वादा तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू करने का, पर यहां तो एमसीपी ही खतरे में है

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वादा फरामोशी, यूं तो दुनिया भर की सभी सरकारों और राजनीतिक दलों का स्थायी भाव होता है, पर चर्चा उसी की होती है जो वर्तमान में सामने है। 20 सितंबर को राज्यसभा से किसी तरह ध्वन्यात्मकता के सहारे सरकार ने कृषि विधेयकों (Agricultural bills) को पारित ज़रूर करा लिया और जैसा कि प्रधानमंत्री जी ने कहा है कि यह सब तो कांग्रेस के भी घोषणापत्र (Manifesto of congress too) में था, तो अचानक यह खयाल आया कि किसानों के लिये इनका क्या वादा है (What is the promise of Modi-BJP for farmers) ?

सरकार के प्रति अविश्वास का फल है किसान आंदोलन Farmer movement is the result of mistrust of government

ऐसा नहीं है कि आज पंजाब से कर्नाटक तक जो किसान आंदोलन चल रहा है वह भटके हुए कुछ मुट्ठीभर किसानों का आंदोलन है, बल्कि यह सरकार के प्रति अविश्वास, वादा खिलाफी, बार बार हो रहे मिथ्यावाचन और साख के संकट का परिणाम है। अन्नदाता, माईबाप, मिट्टी, भारत माता के सच्चे सपूत आदि-आदि ख़िताबों से अलंकृत देश का कृषक समाज, आज पहली बार सड़कों पर नहीं उतरा है। वह हर राजनीतिक दल के शासनकाल में, हर सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ (Against the government’s anti-farmer policies), कभी गन्ने के बकाया भुगतान को लेकर, तो कभी प्याज़ की अचानक घट जाती कीमतों को लेकर, तो कभी कॉरपोरेट के इशारे पर ज़मीन के बलात अधिग्रहण को लेकर, तो कभी बिजली, खाद, डीजल को रियायती दर पर देने की मांग को लेकर, तो कभी अपनी उपज के वाजिब कीमत को लेकर, सड़कों पर उतरता रहा है।

किसान आंदोलन का इतिहास | History of peasant movement

अगर किसान आंदोलन के इतिहास को खंगाला जाय तो देश के हर हिस्से में कहीं न कहीं बराबर किसान आंदोलन होते रहे हैं। इस इतिहास को एक लेख वह कितना भी लंबा हो, उसे समेटना सम्भव नहीं होगा। उस पर अलग अलग आंदोलनों पर अलग अलग लेख लिखे जाने चाहिए।

उपज की वाजिब कीमत और उसका समय पर  भुगतान, यह किसानों की एक बड़ी समस्या है। 1965 से किसानों को उनके फसल की लागत मिले इस लिए एक आयोग बनाया गया जो अध्ययन कर के उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करता था। गन्ने का मूल्य अलग से तय होता था। सभी सरकारें हर साल बुआई के पहले फसल की कीमत तय करती थी। हर साल इनकी कीमत सरकारें बढ़ाती भी हैं। यह अलग बात है कि किसी साल यह वृद्धि दर कम होती है तो किसी साल यह वृद्धि दर अधिक हो जाती है। यह बहुत कुछ बाजार और सरकार की आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करता है।

एमएस स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट की दिलचस्प कहानी | Interesting story of MS Swaminathan Committee report

ऐसी ही कृषि उपज की कीमतों को तय करने के लिये एक कमेटी एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित हुयी थी, जिसने एक लंबी चौड़ी रिपोर्ट दी। इस कमेटी के रिपोर्ट की एक दिलचस्प कहानी यह है कि, जब कांग्रेस सत्ता के बाहर रहती है तो वह, यह मांग करती है कि, सरकार इस कमेटी की रिपोर्ट को लागू करे, और जब भाजपा सत्ता के बाहर विपक्ष में रहती है तो वह इस पर अड़ी रहती है कि, इस कमेटी की रिपोर्ट लागू की जाय और जब दोनों सरकार में होते हैं तो इस रिपोर्ट की बात भी नहीं करते हैं !

कौन हैं एमएस स्वामीनाथन | Who is MS Swaminathan

अब एक चर्चा वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन की। जेनेटिक वैज्ञानिक, एमएस स्वामीनाथन, को भारत की हरित क्रांति का जनक माना जाता है। उन्होंने 1966 में मैक्सिको के बीजों को पंजाब की घरेलू किस्मों के साथ मिश्रित करके उच्च उत्पादकता वाले गेहूं के संकर बीज विकिसित किए। ‘हरित क्रांति’ कार्यक्रम के तहत ज़्यादा उपज देने वाले गेहूं और चावल के बीज ग़रीब किसानों के खेतों में लगाए गए थे। इस क्रांति ने भारत को दुनिया में खाद्यान्न की सर्वाधिक कमी वाले देश के कलंक से उबारकर 25 वर्ष से कम समय में आत्मनिर्भर बना दिया था।

