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साहित्यिक, सामाजिक और राजनैतिक प्रतिरोध का संग्रह: ‘फिर एक दुर्योधन ऐंठा है’

63 कविताओं का संग्रह ‘फिर एक दुर्योधन ऐंठा है’ इन दिनों पढ़ने को मिला। संजीव ‘मजदूर’ झा का यह पहला काव्य संग्रह है। कवि को मैं वर्धा से जानता हूँ। मैंने उसे जब-जब देखा, एक गहन बौद्धिक चिंतन में डूबे, किसी मौजू सवालों का उत्तर ढूँढते और अपने साथी-मित्रों से घंटों बातचीत करते देखा। मुझे याद आते हैं जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ के मनु जो ‘हिमगिरि के उतुंग शिखर’ पर बैठकर प्रलय प्रवाह को देखते हुए रोते हैं। उधर मनु हैं, इधर ‘मजदूर’ है जो ‘गाँधी पहाड़’ पर बैठकर सांसारिक ‘लहर’ के बहाव में बहे जा रहे दिशाहीन जीवन को अपलक देख रहा है। लेकिन दोनों की दृष्टि में एक बुनियादी अंतर है। मनु के नैन भिंगे हुए हैं, ‘मजदूर’ की आँखों में आक्रोश है। वह पहाड़ पर बैठकर शोक नहीं मनाता है बल्कि लहरों से टकराने का साहस बटोरता है। बिल्कुल पहाड़ जैसा अडिग और विश्वास के साथ तन कर खड़ा है। घंटों बैठकर हमारे जैसे नवागंतुक छात्र-मित्रों से देश-दुनिया के बारे में बात करता है। कबीर, तुलसी, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि पर बात करते-करते फ्रायड, मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और माओत्से तुंग पर बात करने लगता है। हम सोच में पड़ जाते हैं कि यह साहित्य का शोधार्थी ही है या साहित्य का इनसाइक्लोपीडिया। हमें मुक्तिबोध याद आते हैं कि कैसे वे देश की बात करते-करते विदेश और यूरोप की साहित्यिक-राजनीतिक गतिविधियों पर बोलने लगते हैं। अपने समय में  मुक्तिबोध ऐसे इकलौते कवि थे। हमारी समझ में ‘मजदूर’ झा वर्धा के इकलौते ऐसे बौद्धिक चिंतक है। यह संग्रह उसकी इसी बौद्धिक चिंतन का परिणाम है।

          ‘फिर एक दुर्योधन ऐंठा है’ में संग्रहीत कविताएँ विचार की कविताएँ हैं, सामाजिक-राजनीतिक प्रतिरोध की कविताएँ हैं, ‘सब जानते हैं/कि कुछ जानना नहीं है’ के विरुद्ध ‘कुछ नहीं जानते हैं/कि बहुत कुछ जानना है’ की कविताएँ हैं। यहीं से संवाद की प्रक्रिया शुरू होती है। इस संग्रह की कविताओं को मुख्य रूप से चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक विद्रूपताओं के साथ-साथ वह उम्मीद जो पूरे आत्मविश्वास के साथ कहता है कि ‘जब विकास नहीं था/दुनिया थी।/जब तंत्र नहीं था/लोक था।/एक दिन फिर तुम नहीं होगे/और हम होंगे’। कवि पराजय से निराश नहीं होते बल्कि उन्हें पूर्ण विश्वास है कि यही पराजय विजय का कारण बनेगा। ठीक वैसे ही जैसे असफलता ही सफलता की जननी है- ‘इसलिए हे इरोम/तुम शोक मत मनाना/क्योंकि जब समाज हारता है तब/क्रांति का मार्ग प्रशस्त होता है’।

