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Today's Deshbandhu editorial

आधी आबादी की पूरी आजादी के लिए जरूरी है फटी जींस के फटे संस्कारों को उखाड़ना

For the complete independence of half the population, it is necessary to uproot the torn rites of torn jeans

देशबन्धु में संपादकीय आज | Editorial in Deshbandhu today

उत्तराखंड के नवनियुक्त मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की उम्र (Age of newly appointed Chief Minister of Uttarakhand Tirath Singh Rawat) 57 बरस है और साढ़े पांच दशक से अधिक की इस जीवन यात्रा में उन्हें संस्कारित करने वाले लोगों ने अधिकतर साड़ी, सलवार-कमीज, धोती-कुर्ता, शर्ट- फुल पैंट या हाफपैंट ही पहने होंगे। उन्हें श्रेष्ठ ग्रंथों से ज्ञान के संस्कार दिए गए होंगे। इंसान की असल पहचान कैसे होती है (How does a person have a real identity), इस बारे में भी यकीनन उनके बड़े-बुजुर्गों और गुरुजनों ने उन्हें सीख दी होगी। हिंदू धर्म की शिक्षा-दीक्षा में संत समाज से उनका परिचय हुआ होगा। और भारत की महान संत संस्कृति (Great saint culture of India) में कबीरदास जी के लिखे झीनी-झीनी बीनी चदरिया से लेकर मीरा बाई के पद मैं तो सांवरे के रंग राची। साजि सिंगार बांधि पग घुंघरू, लोक-लाज तजि नाची, जैसी रचनाओं से वे गुजरे होंगे। इन रचनाओं में मानव जीवन का फलसफा सिखाया गया है, प्रभु की भक्ति में सब कुछ भूल जाने की सीख दी गई है।

संक्षेप में कहें तो असली धर्म की शिक्षा इनमें दी गई है। लेकिन सीखने वाले ने कहीं कुछ अधूरा पाठ पढ़ा है, जिस वजह से तीरथ सिंह रावत संस्कारों का संबंध कपड़ों से जोड़ने लगे। और बात अगर महिला की पोशाक से हो, तो संघ से दीक्षित व्यक्ति संघ की सोच के अनुरूप पितृसत्तात्मक समाज वाले अंदाज में ही बात करेगा।

लिहाजा तीरथ सिंह रावत ने भी रिप्ड यानी घुटनों के आस-पास फटी जींस का संबंध सीधे इस बात से जोड़ दिया कि जो महिला ऐसे कपड़े पहनेगी, वो अपने बच्चों को क्या संस्कार देगी।

India has successfully transformed into a narrow society

पिछले कुछ सालों में भारत संकीर्ण समाज में सफलतापूर्वक तब्दील हो चुका है। अब तक देश के कुछ हिस्सों में हम महिलाओं को लेकर तुगलकी फरमान सुनाने वाले समुदायों को देखते थे। या फिर उन कट्टर इस्लामी देशों में महिलाओं का शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न देखते थे, जहां औरत उपभोक्ता सामग्री की तरह इस्तेमाल की जाती है, जहां उसके स्वतंत्र अस्तित्व की बात करना गुनाह होता है। इनमें से सऊदी अरब जैसे देशों से खबर आती थी कि वहां महिलाओं को स्टेडियम में खेल देखने की इजाजत है या ड्राइविंग सीखने का मौका मिल रहा है, तो लगता था कि कितने संघर्षों के बाद महिलाओं को आजादी मिल रही है।

Manusmriti denies the free existence of women

भारत में तो हम इस बात पर गर्व भी करते हैं कि यहां दुनिया के कई विकसित औऱ लोकतांत्रिक देशों से पहले महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला है। लेकिन हम इस बात को शायद नजरंदाज कर रहे हैं कि जिन लोगों के बनाए संविधान की बदौलत महिलाओं को आजाद भारत में कई तरह के हक मिले, अब उनसे विपरीत विचारधारा के लोग सत्ता पर काबिज हैं।

