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Ghazipur border: farmers will plant flowers near police forts.

जनांदोलन बन चुका है किसान आंदोलन

Farmers’ movement has become a mass movement

बेनतीजा रही सरकार और किसानों के बीच बातचीत

भारत सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में पिछले 9-10 महीनों से दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में किसान शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन कर रहे हैं। सरकार के साथ किसान नेताओं की कई दौर की बातचीत (Several rounds of talks of farmer leaders with the government) कृषि कानूनों को वापस नहीं लेने, यहां तक कि उसमें फेरबदल पर भी राजी नहीं होने वाली सरकार की जिद के कारण बेनतीजा ही रही है।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा ने एक स्वर से घोषित किया है कि किसान अपनी मांगें पूरी होने यानी कृषि कानूनों की वापसी होने तक घर लौटने वाले नहीं हैं। चाहे इसके लिए उन्हें अपने संघर्ष को 2024 तक या उससे आगे भी क्यों न खींचना पड़े।

करनाल एपिसोड ने बढ़ाया किसानों का मनोबल

हरियाणा के करनाल में संघर्षरत किसानों को मिली तात्कालिक कामयाबी से भी किसान नेताओं का मनोबल बढ़ा है। गौरतलब है कि 28 अगस्त को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के करनाल आगमन का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज (Police’s barbaric lathi charge on farmers) के बाद किसानों ने अपनी मांगें पूरी होने तक करनाल में मिनी सचिवालय (Mini Secretariat in Karnal) के सामने डेरा डाल दिया था। किसानों के दबाव में आई हरियाणा सरकार और किसान नेताओं के बीच बनी सहमति के बाद किसानों ने मिनी सचिवालय से अपना धरना हटा लिया है। सरकार ने 28 अगस्त के पुलिस लाठी चार्ज की न्यायिक जांच पूर्व न्यायाधीश से करवाने, एक महीने के भीतर जांच रिपोर्ट पेश करने, पुलिस लाठीचार्ज के बाद मरे घायल किसान के परिवार के दो लोगों को सरकारी नौकरी देने और एसडीएम आयुष सिन्हा को एक महीने के लिए छुट्टी पर भेजने की घोषणा की है।

मुजफ्फरनगर में किसानों की महापंचायत से बदल रही किसान आंदोलन की दशा-दिशा

इधर उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 5 सितंबर को हुई किसानों की महापंचायत ने इस आंदोलन की दिशा बदलनी शुरू कर दी है।

तीन कृषि कानूनों की वापसी की मांग (Demand for withdrawal of three agricultural laws) के साथ शुरू हुआ किसान आंदोलन अब एक जन आंदोलन का रूप लेने लगा है। किसान नेता अब कृषि कानूनों के विरोध के साथ ही मोदी सरकार पर देश के सरकारी संसाधनों, सार्वजनिक उपक्रमों को अपने चहेते पूंजीपतियों को बेचने का आरोप भी लगाने लगे हैं। इसके साथ ही महंगाई, बेरोजगारी के सवाल भी उठाते हुए किसान नेता वोट की चोट से सत्ता परिवर्तन की बात भी करने लगे हैं। यह भी एक कारण है कि अब किसान आंदोलन के साथ मजदूर और बेरोजगार युवा भी जुड़ते जा रहे हैं।

तमाम विरोधी दलों का खुला समर्थन इस आंदोलन के पक्ष में दिखने लगा है। और अब तो सत्तारूढ़ दल भाजपा, इसके सहयोगी और इसे संचालित करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय किसान संघ के लोग भी कृषि कानूनों के विरुद्ध आंदोलित किसानों के पक्ष में बोलने लगे हैं।

लेकिन सरकार न जाने किन कारणों से इन सब बातों को अनसुना कर रही है। अलबत्ता पिछले 5 सितंबर को मुजफ्फरनगर में हुई किसानों की महापंचायत और उसमें मंच से सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ाने के इरादे से दिए गए अल्ला हू अकबर, हर हर महादेव और जो बोले सो निहाल, सत सिरी अकाल का नारा लगाकर किसान नेताओं ने भाजपा के चुनावी रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। उन्हें लगता है कि इस तरह के नारों के साथ किसान नेताओं और खासतौर से राकेश टिकैत के गूंगी-बहरी और संवेदनहीन सरकार को वोट की चोट देने के आह्वान का न सिर्फ उत्तर प्रदेश और पंजाब बल्कि उत्तराखंड विधानसभा के चुनावों में भाजपा की राजनीतिक सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।

महापंचायत में किसान नेताओं ने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि 2013-14 में वे लोग भाजपा और आरएसएस के द्वारा फैलाए गए भ्रम के झांसे में आ गए थे।

गौरतलब है कि 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों ने न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में भी भाजपा के पक्ष में चुनावी माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस बार किसान आंदोलन ने न सिर्फ किसानों को बल्कि इन इलाकों में दशकों पुराने सामाजिक सद्भाव और भाईचारे को भी लामबंद किया है। किसानों ने 27 सितंबर को भारत बंद करने की घोषणा भी की है। उनके इस आह्वान को तमाम मजदूर संगठनों का समर्थन भी मिल रहा है।

