5 पी से ही संभव भारत में कोरोना से मुक्ति

Coronavirus CDC

प्रधान सेवक ने कोरोना संक्रमण से बचने के लिए 24 मार्च की आधी रात को चार घंटे की नोटिस पर 21 दिनों का संपूर्ण लॉकडाउन (21 days complete lockdown on four hours notice at midnight of 24 March to avoid corona infection) देश भर में लागू कर दिया गया बिना राज्यों को विश्वास में लिए ये उनकी सबसे बड़ी भूल है, उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि भारत एक गणराज्य है उसमें लॉ एंड आर्डर (Law and order) की जिम्मेदारी राज्यों के मुखिया की होती ना कि प्रधानमंत्री की, जिसे अब आपने तीन मई तक बढ़ा दिया गया है।

प्रधानसेवक मोदी जी के लॉकडाउन के साथ समस्या (Problem with lockdown of Pradhan Mantri Modi) यह है कि इसे बिना पहले से सोचे समझे ही दूसरों की नकल करके प्लान को लागू करा दिया गया। वास्तव में मुझे जो लगता है कि मोदी जी यह जानते ही नहीं हैं कि ‘योजना’ को कहाँ, कैसे, क्यों और कब तक लागू करना है।

कोरोना वायरस की महामारी (Epidemic of corona virus) शुरू होने के साथ ही दुनिया दूसरे विश्व युद्ध के बाद, सबसे बड़े संकट से जंग लड़ने में जुट गई है। कोई भी संकट चाहे वह छोटा हो या बड़ा हो, उनमें हमेशा यही मांग होती है कि सरकारें इनसे निबटने के लिए कोशिशें करें और जनता उसमे भरपूर सहयोग करें।

मगर भारत सरकार (Indian government) कोरोना की महामारी से लड़ने के लिए तैयार नहीं थी साथ ही देश में स्वास्थ्य सेवाओं में, या कहें कि टेस्टिंग या इलाज की भी सुविधाएं बेहद कम हैं। भारत में हर 1,000 लोगों पर महज़ 0.7 बेड हैं। देश में हर एक हज़ार लोगों पर केवल 0.8 डॉक्टर हैं। देश में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर (Health Infrastructure in India) कितना लचर है इसकी एक मिसाल यह है कि महाराष्ट्र के सरकारी अस्पतालों में केवल 450 वेंटिलेटर और 502 आईसीयू बेड हैं। इतने कम संसाधनों पर राज्य के 12.6 करोड़ लोग टिके हैं।

मेरे हिसाब से लॉकडाउन को संपूर्ण नहीं बल्कि स्मार्ट होना चाहिए (Lockdown should be smart but not exhaustive) आप इसका अनुमान ऐसे देख सकते हैं कि जिन भी देशों ने कोरोना वायरस से अपने यहां बड़े नुक़सान होने से रोके हैं, उन्होंने अपने यहां कड़े उपाय लागू नहीं किए थे। बल्कि इन देशों ने अपने यहां सटीक, सर्जिकल एप्रोच का सहारा लिया, लेकिन क्या भारत में ऐसा हुआ है?

भारत में जनता ने मोदी जी की लॉकडाउन नीतियों पर अधिक सवाल नहीं उठाए गए हैं, बल्कि पूरे विपक्ष के साथ उन्हें पूर्ण समर्थन दे कर उल्टा देश में जश्न का माहौल बनाकर दिया था जब प्रधानमंत्री जी ने कोरोना का ताली, थाली, दिया, बाती और टॉर्च तथा पटाखों से स्वागत करवाया था।

मैं यहां साफ़ कर दूं कि मैं कभी भी संपूर्ण लॉकडाउन का समर्थक (Full Lockdown Supporters) नहीं रहा हूँ। मैंने हमेशा से स्मार्ट और टारगेटेड एप्रोच की वकालत की है। जैसा कि भारत में भीलवाड़ा जिले में, केरल और मिजोरम के कुछ जिलों में या मुम्बई के धारावी में देखने को मिलता है। मगर ऐसे अप्रोच में हमेशा ही धार्मिक कार्यक्रमों को रद्द करने की बात होनी चाहिए।”

जिस तरह से लॉकडाउन के कड़े उपाए से कमज़ोर तबक़े का अधिक नुक़सान हुआ है। मोदी के कड़े उपाय देश की बड़ी आबादी के सबसे ज़्यादा जोख़िम वाले तबक़ों में पैनिक फैलाने वाले रहे हैं।

भारत के 81 फ़ीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं. भारत की बड़ी अंडरग्राउंड इकोनॉमी की वजह यह है कि यहां सरकार के ग़ैर-ज़रूरी और प्रताड़ित करने वाले रेगुलेशंस मौजूद हैं, क़ानून का राज बेहद कमज़ोर है और साथ ही यहां संपत्ति के अधिकारों में अनिश्चितता है। ऐसे में देश में अनिश्चितता का माहौल बनना लाज़मी है।

आज के इन हालातों में इसे संगठित करने का सही तरीका तो अब एक ही दिखता है कि हमें अर्थव्यवस्था में सुधार (Improvement in economy), कानून का राज कायम करना (Rule of law), दाग़दार और भ्रष्ट नौकरशाही और न्यायिक व्यवस्थाओं में तेजी से सुधार की प्रक्रिया से ही असंगठित अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है.

