सत्याग्रह से सत्याग्रह तक : 2020 की तीन तस्वीरें

इन तीनों तस्वीरों को जोड़कर देखें तो, 2021 के लिए कुछ महत्वपूर्ण इशारे जरूर मिल जाएंगे। सीएए से लेकर, लॉकडाउन से होते हुए, कृषि कानूनों तथा इसी बीच बनायी गयी श्रम संहिताओं तक की यात्रा, मौजूदा शासकों के नंगई से देशी-विदेशी कार्पोरेट खिलाडिय़ों के स्वार्थों को आगे बढ़ाने और इसके लिए, शासन की बढ़ती निरंकुशता से लेकर, जनता को सांप्रदायिक आधार पर बांटने तक के हथियारों को आजमाने की यात्रा है।

From Satyagraha to Satyagraha: Three pictures of 2020

Happy New Year 2021

गुजरे साल, 2020 की विरासत (Legacy of 2020) को बहुत हद तक सिर्फ तीन छवियों में पकड़ा जा सकता है। इनमें पहली छवि तो, जिससे यह साल शुरू हुआ था, शाहीन बाग (Shaheen bagh) में दिन-रात के धरने पर बैठी, महिलाओं की ही थी। नागरिकता संशोधन कानून- Citizenship amendment law (सीएए) और उसके जोड़ीदार, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर- (एनआरसी) के खिलाफ आंदोलन का सिलसिला, शुरू तो 2019 के आखिरी महीनों में ही हो गया था। एक ओर वामपंथ (Left front) समेत धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों और दूसरी ओर, जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों के छात्रों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से, नागरिकता की परिभाषा में ही सांप्रदायिक शर्त जोड़ने के उक्त कदम के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों की शुरूआत हुई थी। बहरहाल, दिसंबर के आरंभ में जैसे इस सांप्रदायिक हमले समेत सरकार के कदमों के विरोध की सजा देने के लिए ही, जेएनयू (JNU) के छात्रों व शिक्षकों पर बाहर से लाए गए भगवा गुंडों ने, घातक हथियारों से हमला कर दिया। और दिसंबर के मध्य में, जेएनयू के छात्रों पर हमले समेत सीएए-एनआरसी के हमले के विरोध में, जामिया के छात्रों तथा आस-पड़ोस के लोगों के प्रदर्शन पर बर्बर पुलिस दमन के साथ, इस आंदोलन के खिलाफ मोदी शासन के बर्बर दमनचक्र की शुरूआत हो गयी।

          भाजपायी सरकारों ने हर जगह इन जनतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ पाबंदियां ही नहीं लगायीं, जगह-जगह पर इन विरोध प्रदर्शनों को पुलिस दमन के जरिए खून में डुबोने की कोशिश भी की। उत्तर प्रदेश के योगी राज ने और कर्नाटक के येद्दियुरप्पा राज ने खासतौर पर प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलवाने के रिकार्ड बनाए। उत्तर प्रदेश में तो उस बर्बर दमनचक्र के घाव अब भी खुले हुए हैं। न सिर्फ उस दौर में पुलिस की गोलियों से हुई अनेक मौतों को अब तक नकारा ही जा रहा है बल्कि इस आंदोलन के सिलसिले में ब्रिटिश राज के जमाने की तरह थोपे गए जुर्माने वसूल करने का सिलसिला ही नहीं, आंदोलन में शामिल अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं के नामों व तस्वीरों के साथ सार्वजनिक रूप से वसूली आदि के होर्डिंग लगाए जाने का सिलसिला भी आज भी जारी है।

Shaheen Bagh set the model for a completely peaceful satyagraha.

          इसी सब की पृष्ठभूमि में, जामिया के छात्रों के तथा जामिया के छात्रों के समर्थन में, मुसलसल सत्याग्रह के समानांतर, इस विश्वविद्यालय से डेढ़-दो किलोमीटर की ही दूरी पर, शाहीन बाग में सड़क के एक बाजू पर मुसलसल सत्याग्रह शुरू हो गया।

यह इस माने में एकदम अनोखा सत्याग्रह था कि इसमें न सिर्फ मुख्यत: महिलाओं की हिस्सेदारी थी, बल्कि हर तरीके से सत्याग्रह की कमान भी महिलाओं के और खासतौर बुजुर्ग मुस्लिम महिलाओं के हाथों में थी। उस समय जबकि भाजपायी सरकारें, विरोध की इस लहर को शासकीय हिंसा से कुचलने की कोशिश कर रही थीं, शाहीन बाग ने एक पूरी तरह से शांतिपूर्ण सत्याग्रह का मॉडल कायम किया। यह मॉडल न सिर्फ इस सत्याग्रह की स्वत:स्फूर्तता व राजनीतिक दलों से स्वायत्तता पर जोर देता था बल्कि सचेत रूप से तथा बड़ी मुस्तैदी से, सीएए के लिए अपनी चुनौती को संविधान के दायरे में रखता था। अहिंसक और खुद कष्ट सहने के जरिए किया जाता प्रतिरोध इसे गांधी की सत्याग्रह की विरासत से जोड़ता था, तो संविधान प्रदत्त सभी नागरिकों की बराबरी के अधिकार का आग्रह, आंबेडकर की विरासत से।

