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भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है किसान आंदोलन

Farmer movement can cause political damage to BJP

नई कृषि नीति के लिए केंद्र सरकार की तरफ से लाये गए कानूनों के बाद पंजाब सहित देश के कई हिस्सों में किसानों की अगुवाई में विरोध हो रहा है। दिल्ली राज्य के तीन प्रवेश द्वारों पर किसानों ने अपने खेमे लगा दिए हैं। किसान आन्दोलन (Kisan Andolan Hindi News) शुरू होने के बाद जब पहली बार कोई चुनाव हुआ तो साफ समझ में आ गया कि किसानों का आन्दोलन (Kisan Andolan News) भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है। पंजाब में नगर पंचायतों के चुनाव के नतीजे आए वे केन्द्र की भाजपा सरकार के लिए बुरी खबर के रूप में आए।

कांग्रेस की पंजाब में सरकार है और पिछले चार साल से अमरिंदर सिंह की सरकार ने बहुत सारे ऐसे काम किए हैं जिनके कारण उनका विरोध भी है लेकिन नगर पंचायतों के चुनाव के नतीजे बताते हैं कि अकाली दल और भाजपा से नाराज लोगों ने टूट कर कांग्रेस को समर्थन दिया है। इन नतीजों से भाजपा की उन उम्मीदों को झटका लगा है जिसके तहत उसके नेता सोच रहे थे कि यह चुनाव मूल रूप से शहरी इलाकों में हुए हैं। कृषि कानूनों का विरोध करने वाले ज्यादातर किसान गांवों में रहते हैं।

बंगाल में भाजपा को अब शुवेंदु अधिकारी पर नहीं असदुद्दीन ओवैसी पर भरोसा

बंगाल में भी भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ा है। वहां इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। सबको मालूम है कि नंदीग्राम में किसानों की समस्याओं को मुद्दा बना कर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2011 का चुनाव लड़ा था और दशकों से जमी हुई वाम मोर्चे की सरकार को उखाड़ फेंका था। उस आन्दोलन का प्रमुख नौजवान चेहरा था शुवेंदु अधिकारी। शुवेंदु को बाद में ममता बनर्जी ने मंत्री बनाया। उनके पूरे परिवार को राजनीति से जो भी लाभ संभव है, मिलता रहा लेकिन भाजपा ने उनको तोड़ लिया। कोशिश यह थी कि किसानों के नेता के रूप में बनी उनकी छवि का लाभ लिया जाएगा। बहुत ही बाजे-गाजे के साथ उनको भाजपा में भर्ती किया गया। लेकिन जब किसान आन्दोलन से उपजी नाराजगी की आंच बंगाल में भी दिखने लगी तो पार्टी ने चुनावी रणनीति में बदलाव किया। अब मुस्लिम नेता, असदुद्दीन ओवैसी को मैदान में लाया गया है और भाजपा के सभी नेता अपने भाषणों में ममता सरकार की तुष्टिकरण की नीति की आलोचना (Criticism of Mamta government’s appeasement policy) कर रहे हैं, जय श्रीराम के नारे लगा रहे हैं और ममता को हिंदुत्व की पिच पर खेलने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

तीनों कानून वापस भी ले सकती है भाजपा सरकार, लेकिन …

इस बात में दो राय नहीं है कि भाजपा को नई कृषि नीति की वजह से चुनावी नुकसान हो रहा है। यह भी संभव है कि राजनीतिक नुकसान का आकलन करने के बाद भाजपा और उनकी सरकार किसानों की मांग को मान भी ले और तीनों कानून वापस ले ले लेकिन उससे भी कोई राजनीतिक फायदा नहीं होने वाला है क्योंकि किसान आन्दोलन तो यही साबित करने की कोशिश करेगा कि उनके दबाव के कारण ऐसा संभव हुआ है। दिल्ली में कुछ ऐसे भी ज्ञानी मिल जायेंगे तो बता देंगे कि दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा किसान आन्दोलन कमजोर पड़ गया है लेकिन यह सच नहीं है। आन्दोलन का असर गांवों में किसानों की नाराजगी के रूप में साफ नजर आ रहा है। भाजपा को अगर इस बात का सही अंदाजा लग गया तो खेती के औद्योगीकरण और पूंजीवादीकरण (Industrialization and Capitalization of Farming) पर रोक लग जायेगी और किसानी उसी हरित क्रान्ति के दौर में बनी रह जायेगी। पूंजीवादी आर्थिक विकास की दिशा कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है लेकिन जब पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था उसी ढर्रे पर जा रही हो तो खेती को उससे बाहर रखने से उन्हीं लोगों का नुकसान होगा जो खेती पर ही निर्भर हैं।

