Home » हस्तक्षेप » आपकी नज़र » फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का पक्षपातपूर्ण भारतीय उच्च न्यायपालिका का बचाव-कुछ ज़रूरी सवाल
shamsul islam

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का पक्षपातपूर्ण भारतीय उच्च न्यायपालिका का बचाव-कुछ ज़रूरी सवाल

Faizan Mustafa’s defense of the biased Indian higher judiciary – some important questions

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा जो नेशनल अकादमी ऑफ़ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च (संक्षेप में नालसर, जिसकी स्थापना तेलंगाना की विधान सभा ने की है) में प्रोफ़ेसर ऑफ़ लॉ और वाइस-चांसलर हैं. अपने एक ताज़ा आलेख (‘मुस्लिम एंड ज्यूडीशियरी : वी डोंट हेव मुस्लिम ओर नॉन-मुस्लिम जजेज़ इन इंडिया,’, इंडियन एक्सप्रेस, जुलाई, 8, 2022) में बताते हैं कि 1997 में उन्होंने मुसलमान जजों की भूमिका पर केन्द्रित एक शोध परियोजना में हिस्सा लेने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि यह विषय भारतीय न्याय व्यवस्था में निहित निष्पक्षता के तत्व से मेल नहीं खाता था. लेकिन यह आलेख इस जैसे विषय पर ही केन्द्रित है कि आज सर्वोच्च न्यायालय मुसलमानों के मामलों को कैसे ले रहा है. इस लेख की मंशा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पक्ष का बचाव करना है जो निश्चय ही भारत और विदेशों में भी भारतीय न्याय-व्यवस्था को लेकर बन रही इस धारणा के जवाब में लिखा गया है, कि भारतीय न्याय-व्यवस्था, ख़ासकर इसके उच्च स्तरों पर बहुलतावादी दबाव हावी हो गए हैं और वह आरएसएस-बीजेपी सरकार के हाथों में खेल रही है, जिनका एकमात्र वैचारिक आधार हिंदुत्व है.  

दावा : मुसलमान हितों को लेकर जज बहुत संवेदनशील रहते हैं

फ़ैज़ान का कहना है कि, “माननीय जज मुसलमान हितों को लेकर न सिर्फ़ निष्पक्ष बल्कि संवेदनशील भी रहे हैं.” इस दावे में एक बड़ी समस्या है.

मेरा सवाल यह है कि जिन मामलों को `मुसलमान हित’ कहा जा रहा है, क्या वे भारतीय हित नहीं हैं? रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद केस, आतंकवादी क़ानूनों के तहत सैकड़ों युवाओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की गिरफ़्तारियां, सीएए को लेकर विरोध-प्रदर्शन और उसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं का दमन, घरों पर बुलडोज़र चलाना और धारा 370 हटाने का विरोध—क्या ये सब सिर्फ़ मुसलमान हितों से जुड़े मामले हैं? इन मसलों को बार-बार मुसलमानों से जोड़ा गया है लेकिन वास्तव में ये सभी मामले लोकतंत्र के प्रति भारतीय राजनीति की संवैधानिक प्रतिबद्धता, सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक बराबरी, धर्म-निरपेक्षता, हमारे संघीय बोध, क़ानून के शासन और हमारी न्याय-प्रणाली की स्वतंत्रता की परीक्षा के अत्यंत निर्णायक मुद्दे थे और हैं. 

वास्तविकता : अंतर्निहित विद्वेष

सर्वोच्च न्यायालय की पैरवी करते हुए फ़ैज़ान शुरू करते हैं जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ से जिन्हें वे एक ‘विद्वान् जज’ कहते हैं.

फ़ैज़ान का कहना है : “जून 20 (2022) को लन्दन के किंग्स कॉलेज में जस्टिस चंद्रचूड़ से एक प्रश्न न्यायालय के मुसलमानों के प्रति रुख़ के बारे में पूछा गया. सवाल से बिलकुल भी परेशान न होते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने विनम्रतापूर्वक कहा कि न्याय देते हुए हमारे जज वादी की धार्मिक पहचान को दिमाग़ में नहीं रखते.”

