गांधी की दांडी यात्रा : ‘नमक कर’ के विरोध का इतिहास और सत्याग्रह की भूमिका

गांधी की दांडी यात्रा : ‘नमक कर’ के विरोध का इतिहास और सत्याग्रह की भूमिका

महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन और सत्याग्रह की योजना के पहले, नमक पर कर और उसके विरोध के इतिहास पर भी एक नजर डालते हैं। ऐसा बिलकुल भी नहीं था कि नमक पर, कर 1930 में ही लगाया गया था, बल्कि नमक पर कर का इतिहास (History of tax on salt) उसके बहुत पहले से शुरू होता है।

ईस्ट इंडिया कंपनी का उद्देश्य ही देश का आर्थिक दोहन और साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि करना था। वे आए ही भारत में इस उद्देश्य थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की लूट पर फिलहाल विस्तार से, चर्चा करने के बजाय, हम नमक कर के इतिहास पर एक चर्चा करते हैं।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1835 में, भारतीय नमक के आयात को सुविधाजनक बनाने के लिए नमक पर विशेष कर लगाए, जिससे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों को भारी लाभ हुआ।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नमक पर पहला कर लगाने के बाद पर, इन टैक्स कानूनों की तीखी आलोचना हुई थी। यह आलोचना ब्रिटेन में भी हुई थी। ब्रिस्टल में चैंबर ऑफ कॉमर्स, नमक कर के विरोध में एक याचिका प्रस्तुत करने वाले पहले लोगों में से, एक था।

कटक में फरवरी 1888 में एक सार्वजनिक बैठक में नमक कर की आलोचना की गई थी। बंबई में 1885 में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अधिवेशन में ही, कांग्रेस के एक सदस्य, एसए स्वामीनाथ अय्यर ने नमक कर के खिलाफ अपना विरोध जताया और इसे रद्द करने का अनुरोध किया था। अय्यर ने जो प्रस्ताव पेश किया, उसमें कहा गया था कि,

“यदि नमक पर कर बढ़ा दिया जाए तो यह अन्यायपूर्ण और अधार्मिक होगा। यह मानव और पशु दोनों के लिए एक आवश्यक तत्व है। इस मूर्खतापूर्ण कर नीति और इसमें और वृद्धि करने के विरुद्ध एक आंदोलन होना चाहिए, खासकर ऐसे समय में जब भारत के लाखों गरीब लोग अभाव से पीड़ित है।”

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1888 में इलाहाबाद अधिवेशन में पूना के एक प्रतिनिधि नारायण विष्णु ने भारतीय नमक अधिनियम का पुरजोर विरोध किया। एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें उपस्थित प्रतिनिधियों ने घोषणा की कि, ‘यह कांग्रेस नमक कर की हालिया वृद्धि के बारे में अपनी अस्वीकृति दर्ज करती है, जिसमें गरीब वर्गों के बोझ में एक स्पष्ट वृद्धि शामिल है।’

इलाहाबाद में 1892 का अधिवेशन भी इस प्रस्ताव के साथ समाप्त हुआ : ‘… हम नहीं जानते कि, यह कर कब कम किया जाएगा। लेकिन, जनता के हित में, सरकार से, इस प्रार्थना को दोहराने की आवश्यकता है, और हमें पूरी उम्मीद है कि सरकार यह अनुरोध जल्द ही स्वीकार कर लेगी।”

अहमदाबाद में कांग्रेस के अधिवेशन में भी इसी तरह का विरोध किया गया था।

नमक कर का विरोध, दादाभाई नौरोजी जैसे प्रख्यात लोगों ने भी किया था। 14 अगस्त 1894 को उन्होंने, हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा था, “फिर नमक कर, किसी भी सभ्य देश में लगाए गए सबसे क्रूर राजस्व जो रु 8,600,000/- होता है और जो अफीम पर मिलने वाले राजस्व के साथ ‘भारत के राजस्व का बड़ा हिस्सा बनता था, यह सब, कि लोगों की दुर्दशा कर के वसूला जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि राज्य को क्या मिला। इस मामले का मूल तथ्य यह है कि एक निश्चित वार्षिक राष्ट्रीय उत्पादन में से, राज्य एक निश्चित हिस्सा लेता था। अब यह राज्य द्वारा लिए गए हिस्से के बारे में भी ज्यादा मायने नहीं रखता अगर वह हिस्सा, जैसा कि इस देश में है, खुद लोगों को वापस कर दिया जाता है, जिनसे इसे उठाया गया था। लेकिन दुर्भाग्य और बुराई यह थी कि इस हिस्से का अधिकांश हिस्सा लोगों के पास वापस नहीं गया और राजस्व की पूरी व्यवस्था और लोगों की आर्थिक स्थिति अप्राकृतिक और दमनकारी हो गई।

