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<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
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<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
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<pubDate>Wed, 17 Jun 2026 05:38:01 GMT</pubDate>
<lastBuildDate>Wed, 17 Jun 2026 05:38:01 GMT</lastBuildDate>
<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
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<title><![CDATA[टेलीविजन ज्योतिष और सामाजिक विभाजन: कैसे टीवी पर प्रसारित फलित ज्योतिष बढ़ाता है सांप्रदायिकता और यथास्थितिवाद | प्रो. जगदीश्वर]]></title>
<description><![CDATA[प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी का विश्लेषण कि कैसे टेलीविजन पर प्रसारित फलित ज्योतिष सामाजिक विभाजन, सांप्रदायिक चेतना, मनोवैज्ञानिक परनिर्भरता और यथास्थितिवाद को मजबूत करता है।]]></description>
<tags>ज्योतिष,लोकतंत्र,साम्प्रदायिकता</tags>
<link>https://hastakshep.com/column/television-jyotish-samajik-vibhajan-tv-astrology-communalism-prof-jagdishwar-part-1-305141</link>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 17 Jun 2026 03:28:07 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Professor Jagdishwar Chaturvedi]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2025/12/23/66843-professor-jagdishwar-chaturvedi.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2025/12/23/66843-professor-jagdishwar-chaturvedi.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>टेलीविजन पर ज्योतिष कार्यक्रमों का बढ़ता प्रभाव
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>क्या टीवी ज्योतिष हिंदू समाज के ध्रुवीकरण का माध्यम बन रहा है?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>फलित ज्योतिष और सामाजिक यथास्थितिवाद का संबंध
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>टीवी ज्योतिष में सांप्रदायिक चेतना का निर्माण
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>टेलीविजन ज्योतिष का मनोवैज्ञानिक तंत्र
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>महिलाओं और मध्यवर्ग को कैसे प्रभावित करता है टीवी ज्योतिष
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>ज्योतिष, अंधविश्वास और अधिनायकवादी मानसिकता
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>समय, ग्रह और नियति का मनोवैज्ञानिक विमर्श
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>फलादेश की भाषा और सामाजिक नियंत्रण
</b></li></ul><h3 style="text-align: justify; "><b>प्रो. जगदीश्वर की दृष्टि में टेलीविजन, ज्योतिष और लोकतंत्र
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी अपनी आत्मकथा के इस महत्त्वपूर्ण अंश में टेलीविजन पर प्रसारित फलित ज्योतिष का समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। उनका तर्क है कि टीवी ज्योतिष केवल धार्मिक आस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक विभाजन, सांप्रदायिक चेतना, अंधविश्वास, मध्यवर्गीय मनोविज्ञान और अधिनायकवादी संस्कृति को मजबूत करने वाला वैचारिक उपकरण भी है। यह लेख मीडिया, धर्म और लोकतंत्र के अंतर्संबंधों पर गंभीर बहस छेड़ता है....
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>टेलीवि‍जन ज्‍योति‍ष और सामाजि‍क वि‍भाजन- 1
</b></p><p style="text-align: justify; ">टेलीविजन जनमाध्यम है। सबका माध्यम है। यह धर्म और सम्प्रदाय की सीमाओं को अस्वीकार करता है। इसके बावजूद धर्म के बगैर इसका जिंदा रहना असंभव है। ज्यादा से ज्यादा श्रोता जुटाने के चक्कर में टेलीविजन समाज की अविवेकवादी परंपराओं का इस्तेमाल करता है। अविवेकवादी परंपराएं सहज स्वीकार्य होती हैं। जो सहज स्वीकार्य है वह टेलीविजन का अंग बन सकता है। जटिल और विवेकपूर्ण सहज स्वीकार्य नहीं होता और इस तरह के कार्यक्रमों को प्रायोजक भी जल्दी नहीं मिलते। साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फलित ज्योतिषशास्त्र सामाजिक जीवन में यथास्थिति बनाए रखने का सबसे प्रभावी औजार है। इसे सामाजिक परिवर्तन से घृणा है। इस परिप्रेक्ष्य में सीटीवीएन, अल्फा, एटीएन वर्ल्ड आदि बांग्ला चैनलों और संस्कार, आस्था आदि हिन्दी चैनलों से प्रसारित ज्योतिष कार्यक्रमों पर विचार करने से कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">पहली बात यह कि ये चैनल टेलीविजन के माध्यम से हिंदुओं को गोलबंद कर रहे हैं। यह साम्प्रदायिक कार्य है। इस कारण इस तरह के प्रसारणों पर तुरंत पाबंदी लगायी जानी चाहिए। टेलीविजन से फलित ज्योतिष का प्रसारण सामाजिक विभाजन और असुरक्षा को बढ़ाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">फलित ज्योतिषशास्त्र हमेशा से जनप्रिय रहा है। इसकी जनप्रियता का प्रधान कारण है इसका यथास्थितिवादी होना।
</p><p style="text-align: justify; ">हिंदुओं को गोलबंद कर रहा है ज्योतिष की हिन्दूवादी परंपरा का टेलीविजन प्रसारण
</p><p style="text-align: justify; ">ज्योतिषशास्त्र की प्रत्येक देश और धर्म में अलग-अलग परंपराएं हैं। ज्योतिष के इस वैविध्यमय स्वरूप के बावजूद ज्योतिष की हिन्दूवादी परंपरा का टेलीविजन प्रसारण स्वभावत: हिंदुओं को गोलबंद कर रहा है। टेलीविजन चैनलों से ज्योतिष के जिन फार्मूलों, पद्धतियों, उपायों और भाषा का प्रयोग हो रहा है। वे सभी हिन्दू धर्म के तहत प्रचलित फलित ज्योतिषशास्त्र की देन हैं। यह हमारी अविवेकवादी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है।
</p><p style="text-align: justify; ">टेलीविजन की खूबी है कि वह अपने दर्शकों की सामाजिक अवस्था को हमेशा ध्यान में रखता है। यही खूबी फलित ज्योतिषशास्त्र की भी है।
</p><p style="text-align: justify; ">फलादेश की प्रकृति से पाठक की प्रकृति का अंदाजा लगाया जा सकता है। चूंकि केबल टेलीविजन के ग्राहक घोषित हैं और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि भी घोषित है, अत: ज्योतिषी को अपने मुहावरे और सलाह तय करने में समय नहीं लगता। साथ ही उसे फुसलाने में भी मदद मिलती है।
</p><p style="text-align: justify; ">टेलीविजन पर पूछे जाने वाले सवालों के जबाव पुंसवादी दृष्टिकोण से दिए जाते हैं। सवाल करने वाले सिर्फ हिन्दू होते हैं। टेलीविजन वालों से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या उनके चैनल को मुसलमान और ईसाई नहीं देखते? अथवा सवाल प्रायोजित होते हैं ? यदि मुसलमान और ईसाई देखते हैं तो उनके लिए एक जैसी समस्याओं पर उनकी परंपरा के मुताबिक उत्तर क्यों नहीं दिए जाते ?