मोदीजी अपने मन की बात में संस्कृत के एक श्लोक ‘एवं एवं विकार : अपी तरुन्हा साध्यते सुखं’ का जिक्र किया था। जिसका मतलब है कि बीमारी और उसके प्रकोप से शुरुआत में ही निपटना चाहिए। बाद में रोग असाध्य हो जाते हैं (Later the diseases become incurable) तब इलाज भी मुश्किल हो जाता है। पर उन्हें पता होना चाहिए कि बीमारी से निपटने में देरी सरकार की ओर से ही हुई और अब पूरा देश इसे भुगत रहा है। अपने प्रवचनों में वो देश की जनता से त्याग, बलिदान तथा कर्तव्यों की दुहाई देते हैं लेकिन उनके अधिकारों का जिक्र तक नही करते हैं क्यों ?

एक बार अपने सलाहकारों को कहिए कि वह भारतीय संविधान के समवर्ती सूची में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्व को पढ़ें फिर उसके क्रियान्वयन के लिए प्रयास करें।

यह सोचने की बात है कि दिक्कत तब और बढ़ जाएगी जब आप अपने अड़ियल रवैये को अपनाते हुए उसे अस्वीकार करें।

5 पी पर जोर देना चाहिए पर ये 5 पी हैं- प्रायर, प्रिपेरेशन, प्रीवेंट्स, पुअर, परफ़ॉर्मेंस. इसका मतलब है कि पहले से की गई तैयारी आपको बाद की दिक़्क़तों से बचाती है। चाहे कारोबार हो या सरकार हो, इन 5 पी से एक अनिश्चितता और उथल-पुथल भरी दुनिया में ख़ुद को ज़िंदा रखा जा सकता है।

जो देश अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, वे वही देश हैं जो 5 पी का पालन करते हैं। ये दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, हांगकांग, स्वीडन और जर्मनी जैसे मज़बूत, मुक्त-बाज़ार वाली इकनॉमीज़ हैं। इन देशों को आज कम दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है।

हमें सरकार के स्कोप और स्केल को बढ़ाने की ज़रूरत होती है। इसके कई रूप हो सकते हैं, लेकिन इन सभी का नतीजा समाज और अर्थव्यवस्था पर ही हमेशा दिखता है।

किसी भी संकट में वक़्त ही आपका सबसे बड़ा दुश्मन होता है। अधिकतम प्रभावी होने के लिए हमें बहुत तेज़ी से, बोल्ड और स्पष्ट फ़ैसले लेने होते हैं। यहाँ मुझे इसमे कमी नज़र आती है।

किसी भी संकट के वक़्त पहले से की गई तैयारी बाद में राहत का सबब बनती है, लेकिन ऐसा देखा गया है कि सरकारें ऐसे संकटों का इस्तेमाल सत्ता पर अपनी पकड़ को मज़बूत करने में करती हैं, जैसा कि भारत में देखा जा रहा है।

जैसा कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी (Whatsapp university) द्वारा ज्ञान का प्रसार करके हमें इम्युनिटी सिस्टम (Immunity system) और रेसिस्टेंट पॉवर (Resistant power) पर प्रवचन दिए जा रहे हैं।

चलिए माना कि इम्यून और रेजिस्टेंस पावर पर नकारात्मक और सकारात्मक भाव विचार का गहरा असर पड़ता है।

जरूरी नहीं कि सकारात्मक विचार सही असर ही डालेगा।

जरूरी नहीं कि नकारात्मक विचार गलत असर ही डालेगा।

पिट्यूटरी ग्रंथि को कन्फ्यूज्ड तो कर ही सकता है न ??

ठीक है बचाव के लिए जानकारी जरूरी है। डिस्टेंस ठीक है, कर्फ्यू ठीक है। अब क्या भूख लगने पर पेट पर पत्थर बांध लें या फिर रोटियों को लपेट के रहेंगे ??? भूख रोटी खाने से जाएगी और इलाज़ समुचित दवाइयों और हॉस्पिटलों में ही होगा।

कानून मकड़ी का वो जाला है,

जिसमें कीड़े मकोड़े तो फंसते हैं,

मगर बड़े जानवर उसे,

फाड़कर निकल जाते हैं?

ज़ुल्म के खिलाफ जो क़ौम आवाज़ नहीं उठाती, वह क़ौम सिर्फ लाशें उठाती है।

अमित सिंह शिवभक्त नंदी

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