यह भी सच है कि जिस रूप में नए कानूनों को लाया गया है उसमें बहुत कमियां हैं। पूरा कानून वापस लेने की जिद पर अड़े किसानों को चाहिए कि उसमें जो खामियां हैं उनको दुरुस्त करने की बात करें।

जरूरी है कृषि कानून में बदलाव | Changes in agricultural law are necessary

कृषि कानून में बदलाव जरूरी है, क्योंकि हरित क्रान्ति के बाद कोई भी बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। 1991 में जब डॉ. मनमोहन सिंह ने जवाहरलाल नेहरू के सोशलिस्टिक पैटर्न के आर्थिक विकास को खतम करके देश की अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी विकास के रास्ते पर डाला था तो उन्होंने कृषि में भी बड़े सुधारों की बात की थी। खेती को अगर विकास का औजार और ग्रामीण गरीबी को घटाने के वाहक रूप में रखना है तो कृषि सुधारों का पूरी तरह से विरोध नहीं किया जाना चाहिए। आज भारतीय खेती में खेत मजदूर की संख्या, जमीन के मालिक से ज्यादा है। पंजाब और हरियाणा के अलावा बाकी देश में किसानों के पास बहुत कम क्षेत्रफल की जमीन खेती लायक है।

पंजाब सहित बाकी देश में जमीन के नीचे पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। धान और गेहूं की खेती में बहुत पानी लगता है। चावल का तो देश के बाहर भी बाजार है लेकिन गेहूं को निर्यात करना असंभव है। ऐसी खेती की जरूरत है जिससे जलस्तर का संतुलन भी बना रहे और खेती से प्रति एकड़ आर्थिक उपज भी ऐसी हो जिससे किसान के परिवार की देखभाल भी हो सके। साथ-साथ औद्योगीकरण को भी रफ्तार दी जाए जिससे खेती से बाहर निकलने वाले कामगारों को उद्योगों में खपाया जा सके।

जरूरत है कम पानी वाली खेती को देश की आदत बनाया जाए

सबसे जरूरी बात तो कम पानी वाली खेती को देश की आदत बनाने की जरूरत है। इजरायल में इसी तरह के प्रयोग किये गए और अब बहुत बड़े पैमाने पर सफलता मिल चुकी है। रेगिस्तान में महंगी निर्यात होने लायक फसल पैदा करके उन्होंने अपने यहां के जमीन मालिकों की संपन्नता को कई गुना बढ़ा दिया है। कीनू, नींबू, खजूर और जैतून की खेती को बढ़ावा दिया गया जिसमें कम से कम पानी लगता है और सभी उत्पादन निर्यात किये जाते हैं।

नई कृषि नीति में खामियां, इससे ग्रामीण भारत में समस्याओं का अम्बार लग जायेगा

जरूरत इस बात की है एक एक बूंद पानी बचाया जाय और सीमित जमीन से ज़्यादा आर्थिक लाभ लिया जाए। नई कृषि नीति को इस दिशा में जाना चाहिए था लेकिन उसमें खामियां बहुत सी हैं। इन खामियों के साथ-साथ अगर यह नीति पूरी तरह से लागू कर दी गई और आर्थिक असमानता और बढ़ेगी और ग्रामीण भारत में समस्याओं का अम्बार लग जायेगा।

एक प्रसिद्ध कहावत है कि, ‘हमको जमीन अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं मिलती, हम उसे अपने बच्चों से उधार लेते हैं।’ यानि हमें इस जमीन को उनके मालिकों तक उसी तरह से पहुंचाना है जैसी हमको मिली थी। साफ मतलब है कि जमीन का जलस्तर घटाए बिना खेती करने की जरूरत है।

शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंह शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं।
शेष नारायण सिंह
शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं।

(देशबन्धु)

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