उस समय से भारत के कृषि पुनर्जागरण ने स्वामीनाथन को ‘कृषि क्रांति आंदोलन’ के वैज्ञानिक नेता के रूप में ख्याति दिलाई। उनके द्वारा सदाबाहर क्रांति की ओर उन्मुख अवलंबनीय कृषि की वकालत ने उन्हें अवलंबनीय खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में विश्व नेता का दर्जा दिलाया। एम. एस. स्वामीनाथन को ‘विज्ञान एवं अभियांत्रिकी’ के क्षेत्र में ‘भारत सरकार’ द्वारा सन 1967 में ‘पद्म श्री’, 1972 में ‘पद्म भूषण’ और 1989 में ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया था।

देश में जब-जब किसान आंदोलन होता है और किसान जब सड़क पर आते हैं तब-तब स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों की चर्चा होती है। महात्मा गांधी ने 1946 में कहा था, “जो लोग भूखे हैं, उनके लिए रोटी भगवान है।”

इसी कथन को मार्गदर्शी सिद्धांत बनाते हुए 18 नवम्बर 2004 को यूपीए सरकार ने, कृषि की समस्या को गहराई से समझने और किसानों की प्रगति का रास्ता तैयार करने के लिए राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया था। इस आयोग के चेयरमैन कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के जनक डॉ. एमएस स्वामिनाथन थे। इसलिए ही इसे स्वामीनाथन रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है।

इस आयोग ने अक्टूबर 2006 में अपनी रिपोर्ट दी है, जिसमें खेती-किसानी में सुधार के लिए बहुत सी बातें कही गई हैं। इसमें जो सबसे प्रमुख सिफारिश है, वह, कृषि को राज्यों की सूची के बजाय समवर्ती सूची में लाने की बात है, ताकि केंद्र व राज्य दोनों किसानों की मदद के लिए आगे आएं और समन्वय बनाया जा सके। आज भी यह सिफारिश लंबित है।

स्वामीनाथन आयोग के मुख्यमुख्य सुझाव निम्न प्रकार से हैं,

● कमेटी ने बीज और फसल की कीमत को लेकर भी सुझाव दिया. कमेटी ने कहा कि किसानों को अच्छी क्वालिटी का बीज कम से कम दाम पर मुहैया कराया जाए और उन्हें फसल की लागत का पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम मिले।

● अच्छी उपज के लिए किसानों के पास नई जानकारी का होना भी जरूरी है। ऐसे में देश के सभी गांवों में किसानों की मदद और जागरूकता के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल की स्थापना की जाए। इसके अलावा महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड की व्यवस्था की जाए।

● कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में भूमि सुधारों पर भी जोर दिया और कहा कि अतिरिक्त व बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांट दिया जाए। इसके अलावा कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए गैर-कृषि कार्यों को लेकर मुख्य कृषि भूमि और वनों का डायवर्जन न किया जाए। कमेटी ने नेशनल लैंड यूज एडवाइजरी सर्विस का गठन करने को भी कहा।

● कमेटी ने भी किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाने की सिफारिश की थी, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके।

● कमेटी ने छोटे-मंझोले किसानों को लेकर भी बड़ी सिफारिश की थी और कहा था कि सरकार खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था करे, ताकि गरीब और जरूरतमंद किसानों को कोई दिक्कत न हो।

● किसानों के कर्ज की ब्याज दर 4 प्रतिशत तक लाई जाए और अगर वे कर्ज नहीं दे पा रहे हैं तो इसकी वसूली पर रोक लगे।

स्वामीनाथन आयोग की एक प्रमुख सिफारिश यह भी है, कि किसानों को उनकी फ़सलों के दाम उसकी लागत में कम से कम 50 प्रतिशत जोड़ के दिया जाना चाहिए। पूरे देशभर के किसान इसी सिफ़ारिश को लागू करने की माँग को लेकर सड़कों पर कई बार आंदोलन कर चुके हैं। लेकिन तमाम वादे करने के बाद भी इस सिफ़ारिश को न तो यूपीए सरकार ने लागू किया गया और न ही वर्तमान की भाजपा सरकार ने। लगभग दो सालों तक भारत के तमाम कृषि संगठन, जानकार और किसानों से बात करने के बाद आयोग ने अपनी कई महत्वपूर्ण सिफ़ारिशों के साथ कुल पाँच रिपोर्ट तत्कालीन यूपीए सरकार को 2006 में सौंप दी थी। पर अफ़सोस की दस साल बीत जाने के बाद भी अभी तक इस रिपोर्ट को पूरी तरीक़े से लागू नहीं किया गया है।

भाजपा ने 2014 के आम चुनाव के समय अपने घोषणापत्र जिसे वे संकल्पपत्र कहते हैं, में वादा किया है कि वे फ़सलों का दाम लागत में 50 प्रतिशत जोड़ कर के देंगे। लेकिन जब हरियाणा के एक आरटीआई एक्टिविस्ट पीपी कपूर की एक आरटीआई दायर कर के सरकार से इस वादे के बारे में पूछा तो,  सरकार ने जवाब दिया कि, वे इसे लागू नहीं कर सकते हैं।