यहां आकर सीएएविरोध ने एक जनांदोलन का रूप ले लिया। देखते ही देखते, देश भर में सैकड़ों स्थानों पर स्वत: स्फूर्त तरीके से शाहीन बाग जैसे सत्याग्रह के केंद्र स्थापित हो गए। बेशक, सत्ताधारी संघ-भाजपा ने इसे दबाने के लिए सभी हथकंडे आजमाए। आंदोलनकारियों के खिलाफ हर प्रकार का दुष्प्रचार किया गया। उनके खिलाफ शासन की ताकत का इस्तेमाल किया गया। उसके खिलाफ सांप्रदायिक  गोलबंदी कर, जनता के खिलाफ जनता को मैदान में उतारने की कोशिश की गयी। लेकिन, इस सत्याग्रह के नैतिक बल को नहीं दबाया जा सका। अंतत: सत्ताधारी संघ परिवार ने इस अहिंसक सत्याग्रह के खिलाफ हिंसा/ दंगे का अपना जाना-पहचाना हथियार आजमाया। एक ओर पूर्वी-दिल्ली में दंगे के हथियार के इस्तेमाल और दूसरी ओर उसके पूरक के रूप में शासन तंत्र के इस्तेमाल ने, इस आंदोलन की कमर तोड़ दी। रही-सही कसर कोरोना के हमले ने पूरी कर दी, जिसे सत्ताधारियों ने अपनी निरंकुशता का रास्ता निरापद करने का औजार बना लिया।

गुजरे साल की दूसरी अमिट छवि, कोरोना के इस हमले और सत्ताधारियों की निरंकुशता के इस योग ने ही गढ़ी थी। यह छवि थी पांवों में छाले लिए, अपनी संक्षिप्त सी गृहस्थी को सिर पर उठाए, सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय कर, हमारे शहरों से अपने गांव-घर लौटने के लिए निकले, मेहनत-मजदूरी करने वाले दसियों लाख औरत-मर्दों, बुजुर्गों-बच्चों की। इस एक छवि में लाखों तस्वीरें थीं। पहिए वाली अटैची पर टिके अधसोये बच्चे को रास्ते पर खींचती मां की तस्वीर। सिर पर सामान की पोटली उठाए, गोदी में छोटे बच्चे को लिए मां की तस्वीर। मां को पीठ पर लादकर असंभव सी यात्रा पर निकले बेटे की तस्वीर। और बेशुमार दुर्घटनाओं में मौतों की तस्वीरें। रेल की पटरी के साथ-साथ चलकर घर लौटते हुए मजदूरों के रेलगाड़ी के नीचे कट जाने के बाद, पटरियों के बीच में बिखरी रोटियों की तस्वीर। और दिन भर में एक बार खाने के नाम पर मामूली खिचड़ी के लिए लंबी-लंबी लाइनों में लगकर घंटों इंतजार करते, मजदूर से अचानक पूरी तरह से मजबूर कर के भिखारी बना दिए गए, मेहनत-मजदूरी करने वालों की तस्वीर भी।

This great exodus from cities and towns across the country was also a kind of non-violent mass Satyagraha.

          देशभर में शहरों तथा कस्बों से यह महापलायन भी, एक तरह का अहिंसक जन-सत्याग्रह था। यह सत्याग्रह था उस विचारहीन शासन के खिलाफ, जिसने बिना किसी तैयारी के तथा बिना कोई योजना बनाए, अचानक और सिर्फ चार घंटे के नोटिस पर, विश्व रिकार्ड बनाने की किसी सनक में ‘दुनिया का सबसे कड़ा लॉकडाउन(World’s tightest lockdown) इसका रत्तीभर ख्याल किए बिना थोप दिया था कि इसका मेहनतकशों पर क्या असर पड़ेगा? कोई भी इंतजाम किए बना, लोगों को घर से बाहर ही नहीं निकलने का फरमान दे दिया गया और उसे पुलिस के डंडों के बल पर सख्ती से लागू भी करा दिया गया। लेकिन, फरमान जारी करने वालों ने न तो यह सोचा कि क्या सब के पास घर में ही रहने के लायक या किसी भी तरह के घर हैं? और जो रोज कमाते और रोज खाते हैं, घरों में ही बने रहेंगे तो खाएंगे क्या और कैसे? जाहिर है कि इसका भी ख्याल नहीं किया गया कि अगर लॉकडाउन के जरिए, कई हफ्ते के लिए सारी गतिविधियां बंद रखी जानी हैं, तो प्रवासी मजदूरों को शहरों-कस्बों की उनकी तंग रिहाइशों में, जहां न्यूनतम सुविधाएं भी मुश्किल से ही होती हैं, बंद रहने पर मजबूर किए जाने के मुकाबले, इस महामारी से बचाव के लिहाज से भी यही बेहतर नहीं होता कि उन्हें अपने घर-गांव पहुंचा दिया जाता। पर उन्हें महामारी से लेकर भूख तक से बचाने की चिंता ही किसे थी। अलबत्ता उनसे छूत की बीमारी लगने के खतरे सेे, संपन्नतर तबकों को बचाने की परवाह जरूर थी। यह महापलायन, शासन की इस निष्ठुरता और जन-शत्रुता के खिलाफ एक तरह का जन-सत्याग्रह ही था।