भारत के संसाधनों का लगातार दोहन हो रहा था, और इसलिए वह कभी भी एक समृद्ध देश नहीं बन सकता है। इतना ही नहीं, समय के साथ भारत का नाश होना चाहिए और इसके साथ ही ब्रिटिश साम्राज्य का भी नाश होना चाहिए।

दादाभाई नौरोजी, ब्रिटिश उपनिवेश की उस कर विसंगति का उल्लेख कर रहे थे, जिसमें भारत से कमाए राजस्व का बहुत कम भाग भारत में व्यय किया जाता है और अधिकांश से ब्रिटिश साम्राज्य, की समृद्धि में लगातार वृद्धि हो रही है।

जॉर्ज हैमिल्टन ने 1895 में हाउस ऑफ कॉमन्स के एक सत्र में कहा कि, “हालाँकि, अब समय आ गया है, कि, जब सरकार के पास अधिक धन आ गया है, और इसलिए, सार्वजनिक खजाने के संरक्षक के रूप में यह उसका कर्तव्य है कि वह नमक पर कराधान को कम करे।” लेकिन, वर्ष 1923 में जब नमक कर को दोगुना कर दिया गया था, तब कराधान जांच समिति की एक रिपोर्ट में इसकी तीखी आलोचना की गई थी जो दो साल बाद प्रकाशित हुई थी। इस वृद्धि पर भारतीय राष्ट्रवादियों की तीखी प्रतिक्रिया भी हुई। 1929 में, पंडित नीलकंठ दास ने शाही विधानमंडल में नमक कर को निरस्त करने की मांग की, लेकिन उनकी दलील बहरे कानों पर पड़ी। 1930 में, उड़ीसा, खुले विद्रोह के करीब था।

अब आते हैं, गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि की।

गांधी और उनके अनुयायी भले ही अहिसा के प्रति प्रतिबद्ध रहे हों, पर वे क्रांतिकारी आंदोलन के साथियों के युवाओं पर पड़ रहे प्रभाव से अपरिचित नहीं थे। वे क्रांतिकारी हिंसक संघर्ष के साथ युवाओं के आकर्षण के बारे में, अक्सर चर्चा भी करते थे। वर्ष, 1928,29 और 1930 का समय पंजाब के लिए, बेहद घटनाओं भरा रहा।

पंजाब स्वाधीनता आन्दोलन का केंद्र कैसे बना?

साइमन कमीशन का विरोध, लाला लाजपतराय पर बर्बर लाठीचार्ज और उनकी दुखद मृत्यु, सांडर्स की हत्या, भगत सिंह और अन्य साथियों पर, चल रहा मुकदमा, और कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य का संकल्प, एक, एक कर के घटने वाली इन महत्वपूर्ण घटनाओं ने पंजाब को स्वाधीनता आन्दोलन के केंद्र में ला दिया था। गांधी इस बदली हुई परिष्टिति को अच्छी तरह से समझ रहे थे। पंजाब में, उन्होंने पहली बार भगत सिंह और उनके साथियों के बारे लोगों का अप्रत्याशित उत्साह और लगाव देखा।

मोतीलाल नेहरू ने उस समय भी कहा था कि, वह ऐसा समय है जब भगत सिंह, महात्मा गांधी से भी अधिक लोकप्रिय, युवाओं में हो गए थे। इस उत्साह का प्रभाव, कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष युवा नेताओं, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस पर भी पड़ा। इंडियन नेशनल कांग्रेस के ये युवा नेता, ब्रिटिश साम्राज्य से पूरी तरह छुटकारा पाना चाहते थे। लेकिन अब आगे की रणनीति कैसी हो, इस पर अभी किसी की दृष्टि साफ नहीं थी।

गांधी अब साबरमती आश्रम में थे। एक तरफ देश की जनता आजादी के लिए उद्वेलित हो रही थी तो दूसरी तरफ, कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज्य का संकल्प लेने के बाद कांग्रेस का युवा नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू और सुभाष बोस के साथ, अब उस पूर्ण स्वराज्य की संकल्पपूर्ति के लिए, किसी नए संघर्ष की उम्मीद में लगा हुआ था।