</p><p style="text-align: justify; ">टेलीविजन से प्रसारित फलित ज्योतिषशास्त्र के सीधा प्रसारण कार्यक्रमों के दर्शकों में सवाल पूछने वालों में ज्यादातर महिलाएं होती हैं। कभी-कभार पुरूषों की संख्या ज्यादा होती है। यह भी देखा गया है कि महिला और पुरूषों की संख्या बराबर होती है। ज्योतिषी का औरतों के प्रति जो व्यवहार होता है वही पुरूषों के प्रति होता है। इसके कारण स्त्रियां ज्यादा आकर्षित होती हैं। क्योंकि ज्योतिषी उनसे समान व्यवहार करता है। साथ ही घरेलू औरतें इससे यह भी महसूस करती हैं कि उनसे वीआईपी की तरह व्यवहार किया जा रहा है। 
</p><p style="text-align: justify; ">ज्यादातर सवालों के व्यवहारिक उत्तर दिए जाते हैं। ज्योतिषी यह संदेश देता है कि जो बताया जा रहा है उसका पालन करो। पालन कराने वाले की छवि पुरूष की ही होती है। वही समाज में फैसले लेता है। ज्योतिष के पुंसवाद के कारण महिला ज्योतिषी भी मर्दभाषा में ही बोलती हैं। ज्यादातर औरतें सामाजिक जीवन में फैसले के लिए पुरूषों पर निर्भर होती हैं। अत: उन्हें समाधान इसी चीज को ध्यान रखकर सुझाए जाते हैं। जब किसी युवा (30साल तक) को सलाह दी जाती है तो उसमें आनंद और रोमांस के तत्व पर ज्यादा जोर रहता है। जो औरत नौकरी की तलाश में है या नौकरी कर रही है उसे पेशेवर रिश्तों और रवैयये में इजाफा करने की सलाह दी जाती है। युवा नौकरीपेशा लोगों को पेशेवर कौशल में वृद्धि करने की सलाह दी जाती है। जब तय है कि सवाल करने वाला हिन्दू है तो उसके हिन्दू कर्मकाण्ड के मुताबिक समाधान भी तय हैं। यही वह जगह है जहां टेलीविजन विशेष रूप से हिन्दुओं को सम्बोधित करता है। मसलन् एक ही जैसी समस्या से हिन्दू परेशान है और मुसलमान भी परेशान है। 
</p><p style="text-align: justify; ">या यह भी संभव है कि सवाल करने वाला मुसलमान हो तब क्या ज्योतिषी उसे हिन्दू समाधान देगा या इस्लामिक समाधान देगा। मसलन् किसी मुस्लिम युवक की नौकरी नहीं लगी है या वह गंभीर बीमारी का शिकार है। तब ज्योतिषी क्या समाधान देगा ?जाहिरा तौर पर हमारे टेलीविजन ज्योतिषियों को इस्लामिक परंपरा का ज्ञान ही नहीं है। 
</p><p style="text-align: justify; ">फर्ज कीजिए जो मुस्लिम युवक गंभीर बीमारी का शिकार है और उसका मारकेश ग्रह का समय चल रहा है। ऐसे में क्या किया जाय ? ज्योतिष में ऐसी स्थितियों के लिए जितने भी उपाय सुझाए गए हैं उनमें से किसी को भी मुसलमान को मानना संभव नहीं है। मसलन् आप उसे महामृत्युंजय का जप करने को बोलें या मारकेश ग्रह का मंत्र जप करने के लिए कहें, यह सब इस्लामिक परंपरा में नहीं है। तब क्या मुस्लिम युवक को मरने के लिए छोड़ दें ?
</p><p style="text-align: justify; ">यह बात रखने का प्रमुख उद्देश्य है ज्योतिष में निहित साम्प्रदायिकबोध को सामने लाना। 
</p><p style="text-align: justify; ">ध्यान रहे अधिनायकवादी, सर्वसत्तावादी और फासीवादी ताकतें अपने जनाधार का विस्तार करने के लिए ज्योतिष रूपी अविवेकवादी सांस्कृतिक परंपरा का जमकर इस्तेमाल करती हैं। साथ ही यह भी ध्यान रहे कि ज्योतिषी के द्वारा बताए गए समाधान हमेशा सामान्य और आनंद के समय धार्मिक उपायों पर जोर देते हैं। अथवा यह कोशिश होती है कि किसी अन्य के बहाने उपाय करा दिया जाय।
</p><p style="text-align: justify; ">फलित ज्योतिष और मनोविज्ञान के बीच रिश्ता
</p><p style="text-align: justify; ">अमूमन प्रश्नकर्ता से यह सवाल किया जाता है कि वह क्या करता है, कितना पढ़ा - लिखा है, कितनी उम्र है। इस सबकी पद्धति पर गौर करें तो फलित ज्योतिष और मनोविज्ञान के बीच के रिश्ते को बखूबी समझ सकते हैं। ज्योतिषी किसी भी व्यक्ति को निराश नहीं करता। वह आशा बनाए रखता है। साथ ही वह यह जानता है कि सवाल करने वाले मध्य वर्ग-निम्न मध्य वर्ग से हैं और इनमें ज्यादा से ज्यादा पाने की लालसा होती है। सब कुछ शॉर्टकट रास्ते से पाना चाहते हैं। इसके लिए वह रत्नधारण करने, ताबीज पहनने और मंत्र जप करने के उपाय सुझाता है। यह सारे उपाय मध्यवर्ग के शॉर्टकट को रास आते हैं। इसमें सफलता प्रमुख है चाहे वह किसी भी तरीके से हासिल की जाय। यह मानसिकता राजनीतिक तौर पर अजनतांत्रिक व्यक्तित्व का निर्माण करती है जिससे अधिनायकवादी और फासीवादी ताकतें लाभ उठाती हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">ज्योतिषी फलादेश करते समय हमेशा देश, काल और पात्र का ख्याल रखता है। इसके आधार पर वह सामान्य फार्मूलों के जरिए समाधान देने की कोशिश करता है। 
</p><p style="text-align: justify; ">ज्योतिषी के लिए भ्रम बनाए रखना जरूरी होता है। साथ व्यक्ति की स्वायत्तता का भी ख्याल करता है। भ्रमों को बनाए रखकर यह आभास देता है कि फलां-फलां आकांक्षाएं हैं जो अभी पूरी होनी बाकी हैं। यदि इन्हें हासिल करना है तो किसी अन्य की मदद लेनी होगी। अन्य में अपने से बड़े की मदद हो सकती है, ज्योतिषी द्वारा किया गया अनुष्ठान या उपाय हो सकता है या स्वयं के द्वारा किया गया मंत्र, पूजा आदि हो सकती है। इस सबमें मूल में है अन्य। यह बड़ा होगा या अदृश्य होगा।
</p><p style="text-align: justify; ">ज्योतिषी अन्य की सलाह देते समय प्रश्नकर्ता के अहं का ख्याल रखता है। वह ऐसा कोई समाधान नहीं देता जो अहं को ठेस पहुँचाए अथवा नीचा दिखाए। यही वजह है कि वह ज्यादातर व्यक्तिगत उपाय सुझाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">दूसरी बात यह ध्यान में रखता है कि समाज की हायरार्की को व्यक्ति माने। मसलन् किसी व्यक्ति ने पूछा कि मेरा अपने ऑफिस में काम सही ढंग से नहीं चल रहा या मेरा प्रमोशन होगा या नहीं तो ज्योतिषी का सीधा उत्तर होता है कि अपने से बड़े अधिकारी से सामंजस्य बनाकर रखो।
