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न झुकने और न रुकने की बात ‘नूर’ में

फ़िल्म रिव्यू – न झुकने और न रुकने की बात नूरमें

फ़िल्म – नूर

निर्देशक – विकास विक

स्टार कास्ट – वेदांत, जसपाल शर्मा, सुनील चितकारा, शिव कुमार आदि

रिलीजिंग प्लेटफॉर्म – डिज़्नी हॉट स्टार प्लस

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

पिता जी भूख लगी है। ले बेटा गोली खा। हा… हा…हा… ये फ़िल्म के किसी के डायलॉग नहीं है। डायलॉग इतना ही है कि बेटा अपने सफाई कर्मचारी बाप से कहता है सफाई और साज सजावट का काम करते हुए। भूख लगी है। बस फिर क्या उसके अब्बू सुनाने लगते हैं उसे गुलाम भारत की आजादी के लिए लड़े लोगों की कहानी। जिन्हें भूख लगती थी तो उन्हें अंग्रेजो की गोलियाँ खानी पड़ती थीं या कोड़े। माफ कीजिएगा मुझे मैंने बड़ा भद्दा मजाक किया।

दरअसल स्वतंत्रता सेनानी गांधी, भगत सिंह, लक्ष्मीबाई आदि सभी ने अंग्रेजों से लोहा लिया तभी हम आज आजाद भारत में सांस ले पा रहे हैं। फिल्म की कहानी बड़ी सिंपल सी है कि एक पिता स्कूल में कार्यक्रम के कारण वहां दिहाड़ी मजदूर बनकर जाता है साथ में अपने बेटे नूर को भी ले जाता है। नूर वहां जाते ही अपनी बुद्धि चातुर्यता का परिचय देता है। उसके बाद वह नाटक के लिए तैयार हो रहे कुछ कलाकारों को खाते पीते देखता है। अब बच्चा है बेचारा भूख लग आई उसे भी देखकर। फिर उसका पिता उसे कहानी सुनाने लगता है गुलाम भारत की। वहां स्कूल का अध्यापक आ जाता है उसके बाद उन्हें वहां से निकाल दिया जाता है नुकसान कर दिया कहकर। इसके बाद कहानी पलटती है अब क्या होता है उनके साथ वह जानने के लिए आपको डिज्नी हॉट स्टार पर पिछले दिनों आई इस छोटी सी दस मिनट की फ़िल्म को देखना होगा।

फ़िल्म की खासियत है कि यह हमें कुछ और सौंपें न सौंपें लेकिन एक बार फिर से हमारे उन वीर शहीदों को नमन करने को मजबूर करती है उनके लिए दो बूंद आँसू गिराने पर विवश करती है। जिन्होंने हमारे लिए बड़े-बड़े त्याग किए। मात्र 22-23 साल की वयस में फांसी के फंदे को झूल जाने वाले भगतसिंह इस धरती ने दिए हैं तो लक्ष्मीबाई सरीखी वीरांगना भी दी है। सचमुच हमारी धरती महान है। फ़िल्म का मूल संदेश इन सेनानियों के बहाने से यही है कि हमें रुकना और झुकना नहीं चाहिए फिर परिस्थिति जो कोई भी हो।

फ़िल्म का बैकग्राउण्ड स्कोर कुछ जगह अपना प्रभाव छोड़ता है तो कुछ जगह उसके और बेहतर होने की संभावनाएं नजर आती हैं। फ़िल्म का गीत-संगीत फ़िल्म का कमजोर पहलू कहा जा सकता है। इस तरह की फिल्मों में गीत-संगीत कम से कम ऐसे होने चाहिए जो कुछ दिन याद रहें। या उन्हें देखते हुए हमारी बाहें फड़कने को मजबूर हो जाएं। मिलिंद रत्नाकर की एडिटिंग कमाल रही। अभिनय के मामले में वेदांत जो बच्चा है उसकी तारीफ बनती है। इसके अलावा जसपाल शर्मा जो नूर के पिता बने हैं वे इससे पहले छपाक, टॉयलेट एक प्रेम कथा, हिंदी मीडियम, भारत, तलवार, सोनचिरैया जैसी बड़ी फिल्मों में भी नजर आ चुके हैं। भले उनमें उन्हें ज्यादा स्क्रीन न मिली हो लेकिन सहायक कलाकार के रूप में उन्होंने प्रभावित किया था। ‘इंडियन सर्कस’ रॉयल स्टैग की पिछले साल यूट्यूब पर रिलीज हुई फ़िल्म में भी जसपाल ने अच्छा अभिनय किया था और यह फ़िल्म मामी फ़िल्म फेस्टिवल 2019 में बेहतरीन शॉर्ट फिल्म का पुरुस्कार भी अपने नाम कर पाई थी।

प्रिंसिपल बने सुनील चितकारा और शर्मा जी ओवे रूप में शिव कुमार दोनों का अभिनय भी अच्छा रहा।

कुल मिलाकर अभिनय ये मामले में सब एक दूसरे को पछाड़ते नजर आए। निर्देशक विकास विक का निर्देशन और उनके द्वारा इस तरह के विषय का चुनाव किया जाना एक अच्छा फैसला है। इस तरह की फिल्में आती रहनी चाहिए ताकि हमारी युवा पीढ़ी और गैजेट्स के दौर में वेब सीरीज के नाम से सॉफ्ट पॉर्न देखने वाली पीढ़ी और उन्हें बनाने वालों को यह सनद रहे कि उसके अलावा भी कई विषय हैं जिनके सहारे तारीफ़ें बटोरी जा सकती हैं। फ़िल्म एक आध फ़िल्म फेस्टिवल की यात्रा भी कर चुकी है।

तेजस पूनियां

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

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