गांधी अब किसी नए आंदोलन का ताना बाना बुनने में लगे थे और वे समझ गए थे कि, उन्हें अब, आश्रम छोड़ना होगा और एक बार फिर से, सक्रिय राजनीति में, प्रवेश करना होगा।

इस प्रकार गांधीजी के मन में एक नए सविनय अवज्ञा आंदोलन की भूमिका बन रही थी, लेकिन इसका स्वरूप क्या होगा, इस पर अभी उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया था। जवाहरलाल नेहरू को 10 जनवरी 1930 को लिखे अपने पत्र में, उन्होंने कहा था कि ‘जब से हमने लाहौर को छोड़ा है, मन में सविनय अवज्ञा आंदोलन की अनेक योजनाएं चल रही हैं। मैं अभी तक अपना रास्ता साफ देख रहा हूं।” लेकिन रास्ता क्या है, इसका वे खुलासा नहीं करते हैं।

कांग्रेस ने इसी ऊहापोह और चिंतन मनन के बीच, लाहौर में ही, जनवरी के आखिरी रविवार के दिन, जो 26 जनवरी 1930 को पड़ रहा था, ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया।

26 जनवरी 1930 को पूरे भारत में, जगह-जगह प्रभात फेरियां निकाल, गईं, जनसभाएँ आयोजित हुईं और जुलूस निकाले गए। स्थान-स्थान पर तिरंगा फहराया गया। देशभक्ति के गीत गाए गए और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया गया।

अपने अखबार के माध्यम से गांधी जी ने, इस आयोजन में, सभी से पूर्ण अनुशासन, संयम, गरिमा और उत्साह बनाए रखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, कांग्रेस के स्वयंसेवक, इस दिन कुछ रचनात्मक कार्य करते हुए अपना दिन बिताएंगे। उन्होंने, चरखा कताई, अछूतों की सेवा या हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव बढ़ाने जैसे कार्य करने का आग्रह भी किया। इन सब गतिविधियों के बीच, 26 जनवरी 1930 का दिन, एक उत्सव के रूप में पूरे देश भर में मनाया गया।

पहले स्वतंत्रता दिवसका, इस प्रकार, किया गया आयोजन, एक शानदार सफलता थी।

अपनी पुस्तक में रामचन्द्र गुहा इस आयोजन पर टिप्पणी करते हुये कहते हैं, “जैसा कि एक सरकारी खुफिया रिपोर्ट ने स्वीकार किया है, भारत भर के शहरों और कस्बों में समारोहों में काफी भीड़ थी और उनका प्रभाव गंभीर और प्रभावशाली था।”

(गांधी, द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड, पृ.329)

26 जनवरी के आयोजन का देश भर में जबरदस्त प्रभाव पड़ा। पंजाब सरकार तो सतर्क हुई ही, साथ ही वायसरॉय को भी यह खबर मिलने लगी कि, गांधी कोई नया आंदोलन छेड़ सकते हैं। पर यह सूचना सरकारी तंत्र को नहीं मिल सकी कि, नया आंदोलन किस तरह का होगा।

महात्मा गांधी साबरमती में थे, लेकिन, उन्हें देश भर से खबरें मिल रही थीं और वे देश को निराशा से उबरते देख रहे थे। अमृतसर से कांग्रेस के एक सहयोगी ने गांधी जी को टेलीग्राम देकर बताया कि, ‘स्वतंत्रता दिवस ध्वजारोहण, जुलूस, सभा और रोशनी का उत्सव बेहद भव्य था। इतने अधिक झंडे, रोशनी और जुलूस पहले कभी भी नहीं देखे गए थे। सफलतापूर्वक फहरते हुए हजारों ध्वज, पूरे जिले में राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में, लड़ने के लिए लोगों के उत्साह और उनकी तत्परता का प्रमाण है।”

लाहौर से भी, एक और कांग्रेस कार्यकर्ता ने लिखा, “हजारों पुरुष, महिलाएं और बच्चे, छात्र व्यापारी, सरकारी नौकर, सभी जातियों, समुदायों और पंथों के लोग, जनसभा में सर्वोत्तम संभव स्थान पाने के लिए एक-दूसरे के साथ होड़ कर रहे थे। यह एक ‘अनोखा प्रदर्शन’ था, और लग रहा था, जैसे लोग विदेशी जूए से स्वतंत्र होने के आवेग से ही उत्साहित थे।”