</p><p style="text-align: justify; ">फलादेश की संरचना हमेशा जिज्ञासु की सामाजिक हैसियत और अवस्था को ध्यान रखकर तैयार की जाती है। इसमें सामाजिक और मानसिक तौर पर कमजोर और पर निर्भर व्यक्ति की इमेज होती है। किन्तु यह व्यक्ति कभी अपनी कमजोरी स्वीकार नहीं करता और न ज्योतिषी कभी इसे सीधे इस रूप में पेश भी नहीं करता। बल्कि संरचना इस तरह तैयार की जाती है जिसमें साफ तौर पर दिखाई देता है कि व्यक्ति सामाजिक ढ़ांचे में कमजोर है। फलादेश में उसकी सामाजिक कमजोरियों के चारित्रिक गुणों को समाहित कर लिया जाता है। फलादेश के ढ़ांचे में इन कमजोरियों को शामिल करने से व्यक्ति अपने को मजबूत महसूस करता है। यहां सब कुछ भाषा के खेल में व्यक्त होता है। मसलन् जब कोई व्यक्ति यह पूछता है कि मेरा मुकदमा चल रहा है।मैं जीतूँगा या हारूँगा। ज्योतिषी बड़े कौशल के साथ जबाव देता है कि समय थोड़ा खराब चल रहा है। कुण्डली में फलां-फलां ग्रह कमजोर है। इसके लिए फलां मंत्र जप करो, फलां रत्न पहनो, फलां देवता की किसी दिन विशेष को पूजा करो। इससे स्थिति में सुधार होगा। इस तरह के उत्तर आम हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">असल में ग्रह की कमजोर या खराब स्थिति के बहाने व्यक्ति की कमजोर और परनिर्भर अवस्था की ओर ही ध्यान खींचा जाता है। इससे उबरने का वास्तव तरीका सुझाने की बजाय ज्योतिषी 'छद्म भूमिका' के लिए मजबूर करता है। मंत्र, तंत्र, रत्न आदि 'छद्म भूमिकाएं' हैं। इस क्रम में व्यक्ति के अहं और बौद्धिक कमजोरी को छिपाने में मदद मिलती है। सामाजिक अहं को संतुष्टि मिलती है।
</p><p style="text-align: justify; ">ज्यादातर समय हम छद्म गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। ज्योतिषी इस छद्म वातावरण का बड़े कौशल के साथ इस्तेमाल करता है। साथ ही छद्म गतिविधियों के लिए माहौल तैयार करता है।
</p><p style="text-align: justify; ">फलादेश में जितनी कमजोरियां बतायी जाती हैं, वे व्यक्ति की स्वभावगत कमजोरियां हैं। असल में ये बुद्धि या विवेक या व्यक्तित्व की कमियां हैं। इनको सुधारा जा सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">फलादेश में आमतौर पर मध्यवर्ग की मनोदशा को ध्यान में रखा जाता है। मध्यवर्गीय चरित्र की विशेषता है कि यह सर्वसंग्रही होता है। किन्तु फलादेश में उसके सर्वसंग्रही भाव के अनेक मुख्य तत्वों की अनदेखी की जाती है। जैसे परपीड़क आनंद, कृपणता आदि को छिपाया जाता है। पण्डित नियमों के पालन पर जोर देता है। ये नियम ही हैं जिनके माध्यम से वह सवालों के जबाव देता है। यह 'अंधभक्ति' है, आज्ञापालन है। इसी के जरिए ज्योतिषी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। अथवा अदृश्य शक्ति के ऊपर अपना नियंत्रण दर्शाता है। वह बताता है कि यह करो और यह न करो। यह एक तरह से बाध्यकारी व्यवस्था को आरोपित करना हुआ।
</p><p style="text-align: justify; ">ज्योतिषियों के द्वारा ग्रहों के बहाने दी गई सलाह जातक के अंदर अविवेकवादी अधिनायकवादी परनिर्भरता और समर्पण के भावबोध की सृष्टि करती है। इस भावबोध को निर्मित करने में जातक की बाध्यतामूलक संभावनाओं को उभारा जाता है। ज्योतिषी इस प्रसंग में अनेक ऐसी सलाह और उपचार बताता है जिनका जातक के जीवन के यथार्थ और भविष्य से कोई संबंध नहीं होता।
</p><p style="text-align: justify; ">मसलन् किसी आदमी का अपनी नौकरी में मन नहीं लगता अथवा मालिक परेशान करता है या किसी लड़की की शादी में बिलंव हो रहा है या किसी का कारोबार मंदा चल रहा है आदि सवालों के जबाव और समाधान इस तरह दिए जाते हैं जिससे जातक विपरीत परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बनाने की कोशिश कर और आत्महीनता से मुक्त हो जाए। ऐसा करते समय ज्योतिषी जातक को और भी ज्यादा आज्ञाकारी बनाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">आज्ञाकारी बनाने का तरीका यह है, ज्योतिषी कहता है तुम्हारा शादी में सूर्य के कारण विलंव हो रहा है अत: सूर्य की पूजा करो और मंत्र जाप करो। जातक मजबूर होता है और आज्ञापालन करता है। यह एक तरह से अविवेकवादी ढ़ंग से आज्ञाकारी बनाने का तरीका है।
</p><p style="text-align: justify; ">जातक से कहा जाता है कि वह उपाय करे और कष्ट मुक्त हो वरना दु:ख भोगे। जब इस तरह के परनिर्भरता को उभारने वाले उपाय बताए जाते हैं तो यथार्थवादी तत्वों का पूरा तरह लोप नहीं होता। बल्कि ज्योतिषी यही समझाने की कोशिश करता है कि जातक आत्मनिर्भर है। किन्तु ज्योतिषी हमेशा जातक की परनिर्भर अवस्था का इस्तेमाल करता है।
</p><p style="text-align: justify; ">प्रस्तुति में ज्योतिष इस तरह के मुहावरों और भाषायी रूपों का इस्तेमाल करता है जिससे ज्योतिष में निहित अविवेक छिप जाता है। वह ज्योतिष के बारे में सोचना बंद कर देता है। वह जातक की यथार्थ जिन्दगी और ज्योतिष के बीच इस तरह संबंध बनाता है जिससे बाध्यतामूलक भावबोध छिप जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि ज्योतिषी की कोशिश यह होती है कि लोगों में परंपरागत, यथास्थितिवादी और अड़ियल रवैया बना रहे। इससे यथार्थ के नकारात्मक पक्ष को नियंत्रण में रखने और यह समझाने में मदद मिलती है कि जो भी कुछ होगा वह व्यक्ति के नियंत्रण में है न कि वस्तुगत परिस्थितियों के नियंत्रण में है। इस क्रम में व्यक्ति से वायदा किया जाता है कि यदि वह फलां-फलां उपाय करे और फलां-फलां चीजों से परहेज करे तो उसकी समस्या का समाधान हो जाएगा। व्यक्ति को इस तरह उन परिस्थितियों के ज्ञान से दूर रखने की कोशिश की जाती है जिनके कारण वह ज्योतिष की शरण में जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">ज्योतिषी जानता है कि जीवन की वास्तव परिस्थितियां इस कदर कठिन और चुनौतीपूर्ण हैं कि उनकी पूरी तरह उपेक्षा संभव नहीं है। यही वजह है कि ज्योतिषी अंतर्विरोधपूर्ण स्थितियों और संभावनाओं की ओर ध्यान देता है।
