जी-7 देशों की बैठक और समानता पर आधारित दुनिया का ख्वाब

जी-7 देशों की बैठक और समानता पर आधारित दुनिया का ख्वाब

जी-7 देशों की बैठक पर संपादकीय टिप्पणी (Editorial note in Hindi on G-7 countries meeting,)

देशबन्धु में संपादकीय आज (Editorial in Deshbandhu today) | जी-7 का नीति वाक्य क्या है?

‘समानता आधारित दुनिया की ओर बढ़ो’ (Progress towards an equitable world), ये जी-7 का नीति वाक्य (G-7 Policy Sentence in Hindi) है और पिछले दिनों जर्मनी में जी-7 देशों की बैठक (G-7 meeting in Germany) इसी नीति वाक्य के इर्द-गिर्द चर्चाओं के साथ संपन्न हुई। इस बैठक का क्या नतीजा निकला, इस के बारे में सोचने का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि पिछली बैठकों से भी दुनिया के साधारण लोगों को कुछ हासिल नहीं हुआ है। जो हासिल होता है, वो पूंजीपति, साम्राज्यवादी मानसिकता के पोषक लोगों की झोली में जाता है।

जर्मनी के बेवेरिया राज्य में एलमाऊ नाम के बेहद सुंदर और भीड़-भाड़ से दूर शांत इलाके में लगभग 18 हजार करोड़ यूरो के खर्च पर दो दिन के लिए दुनिया के कुछ शक्तिशाली नेता जुटे और कुछ अपने से कमजोर देशों के नेताओं को भी बैठक में खास तौर पर आमंत्रित किया।

जी-7 देशों की बैठक में क्या बातें हुईं?

जी-7 देशों की बैठक में जलवायु परिवर्तन, भुखमरी और गरीबी को लेकर बात हुई है। इस तरह की बातें हर बैठक में होती हैं, क्योंकि दुनिया में पूंजीवाद के कारण ये तमाम समस्याएं गहरी जड़ें जमा चुकी हैं और इन्हें सबसे अधिक गरीब आदमी भुगतता है।

जी-7 की विशेषता क्या है?

जी-7 जैसे मंचों की विशेषता ये है कि ये पूरे तामझाम के साथ दुनिया की बड़ी समस्याओं पर इस तरह बात का माहौल बनाते हैं, मानो इनका हल निकाल कर ही दम लेंगे। लेकिन समस्याएं भी जारी रहती हैं और इस तरह के मंचों पर होने वाली बैठकें भी।

एक भयंकर त्रासदी मानव तस्करी

यह संयोग ही है कि जिस वक्त जी-7 के मंच से भावी दुनिया के लिए बड़ी घोषणाएं हो रही थीं, उसी समय अमेरिका और मेक्सिको की सीमा पर टेक्सास प्रांत (Texas province on the border of the US and Mexico) के सेंट एंटोनियो इलाके में एक लावारिस ट्रक में 46 लाशें मिलीं और जो लोग जिंदा बचे हुए थे, वो भीषण गर्मी के कारण बेहद बीमार अवस्था में मिले। इस घटना से मानव तस्करी एक भयंकर त्रासदी (Human trafficking a terrible tragedy) के रूप में सामने देखने मिली है।

मध्य अमेरिकी देशों में मानव व्यापार  (Human trade in Central American countries)

गौरतलब है कि होंडुरास, ग्वाटेमाला और एल सल्वाडोर (Honduras, Guatemala and El Salvador) जैसे सेंट्रल अमेरिकी देशों से हर साल ग़रीबी और हिंसा से बचने के प्रयास में लाखों लोग अवैध तरीके से सीमा पार कर अमेरिका आने की कोशिश करते हैं, ताकि बेहतर ज़िंदगी मिल सके। इनमें से अधिकतर लोग मानव तस्करों को अमेरिकी सीमा पार करने के लिए मोटी रकम देते हैं। अवैध तरीके से लाने के लिए मानव तस्कर (human traffickers) जिंदा इंसानों को जानवरों की तरह ट्रकों या कंटेनरों में ठूंस कर लाते हैं, जहां उनके खाने-पीने की व्यवस्था तो दूर, सांस लेने के लिए मुश्किल होती है।

इंसानों के इस व्यापार में सामने चेहरा तस्करों का होता है, लेकिन इसके पीछे पुलिस, प्रशासन और सरकार से जुड़े लोगों की सरपरस्ती होती है और इस मानव व्यापार के मुनाफे में उनकी भी हिस्सेदारी होती है। जब इस व्यापार में किसी किस्म का घाटा होता है, यानी अगर इंसानों की जान जाती है, तो उसका जिम्मेदार कोई नहीं होता।

पुराना है अमेरिका में तस्करी के दौरान मौतों का इतिहास, लेकिन..

