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Modi in Gamchha

गहरे संकट में अर्थव्यवस्था : जीडीपी का 34% पहुंच चुका है भारत सरकार का वित्तीय घाटा !

नई दिल्ली, 03 जुलाई 2020. भारत की विकास दर (India’s growth rate) रसातल में पहुंच गई है। भले ही मोदी सरकार या आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहते हों कि भारत सरकार का वित्तीय घाटा (Government of India’s financial deficit) चार से पांच प्रतिशत के बीच हो लेकिन जाने माने अर्थशास्त्री अरुण कुमार का कहना है कि वित्तीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 34% पहुंच चुका है।

Famous economist Arun Kumar speaking on the topic of ‘Economic conditions and challenges’ in Facebook Live

वर्कर्स यूनिटी के डिजिटल प्लेटफॉर्म फेसबुक लाइव में ‘आर्थिक हालात और चुनौतियाँ’ विषय पर बोलते हुए मशहूर अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा- “कोरोना काल में लॉकडाउन केचलते उत्पादन पूरी तरह से रुक गया है। सिर्फ़ ज़रूरत के सामानों का ही उत्पादन हो पा रहा है। पूरी तरह से उत्पादन रुकने के कारण स्थिति युद्ध समय से भी बदतर है क्योंकि युद्ध के समय में भी उत्पादन पूरी तरह से नहीं रुकता। 2007 से 2009 के बीच आई ग्लोबल मंदी में हालात इतने बुरे नहीं थे, जितने कि अब हैं। सप्लाई और डिमांड भी पूरी तरह से खत्म हो गए हैं।”

ये एक मेडिकल इमर्जेंसी है और इससे निपटने के लिए लॉकडाउन लागू किया गया। लेकिन लॉकडाउन समाधान नहीं है। लॉकडाउन सिर्फ़ समय देता है तैयारी का। ताकि पीक समय के लिए आप तैयार हो सकें। अपने देश में पीक समय अक्टूबर नवंबर में आएगा और उस समय दोबारा से लॉकडाउन लगाना पड़ सकता है ताकि पीक नंबर को कम किया जा सके जब वायरस दोबारा से अटैक करता है और ज़्यादा ख़तरनाक तरह से करता है जैसा कि हमने कुछ देशों के संदर्भ में देखा है।

जब संक्रमितों की संख्या मौजूदा बेडों की संख्या से ज़्यादा हो जाती है तो सुसाइडल ब्रेकडाउन शुरू हो जाता है।

प्रवासी मजदूरों का रिवर्स माइग्रेशन | Reverse migration of migrant laborers

अरुण कुमार कहते हैं –

“गरीब की आमदनी रुकती है तो वो भूख के कगार पर आ जाता है। लोग भूखे प्यासे हजारों किमी पैदल चलकर वापिस अपने गांव जाने को मजबूर हो जाते हैं। वापिस जाते मजदूर लोग अपने गांव जाकर मरने की बात करते हैं। ये डर है जो समाज में व्याप्त हो गया है।

गरीबी और असमान वितरण के चलते लॉकडाउन ने समाज के एक बड़े हिस्से को ज़्यादा प्रभावित किया है। पीने का साफ़ पानी तक नहीं होता उनके पास। पानी के लिए खाने के लिए छोटी छोटी ज़रूरत के सामानों के लिए उन्हें निकलना पड़ता है। शहरों में काम करने गए मजदूर एक छोटे से कमरे में 6-8 मजदूर रहते हैं। सरकार ने सोचा ही नहीं कि लॉकडाउन से इतनी बड़ी संख्या में पलायन होगा। ये सोचना चाहिए था कि लॉकडाउन से काम बंद होने से असंगठित क्षेत्र पर क्या असर होगा? यह सोचना चाहिए था कि फिजिकल डिस्टेंस कैसे होगी जब एक कमरे में 6-8लोग रहते हैं? आप हाथ धोने की बात कर रहे हैं, उनके पास पीने का पानी नहीं है, वो क्या करेंगे? वो रोज कमाकर खाते हैं तो लॉकडाउन में क्या करेंगे? इसीलिए लॉकडाउन का जितना फायदा मिलना चाहिए था, नहीं मिला। अब पता चल रहा है कि स्थिति कितनी खराब है। 8 मजदूर एक कमरे में चौबीसों घंटे नहीं रह सकते। बेहतर तो यही होता कि वो जहां थे उन्हें वहीं ज़रूरत का सामान पहुँचाया जाता। स्कूलों और तमाम खाली इमारतों में उनके रहने की व्यवस्था की जाती।