</p><p style="text-align: justify; ">मसलन् एक बेरोजगार इंजीनियर युवक को नौकरी नहीं मिल रही है। ज्योतिष के उपाय के बावजूद नौकरी नहीं मिल रही है। ऐसी स्थिति में ज्योतिषी कुछ इस तरह का तंत्र फैलाएगा कि लगे कहीं न कहीं कुछ बड़ी गड़बड़ी है। इस क्रम में बेकार युवक परेशान होगा और ज्योतिषी इसके लिए उसे मानसिक तौर पर तैयार करता है। वह बेकारी के वास्तव कारणों को अपने बयान में शामिल करता है, उन वास्तव अंतर्विरोधों को शामिल करता है जिन्हें जातक जानता है। जिससे जातक उसके आदेश को माने।
</p><p style="text-align: justify; ">इस प्रसंग में ज्योतिषी जिस तत्व का सबसे प्रभावी ढ़ंग से इस्तेमाल करता है वह है समय का तत्व। जितने भी फलादेश टेलीविजन और पत्र-पत्रिकाओं के कॉलम में छपते हैं उनमें समय की सर्वोच्च सत्ता पर जोर होता है। समय की सत्ता पर जोर देते समय अंतर्विरोधपूर्ण तत्वों को छोड़ दिया जाता है। ज्योतिषी यहां समय का मीडियम के तौर पर इस्तेमाल करता है। ज्योतिषी यह आभास देता है कि जो कुछ भी हो रहा है और होने वाला है वह सब ग्रहों के प्रभाव का परिणाम है। इस क्रम में वह पल-पल की जानकारी देने का पाखण्ड रचता है। यह कार्य वह कुण्डली, राशिफल, जन्म लग्न या अंक ज्योतिष के बहाने करता है। 
</p><p style="text-align: justify; ">फलादेश इस तरह लिखा या बताया जाता है जिससे सारी संभावनाएं समय के ऊपर छोड़ दी जाती हैं। अब समय ही अंतत: निर्णायक शक्ति बनकर सामने आता है। और प्रकारान्तर से समय का नियंता स्वयं ज्योतिषी बन जाता है। यही ज्योतिष में निहित अविवेकवाद है।
</p><p style="text-align: justify; ">समस्या यह है कि जीवन की अंतर्विरोधपूर्ण परिस्थितियों और जरूरतों का ज्योतिषी कैसे विकेन्द्रीकरण करता है, समाधान करता है। वह जरूरतों को विभिन्न काल खण्डों में विभक्त कर देता है। यहां तक कि उन्हें एक ही दिन में विभिन्न समयों में विभक्त कर देता है। इस क्रम में वह कोशिश करता है कि व्यक्ति की दो अन्तर्विरोधी इच्छाएं एक साथ न रहें। मसलन् किसी बच्चे के बारे में यह सवाल नहीं किया जा सकता कि उसकी शादी कब होगी ?क्योंकि वह अभी बच्चा है और बच्चे की एकमात्र इच्छा है कि वह पढ़े। यदि बच्चा पढ़ता नहीं है और खेलता है या सब समय परेशान करता है तो इसके साथ पढ़ाई संभव नहीं है। इस तरह के अंतर्विरोधों को हल करने के लिए ज्योतिषी वास्तव समाधान सुझाता है। समय की सत्ता पर विश्वास के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह ईगो की कमजोरी को सामने लाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">(क्रमशः)
</p><p style="text-align: justify; "><b>(प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी की आत्मकथा का अंश)</b></p><p style="text-align: justify; "><b></b></p><div draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/8t5vHqDoB9I" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></div><p style="text-align: justify; "><b> 
</b></p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
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<title><![CDATA[INDIA गठबंधन का भविष्य: राहुल गांधी के सामने क्या हैं सबसे बड़ी चुनौतियां? दीपांकर भट्टाचार्य का विश्लेषण]]></title>
<description><![CDATA[INDIA गठबंधन का भविष्य : दीपांकर भट्टाचार्य ने INDIA गठबंधन, राहुल गांधी, लोकतांत्रिक प्रतिरोध, जन आंदोलनों और विपक्ष की राजनीति के भविष्य पर विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है]]></description>
<tags>भाजपा,आरएसएस,हिंदुत्व,स्वतंत्रता,स्वतंत्रता आंदोलन,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद,किसान आंदोलन,राहुल गांधी,भारत जोड़ो यात्रा,पश्चिम बंगाल</tags>
<link>https://hastakshep.com/politics/india-alliance-future-rahul-gandhi-deepankar-bhattacharya-analysis-305025</link>
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<category><![CDATA[Breaking News,देश,राजनीति,समाचार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 10:12:47 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Dipankar Bhattacharya's response to Rahul Gandhi: Will the INDIA alliance regain its strength?]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/16/151021-dipankar-bhattacharyas-response-to-rahul-gandhi-will-the-india-alliance-regain-its-strength.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/16/151021-dipankar-bhattacharyas-response-to-rahul-gandhi-will-the-india-alliance-regain-its-strength.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>INDIA गठबंधन को नया जीवन कैसे मिलेगा? दीपांकर भट्टाचार्य ने बताए रास्ते</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>राहुल गांधी, INDIA ब्लॉक और लोकतांत्रिक प्रतिरोध की नई राजनीति
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>प्रतिरोध, नवीनीकरण और INDIA गठबंधन का भविष्य: दीपांकर भट्टाचार्य का बड़ा राजनीतिक विश्लेषण
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या INDIA गठबंधन फिर मजबूत होगा? राहुल गांधी की भूमिका पर CPI(ML) महासचिव की राय
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>लोकतंत्र, प्रतिरोध और विपक्ष की राजनीति: INDIA गठबंधन पर दीपांकर भट्टाचार्य का लेख
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>क्या INDIA गठबंधन 2029 की लड़ाई के लिए खुद को फिर से तैयार कर सकता है? CPI(ML) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने राहुल गांधी की भूमिका, विपक्ष की चुनौतियों, जन आंदोलनों और लोकतांत्रिक प्रतिरोध की राजनीति पर महत्वपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया है। जानिए उनके लेख की प्रमुख बातें...
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>राहुल गांधी के भाषण में क्या था खास?
