नेपाली परमाणु विधेयक के भू-राजनैतिक आयाम : क्या नेपाल में संसद नहीं है या सांसद व संसदीय समिति नहीं हैं ?

Geopolitical Dimensions of Nepali Nuclear Bill: Is there no Parliament in Nepal or Member of Parliament and Parliamentary Committee?

डॉ. मेरी डेशेन, राजेंद्र महर्जन

(हिंदी अनुवाद : डॉ. पवन पटेल)

डॉ. मेरी डेशेन (Mary Des Chene) प्रख्यात मानवशास्त्री हैं

  नेपाल को ‘परमाणुसंपन्न राष्ट्र’ बनाने सम्बन्धी विधेयक हाल ही में संसद उर्फ़ प्रतिनिधि सभा में बहस के लिए लाया गया है. ‘परमाणु तथा रेडियोधर्मी पदार्थों के सुरक्षित व शांतिपूर्ण उपयोग के सन्दर्भ में रेगुलेटरी बॉडी बनाने के लिए प्रस्तावित इस विधेयक’ में गंभीर विमर्श की महती आवश्यकता है.

अन्य क्षेत्रों की तुलना में न्युक्लियर क्षेत्र में एक व्यवस्थित रेगुलेटरी बॉडी स्थापित करने का बड़ा महत्व है. वैसी संरचना स्थापित न होने तक चिकित्सा जैसे क्षेत्र में इसके छिटपुट प्रयोग के अलावा संसार के किसी भी देश में परमाणु व रेडियोधर्मी चीज़ से सम्बंधित गतिविधियाँ करने व प्रयोग करने की परिपाटी नहीं दिखाई देती. ऐसी रेगुलेटरी बॉडी स्थापित करने का सीधा अर्थ राष्ट्र के चरित्र को आधारभूत रूप में रूपांतरित कर ‘नेपाल को न्युक्लियर राष्ट्र बनाना है’.

इस विधेयक के पक्ष में पहला तर्क यह दिया गया है कि कैंसर जैसे गंभीर रोगों के उपचार और अन्य चिकित्सकीय उपयोग के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने की जरुरत है. यह विधेयक मात्र निश्चित चिकित्सकीय उपयोग को रेगुलेटरी बॉडी द्वारा नियंत्रित करने के लिए ही नहीं बल्कि न्युक्लियर टेक्नोलॉजी से जुड़े कामों के लिए भी दरवाजा खोल देता है. और तो और यह विधेयक परमाणु अस्त्र- शस्त्र के अलावा उर्जा उत्पादन व अन्य देशों के विषैले ईंधन के विसर्जन स्थल (डंपिंग ग्राउंड) बनाने के जोखिमपूर्ण प्रयोग के लिए भी दरवाजा खुला रख छोड़ता है.

सुरक्षा के नाम पर यह विधेयक भविष्य में अन्य देशों के परमाणु हथियारों को नेपाल में भण्डारण करने की गुंजाइश भी देता है और पड़ोसी देशों के आक्रामक हस्तक्षेप को भी निमंत्रित करता है.

इस तरह के ‘शांतिपूर्ण प्रयोगों’ के लिए कतिपय यूरोपीय देश इसके दुष्परिणाम भोग चुके हैं.

‘समृद्ध नेपाल सुखी नेपाली’ नाम का सरकारी नारा इस विधेयक को पारित कराने के सन्दर्भ में दिया जाने वाला दूसरा तर्क है.

नेपाल के शिक्षा एवं विज्ञान-प्रविधि मंत्री गिरिराज मणि पोखरेल के अनुसार ‘देश को समृद्धि के पथ पर ले जाने के लिए न्यूक्लियर रिसर्च रिएक्टर (परमाणु अनुसंधान भट्टी) बनाना अति आवश्यक है’.

चिकित्सकीय सेवाओं में बहुत सीमित मात्रा में रेडियो धर्मी पदार्थों के आयात व सुरक्षित उपयोग का मसला थोडा जटिल लग सकता है. लेकिन इसके लिए विधेयक प्रस्तावित करने का यह कदम व न्यूक्लियर रियक्टर (परमाणु भट्टी) लगाने की बात मानवीय तथा पर्यावरणीय नुकसान द्रष्टिकोण से देखने पर ये बातें जमीन और आसमान के सन्दर्भ में की जा रहीं दो भिन्न-भिन्न बातें प्रतीत होती हैं. एड़ी चोटी का जोर लगाकर भी इसे पास कराने में जुटे इसके समर्थकों के इस विधयेक में ऐसा कोई सरकारी व अव्यवासिक प्रावधान भी नहीं रखा गया है, लेकिन हाँ न्युक्लियर तकनीक से जुड़े व्यवसायिक उद्योग धंधे स्थापित करने के अनेकों संकेत दिए गए हैं.

इससे जुड़े कितने उद्योग धंधे नेपाल में स्थापित किये जायेंगे और इनका स्वामित्व किनके पास होगा, विधेयक इस बारे में कुछ भी नहीं कहता. विदेशी भी इसे संचालित कर सकते हैं और देश भर में जहाँ कहीं भी ऐसे न्यूक्लियर रियक्टर से जुड़े उद्योग खोल सकते हैं. संसार भर में ३०० के आस पास ऐसी परमाणु अनुसन्धान भट्टियाँ हैं. पर आज ये अपनी अंतिम साँसे गिन रही हैं.