सर्वोच्च न्यायालय के पक्षपातरहित चरित्र को रेखंकित करने के लिए वे रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2019 के फ़ैसले का हवाला भी देते हैं जब जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ भी फ़ैसला देने वाली बेंच में शामिल थे.

फ़ैज़ान के मुताबिक़, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में  

“1949 में मूर्तियों की स्थापना और 1992 में मस्जिद के गिराए जाने को ‘बड़ी ग़लतियाँ’ ठहराया [और कहा] कि बाबरी मस्जिद का निर्माण राम मंदिर को गिराकर नहीं किया गया था और बताया कि भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार ऐसे किसी विध्वंस का कोई प्रमाण नहीं मिला. उसने यह भी कहा था कि पूजा स्थल विधेयक, 1991 संविधान के मूलभूत मूल्यों की सुरक्षा करता है.”

लेकिन जाने किन कारणों के चलते जिनकी जानकारी शायद सिर्फ़ फ़ैज़ान साहब को ही है, उन्होंने यह नहीं बताया कि इन सब तथ्यों और सबूतों के बावजूद, जिनकी पुष्टि खुद माननीय उपरोक्त निष्पक्ष जज भी कर रहे हैं, भारत के निष्पक्ष और सबसे बड़े न्यायालय ने यह फ़ैसला कैसे दिया कि “हिन्दुओं की आस्था और उनके इस विश्वास के चलते…कि जहाँ बाबरी मस्जिद बनी है वह भगवान् राम का पूजा-स्थल है” वहाँ एक राम मंदिर का निर्माण किया जाना चाहिए. यहाँ यह उल्लेख करना भी ज़रूरी है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद कोई हिन्दू-मुसलमान मामला नहीं था जैसा कि उसे हिन्दुत्ववादी संगठनों ने बना दिया, और सर्वोच्च न्यायालय भी जिस कथा को सच मान बैठा.

बाबरी मस्जिद का ध्वंस 6 दिसम्बर, 1992 को उस उग्र हिन्दुत्ववादी भीड़ ने किया था जिसे आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने वहाँ जुटाया था. यह हिन्दुओं और मुसलमानों का नहीं हिन्दुत्ववादी संगठनों और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारतीय राजनीति के बीच का मामला था. मस्जिद का ध्वंस सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अनदेखी करते हुए और आरएसएस/भाजपा द्वारा भारतीय संसद और तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को दिए गए इस आश्वासन के बावजूद किया गया कि ऐसा कुछ नहीं होने दिया जाएगा.

प्रधानमंत्री राव ने 15 अगस्त 1993 को लाल क़िले की प्राचीर से बोलते हुए देश और संसद को यह भरोसा दिलाया था कि जो हुआ है उसको पूरी तरह ठीक कर दिया जाएगा, तोड़ी गयी मस्जिद को उसी स्थान पर वापस बनाया जाएगा.

और जैसे यही काफ़ी न हो, सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर बनाने कि इजाज़त उसी संगठन (विश्व हिन्दू परिषद्) को दे दी जो ख़ुद ही मान चुका था कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस में मुख्य भूमिका उसी की थी. इस तरह कुल मिलाकर हुआ यह कि हिंदुत्व के ठेकेदार जो 6 दिसम्बर, 92 को नहीं कर पाए थे उसकी राह सर्वोच्च न्यायालय ने हमवार कर दी.