</b></h3><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>INDIA गठबंधन के सामने वैचारिक चुनौतियां
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>पूर्ण स्वराज से लोकतांत्रिक प्रतिरोध तक की राजनीतिक विरासत
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>दीपांकर भट्टाचार्य ने कांग्रेस के भीतर किन विरोधाभासों की ओर इशारा किया?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>INDIA ब्लॉक की रणनीति में किसान, छात्र और श्रमिक आंदोलनों की भूमिका
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>चुनावी झटकों के बाद INDIA गठबंधन की नई चुनौतियां
</b></li></ul><h4 style="text-align: justify; "><b>राहुल गांधी की दोहरी जिम्मेदारी: कांग्रेस का पुनर्निर्माण और गठबंधन का नेतृत्व
</b></h4><p style="text-align: justify; ">नई दिल्ली, 16 जून 2026. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा INDIA गठबंधन की बैठक में दिए गए भाषण को सार्वजनिक किए जाने के बाद विपक्षी राजनीति और गठबंधन की दिशा पर नई बहस शुरू हो गई है। CPI(ML) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने अपने अंग्रेज़ी में लिखे एक विस्तृत लेख में राहुल गांधी के भाषण का विश्लेषण करते हुए INDIA गठबंधन की उपलब्धियों, उसकी वैचारिक चुनौतियों और भविष्य की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की है। उनका कहना है कि गठबंधन की सफलता केवल चुनावी तालमेल से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध, जन आंदोलनों और साझा वैचारिक प्रतिबद्धता से तय होगी।
</p><p style="text-align: justify; "><b>पृष्ठभूमि और राहुल गांधी का भाषण
</b></p><p style="text-align: justify; ">भाषण का सार्वजनिक होना: यह संभवतः पहली बार है जब कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के नेताओं की बैठक में दिए गए अपने भाषण को सार्वजनिक किया है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>भाषण का मुख्य ध्यान: </b>उनका ध्यान संघ-भाजपा (Sangh-BJP) द्वारा भारतीय गणराज्य की संवैधानिक नींव, और लाखों भारतीयों की स्वतंत्रता व आजीविका पर किए जा रहे हमलों के खिलाफ एक एकजुट प्रतिरोध खड़ा करने पर केंद्रित था।
</p><p style="text-align: justify; "><b>भाषण पर प्रतिक्रिया: </b>सीपीआई-एमएल लिबरेशन महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य के अनुसार, राहुल गांधी का भाषण आश्वस्त करने वाला भी था और कुछ हद तक चिंताजनक भी। यह भाषण कांग्रेस की बैठक में तो बहुत प्रभावी ढंग से गूंजता, लेकिन भारत के संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य की रक्षा के लिए एकजुट हुए 23 दलों (जो विविध वैचारिक धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं) की बैठक में इसके कुछ हिस्से थोड़े असंगत (discordant) लग रहे थे।
</p><p style="text-align: justify; "><b>'पूर्ण स्वराज' का इतिहास और वैचारिक धाराएं
</b></p><p style="text-align: justify; ">राहुल गांधी ने याद दिलाया कि 'पूर्ण स्वराज' (पूर्ण स्वतंत्रता) को आधिकारिक लक्ष्य घोषित करने के बाद कांग्रेस प्रतिरोध का एक आंदोलन बन गई थी। 
</p><p style="text-align: justify; ">इस प्रस्ताव को पहली बार 1927 के मद्रास सत्र में पेश किया गया था और दो साल बाद 1929 के लाहौर सत्र में अपनाया गया था।
</p><p style="text-align: justify; ">हालांकि, दीपांकर भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया है कि 'पूर्ण स्वराज' का विचार सबसे पहले 1921 के अहमदाबाद सत्र में दो कम्युनिस्ट प्रतिनिधियों—मौलाना हसरत मोहानी और स्वामी कुमारानंद—द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इसके अलावा, भगत सिंह और उनके साथियों ने 1928 में 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' की स्थापना कर एक स्पष्ट वैचारिक बयान दिया था।
</p><p style="text-align: justify; "><b>सत्तावाद के खिलाफ लड़ाई और वर्तमान चुनौतियां
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>वैचारिक संघर्ष: </b>आज की लड़ाई उस एकमात्र वैचारिक धारा (जो स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रही और अक्सर उसका विरोध किया) और उन विविध वैचारिक धाराओं के बीच है जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी और उसे जीता।
</p><p style="text-align: justify; "><b>भाजपा का एजेंडा: </b>आरएसएस-भाजपा का हिंदुत्व स्कूल अपने वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए राज्य के संस्थानों और संसदीय लोकतंत्र के ढांचे को नया आकार देने की कोशिश कर रहा है। यदि भाजपा को 'एक राष्ट्र, एक पार्टी' के लिए खुली छूट मिलती है, तो कांग्रेस को भी अन्य दलों की तरह ही नुकसान उठाना पड़ेगा।
</p><p style="text-align: justify; "><b>कांग्रेस के भीतर विरोधाभास: </b>दीपांकर भट्टाचार्य ने उल्लेख किया है कि जहां राहुल गांधी भाजपा का विरोध करने पर जोर दे रहे हैं, वहीं तेलंगाना में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैदराबाद के विवादास्पद विध्वंस अभियान का बचाव करते हुए गर्व से हिटलर का नाम ले रहे थे।
</p><p style="text-align: justify; "><b>एक न्यायपूर्ण गणराज्य की ओर (बदलाव की आवश्यकताएं)
</b></p><p style="text-align: justify; ">दीपांकर भट्टाचार्य के अनुसार, देश को निम्नलिखित विनाशकारी नीतियों को बदलने की तत्काल आवश्यकता है :
</p><p style="text-align: justify; "><b>आर्थिक मॉडल: </b>क्रोनी कैपिटलिज्म (याराना पूंजीवाद) के उस आर्थिक मॉडल को खत्म करना होगा जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हुए और जनता को गरीब बनाते हुए देश के सारे संसाधन मुट्ठी भर कॉरपोरेट्स को सौंप देता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>विदेश नीति</b>: उस विदेश नीति में तत्काल बदलाव की आवश्यकता है जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को अमेरिका-इजरायल धुरी के पास गिरवी रखती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>अधिकारों की रक्षा</b>: आदिवासियों की जमीन और वन अधिकारों पर हमले तथा उनके संवैधानिक संरक्षण को छीनने के प्रयासों को रोकना होगा।
</p><p style="text-align: justify; "><b>शासन मॉडल:</b> बुलडोजर और मुठभेड़ों (encounters) को बढ़ावा देने वाले तथा असहमति को अपराध घोषित करने वाले शासन मॉडल को खारिज करना होगा।
</p><p style="text-align: justify; "><b>सांस्कृतिक राष्ट्रवाद</b>: धार्मिक सर्वोच्चता और बहिष्कार के आधार पर राष्ट्रवाद को परिभाषित करने वाली विचारधारा को खारिज करना होगा।
</p><p style="text-align: justify; "><b>चुनावी प्रणाली</b>: विश्वसनीयता और पारदर्शिता से समझौता करने वाली चुनावी प्रणाली में व्यापक सुधार की आवश्यकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>जनता का प्रतिरोध और चुकाई गई कीमत
</b></p><p style="text-align: justify; ">दीपांकर भट्टाचार्य के अनुसार देश में पहले से ही कई जन-प्रतिरोध चल रहे हैं, जिनमें लोगों ने भारी कीमतें चुकाई हैं:
</p><p style="text-align: justify; "><b>किसान आंदोलन</b>: किसानों ने 2014 में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस लेने और सात साल बाद (2021 में) तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए सरकार को मजबूर किया। इस ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन में 700 से अधिक किसानों की मौत हुई।
</p><p style="text-align: justify; "><b>सीएए (CAA) विरोधी आंदोलन</b>: 2019 में शाहीन बाग के नेतृत्व में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ देशव्यापी विरोध हुआ।
</p><p style="text-align: justify; "><b>छात्र और श्रमिक आंदोलन:</b> उत्तर भारत में बढ़ते काम के बोझ और घटती मजदूरी के खिलाफ श्रमिकों के प्रदर्शन हुए। शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में संकट को लेकर एनएसयूआई (NSUI), आइसा (AISA), एसएफआई (SFI) और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) जैसे छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए।
</p><p style="text-align: justify; "><b>दमन का सामना:</b> फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत हो गई। सुरेंद्र गाडलिंग, उमर खालिद और शारजील इमाम जैसे कार्यकर्ता वर्षों से जेलों में बंद हैं। कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत महीनों हिरासत में रखने के बाद बिना किसी स्पष्टीकरण के रिहा किया गया। पत्रकार प्रबीर पुरकायस्थ को लंबे समय बाद कानूनी राहत मिली।
</p><p style="text-align: justify; "><b>'इंडिया' (INDIA) गठबंधन का चुनावी सफर और भविष्य की राह
</b></p><p style="text-align: justify; ">दीपांकर भट्टाचार्य के समान नागरिकता अभियान, ऐतिहासिक किसान आंदोलन, राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' और 2020 (बिहार) से लेकर 2021 (पश्चिम बंगाल) व 2023 (कर्नाटक) के चुनावी नतीजों ने इंडिया गठबंधन की पृष्ठभूमि तैयार की।
</p><p style="text-align: justify; "><b>2024 के चुनाव:</b> जदयू (JD-U) और रालोद (RLD) के बाहर जाने तथा कुछ राज्यों (पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब) में चुनावी तालमेल न होने के बावजूद, गठबंधन ने 2024 में भाजपा नीत एनडीए को कड़ी टक्कर दी। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और बिहार के नतीजों ने इसकी क्षमता दिखाई, जिससे कांग्रेस की सीटें 100 और गठबंधन की कुल सीटें 234 तक पहुंच गईं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>हालिया झटके:</b> इसके बाद, 2024 में महाराष्ट्र और हरियाणा तथा 2025 में दिल्ली के चुनावी झटकों (जो बहुआयामी चुनावी धोखाधड़ी से प्रभावित थे) ने गठबंधन की ताकत को कमजोर किया है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>आगे का रास्ता: 'इंडिया' गठबंधन को एक नए प्रोत्साहन और बदलाव की जरूरत है। इसमें राहुल गांधी की दोहरी भूमिका महत्वपूर्ण है:
</b></p><p style="text-align: justify; ">1. कांग्रेस को पुनर्जीवित करना।
</p><p style="text-align: justify; ">2. विविध इतिहास और वैचारिक झुकाव वाले दलों के बीच आपसी सम्मान, विश्वास और सामंजस्य सुनिश्चित करके व्यापक 'इंडिया' मंच को सुगम बनाना।
</p><p style="text-align: justify; "><b>INDIA ब्लॉक को प्रभावी प्रतिरोध बनाने के लिए राहुल गांधी को किन चुनौतियों का सामना करना होगा?