आधुनिक अर्थव्यवस्था में स्पेशलाइजेशन के चलते निर्भरता बढ़ी है

आधुनिक अर्थव्यवस्था में स्पेशलाइजेशन के चलते गांवों में भी निर्भरता बहुत बढ़ी है शहर तो पूरी तरह से निर्भर हैं ही। गांव वापिस जाकर भी मजदूरों के लिए सर्वाइव करना बहुत मुश्किल होगा।

चीन ग्लोबल इकोनॉमी का हब बन गया है। तो जहां चीन में दिक्कत आई तो हर जगह प्रभावित हुआ। पूरी ग्लोबल सप्लाई चैन डिस्टर्व हो जाती है तो उत्पादन भी मुश्किल हो जाता है। लॉकडाउन में मशीनें नहीं चलती। वर्कर्स काम पर नहीं जाता। तो इन्वेंट्री पर दबाव बढ़ जाता है।

हमारे देश की अर्थव्यावस्था के दो अभिन्न अंग हैं- संगठित और असंगठित क्षेत्र। असंगठित क्षेत्र में उपभोग और इनकम कम होता है। जबकि संगठित क्षेत्र में बँधी आमदनी होती है। संगठित क्षेत्रों में जैसे कि मीडिया में 10-50 प्रतिशत वेतन कटौती की गई है। रियल स्टेट और दूसरे सेक्टर में भी ऐसा हो रहा है। जाहिर है सेविंग होने के बावजूद उपभोग में कटौती होगी।

फाइनेंशियल क्षेत्र में संकट आने से पूरी अर्थव्यवस्था डूब जाती है

A crisis in the financial sector sinks the entire economy

प्रोफेसर अरुण कुमार फाइनेंशियल क्षेत्र के संकट पर बात करते हुए कहते हैं- “जिनका लोन ज़्यादा होगा उनका ब्याज भी ज़्यादा बढ़ेगा। फाइनेंशियल क्षेत्र में संकट आने से अर्थव्यवस्था डूब जाती है। क्योंकि लोन का भी एक पूरा चेन होता है। एक दूसरे को नहीं देगा तो दूसरा तीसरे और तीसरा चौथे को नहीं दे पाएगा। 2008 में अमेरिका का बड़ा बैंक ‘लीमन ब्रदर्स’ ऐसे ही डूबा था। सरकार ने मोरटोरयम दिया है पर समस्या ये है कि यदि उद्योग रिस्टार्ट करना चाहेंगे तो लोन नहीं मिलेगा। एनपीए में तबदील होने के डर से।

छोटे उद्योग डिफॉल्ट होंगे क्योंकि इनके पास वर्किंग कैपिटल नहीं होता। लॉकडाउन में वो छोटी बचत का इस्तेमाल उपभोग में करेंगे तो लॉकडाउन खत्म होने के बाद उद्योग को दोबारा खड़ा करने के लिए उनके पास वर्किंग कैपिटल नहीं होगा। वर्किंग कैपिटल इन्वेस्टमेंट का हिस्सा है।

इसकी पूरी चेन होती है, प्रोडक्शन- वर्कर्स- इनकम- डिमांड- इन्वेस्टमेंट।

इस तरह यदि इन्वेस्टमेंट बंद हो जाएगा तो प्रोडक्शन भी बंद हो जाएगा। केंन्द्रीय बैंक की नीति अप्रभावी हो जाएगी। देखिए इस समय तमाम बैंक के पास लिक्विड फंड है। तो वो इसे रिजर्व बैंक के पास जमा करा देते हैं इससे उन्हें रिवर्स रेपो रेट के जरिए ब्याज मिल जाएगा। केंद्रीय बैंक कह रही है कि इस पैसे को कंपनियों को दो। वो इसे इन्वेस्टमेंट में लगाएंगी। लेकिन बैंक जानते हैं कि कंपनियों में इन्वेंस्टमेंट के बाद इनकम नहीं होगा और ये पैसा एनपीए में बदल जाएगा इसलिए वो कह रही हैं कि डिमांड नहीं है।

अर्थव्यवस्था में जितनी तेज गिरावट आई है उतनी तेज रिकवरी नहीं होगा

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रिकवरी पर बात करते हुए अरुण कुमार कहते हैं-

“अमेरिका में 4.5 करोड़ लोगो की नौकरी गई है। भारत में 12.2 करोड़ नौकरियां अप्रैल तक गई ये बात कही जा रही है यदि इसमें असंगठित क्षेत्रों को भी जोड़ लें तो आँकड़ा 20-22 करोड़ के ऊपर चला जाता है। बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान होने और नौकरियां जाने के कारण आम जनता की तरफ से मांग नहीं आएगी। इसी वजह से आरबीआई ब्याज दरें घटा कर भी नए लोन देने में अधिक सफल नहीं रहेगा।

भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतौर पर घरेलू बाजार पर निर्भर है। भारतीय अर्थव्यवस्था 95% घरेलू बाजार पर और 5% विदेशी निवेश पर निर्भर करती है। लॉकडाउन की वजह से घरेलू मांग बुरी तरह प्रभावित हुई है और विदेशी निवेश भी नहीं आ रहा है। आने वाले समय में V शेप रिकवरी नहीं U शेप रिकवरी होगी। यानि जितनी तेज गिरावट आर्थिक मोर्चे पर आई है, उतनी तेज रिकवरी नहीं होगी। इससे कम से कम एक साल या उससे अधिक का समय लग सकता है। ”

अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने आगे बताया कि-

“200 लाख करोड़ की इकोनॉमी लॉकडाउन में घटकर 130 लाख करोड़ की हो गई है जबकि जीएसटी कलेक्शन करीब 10% ही हो रहा है। अर्थव्यवस्था में 75% की कटौती हुई है और फिलहाल लॉकडाउन के बीच अर्थव्यवस्था 25% ही काम कर रही है। ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित हैं।

कृषि क्षेत्र की हालात संभालने के लिए सरकारी बसों को इस्तेमाल हो

कृषि क्षेत्र के संकट पर बात करते हुए अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं,

“भारत की कुल आबादी का 58 फ़ीसदी हिस्सा खेती पर निर्भर है और देशी की अर्थव्यस्था में 256 बिलियन डॉलर का योगदान है। ऐसे में दो हज़ार रुपये की मदद पर्याप्त नहीं है क्योंकि निर्यात ठप हो चुका है, शहरी क्षेत्रों में कीमतें बढ़ेंगी क्योंकि मांग बढ़ रही है और ग्रामीण क्षेत्र में कीमतें गिरेंगी क्योंकि किसान अपनी फसल बेच नहीं पाएंगे। यह संकट बेहद गंभीर समय में आया है, जब नई फसल तैयार है और बाज़ार भेजे जाने के इंतज़ार में है। भारत जैसे देश में जहां लाखों लोग गरीबी में जी रहे हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि कठिन लॉकडाउन की स्थिति में गांवों से खाने-पीने की ये चीज़ें शहरों और दुनिया के किसी भी देश तक कैसे पहुंचेंगी। अगर सप्लाई शुरू नहीं हुई तो खाना बर्बाद हो जाएगा और भारतीय किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ेगा।”

प्रो अरुण कुमार का कहना है कि खाली खड़े पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग गांव की अर्थव्यवस्था संभालने में हो सकता है।

सरकार अपना बजट दोबारा से बनाए

अपने वक्तव्य को कन्क्ल्यूड करते हुए अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं- सच तो ये है कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं। जो हैं उससे बस सर्वाइवल हो सकता है। अतः इस समय हमें इकोनॉमिकल रिवाइवल से अधिक सर्वाइवल के बारे में सोचना होगा। पर सरकार ने जो राहत पैकेज के नाम पर दिया है वो भी सर्वाइवल के पैसे नहीं हैं वो लोन चुकाने के लिए दिए गए पैसे हैं। सरकार को अपने संसाधनों का इस्तेमाल लोगों के खाने पीने और मेडिकल सुविधाओं पर खर्च करने चाहिए। साथ ही 6 करोड़ कुटीर उद्योगों को उबारने के लिए उनका सहायता देने का प्रयास करना चाहिए। सरकार को अपने फंड्स का इस्तेमाल धारावी जैसी तंगहाल जगहों से लोगों को डिकंजस्ट करने में लगाना चाहिए। उनका पार्कों  या शेल्टर होम्स में रहने का इंतजाम करना चाहिए। जो लोग जहां पर मौजूद हैं उनके खाने पीने और मेडिकल की सुविधा का इंतजाम होना चाहिए।

अर्थव्यवस्था ब्रेकडाउन की स्थिति में हैं तो ऐसे में सरकार के लिए अपने खर्चों (जैसे कि अपने कर्मचारिय़ों को सैलरी आदि देने) के निकालनें में भी दिक्कत होने वाली है।

अंत में प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि सरकार के पास आने वाले समय में कुछ महीनों तक सैलरी देने लायक भी पैसा नहीं होगा. ऐसे में सरकारी कर्मचारियों को सैलरी कट के लिए तैयार रहना होगा। साथ ही बेहतर होगा सरकार अब कोरोनाकाल को देखते हुए अपने बजट को दोबारा से बनाए।

(वीडियो से रूपांतरणः सुशील मानव)

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