किसान नेताओं की बदली रणनीति पर काबू पाने की गरज से मोदी सरकार ने तीन दिन बाद, 8 सितंबर को रबी फसलों-दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की खरीद के लिए एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य में लाक्षणिक वृद्धि कर किसानों के सामने राजनीतिक चुग्गा फेंकने की कोशिश की। लेकिन किसान नेता इससे अप्रभावित रहे। उनका कहना है कि एमएसपी तो बढ़ती-घटती रहती है, उनकी मांग तो एमएसपी की व्यवस्था जारी रखने और एमएसपी पर किसानों की फसल की खरीद की संवैधानिक गारंटी देने की है। किसान नेता करनाल में एसडीएम के बर्बर और किसान-विरोधी रवैए को सामने रखकर कह रहे हैं कि इससे भी जाहिर होता है कि कृषि कानून किस हद तक किसानों के विरुद्ध है।

कृषि कानून के तहत किसानों और व्यापारी पूंजीपतियों के बीच किसी तरह का विवाद होने पर उसका निपटारा किसी अदालत में नहीं बल्कि एसडीएम के दरबार में होगा। आयुष सिन्हा के रवैए से समझा जा सकता है कि किसानों को किस तरह का न्याय मिलेगा। यही नहीं मंडियों के बने रहने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों की फसल खरीद के लिए संवैधानिक गारंटी की मांग कर रहे किसानों का तर्क है कि इस तरह की गारंटी नहीं होने के बाद पूंजीपति वैसा ही करेंगे जैसे हिमाचल प्रदेश में गौतम अडानी की कंपनी ने सेब किसानों के साथ किया है।

पहले तो मंडी व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए उन लोगों ने दाम बढ़ाकर किसानों से सेब की खरीद की लेकिन इस बार सेब के दामों में गुणवत्ता के हिसाब से औसतन 15-20 रुपए प्रति किलो के हिसाब से कमी कर दी है। इसी तरह से उनका कहना है कि कृषि कानूनों के बनने के बाद से उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब तथा कई अन्य राज्यों में भी कृषि उत्पादन मंडी समितियों में भारी कमी आई है। किसान नेताओं का मानना है कि कृषि कानूनों के अमल में आने पर किसानों का उनकी जमीन और उपज पर भी हक नहीं रह जाएगा। कार्पोरेट ताकतों को कृषि पर कब्जा करने का हक मिल जाएगा। इस बीच भारत सरकार के अधीन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के ताजा सर्वेक्षण ने बताया है कि देश में खेती-बाड़ी करने वाले आधे से अधिक परिवार कर्ज के बोझ से दबे हैं। इस सर्वेक्षण के अनुसार 2019 में 50 प्रतिशत से अधिक कृषक परिवार कर्ज में डूबे थे। उन पर प्रति परिवार औसतन 74,121 रुपये का कर्ज था। सर्वे में कहा गया है कि उनके कुल बकाया कर्ज में से तकरीबन 70 प्रतिशत बैंक, सहकारी समितियों और सरकारी एजेंसियों जैसे संस्थागत स्रोतों से लिए गये थे।

जबकि 20.5 प्रतिशत कर्ज पेशेवर सूदखोरों से लिये गये। इसमें से 57.5 प्रतिशत ऋ ण कृषि उद्देश्यों से लिए गये थे। एनएसओ ने जनवरी-दिसंबर 2019 के दौरान देश के ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार की भूमि और पशुधन के अलावा कृषि परिवारों की स्थिति का आकलन किया। सर्वे के अनुसार कृषि वर्ष 2018-19 (जुलाई-जून) के दौरान प्रति कृषि परिवार की हर महीने औसत आमदनी महज 10,218 रुपये थी। एनएसओ यानी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की यह रिपोर्ट आंख खोलने वाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 के संसदीय चुनाव से पहले और बाद में भी किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने, उनकी आमदनी दो गुनी करने की बातें करते रहे हैं। एनएसओ के ये आंकड़े उनके इन वादों को सच की कसौटी पर परखने में भी मददगार हो सकते हैं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो किसानों का आंदोलन अब केवल तीन कृषि कानूनों को रद्द करने का आंदोलन मात्र नहीं रह गया है। अब इसने एक वृहत्तर जनांदोलन की शक्ल लेनी शुरू कर दी है। मोदी जी और उनकी सरकार में शामिल लोगों को पता होना चाहिए कि 1973-74 का गुजरात आंदोलन कुछ कालेजों में होस्टल की फीस बढ़ने और भोजन की गुणवत्ता के लेकर शुरू हुआ था। उसकी ही तर्ज पर बिहार आंदोलन शुरू हुआ। आगे चलकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के भी उस आंदोलन में शामिल होने के बाद उसे जेपी आंदोलन या कहें संपूर्ण क्रांति आंदोलन भी कहा जाने लगा। उसकी परिणति आपातकाल और फिर पहली बार केंद्र में सत्ता परिवर्तन के रूप में देखने को मिली थी।

समय रहते अगर सरकार ने कृषि कानूनों पर किसानों के हित में कोई ठोस फैसला नहीं किया तो उसे इसकी बानगी अगले साल फरवरी-मार्च महीने में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिल सकती है।

जयशंकर गुप्त

लेखक देशबन्धु के कार्यकारी संपादक हैं। वह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य भी रहे हैं।

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