</b></p><p style="text-align: justify; ">दीपांकर भट्टाचार्य के अनुसार INDIA ब्लॉक को एक प्रभावी और निरंतर चलने वाला लोकतांत्रिक प्रतिरोध बनाने के लिए राहुल गांधी को निम्नलिखित चुनौतियों और परिस्थितियों का सामना करना होगा:
</p><p style="text-align: justify; "><b>1. गठबंधन के भीतर वैचारिक विविधता और सामंजस्य की चुनौती
</b></p><p style="text-align: justify; ">विविध वैचारिक धाराएं: INDIA ब्लॉक में 23 दल शामिल हैं जो विभिन्न वैचारिक धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। राहुल गांधी का भाषण (जो कांग्रेस की बैठक के लिए उपयुक्त था) इस विविध समूह में कुछ हद तक असंगत (discordant) लग रहा था। 
</p><p style="text-align: justify; ">आपसी सम्मान और विश्वास की आवश्यकता: राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न इतिहास और वैचारिक झुकाव वाले दलों के बीच आपसी सम्मान, विश्वास और तालमेल (accommodation) सुनिश्चित करके इस व्यापक मंच को सुगम बनाने की है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>2. कांग्रेस के भीतर वैचारिक विरोधाभास
</b></p><p style="text-align: justify; ">दीपांकर भट्टाचार्य के अनुसार जहां राहुल गांधी भाजपा के सत्तावाद का विरोध करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने पर जोर दे रहे हैं, वहीं उनकी अपनी ही पार्टी के भीतर विरोधाभास दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, तेलंगाना में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैदराबाद में एक विवादास्पद विध्वंस अभियान का बचाव करते हुए गर्व से हिटलर का नाम ले रहे थे।
</p><p style="text-align: justify; "><b>3. फासीवादी हमले और संस्थागत नियंत्रण का सामना
</b></p><p style="text-align: justify; ">संस्थाओं पर कब्जा और चुनावी हेरफेर: आरएसएस-भाजपा द्वारा राज्य के संस्थानों और संसदीय लोकतंत्र के ढांचे को अपने वैचारिक एजेंडे के तहत नया आकार दिया जा रहा है। मतदाता सूची से लेकर मतों की गिनती और परिणामों की घोषणा तक, चुनावी प्रणाली में हेरफेर किया जा रहा है।
</p><p style="text-align: justify; ">'एक राष्ट्र, एक पार्टी' का खतरा: यदि भाजपा को इस एजेंडे में खुली छूट मिलती है, तो कांग्रेस को भी अन्य दलों की तरह ही भारी नुकसान उठाना पड़ेगा, क्योंकि किसी भी पार्टी के पास इस चौतरफा वैचारिक हमले से बचने के लिए कोई सुरक्षा कवच (immunity) नहीं है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>4. हालिया चुनावी झटके और मनोबल की कमी
</b></p><p style="text-align: justify; ">वर्ष 2024 में महाराष्ट्र और हरियाणा तथा 2025 में दिल्ली के चुनावों में मिली हार (जो बहुआयामी चुनावी धोखाधड़ी से प्रभावित थी) ने INDIA ब्लॉक की ताकत और प्रभाव को कमजोर किया है। इस झटके के बाद गठबंधन को फिर से खड़ा करना और उसमें नया उत्साह फूंकना एक बड़ी चुनौती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>5. जन-आंदोलनों और जमीनी संघर्षों से जुड़ना
</b></p><p style="text-align: justify; ">देश में पहले से ही कई जन-संघर्ष (जैसे किसान आंदोलन, सीएए-विरोधी प्रदर्शन, श्रमिक और छात्र आंदोलन) चल रहे हैं, जहां लोगों ने भारी दमन और जेल यात्रा जैसी कीमतें चुकाई हैं। राहुल गांधी और INDIA ब्लॉक के सामने चुनौती इन चल रहे संघर्षों से जुड़ने, जनता के असंतोष व गुस्से को आवाज देने और लोकतंत्र के लिए सामूहिक संघर्ष को मजबूत करने की है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>6. दोहरी भूमिका का संतुलन
</b></p><p style="text-align: justify; "> राहुल गांधी को एक साथ दो अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभानी होंगी: पहली, अपनी खुद की पार्टी (कांग्रेस) को पुनर्जीवित और ऊर्जावान करना, और दूसरी, पूरे INDIA गठबंधन को एक साथ लेकर चलना।
</p><p style="text-align: justify; "><b>जन आंदोलनों का INDIA ब्लॉक की भविष्य की रणनीति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">दीपांकर भट्टाचार्य के अनुसार, जन आंदोलनों का INDIA ब्लॉक की भविष्य की रणनीति पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकता है:
</p><p style="text-align: justify; "><b>1. गठबंधन के उदय की पृष्ठभूमि तैयार करना</b>: ऐतिहासिक जन आंदोलनों (जैसे समान नागरिकता अभियान और ऐतिहासिक किसान आंदोलन) ने राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' और कुछ राज्यों के चुनावी नतीजों के साथ मिलकर 2023 में INDIA गठबंधन के उदय के लिए एक आदर्श पृष्ठभूमि तैयार की थी।
</p><p style="text-align: justify; "><b>2. गठबंधन के लिए चुनौती और जुड़ाव का अवसर</b>: वर्तमान में देश में कई जन-संघर्ष (जैसे किसानों, सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों, श्रमिकों और छात्रों के आंदोलन) चल रहे हैं। INDIA ब्लॉक के सामने भविष्य की रणनीति के तहत यह चुनौती और अवसर है कि वह:
</p><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;">इन चल रहे जमीनी संघर्षों से खुद को जोड़े।
</li><li style="text-align: justify;">    जनता के बीच व्याप्त निराशा, गुस्से और आकांक्षाओं के भंडार का सही उपयोग करे।
</li><li style="text-align: justify;">    न्याय की मांगों को और अधिक मुखर (amplify) करे।
</li><li style="text-align: justify;">    लोकतंत्र के लिए सामूहिक संघर्ष को और मजबूत बनाएँ।
