पालन नहीं करे जाने के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उन पर भारी जुर्माना लगाने को कहा है। लेकिन जिस हिसाब से ये संयंत्र बिजली उत्पादित करते हैं, उसके मुकाबले यह जुर्माना न के बराबर है। ऊर्जा लागत का 0.12 प्रतिशत से – 3.28 प्रतिशत का जुर्माना नगण्य है। इस तथ्य पर मज़बूती से अपनी प्रतिक्रिया देते हुए काउंसिल एट एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के फेलो, कार्थिक गणेसन कहते हैं, “अनुपालन न करने के लिए कोई ख़ास जुर्माना नहीं लगाया जा रहा है। बस नाम मात्र का जुर्माना है। जब तक केंद्र से स्पष्ट नीति निर्देश नहीं आता, तब तक बिजली उत्पादकों को गंभीरता से अनुपालन कराना मुश्किल है।”

जारी किए गए नए निविदाओं के आधार पर CEEW के संशोधित अनुमानों के अनुसार, FGD की लागत, बिजली संयंत्र में रेट्रोफिट होने की सम्भावना के आधार पर 40 से 80 लाख / MW के बीच होती है। इस रेट्रोफिटिंग के चलते, बिजली की दरों में 0.34 रूपये प्रति kWh से 1.36  रूपये प्रति kWh के बीच होती है।

यदि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के राष्ट्रीय बिजली योजना 2018 के अंतर्गत पहचाने गए सभी बिजली संयंत्रों को प्रदूषण नियंत्रण के लिए रेट्रोफिट किया जाए तो लागत आयेगी 94,267 करोड़ रूपये। और यदि इनमें से सिर्फ़ उन संयंत्रो को शामिल किया जाये जो अच्छी अवस्था में क्रियाशील हैं, तो इसकी लागत 80,587 करोड़ रुपये होगी।

कार्यान्वयन की देरी के कारण 2018 की लागत अनुमानों की तुलना में सीईईडब्ल्यू के संशोधित लागत अनुमान 10 प्रतिशत से बढ़ गए हैं। इस पर कार्तिक कहते हैं, “हम जितनी अधिक देरी करेंगे, उतना ही अधिक खर्च होगा।”

एफ़जीडी को स्थापित करने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए, दूसान पावर सिस्टम्स से प्रभात वर्मा ने कहा,

“स्वच्छ प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है, लेकिन उच्च उपयोग वाले संयंत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”

कम मांग के बीच निजी खनन के लिए कोयला ब्लॉकों की नीलामी के लिए केंद्र सरकार की हालिया घोषणा और भविष्य की आवश्यकताओं का आकलन करते हुए अधिक कोयला खदानों को आवंटित करने की आवश्यकता पर सवाल उठाया गया, जबकि देश मौजूदा लोगों की वजह से होने वाली गंदगी को साफ करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

सामाजिक नियंत्रण के साथ प्रदूषण नियंत्रण तकनीक की लागत के बीच एक तुलनात्मक विश्लेषण, जैसा कि सीईईडब्ल्यू अर्बन एमिशन्स द्वारा एक अध्ययन में किया गया है, ने गणना की कि एफजीडी स्थापना की पूंजी लागत क्षमता के आधार पर 30-72 पैसे / केडब्ल्यूएच तक पहुंच जाती है, जिस पर संयंत्र परिचालन कर रहा है, संयंत्र लोड कारक और पौधे का जीवन। यदि कोयला संयंत्र मानकों पर खरे उतरते हैं तो स्वास्थ्य और सामाजिक लागत 8.58 रुपये / केडब्ल्यूएच से घटकर 0.73 पैसे / किलोवाट हो जाती है।

बिजली निर्माता कार्यान्वयन में देरी के लिए कानूनी फीस में लाखों खर्च कर रहे हैं।

पर्यावरण के वकील रितविक दत्ता का तर्क है कि यह एक MoEFCC आदेश का आपराधिक उल्लंघन है और इरादे की स्पष्ट कमी है।

“2022 के लक्ष्यों में देरी के लिए कोविड और 2020 को सिर्फ़ बहाने के रूप में लिया जाएगा। एनटीपीसी ने 4 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट से तिरपाल के साथ कोयला ले जाने वाले ट्रकों को कवर करने के एनजीटी के आदेश को चुनौती दी थी। यदि तिरपाल जैसे एक साधारण से प्रदूषण नियंत्रण उपदान के प्रयोग पर आपत्ति हो सकती है तो इरादों की कमी साफ़ स्पष्ट है।”

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