फ़ैज़ान यह नहीं बताते कि जस्टिस चंद्रचूड़ बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि मामले में उस सर्वसम्मत फ़ैसले को अनदेखा कैसे कर गये जबकि वे स्वयं भी बेंच में शामिल थे. जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष बताते हैं कि 1991 के फ़ैसले से यह उम्मीद की गयी थी कि इससे हिन्दुत्ववादियों द्वारा अनेकों मस्जिदों का ध्वंस करने की परियोजना पर रोक लगेगी. इसके विपरीत,

“ज्ञानवापी पर याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि 1991 का अधिनियम ‘किसी स्थल के धार्मिक चरित्र-स्थापन पर’ रोक नहीं लगाता. (यानी)…अब जो भी चाहे अदालत में जाकर किसी भी मस्जिद, मंदिर, गुरूद्वारे, चर्च या मठ की प्रामाणिकता को प्रश्नांकित कर सकता है और उसकी पहचान को बदलने का अनुरोध कर सकता है….और इस तरह माननीय सर्वोच्च नयायालय ने देश के हर धार्मिक स्थल को संदेह और विवाद के दायरे में ला दिया. क्या यह कहना सही नहीं होगा कि सर्वोच्च न्यायालय की विचार-प्रक्रिया, ग़लती से ही सही, बहुलतावादी विचार-प्रकिया से प्रभावित हुई है?”

तीस्ता सीतलवाड़ और श्रीकुमार की गिरफ़्तारियाँ

फ़ैज़ान सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस सूर्य कान्त और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की तारीफ़ करते हैं कि उन्होंने “पैग़म्बर के ख़िलाफ़ बोलने के लिए भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के विरुद्ध कड़ी टिप्पणियां कीं. जस्टिस शर्मा ने उन्हें उदयपुर के हत्याकांड के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.”

इसके लिए माननीय जज बेशक धन्यवाद के पात्र हैं, लेकिन मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्त्ता तीस्ता सीतलवाड़ और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी श्रीकुमार के साथ जस्टिस ए.एम्. खानविलकर, जस्टिस दिनेश महेश्वरी और जस्टिस सी.टी. रविकुमार की बेंच ने क्या किया, इस पर विचार करना वे भूल जाते हैं.

इस विषय पर जस्टिस मदन बी. लोकुर जो सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ट जज रह चुके हैं ने, (जो संयोग से उसी विधि विश्वविद्यालय की अकादमिक और जेनरल कौंसिल के सदस्य भी हैं जिसके प्रमुख फ़ैज़ान हैं) क्या लिखा, कम से कम वह तो उन्हें पढ़ना ही चाहिए. उन्होंने लिखा कि तीस्ता की गुजरात पुलिस के ज़रिये गिरफ़्तारी सर्वोच्च न्यायालय ने जो उनकी निंदा की उस आधार पर की गई.

“यह त्रासद है कि कौन गिरफ़्तार होगा और क्यों, यह तय करने का दायित्व सर्वोच्च न्यायालय ने अकेले अपने ही ऊपर ले लिया. जैसा कि हम जानते हैं, अदालत की अवमानना का मामला न हो तो यह सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता. और अदालत की अवमानना के मामले में भी फ़ैसले और गिरफ़्तारी से पहले अवमानना करने वाले को सर्वोच्च न्यायालय सुनता है.”

असहमतों के लिए कोई राहत नहीं

दुखद है कि फ़ैज़ान जो एक विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर है (जिस विवि के चांसलर तेलंगाना उच्च न्यायालय के चीफ़ जस्टिस हैं) और जिन्हें क़ानूनी और न्यायिक मामलों के माहिर के रूप में जाना जाता है, वे भी इतनी तथ्यहीन बातें कर सकते हैं! वे स्वीकार करते हैं कि “कई (यानी अनगिनत) मुसलमान युवाओं को आतंकी अभियोगों में एक के बाद एक सरकारों ने गिरफ़्तार किया” लेकिन फिर यह झूठ भी बोल देते हैं कि “ऐसे ज़्यादातर मामलों में उन्हें साफ़ बरी कर दिया गया जिससे पता चलता है कि साधारण मुसलमान वादियों को भी हमारे जजों ने इन्साफ़ दिया है.” एक प्रोफ़ेसर होने के नाते फ़ैज़ान फ़ैज़ान को जानना चाहिए कि अध्यापक को कभी भी तथ्यों के साथ तोड़-मरोड़ नहीं करनी चाहिए. गिरफ़्तार किए जाने वाले अनेक लोग सिर्फ़ मुसलमान नहीं हैं, असंख्य हिन्दू, ईसाई, सिख और दलित भी ऐसे हैं जो आतंकवाद संबंधी कानूनों के तहत बरसों से जेलों में बिना किसी न्यायिक हस्तक्षेप के पड़े हुए हैं.