</li></ul><p style="text-align: justify; "><b>3. सीख और विनम्रता का अहसास:</b> इन जन आंदोलनों में लोगों ने भारी दमन का सामना किया है और बड़ी कीमतें चुकाई हैं (जैसे 700 से अधिक किसानों की मौत, हिरासत में मौतें और कार्यकर्ताओं की लंबी जेल यात्रा)। लोगों के इस साहस और दृढ़ता के विपरीत, कई राजनीतिक दल दबाव या सत्ता के लालच में टूट रहे हैं। यह स्थिति INDIA ब्लॉक को यह याद दिलाती है कि प्रतिरोध खड़ा करने की बात करते समय उन्हें कितना विनम्र (humble) होना चाहिए और अपनी रणनीति को जनता के वास्तविक संघर्षों के अनुकूल बनाना चाहिए।
</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
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<title><![CDATA[मर्द इंसान नहीं, भूमिका क्यों बन जाते हैं? पुरुषों की भावनात्मक दुनिया का अनकहा सच]]></title>
<description><![CDATA[समाज पुरुषों को मजबूत बनने की सीख देता है, लेकिन उनकी भावनाओं को दबा देता है। जानिए मर्दानगी, अकेलेपन और मानसिक स्वास्थ्य का अनकहा सच]]></description>
<tags>मानसिक स्वास्थ्य,depression-news,mental-depression</tags>
<link>https://hastakshep.com/gender-justice/mard-hona-aasan-nahi-purushon-ki-bhavnatmak-duniya-305008</link>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,समाचार,हस्तक्षेप,जेंडर जस्टिस]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 08:40:28 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Why do men become roles rather than human beings? The unspoken truth of men's emotional world.]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/16/151003-why-do-men-become-roles-rather-than-human-beings-the-unspoken-truth-of-mens-emotional-world.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/16/151003-why-do-men-become-roles-rather-than-human-beings-the-unspoken-truth-of-mens-emotional-world.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>मर्द होना आसान नहीं: पुरुषों के भावनात्मक अकेलेपन की अनसुनी कहानी
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>क्यों रो नहीं पाते मर्द? पुरुष मानसिक स्वास्थ्य पर एक जरूरी बातचीत
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>मर्दानगी का बोझ: जब एक आदमी इंसान नहीं, सिर्फ जिम्मेदारी बन जाता है
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>पुरुषों का दर्द क्यों दिखाई नहीं देता? मर्दानगी के दबाव की पड़ताल
</b></li></ul><h3 style="text-align: justify; "><b>क्या मर्द सिर्फ कमाने और संभालने के लिए हैं? पुरुष जीवन की अनकही सच्चाइयाँ
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>क्या पुरुष सचमुच मजबूत होते हैं, या उन्हें बचपन से मजबूत दिखने के लिए मजबूर किया जाता है? यह लेख मर्दानगी, भावनात्मक अकेलेपन, मानसिक स्वास्थ्य, जिम्मेदारियों और समाज की अपेक्षाओं के बीच फंसे पुरुषों की उस दुनिया को सामने लाता है, जिस पर बहुत कम बात होती है....
</b></p><h4 style="text-align: justify; "><b>मर्द इंसान नहीं, भूमिका होते हैं।
</b></h4><p style="text-align: justify; ">मर्द होना आसान नहीं।
</p><p style="text-align: justify; ">बस दिक्कत ये है कि मर्दों की मुश्किलें अक्सर “प्रिविलेज” के शोर में दब जाती हैं। समाज मर्द को ताकत की तरह देखता है, इंसान की तरह कम। उससे उम्मीद की जाती है कि वो कमाए, संभाले, लड़े, टिके रहे, टूटे नहीं। और अगर टूटे, तो चुपचाप टूटे।
</p><p style="text-align: justify; ">लेकिन इस बातचीत को ईमानदारी से करने के लिए एक बात साथ-साथ समझनी होगी।
</p><p style="text-align: justify; ">एक आदमी सुविधाओं वाला भी हो सकता है और भीतर से भावनात्मक रूप से खाली भी। ताकत और तकलीफ़ हमेशा एक-दूसरे के उलट नहीं होते। कई बार वही आदमी जो बाहर रौबदार दिखता है, भीतर अपनापन और नरमी के लिए तरस रहा होता है। एक पुरुष पितृसत्तात्मक व्यवस्था से कुछ फायदे ले सकता है, और उसी व्यवस्था से भीतर से टूट भी सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">मर्द होने का सबसे बड़ा बोझ शायद यही है कि उसे बचपन से इंसान नहीं, “भूमिका” बनाया जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">एक लड़का बहुत जल्दी सीख जाता है कि उसकी कीमत उसके होने में नहीं, उसके काम आने में है। जब तक वो ज़िम्मेदार है, कमाने वाला है, संभालने वाला है, तब तक उसकी जगह है। जिस दिन वो भावनात्मक सहारे की ज़रूरत वाला दिखा, उलझा हुआ दिखा, कमजोर दिखा, उसी दिन दुनिया का व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगता है।
</p><p style="text-align: justify; ">ये बात बहुत कम कही जाती है कि लड़कों को भावनाओं की भाषा सिखाई ही नहीं जाती। उन्हें गुस्सा करने की छूट है। लेकिन डर नहीं। कमज़ोरी नहीं। रोना नहीं। असुरक्षा नहीं। अकेलापन नहीं।
</p><p style="text-align: justify; ">इसलिए बहुत सारे मर्द भीतर से सुन्न होकर बड़े होते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता कि वो क्या महसूस कर रहे हैं। बस चिड़चिड़ापन, चुप्पी, काम में डूब जाना, ताने मारना, या हर समय व्यस्त रहना, इन्हीं रास्तों से भावनाएं बाहर आती रहती हैं। कई मर्दों की पूरी भावनात्मक भाषा बस इतनी होती है: “ठीक हूं” “कुछ नहीं” “थोड़ा तनाव है”। और समाज इसे उनकी असंवेदनशीलता समझ लेता है, जबकि कई बार वो भावनाओं को समझ न पाने की हालत होती है।
</p><p style="text-align: justify; ">लेकिन ये सिर्फ “समाज” नहीं करता। पुरुषों की दुनिया खुद भी नरमी को सज़ा देती है।
</p><p style="text-align: justify; ">स्कूलों में। छात्रावासों में। खेल के माहौल में। दोस्तों के बीच।
</p><p style="text-align: justify; ">“मर्द बन।” “इतना भावुक क्यों है?” “रो क्यों रहा है?”