अब जो शासकवर्ग है, उसका नजरिया कई मायनों में संकीर्ण है। इसलिए वो संविधान की जगह कई बार मनुस्मृति की खुली हिमायत करता नजर आता है। मनुस्मृति औरतों के आजाद अस्तित्व को नकारती है, वही सोच आज सत्ता पर हावी है और सत्ताधारी लोग समाज को उसी मध्ययुगीन सोच में ढालना चाहते हैं।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने हाल ही में बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े आयोग के द्वारा आयोजित कार्यशाला में एक वाकये का उल्लेख करते हुए कहा कि मैं जहाज से जयपुर से दिल्ली आ रहा था। मेरे बगल में एक बहनजी बैठी थीं। मैंने उनकी तरफ देखा तो उन्होंने गमबूट पहने थे। थोड़ा और ऊपर देखा तो घुटने फटे थे, उनके साथ दो बच्चे थे। उन्होंने बताया कि उनके पति जेएनयू में प्रोफ़ेसर हैं और वह एनजीओ चलाती हैं। अगर ऐसी महिलाएं समाज में जाती हैं, लोगों से मिलती हैं और उनकी दिक्कतें सुलझाती हैं तो हम अपनी सोसाइटी, बच्चों को क्या संदेश दे रहे हैं। यह सब घर से शुरू होता है। जो हम करते हैं, उसे हमारे बच्चे भी सीखते हैं।

वैसे तीरथ सिंह सिंह रावत जिन संस्कारों पर फटी जींस के कारण खतरा देख रहे हैं, वही संस्कार ये भी सिखाते हैं कि किसी पराई स्त्री पर नजर नहीं डालनी चाहिए। औऱ तीरथ सिंह रावत ने तो उस महिला सहयात्री का नखशिख वर्णन किया है।

वैसे इसी कार्यक्रम में मौजूद कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि महिलाओं के लिए सबसे ज़रूरी चीज अपने परिवार और बच्चों को संभालना है।

इन बयानों को सुनने के बाद कोई संदेह नहीं रह जाता कि भाजपा और संघ से जुड़े नेता महिलाओं के बारे में किस तरह की सोच रखते हैं।

देश में हर रोज किसी न किसी हिस्से में किसी बच्ची, युवती या प्रौढ़ा से बलात्कार होता है। घरेलू हिंसा और छेड़खानी की अनगिनत खबरें कहीं दर्ज ही नहीं होती।

राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में जुलाई तक महिलाओं के खिलाफ हिंसा की 2,914 रिपोर्ट दर्ज हुई है, इन में घरेलू हिंसा, बलात्कार, अपहरण और दहेज हत्या के मामले शामिल हैं, वहीं एनसीआरबी के अनुसार 2019 में देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं सात प्रतिशत बढ़ी हैं। अब हम 2021 के तीसरे महीने के आखिर में आ चुके हैं और अब तक न जाने इन अपराधों में कितनी बढ़ोत्तरी हो चुकी होगी। लेकिन तीरथ सिंह रावत जैसे लोगों ने इन घटनाओं का संबंध कभी पुरुषों के संस्कारों से जोड़ने की जहमत नहीं उठाई।

व्यापारी रामदेव की संस्कारी जींस

संयोग से जिस प्रदेश के वे मुख्यमंत्री हैं, उसी उत्तराखंड से योग का व्यापार खड़ा करने वाले रामदेव ने कुछ समय पहले कपड़ों का व्यापार भी शुरु किया था औऱ इसमें घुटनों से फटी जींस भी शामिल थे, जिसे उन्होंने संस्कारी जींस का नाम दिया था।

तीरथ सिंह रावत के बयान पर फिलहाल देश में हंगामा है, उनसे माफी की मांग हो रही है। सोशल मीडिया पर कई रसूखदार महिलाएं रिप्ड जींस के साथ अपनी तस्वीरें शेयर कर रही हैं। ये गुस्सा जायज है, लेकिन इसका असर कितनी दूर और कितनी देर तक रहेगा, ये सोचना चाहिए। कपड़ों से संस्कार और महिला की इज्जत का संबंध जोड़ने वाले लोग समाज में अपनी जड़ें गहरी जमा चुके हैं। सत्ता का साथ इन्हें खुलकर मिल रहा है। इसलिए आधी आबादी की पूरी आजादी के लिए इन जड़ों को उखाड़ना जरूरी है।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप,

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