पहले भी कई बार अवैध तस्करी के दौरान मौतें हुई हैं, लेकिन अमेरिका के इतिहास में शायद इतने अधिक लोगों की मौत वाली यह पहली घटना है। वैसे अमेरिकी पुलिस अवैध रूप से लाए जा रहे लोगों पर निगाह भी रखती है। पिछले महीने में ही लगभग दो लाख लोग बिना किसी काग़ज़ात के अमेरिका में दाखिल होते समय हिरासत में लिए गए हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध से पैदा हो रहे हैं ऐसे ही हालात

अपनी जमीन, घर और परिजनों को छोड़कर इस तरह जान के खतरे उठाकर कोई इंसान दूसरे देश जाता है, तो उसका मतलब यही है कि उसके अपने देश में उसे जीवन की आस दिखाई नहीं दे रही है। अमेरिका और मेक्सिको की सीमा पर जो त्रासदी घटी है, वह कभी सीरिया या लीबिया से यूरोप आने के प्रयास में लगे लोगों के साथ घटती है और अब ऐसी ही त्रासदी यूक्रेन के लोगों के साथ भी हो रही है। पिछले चार महीनों से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है। जिसमें शुरु में रूस के खिलाफ अमेरिका और उसके समर्थक देशों ने खूब हुंकार भरी। रूस को घुटनों पर लाने का दावा किया गया। रूस के खिलाफ कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए। मगर अब तक रुस पीछे हटता नहीं दिख रहा, न ही उसके हमलों में कोई कमी आ रही है।

इन चार महीनों में विश्व के बड़े नेता कई बार आमने-सामने एक-दूसरे से मिले और इस युद्ध की निंदा करते हुए इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित किए गए। जी-7 से पहले ब्रिक्स और क्वाड देशों की बैठक भी हुई। मगर युद्ध अपनी भयावहता के साथ आम लोगों का जीवन नर्क बना रहा है और शक्तिशाली देशों के नेता एक साथ मिलकर विश्व शांति की बातें कर रहे हैं।

रूस के अतिरिक्त अमेरिका के लिए चुनौती बनी हुई है चीन की विस्तारवादी नीति

(G-7‘s infrastructure plan offers an alternative to China’s Belt and Road Initiative in a ‘deliberate way’)

रूस के साथ-साथ चीन की विस्तारवादी नीति (China’s expansionist policy) भी अमेरिका जैसे देशों के लिए चुनौती बनी हुई है। इस बार जी-7 के मंच से चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना (China’s Belt and Road Initiative Project) का तोड़ निकालने की कोशिश की गई है। अपनी इस महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिये चीन एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने के लिए विशाल इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को अंजाम दे रहा है। हालांकि उस पर ये आरोप लग रहे हैं कि इस बहाने वह विकासशील और कमजोर देशों को कर्ज के बोझ में दबाकर अपना आर्थिक गुलाम बना रहा है।

अब जी-7 देशों ने चीन की परियोजना के जवाब में 600 अरब डॉलर की इन्फ्रास्ट्रक्चर योजना का ऐलान किया है।

शक्तिशाली देशों का अखाड़ा बनेंगे विश्व के कमजोर और गरीब देश

पार्टनरशिप फॉर ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इन्वेस्टमेंट यानी पीजीआई/ Partnership for Global Infrastructure and Investment (PGI) के नाम की ये योजना बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड मतलब बी 3 डब्ल्यू कही जा रही है। इस योजना के तहत जी-7 देशों के नेता अगले पांच साल में मध्य और कम आय वर्ग वाले देशों में इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए 600 अरब डॉलर जुटाएंगे। अकेले अमेरिका इसके लिए दो सौ अरब डालर देगा, तीन सौ अरब यूरोपीय यूनियन के देश देंगे और शेष रकम बाकी जगहों से इकट्ठी होगी। मतलब दुनिया में विकास के नाम पर दो बड़ी परियोजनाओं का मुकाबला होगा, जिसके नियम शक्तिशाली देश तय करेंगे और अखाड़ा बनेंगे विश्व के कमजोर और गरीब देश। इस तरह समानता पर आधारित दुनिया की ओर बढ़ने का झांसा जनता को दिया जाएगा।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

G-7 meeting and dream of Progress towards an equitable world

नोट : G7 क्या है? What is the G7?

G7 (सात का समूह) दुनिया की सात सबसे बड़ी तथाकथित “उन्नत” अर्थव्यवस्थाओं का एक संगठन है, जो वैश्विक व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली पर हावी है। वे कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूके और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं।

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