          गुजरे साल की तीसरी अमिट छवि, उसी कोरोना के संकट का फायदा उठाकर, मोदी सरकार द्वारा थोपे गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ राजधानी की सीमाओं पर डठे लाखों किसानों के सत्याग्रह की है।

शाहीन बाग की छवि की तरह, यह छवि भी दिसंबर-जनवरी की कड़कड़ाती सर्दी में, कपड़े के तिरपाल के नीचे, सडक़ों पर दिन-रात धरना दे रहे किसान स्त्री-पुरुषों, बुजुर्गों-बच्चों की है। इस तस्वीर में भी, अन्याय के खिलाफ डटे रहने की दृढ़ता के साथ ही, खुद कुर्बानी देने का गहरा रंग है, जो किसानों के सत्याग्रह को असाधारण नैतिक बल देता है। अपने देशव्यापी असर में यह सहज ही पिछले दसियों सालों का सबसे बड़ा और सबसे असरदार जनांदोलन बन गया है।

बेशक, मौजूदा निरंकुश सत्ता और सत्ताधारी कुनबे ने इस आंदोलन को भी दबाने की हर संभव कोशिश की है।

इस आंदोलन को बदनाम करने, उसके खिलाफ किसानों के एक हिस्से को खड़ा करने, आंदोलन चला रहे संगठनों के बीच फूट डालने की कोशिश करने और शासन की दमनकारी ताकत का इस्तेमाल करने तक के, सभी हथियार आजमाए गए हैं। और ये सभी हथियार अब तक अपने उद्देश्य में विफल रहे हैं। तभी तो मोदी की किसानों से बातचीत से लेकर मन की बात तक में कृषि कानूनों को किसान-हितैषी साबित करने की सारी कोशिशों के बावजूद, सरकार किसानों के आंदोलन के सामने झुकती नजर आ रही है। यह दूसरी बात है कि सीधे-सीधे यह स्वीकार करने के बजाए कि किसानों को स्वीकार्य नहीं होने के कारण ये कानून वापस लिए जाते हैं, मोदी सरकार अब भी कोई ऐसी ओट खोजने में लगी हुई है, जिससे किसान भी संतुष्ट हो जाएं और सरकार को भी यह नहीं कहना पड़े कि वह इन कानूनों को वापस ले रही है।

          इन तीनों तस्वीरों को जोड़कर देखें तो, 2021 के लिए कुछ महत्वपूर्ण इशारे जरूर मिल जाएंगे। सीएए से लेकर, लॉकडाउन से होते हुए, कृषि कानूनों तथा इसी बीच बनायी गयी श्रम संहिताओं तक की यात्रा, मौजूदा शासकों के नंगई से देशी-विदेशी कार्पोरेट खिलाडिय़ों के स्वार्थों को आगे बढ़ाने और इसके लिए, शासन की बढ़ती निरंकुशता से लेकर, जनता को सांप्रदायिक आधार पर बांटने तक के हथियारों को आजमाने की यात्रा है। दूसरी ओर, सीएए विरोधी जनांदोलन (Anti CAA movement) से लेकर, महापलायन से होकर किसान जनांदोलन तक, इसके संकेतक हैं कि आम जनता के तेजी से बढ़ते हिस्से, मौजूदा शासकों की कुचालों को विफल करते हुए, सिर्फ किन्हीं सीमित हितों के लिए नहीं बल्कि अपने मूल अधिकारों के लिए, संघर्ष के मैदान में उतर रहे हैं। किसान आंदोलन दिखाता है कि ये आंदोलन, मौजूदा सत्ताधारियों को हिला ही नहीं सकते हैं, झुकने के लिए भी मजबूर कर सकते हैं। यह नये साल को लेकर काफी उम्मीद बंधाता है। तीसरे, लंबे अविराम धरने से लेकर अंबानी-अडानी के उत्पादों के बहिष्कार तक के, सत्याग्रह के उपायों का बढ़ते पैमाने पर कारगर होना, यह दिखाता है कि शायद, जनांदोलन का वह रूप मिल गया है, जो जनतांत्रिक व्यवस्था के दायरे में मौजूदा सत्ता को कारगर तरीके से नैतिक चुनौती भी दे सकता है और उसके खिलाफ जनता के बढ़ते तबकों को गोलबंद भी कर सकता है। यही 2020 की थाती है, जिसे लेकर 2021 को आगे बढ़ना है।                       

राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
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