यह पत्र सैफुद्दीन किचलू का था, जिन्होंने महात्मा गांधी जी को उस आयोजन का यह आंखों देखा हाल भेजा था।

(सफुद्दीन किचलू का पत्र 27 जनवरी, 1930)

देश भर से गांधी जी को ऐसी ही रिपोर्टें मिलीं। उत्साह भरी इन प्रतिक्रियाओं ने उनका भरपूर उत्साहवर्धन किया। निश्चित रूप से 26 जनवरी को ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाने वालों में भारी संख्या में हिंदू थे। मुसलमान और यहां तक ​​कि ईसाई भी काफी हद तक दूर रहे। हालाँकि, जो रिपोर्ट्स, कांग्रेसी, गांधी को देश भर से भेज रहे थे, केवल उन संख्याओं पर जोर देते थे, जिन्होंने इन समारोहों का आयोजन किया था और भाग लिया था, न कि उनकी सामाजिक संरचना या धार्मिक आधार पर इस आयोजन का कोई विश्लेषण भेज रहे थे।

गांधी जी को इन सब खबरों ने आश्वस्त किया कि देश सविनय अवज्ञा के एक नए दौर के लिए तैयार है।

अपने अखबार यंग इंडिया के जनवरी 1930 के आखिरी अंक में गांधी जी ने एक लंबा लेख लिखा, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार के समक्ष, अपनी ग्यारह मांगों को प्रस्तुत किया और ब्रिटिश सरकार से अपेक्षा की कि, इन मांगों पर सरकार, विचार करे और जनहित से जुड़ी इन समस्याओं का निराकरण करें। इन ग्यारह बिन्दुओं में शराबबंदी, भू-राजस्व में कमी, नमक कर को समाप्त करना, सैन्य खर्च और आधिकारिक वेतन में कमी, और विदेशी कपड़े पर एक सुरक्षात्मक शुल्क लगाना महत्वपूर्ण बिंदु थे। वायसरॉय को सम्बोधित करते हुए उन्होंने अपना पक्ष स्पष्ट किया कि, “यदि वायसराय, ‘भारत की इन बहुत साधारण लेकिन महत्वपूर्ण जरूरतों’ को पूरा कर देंगे तो, वह (गांधी जी) सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसी कोई बात नहीं करेंगे, और कांग्रेस, फिर किसी भी सम्मेलन ( सरकार द्वारा बुलाए गए विचार विमर्श) में दिल से, सम्मिलित होगी, बशर्ते, वहां, अपनी बात कहने, और मांग की पूर्ण स्वतंत्रता हो।”

यह पत्र गांधी जी की तरफ से वायसरॉय के साथ बातचीत का एक द्वार खोलने जैसा था, क्योंकि लंबे समय से सरकार और कांग्रेस के बीच एक संवादहीनता की स्थिति बन गई थी। लेकिन शर्त स्पष्ट थी कि वायसरॉय को लोकहित से जुड़ी उन ग्यारह ज़रूरतों को पूरा करना था, जिनका उल्लेख उन्होंने अपने अखबार यंग इंडिया के जनवरी 1930 के अंतिम अंक में किया था।

गांधी जी की खूबी ही यह थी कि, वे बेहद साधारण और जनता से जुड़े मुद्दे उठाते थे।

लेकिन, इस मांग पत्र पर वायसरॉय का कोई जवाब और प्रतिक्रिया न तो आनी थी और न ही आई।

इस अंक के चार हफ्ते बाद गांधी जी ने, यंग इंडिया के लिए एक और लेख लिखा, जिसमें उन्होंने इन मांगों में से एक विशेष मांग पर ध्यान केंद्रित किया, जो था, नमक के उत्पादन और बिक्री पर राज्य के एकाधिकार का बिंदु। नमक जैसे साधारण और सबसे ज़रूरी वस्तु पर खुले बाजार में इसकी कीमत, राज्य द्वारा लगभग तीन रुपये प्रति मन की दर से कर लगाए जाने के कारण, काफी बढ़ गई थी।

गांधी जी ने इस साधारण और अत्यावश्यक वस्तु पर लगाये गए, इस कर को ब्रिटिश सरकार का ‘नापाक एकाधिकार’ घोषित किया क्योंकि उनका कहना था, “हवा और पानी के बाद नमक ‘शायद जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता’ है। यह इंसानों के लिए तो आवश्यक है ही, साथ ही मवेशियों के लिए भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।”