इस रिपोर्ट में मुख्यतः फ़सलों की मूल्य निर्धारण नीति और कर्ज़ा नीति पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया है। स्वामीनाथन आयोग की एक सिफारिश यह भी है कि, साल भर में किसान की लागत है और उसकी मेहनत को जोड़कर, डेढ़ गुना दाम दिया जाय। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया और वहां भी, सरकार ने हाथ खड़े कर दिए कि हम यह दाम नहीं दे सकते। विडंबना है, जो लोग सरकारी नौकरियों में हैं, उनका वेतन तो 150 गुना तक बढ़ाया गया है और किसान के लिए यही वृद्धि, 70 बरस में सिर्फ 21 गुने तक बढ़ी है। लगता है, पूरा तंत्र ही किसान विरोधी है।

एमएससी के संबंध में, स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू न करने पर खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा कहते हैं,

“सरकारें ऐसा नहीं करेंगी क्योंकि इनकी जो नीति है वो खाद्य महंगाई को कम रखने की है, इसलिए आपको खाद्य मूल्य को कम रखना होगा और इसका मतलब है कि इसका ख़ामियाज़ा सीधे किसान को ही भुगतना है। इसलिए मै ये कहना चाहता हूँ कि सरकार की मंशा है कि किसान को खेती से ही बाहर कर दिया जाए।”

वर्तमान समय में कृषि मंत्रालय के अधीन आने वाली संस्था कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफ़ारिश पर केंद्र सरकार फ़सलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है। सरकार का कहना है कि

“स्वामीनाथन आयोग द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सरकार द्वारा इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि एमएसपी की सिफ़ारिश कृषि लागत और मूल्य आयोग द्वारा संबंध घटकों की क़िस्म पर विचार करते हुए वस्तुपरक मानदंड पर की जाती है।”

पूर्व कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री कहते हैं,

“कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा खेती के ख़र्चे का हिसाब लगाने की जो प्रणाली है वो बहुत ही त्रुटिपूर्ण है। ये ना तो किसी आर्थिक आधार पर तर्कपूर्ण है और ना ही किसी वैज्ञानिक आधार पर।”

वही मज़दूर किसान शक्ति संगठन की सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय कहती हैं,

“चाहे जो भी सरकार सत्ता में हो, हमेशा ही आर्थिक नीतियां कारपोरेट और मुक्त बाज़ार की वकालत करने वाले अर्थशास्त्रियों को ध्यान में रख कर तय की जाती हैं जिन्हें उन ज़मीनी हक़ीक़त की कोई जानकारी नहीं होती जो ग़रीब हर रोज़ सामना करता है। यदि हम चाहते हैं कि देश में किसान बचा रहे तो स्वामिनाथन रिपोर्ट को तुरंत लागू कर देना चाहिए।”

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि फ़सलों के सही दाम ना मिलना, मंडी की अव्यवस्थता, पानी की सही व्यवस्था ना होना, समय पर कर्ज़ ना मिलना, भूमि सुधार का अधूरा रह जाना ये सब किसानों की समस्या के मुख्य कारक है। वर्तमान में किसान की स्थिति पर स्वामीनाथन कहते हैं कि

” खेती एक जीवन देने वाला उद्योग है और यह बहुत दुखद है कि हमारे देश का किसान ख़ुद ही अपना जीवन समाप्त कर लेता है।”

आप जो लगातार बढ़ती हुयी किसान आत्महत्याएं देख रहे हैं, उनकी तह मे यह असंतोष, कुंठा, बेबसी और अंधकार में डूबा हुआ भविष्य है, जहां दूर-दूर तक, प्रत्यूष की कोई आस ही नहीं है।

उद्योग, हाइवे, स्मार्टसिटी, बुलेट ट्रेन, आदि ज़रूरी हैं पर कृषि इन सबसे अधिक ज़रूरी है। आर्थिक सुधार के एजेंडे में समग्र कृषि सुधार पर कोई बात ही नहीं की गई। हर आपदा में उद्योगों को राहत देने की बात उठती है, उन्हें बैंक कर्ज़ भी देते हैं, कर्ज़ देकर उसकी वसूली भूल भी जाते हैं, पर किसानों को मिलने वाली सब्सिडी पर कोई ध्यान नहीं कभी नहीं देता है। 70 % आबादी जो खेती पर निर्भर है, देश की आर्थिकि का मूलाधार जहां कृषि हो, वहां किसानों के संबंध में कोई भी निर्णय लेने के पहले, क्या किसानों के नेताओ से उनकी समस्याओं के बारे में चर्चा नहीं की जानी चाहिए थी ?

हो सकता है स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करना किन्हीं कारणों से सम्भव न हो, पर वे कारण तो किसानों और संसद की जानकारी में लाये जाने चाहिए। आश्वासनों का एक अंतहीन फरेब तो कभी न कभी खत्म होना चाहिए।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अधिकारी हैं

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

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