भारतीय न्याय प्रणाली के विशेषज्ञ की हैसियत से फ़ैज़ान को मानवाधिकार कार्यकर्ता जेसुइट स्टेन स्वामी की वह रिपोर्ट पढ़नी चाहिए, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यक और दलित पृष्ठभूमि से आए उन क़ैदियों के हालात पर रोशनी डाली है जो जेलों में हैं.

क्या फ़ैज़ान साहब को याद दिलाना होगा कि स्टेन स्वामी आतंकवाद संबंधी क़ानूनों के तहत गिरफ़्तार होनेवाले सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति (83 वर्ष) थे जिन्हें 8 अक्टूबर 2020 को गिरफ़्तार किया गया था और जिन्हें मई 28, 2021 को तभी अंतरिम ज़मानत मिल पाई जब बिना इलाज के उनका जीवन असम्भव दिखने लगा. जुलाई 5, 2021 को उनका निधन हो गया.

आपराधिक मामलों में दो तरह के इंसाफ़

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा यह स्वीकार नहीं करते कि भारतीय उच्च न्याय-प्रणाली दो तरह से न्याय करती है जिससे सिर्फ़ मुसलामान ही नहीं अन्य अल्पसंख्यक, दलित और स्त्रियों भी प्रभावित होते हैं. जब भी देश में अल्पसंख्यकों और दलितों पर हिंसा की कोई घटना होती है तो ऐसा कभी-कभार ही होता है कि अपराधियों को दंड मिले, अक्सर उनकी तलाश ही चलती रहती है जो कभी खत्म नहीं होती.

इस सचाई का साक्षात्कार आप कई मामलों में कर सकते हैं जिनमें नेल्ली जनसंहार (1983), सिख जनसंहार (1984), हाशिमपुरा में मुसलमान युवाओं की कस्टडी में हत्या (1987), अयोध्या में मस्जिद के ध्वंस से पहले और बाद में हुई मुसलमान-विरोधी हिंसा (1990-92), गुजरात हत्याकांड (2002), और 2008 में कंधमाल में इसाइयों के सफ़ाये के मामले प्रमुख हैं.

दलितों पर हुई हिंसा की स्थिति भी भिन्न नहीं है.

दलित-उत्पीड़न के हज़ारों मामलों में ये कुछ ऐसे हैं जो हमारे कथन की गवाही देते हैं : 1968 का किल्वेनमनी जनसंहार, 1997 का मलावलायु हत्याकांड, 2013 में मरक्कनम में हुई दलित-हिंसा, 2012 में धरमपुरी की दलित-विरोधी हिंसा (तमिलनाडु), करमचेदु हत्याकाण्ड 1985, 1991 की त्सुन्दुर हिंसा (आंध्र प्रदेश) 1996 का बथानी टोला हत्याकाण्ड, 2014 में लक्ष्मनपुर बाथे हत्याकांड (बिहार), 1997 की रमाबाई हत्या, मुंबई, 2006 का खैरलांजी हत्याकांड, 2014 का जावखेड़ा हत्याकाण्ड (महाराष्ट्र), 2000 का जाति-उत्पीड़न (कर्णाटक), 2006 में एक मृत गाय की खाल उतारने पर दलितों को पीटने और जलाने की घटना, 2011 में मिर्चपुर में दलितों की हत्या (हरियाणा) और 2015 में डंगवास, राजस्थान में दलित-विरोधी हिंसा. इन तमाम मामलों में आज भी अपराधियों की पहचान नहीं हो पायी है. और अगर पहचान हो भी गयी तो सज़ा सिर्फ़ बीस प्रतिशत मामलों में हुई.