इस प्रकार पहली बार नमक, ब्रिटिश सरकार के लिये एक बड़ी चुनौती और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में टर्निंग प्वाइंट जैसा, एक बड़ा आंदोलन बनने जा रहा था।

इस तरह नमक पर कर, सविनय अवज्ञा आंदोलन के एक प्रमुख मुद्दे के रूप में उभरने लगा।

गांधी ने इस मुद्दे पर गंभीरता से एक आंदोलन की रूपरेखा बनाना शुरू कर दिया। इसी सिलसिले में गांधी से, नमक कर विभाग के एक रिटायर्ड अधिकारी मिलने पहुंचे, जिनका नाम गोपनीय रखा गया है ने, गांधी जी को यह सूचना दी कि, “खंभात से रत्नागिरी तक का पूरा पश्चिमी तट एक ‘विशाल प्राकृतिक नमक का इलाका है, जिससे ‘हर खाड़ी में नमक को समुद्र जल से, आसानी से तैयार किया जा सकता है’। यदि युवकों और वालंटियर का एक समूह, पूरे तट पर काम करना शुरू कर देता है, तो पुलिस और कस्टम्स कर्मचारियों की पूरी ताकत से भी, उन्हें प्राकृतिक नमक और नमक की मिट्टी इकट्ठा करने से रोकना असंभव हो जाएगा।”

इस तरह गांधी यह टोह ले रहे थे कि यदि वे कानून तोड़ कर नमक बनाने की किसी योजना पर अपना आंदोलन छेड़ते हैं तो यह आंदोलन कितना व्यापक हो सकता है और सरकार तक भी उसकी धमक पहुंचेगी। उस अवकाश प्राप्त, नमक कर अधिकारी से मिली सूचना के आधार पर, गांधी, नमक कानून तोड़ने की योजना बनाने लगे।

इस प्रकार, रॉलेट एक्ट के खिलाफ किए गए आंदोलन के ग्यारह साल बाद गांधी जी ने, ब्रिटिश साम्राज्य की सरकार के खिलाफ एक नए देशव्यापी आंदोलन का केंद्रबिंदु तय करना शुरू कर दिया था। 2 मार्च 1930 को उन्होंने फिर से एक बार वॉयसराय को एक पत्र लिखा जो रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्स नामक एक अंग्रेज सूत्र द्वारा भेजा गया।

तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन को गांधी ने एक और सविनय अवज्ञा आन्दोलन छेड़े जाने की अग्रिम चेतावनी दी। जब भी गांधी वायसराय को संबोधित करते थे तो, अपनी आदत के अनुसार, उन्हें सबसे प्यारे दोस्त के रूप में संबोधित करते थे। लेकिन यह आत्मीय संबोधन बस संबोधन तक ही था।

पत्र का मजमून उनकी दृढ़ता और संकल्पशक्ति के अनुकूल ही रहता था। वायसराय को भेजे पत्र में गांधी ने टिप्पणी की, ‘उन्होंने ब्रिटिश शासन को ‘अभिशाप’ के रूप में माना, अन्य कारणों से, ‘भू-राजस्व का भयानक दबाव’, हाथ से कताई का विनाश और अन्य कारीगरी और हस्तशिल्प पर आधारित उद्योग, और वायसराय और उनके अधिकारियों को मिलने वाले, बेतुके अत्यंत उच्च वेतन, भत्ते और राजसी सुविधाएं, जो एक औसत भारतीय के आय का पांच हजार गुना से अधिक होती थीं, का उल्लेख किया।

इस भयंकर आर्थिक विषमता का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा कि, ब्रिटिश प्रधान मंत्री को एक ब्रिटिश नागरिक की औसत आय का केवल नौ गुना अधिक वेतन का भुगतान किया जाता है, जब कि यहां वायसराय और एक आम भारतीय की आय में पांच हजार गुने का अंतर है।

