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Justice Markandey Katju

किसानों का आंदोलन : SC के पूर्व जज की सलाह – बचा जाए टकराव से

Farmers’ Movement: Avoid Conflict

जस्टिस मार्कंडेय काटजू,

पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया

हरियाणा पुलिस द्वारा कई बाधाओं और रोकने के बावजूद, भारतीय संसद द्वारा हाल ही में पारित किए गए तीन किसान कानून के खिलाफ ‘दिल्ली चलो’ के नारे के साथ किसानों ने पंजाब से दिल्ली की ओर कूच किया। कुछ अन्य राज्यों के किसान भी आंदोलन में शामिल हो गए हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अब सभी मुद्दों पर किसानों के साथ बातचीत की पेशकश की है, यहां तक कि 3 दिसंबर से ही पहले, जो केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर द्वारा वार्ता के लिए पहले प्रस्तावित तारीख थी। आंदोलनकारी किसानों को इस प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिएI

यह सच है कि भारतीय किसानों को कुछ वास्तविक शिकायतें हैं, उनमें से प्रमुख यह है कि उन्हें अपने उत्पादों के लिए पर्याप्त पारिश्रमिक मूल्य नहीं मिलते हैं। उन्हें यह भी आशंका हैं कि नए कानून उनके हितों के लिए हानिकारक हो सकते हैं, और उन्हें कुछ कॉरपोरेटों ( corporates ) की दया पर जीवित रहने की आशंका है।

फिर भी मैं सम्मान के साथ प्रस्तुत करता हूं कि अगर उन्होंने आगे भी आंदोलन जारी रखा तो आंदोलन उनके लिए हित से ज़्यादा अहित ही साबित होगा। आंदोलन द्वारा अब तक उन्होंने अपनी बात रखी है, और अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया, लेकिन अब केंद्र सरकार के साथ बातचीत का समय आ गया है।

आंदोलनकारी किसानों को एक बात समझनी चाहिए : प्रशासन का एक सिद्धांत है कि सरकार को कभी भी दबाव के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए, क्योंकि अगर वह करती है, तो इस से सरकार को कमज़ोर समझा जाएगा, और तब और मांगें, दबाव बढ़ाए जायेंगे। इसलिए अगर किसानों को लगता है कि इस आंदोलन से वे सरकार को को घुटने टिकवा देंगे और उन्हें पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर देंगे, तो ये उनकी भूल हैI

केंद्रीय गृह मंत्री के माध्यम से सरकार ने सभी मुद्दों पर किसानों के साथ बातचीत की पेशकश की है, और अब उनके लिए यह प्रस्ताव स्वीकार करने का समय आ गया है। हर संघर्ष में एक आगे बढ़ने का वक़्त होता है और एक बातचीत करने का या पीछे हटने का।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पहले की वार्ता विफल रही, लेकिन कोई और प्रयास करने से कोई नुकसान नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच 1950-51 की कोरियाई युद्ध ( Korean War ) के बाद वार्ता कई बार विफल रही, लेकिन अंततः एक सफल समझौता हुआ। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र अमरीका और उत्तरी वियतनाम की युद्ध के दौरान कई बार असफल वार्ता हुईं, लेकिन अंततोगत्वा जनवरी १९७३ में एक समझौता हुआ I यहाँ भी ऐसा हो सकता है।

किसान संगठनों का कहना है कि गृह मंत्री का निमंत्रण शर्तों के साथ है और इस लिए वह उन्हें मंज़ूर नहीं है। पर मेरी समझ में यह कोई अहम् मसला नहीं है। शायद गृह मंत्री ने आंदोलनकारियों को बुरारी जाने को इसलिए कहा क्योंकि कई सड़कों पर बाधा हो रही थी। फिर भी मेरी समझ में भारत सरकार को इस शर्त पर हठ नहीं करना चाहिएI

मुझे भय है कि आंदोलनकारी किसानों की ओर से कठोर स्वभाव और हठी होना केवल हिंसा को ही जन्म देगा, जैसा कि जनवरी 1905 में सेंट पीटर्सबर्ग में ख़ूनी रविवार ( Bloody Sunday ) को हुआ था, या अक्टूबर 1795 में पेरिस में वेंडीमाइरे ( Vendemiare ) में, जहां नेपोलियन की तोपों से ‘व्हिफ़ ऑफ ग्रेपशॉट ‘ ( whiff of grapeshot’ ) के द्वारा एक बड़ी भीड़ को तितर-बितर कर दिया गया।

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