दूसरी तरफ़ देखें तो दलित और अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले “अपराधियों” पर विशेष जांच दल बनाकर आनन-फ़ानन में मुक़दमा चलाया जाता है और फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स के मार्फ़त सज़ा भी दे दी जाती है. इन्साफ़ और देश की सुरक्षा के लिए उन्हें जेलों में डाला जाता है, फाँसी पर भी लटकाया जाता है. लेकिन अगर पीड़ित दलित या अल्पसंख्यक हों तो यह तत्परता देखने को नहीं मिलती बल्कि भारतीय प्रशासन-न्याय तंत्र को लक़वा मार जाता है. ऐसे मामलों में भारतीय राज्य कमीशन-कमीशन खेलने लगता है, और यह खेल तब तक खेला जाता है जब तक कि वह अपराध लोगों की याद से ग़ायब नहीं हो जाता. देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई सिखों की हत्याओं में न्याय-व्यवस्था का यह रुख़ आसानी से देखा जा सकता है.

संतुलन बनाए रखना इंसाफ़ करना नहीं होता

क़ानून के महाज्ञानी प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान को जानना चाहिए कि किसी भी क़ीमत पर संतुलन बनाए रखने के हुनर को इंसाफ़ नहीं कहा जा सकता. इंसाफ़ का मतलब होता है कि सच को सच कहा जाए. उच्च न्याय प्रणाली की आज़ादी अगर सर्वोच्च न्यायालय बनाम मुसलमान तक सीमित दृष्टि से बाधित होती है, तो यह न्याय का ही मज़ाक़ बनाना हुआ. सर्वोच्च न्यायालय आतंकवाद संबंधी कानूनों; पत्रकारों, कार्यकर्ताओं पर पेगासस से जासूसी; सीएए की संवैधानिकता; पोलिटिकल बांड्स और धारा 370; श्रमिक विरोधी क़ानूनों और नफ़रत फैलाने वाली गतिविधि आदि मामलों पर अपनी क़ानूनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं कर सका; और इस ढिलाई के चलते असंख्य राजनीतिक कार्यकर्त्ता, पत्रकार, वकील, मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और ट्रेड यूनियन नेता बिना किसी वजह के जेलों में पड़े हुए हैं.

एक स्वतंत्र निष्पक्ष न्याय-व्यवस्था की ज़रूरत दरअसल पूरे मुल्क को है, सिर्फ़ मुसलमान इस से दया की भीख नहीं मांग रहे हैं!

शम्सुल इस्लाम

[अंग्रेज़ी से अनुवाद: चेतन क्रांति]

FAIZAN MUSTAFA’S QUESTIONABLE DEFENCE OF PARTISAN INDIAN HIGHER JUDICIARY

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हमारे बारे में शम्सुल इस्लाम

Author of 15 books. More than 600 articles in English, Hindi and Urdu on religious bigotry, communalism, denigration of women, Dalits and culture. Shamsul Islam taught Political Science at the University of Delhi. As an author, columnist and dramatist he has been wrting against religious bigotry, dehumanization, totalitarianism, and the persecution of women, Dalits and minorities. He is known globally for fundamental research work on the rise of nationalism and its development in India and around the world.

Check Also

opinion debate

‘आजादी का अमृत महोत्सव’ में कहाँ है खेतिहर मज़दूर

आज़ादी का ख्याल ही बहुत खूबसूरत है। हालांकि यह बात अलग है कि हमारे देश …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.