</p><p style="text-align: justify; ">कई लड़के अपनी नर्मी और टूटन महिलाओं से नहीं, दूसरे पुरुषों से छुपाना सीखते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">मर्दों की दुनिया अक्सर काबिलियत, दबदबे और बेइज़्ज़ती से बचने के डर पर चलती है। इसलिए बहुत से पुरुष भावनात्मक खुलापन को खतरे की तरह देखते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">मर्द को प्यार भी अक्सर उसकी “काबिलियत” के बदले मिलता है।
</p><p style="text-align: justify; ">अच्छी नौकरी हो। आत्मविश्वास हो। रुतबा हो। ज़िंदगी की दिशा साफ हो। फ़ैसले लेने की क्षमता हो।
</p><p style="text-align: justify; ">बहुत कम पुरुषों ने बिना शर्त वाला भावनात्मक सुकून महसूस किया होता है। बहुत कम मर्दों ने किसी को ये कहते सुना होता है: “तुम असफल हो जाओ तब भी मैं तुम्हें इंसान की तरह देखूंगी।”
</p><p style="text-align: justify; ">इसीलिए कई मर्द रिश्तों में प्यार कम, पनाह ज़्यादा खोजते हैं। वो ऐसी जगह ढूंढते हैं जहां कुछ देर के लिए अभिनय बंद हो सके।
</p><p style="text-align: justify; ">एक असहज सच ये भी है कि बहुत सारे पुरुषों की अपनी कीमत का एहसास इस बात से जुड़ जाता है कि लोग उन्हें कितना चाह रहे हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">कितना ध्यान मिलता है। कितनी महिलाएं उनमें दिलचस्पी लेती हैं। वो खुद को कितना आकर्षक महसूस करते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">इसलिए ठुकराया जाना कई पुरुषों को सिर्फ दिल टूटना नहीं लगता। वो उनकी पूरी पहचान हिल जाने जैसा लगता है। कई बार आदमी बिछड़ने से कम, किसी और से बदल दिए जाने से ज़्यादा टूटता है।
</p><p style="text-align: justify; ">एक और अनदेखी चीज़ है। मर्दों का स्पर्श से वंचित रह जाना।
</p><p style="text-align: justify; ">समाज महिलाओं के भावनात्मक अकेलेपन पर बात करता है, करनी भी चाहिए। लेकिन बहुत सारे पुरुष ऐसे हैं जिन्हें सालों तक स्नेह भरा स्पर्श नहीं मिलता। कोई बाल नहीं सहलाता। कोई माथा नहीं छूता। कोई बिना किसी उम्मीद के गले नहीं लगाता।
</p><p style="text-align: justify; ">धीरे-धीरे शरीर भी भावनात्मक रेगिस्तान बन जाता है। फिर वही आदमी असहज हो जाता है। या सिर्फ शारीरिक चाहत में उलझ जाता है। या पूरी तरह कट जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">और लोग सिर्फ उसका व्यवहार देखते हैं, उसकी कमी नहीं।
</p><p style="text-align: justify; ">मर्दों की दोस्ती भी अक्सर अधूरी भावनात्मक जगह होती है।
</p><p style="text-align: justify; ">दोस्त साथ हंसेंगे, शराब पिएंगे, मज़ाक भेजेंगे, लेकिन अवसाद, असफलता, अकेलापन, असुरक्षा, ठुकराए जाने का दर्द, इन सब पर शायद ही खुलकर बात करेंगे। क्योंकि हर आदमी दूसरे आदमी के सामने भी अपना “मजबूत रूप” बनाए रखने की कोशिश कर रहा होता है।
</p><p style="text-align: justify; ">एक बहुत कड़वा सच ये भी है कि समाज मर्दों के दर्द को अक्सर शक की नज़र से देखता है।
</p><p style="text-align: justify; ">अगर एक औरत कड़वी हो जाए, लोग उसके पीछे की चोट ढूंढते हैं। अगर एक मर्द कड़वा हो जाए, लोग उसे ज़हरीला कहकर आगे बढ़ जाते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">लेकिन यहां एक और कठिन सच भी है।
</p><p style="text-align: justify; ">हर घायल आदमी अच्छा आदमी नहीं बनता।
</p><p style="text-align: justify; ">कई बार अनदेखा किया गया पुरुष दर्द नियंत्रण की भूख, गुस्से, नशे, भावनात्मक लापरवाही, धोखे या हिंसा में भी बदल जाता है। तकलीफ़ अपने आप इंसान को समझदार नहीं बनाती।
</p><p style="text-align: justify; ">बहुत से भावनात्मक रूप से दूर रहने वाले पुरुष क्रूर नहीं होते। वो बस भावनाओं को जीना सीखे ही नहीं होते। उन्होंने अपने पिता को चुप देखा। दादाओं को कठोर देखा। उन्होंने जिम्मेदारी देखी, अभिव्यक्ति नहीं। तो कई पुरुष प्यार शब्दों से नहीं, जिम्मेदारियों से जताते हैं। बिजली का बिल भरना। रात में लेने आना। बीमार होने पर दवा लाना। चुपचाप त्याग करना। उनकी पीढ़ी में यही प्यार की भाषा थी।
</p><p style="text-align: justify; ">फिर उम्र के साथ एक और परत जुड़ती है। ज़िम्मेदारी। परिवार। कमाई। माता-पिता। साथी। बच्चे। रुतबे की चिंता। तुलना। असफलता का डर।
</p><p style="text-align: justify; ">मर्दों को अक्सर ये महसूस कराया जाता है कि उनका अस्तित्व उनकी कमाई और उपयोगिता से जुड़ा है। इसलिए कई पुरुष नौकरी छूटने, आर्थिक अस्थिरता, असफलता या ठुकराए जाने के बाद पहचान के संकट में चले जाते हैं। क्योंकि उन्होंने खुद को इंसान की तरह नहीं, एक काम की चीज़ की तरह जिया होता है।
</p><p style="text-align: justify; ">...और ये दबाव हर पुरुष के लिए एक जैसा नहीं होता।
</p><p style="text-align: justify; ">एक गरीब आदमी का मर्दानगी का बोझ ज़िंदा रहने से जुड़ा होता है। एक मध्यमवर्गीय आदमी का स्थिरता और रुतबे से। एक अमीर आदमी का उपलब्धियों और छवि से।
</p><p style="text-align: justify; ">जाति, वर्ग, परवरिश, शहर, गांव, सब मर्दानगी को आकार देते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">और फिर एक उम्र के बाद बहुत से पुरुष भावनात्मक अदृश्यता का शिकार हो जाते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">उनका अकेलापन बातचीत का हिस्सा नहीं रहता। उनकी थकान सामान्य मान ली जाती है। उनके चाहे जाने का एहसास महत्वहीन हो जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">वो बस चलते रहने वाली मशीनें बन जाते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">और फिर भी, पूरी कहानी सिर्फ अत्याचार की नहीं है।
</p><p style="text-align: justify; ">कई पुरुष जिम्मेदारी में सच्चा अर्थ भी खोजते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">कमाना। सुरक्षा देना। काम आना। अपने परिवार के लिए खड़े रहना।
</p><p style="text-align: justify; ">ये सिर्फ थोपा गया बोझ नहीं, बहुत से पुरुषों की पहचान, गरिमा और जीवन का उद्देश्य भी है।
</p><p style="text-align: justify; ">समस्या ताकत में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब ताकत का मतलब भावनाओं को दबा देना बना दिया जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">और ये सब कहने का मतलब ये नहीं कि औरतों की तकलीफें कम हैं। बिल्कुल नहीं।
</p><p style="text-align: justify; ">बस दिक्कत ये है कि स्त्री-पुरुष की बातचीत अब अक्सर मुकाबला बन गई है। कौन ज़्यादा दुख झेल रहा है।
</p><p style="text-align: justify; ">जबकि सच ये है कि दोनों अलग-अलग तरह की मानसिक कैद में फंसे हुए हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">और शायद समझदार समाज वो होगा जहां एक लड़के को बचपन से ये सिखाया जाए कि मजबूत होने का मतलब भीतर से पत्थर हो जाना नहीं होता। कि भावुक होना कोई कमी नहीं। कि मदद मांगना कमजोरी नहीं। और कि कमाने वाले बनने से पहले इंसान होना ज़रूरी है। क्योंकि कई मर्द बाहर से मजबूत दिखते हैं, लेकिन भीतर सालों से बस किसी तरह जी रहे होते हैं। और कई बार उनकी पूरी जिंदगी बस इसी कोशिश में निकल जाती है कि कोई एक जगह तो मिले, जहां उन्हें हर वक्त खुद को साबित न करना पड़े।
</p><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 36px;">निशान्त</span> 
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>सोशल कमेंटेटर 
</b></p>]]></content:encoded>
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