इस प्रकार गांधी ने एक आर्थिक मुद्दा उठाया, उसे भयंकर आर्थिक विषमता से जोड़ा, भारत के आर्थिक दोहन का उल्लेख करते हुए, अपने शिकायत की व्याख्या करने के बाद, गांधी ने, उन मुद्दों के समाधान और उसके साधनों की रूपरेखा भी तैयार की। अपने पत्र में गांधी जी ने वायसराय को लिखा, ‘यदि आप इन जन समस्याओं से निपटने और उनके समाधान के लिए कोई रास्ता नहीं तलाश कर सकते हैं, और मेरा पत्र आप को, उन समस्याओं के समाधान के लिए प्रेरित नहीं करता है, तो मैं, अपने आश्रम के ऐसे सहकर्मियों के साथ आगे बढूँगा, और इस समस्या के समाधान के लिए खुद ही जो प्रयास कर सकता हूं, करूंगा। नमक कर कानून के इस प्रावधान को मैं गरीब और आम जनता के लिए, सबसे अधिक अन्यायपूर्ण मानता हूं।”

(कंप्लीट वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, वॉल्यूम XLIII पृष्ठ.81)

वायसराय लॉर्ड इरविन ने गांधी के पत्र का सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपने निजी सचिव के माध्यम से केवल दो वाक्यों का एक संक्षिप्त उत्तर भेजा, जिसमें वायसराय ने खेद व्यक्त किया कि ‘आप एक ऐसी कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं जो स्पष्ट रूप से कानून के उल्लंघन और सार्वजनिक शांति के लिए खतरा बन सकती है।’

ऐसा लगता है कि वायसराय की यह संक्षिप्त प्रतिक्रिया उनके एक अधिकारी द्वारा उनके लिए तैयार किए गए एक नोट पर आधारित थी। इस नोट में यह तर्क दिया गया कि “पहले तो नमक, समुद्र जल में सीधे न तो दिखता है और न ही उसे वहां आसानी से उत्पादन या खाने योग्य बनाया जा सकता है, इसलिए, इस बिंदु पर किसी आंदोलन का प्रारंभ होता भी है, तो भी, नमक का कोई ऐसा बड़ा उत्पादन नहीं होगा, जिससे सरकार को भारी टैक्स का नुकसान हो। यदि नमक बना भी लिया जाता है तो वह, अपेक्षाकृत खराब नमक होगा जो, छिटपुट रूप से उत्पादित किया गया होगा। सबसे बुरी से बुरी स्थिति में यह संभावना नहीं है कि, राजस्व की कोई गंभीर हानि होगी।”

इस प्रशासनिक नोट में लॉर्ड रीडिंग के समय किए गए नमक कर विरोधी आंदोलन का भी उल्लेख किया गया और यह याद दिलाया गया कि, ‘लॉर्ड रीडिंग के समय में नमक शुल्क को बढ़ाने के विरुद्ध हुए, राजनीतिक आंदोलन को, जनता के बीच आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम प्रतिक्रिया और समर्थन मिला था। शायद इसलिए कि, नमक एक बेहद जरूरी चीज तो है, पर इसकी खपत प्रतिव्यक्ति बहुत कम है। अतः कर का बोझ प्रत्यक्षतः बहुत कम पड़ता है। लोग, सामान्य परिस्थितियों में न तो इसके अस्तित्व को महसूस करते हैं और न ही इसका विरोध करते हैं।”

नमक पर आधारित एक संभावित लोकप्रिय आंदोलन के बारे में वायसराय और सरकारी तंत्र को संदेह था कि इस आन्दोलन को कोई जन समर्थन नहीं मिलेगा और ब्रिटिश सरकार, इस निष्कर्ष पर इसलिए पहुंची कि, लॉर्ड रीडिंग के समय हुये नमक कर विरोधी आंदोलन का विफल होना और गांधी की लोकप्रियता और जन स्वीकारोक्ति ब्रिटिश खुफिया सूत्रों के अनुसार, पहले जैसी नहीं थी और सांप्रदायिक मतभेद तो थे ही, और कांग्रेस भी अब क्या करना चाहिए, दुविधा में थी। लेकिन, सरकार का यह आकलन जमीनी वास्तविकता से परे था।

वायसराय ने ऐसे ही मिले, खुफिया आकलन के आधार पर, इस आंदोलन की सूचना और गांधी के पत्रों को बहुत महत्व नहीं दिया था। पर भविष्य ने गांधी के प्रति, ब्रिटिश सरकार के आकलन, को गलत साबित किया।

(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह

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महात्मा गांधी का पुनर्पाठ-दूसरा एपिसोड-कुशासन, अराजकता और अहिंसक बहिष्कार | hastakshep | हस्तक्षेप

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