          शोषित, पीड़ित और वंचित जमात के प्रति कवि ईमानदारी के साथ खड़ा है। सिर्फ रचना में ही नहीं, व्यावहारिक जीवन में भी गरीबों के हक के लिए विभिन्न आंदोलनों में भाग लेते, आवाज उठाते और पुलिस की लाठी खाते मैंने उसे कई बार देखा है। उन्हीं लाठियों का जवाब यहाँ वह कलम से देता है। कवि अपनी कविता में उसी ‘एक्टिविस्ट’ की तरह निडरता के साथ खड़ा है और कहता है- ‘ये धरती गोद है जिसकी/और आँचल आसमाँ/भीख देता हो/दुनिया को जिसका कारवाँ/जिनके तेवर से पल में/ढल जाए जहाँ/उस नंगे पाँव/खाली हाथ/को है नमन/सौ-सौ बार ऐ मजदूर तुझको है नमन’।

          जब सारी विचारधाराएँ एक बिन्दु पर आकर सिमट कर रह गई हो, जब पुरस्कार पाने वालों की होड़ लगी हो, उस समय में यह कहना कि ‘पाँच वर्ष बहुत होते हैं/कुकुरमुत्तों के उग आने को/षड्यंत्रों के लहलहाने को/रथ के पहिए धँसाने को’ तो कवि की प्रतिबद्धाता जीवंत हो उठती है। वे हाथ जोड़े, आँखें नीची कर खड़े होकर जी हुज़ूरी करनेवालों की श्रेणी में नहीं हैं और न ही मौन की अभिव्यंजना में उन्हें कोई दिलचस्पी है। वह मौन रह ही नहीं सकता। आँखों में आँखें डालकर सवाल करने का साहस उसमें है। कायर, मौकापरस्त समाज पर तीखा व्यंग्य करते हुए कवि कहता है- ‘क्योंकि तुम यह जान नहीं पाए/कि देश बूढ़ा होता है/विश्वासघातियों के घाव से’।

          कवि समाज का संदेशवाहक होता है जो शब्दों को अपनी कला का जामा पहनाकर और उसमें संवेदना का संस्कार भरकर उसके माध्यम से अपना संदेश पाठकों समेत सत्ता की गलियारों तक पहुंचाने का काम करता है। परंतु आज के साहित्यकारों का आयुष्क्रम क्या है? ठीक इसके उलट जो सत्ता की गलियारों में चक्कर काटता है और जनता को गुमराह करने का काम करता है। उसने सत्ता के साथ समझौता कर लिया है, उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है। ‘क्योंकि बाहर खतरा बढ़ गया है/इसलिए साहित्यकारों ने तय किया/बंद खिड़की, बंद दरबाजों के पीछे अभिनय का’। ‘कवि तुम्हारे दूधमुँहे दाँत’ में कविता में और तीखा व्यंग्य करते हुए कवि लिखता है-

रक्तरंजित घरों में सड़ांध मारते

हड्डियों से छिटकते

बेजान मांस पर

तुम एक शब्द का टुकड़ा भी

खर्च नहीं कर पाते।

शायद जब टूट जाएँगे

तुम्हारे दूध के दाँत

तब तुम भी खींच पाओगे

अस्थियों के कुछ बचे हिस्से

अपने नए नुकीले

पूंजीदार कठोर दाँतों से…।

उपभोक्तावादी संस्कृति की इस भेड़चाल से पृथक कवि अपने लिए अलग रास्ता बनाता है- सत्य और ईमानदारी का रास्ता। मनुष्य की जैसी प्रकृति होगी, उनकी कृति भी वैसी ही होगी। क्योंकि कृति का मनुष्य की प्रकृति से बहुत गहरा संबंध होता है। संजीव ‘मजदूर’ झा ने अपने व्यक्तित्व का कहीं स्खलन नहीं होने दिया है। वह जीवन और साहित्य दोनों में मजबूती और ईमानदारी के साथ खड़ा है।

                                                   रमेश कुमार राज

                                                    असिस्टेंट प्रोफेसर

हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

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