इस समय नयी जेनरेशन की परमाणु भट्टियों के निर्माण के लिए धनी देशों की तुलना में अत्यन्त गरीब और विकासोन्मुख देशों में इन्हें स्थापित करने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ रही है. इसका सीधा अर्थ यह है कि मानवीय व पर्यावरणीय खतरों की ‘आउट सोर्सिंग’ हो रही है.

अनायास ही अब केपी ओली की कम्युनिस्ट सरकार अपने होनहार मंत्री के हाथों ऐसा असुरक्षित उपहार सौंपकर नेपाल में सुख समृद्धि की वर्षा करना चाहती है.

शोध दिखाते हैं कि जहाँ-जहाँ भी ऐसी परमाणु भट्टियाँ बनायीं गयीं हैं, वहां-वहां आतंकवादी गतिविधियों और अवैध कालाबाजारी का खतरा मंडराता रहता है. भले ही परमाणु भट्टी में कम ईंधन का प्रयोग होता हो, तथापि तब भी सामान्य तौर पर इनके कॉलेज, अस्पताल, व अनुसन्धान केन्द्रों में रखे होने की वजह से इनकी सुरक्षा में कोताही बरती जाती है और इसी कारण से न्युक्लियर रियक्टर का ईंधन विशेष निशाने पर रहता है. नेपाल सरकार न्युक्लियर रियक्टर से सम्बंधित उद्योग धंधे स्थापित करने वाले ऐसे लाइसेंसधारियों को ही उन्हें इससे उत्सर्जित विषैले पदार्थ को विसर्जित करने की जिम्मेवारी सौंपकर अपने दायित्व से पीछा छुड़ाना चाहती है. इस तरह निजी-व्यापारिक क्षेत्रों व विदेशी दाता एजेंसियों को इसका जिम्मा सौप देने पर उनके विषैले पदार्थों को मनमानी ढंग से जहाँ कहीं भी इसका विसर्जन करने की छुट मिल जाती है कि नहीं. तथा सरकार के पास इनको नियंत्रित कर दायरे में लाने और दण्डित करने की हैसियत रहती है या नहीं? इन सवालों के उत्तर मुंहबाएं खड़े हैं.

प्रस्तावित विधेयक को देखते हुए यह कल्पना करना बहुत मुश्किल काम नहीं है, कि इसमें कमीशनखोरी व भ्रष्टाचार का खुला खेल फ़र्रुखाबादी बिलकुल भी नहीं चलेगा. और देश की सीमाओं की सुरक्षा चाक चौबन्द की जायेगी और इसमें गैर मुल्की हस्तक्षेप की संभावना बिलकुल भी नहीं रहेगी. सो विधेयक के कर्णधार बिना कोई जोखिम उठाये अपनी माँद में सुरक्षित बैठे रहें.

प्रस्तावित विधेयक मोटे तौर पर तीन क्षेत्रों में गंभीर संकट पैदा कर सकता है. पर्यावरण व स्वास्थ्य में ही नहीं वरन भू-राजनीतिक मामले में नेपाल की सार्वभौम सत्ता को चुनौती दे सकता है. इसके फलस्वरूप नेपाल का नाम वैश्विक स्तर पर हस्तक्षेपों की कभी न खत्म होने वाली फ़ेहरिस्त में जुड़ सकता है.

अत्याधुनिक चिकित्सा सेवा की आड़ लेकर प्रस्तुत किया गया यह विधेयक परमाणु अनुसन्धान (न्युक्लियर रिएक्टर रिसर्च) के साथ-साथ परमाणु उर्जा उद्योग-धंधों व इनके उत्पादन के लिए भी मार्ग खोल देता है. यह अन्य देशों के नेपाल में रेडियोधर्मी पदार्थों के विसर्जन पर भी रोक नहीं लगाता. प्रस्तावित विधेयक जहाँ एक तरफ न्युक्लियर रिएक्टर से जुड़े कार्यों को नियंत्रित करने के लिए बनी एक रेगुलेटरी एजेंसी बनाने की वकालत करता है. वहीँ दूसरी तरफ इस एजेंसी की बनावट, योग्यता व विशेषज्ञों की चयन प्रक्रिया के बारे में मुँह तक नहीं खोलता. इस तरह ऐसी संरचना के न बनने तक सरकार किसी भी संस्था को इसके नियंत्रण की जिम्मेदारी दे सकती है, जो “आ बैल मुझे मार” जैसी कहावत को चरितार्थ करने जैसा है.

आजकल गरीब व विकासोन्मुख देशों में कचरा फेंकने का काम व्यापक स्तर पर एक उद्योग की शक्ल ले चुका है. विश्वव्यापी रूप में दशकों से इसके खिलाफ किये जा रहे प्रयास इस दिशा में कुछ ख़ास नहीं कर सके हैं. इस परिघटना को विशेषज्ञों ने “विषैले उपनिवेशवाद” की संज्ञा दी है. तब ऐसे उपनिवेशवाद से नेपाल कैसे बचा रह सकता है?

इन प्रश्नों के बारे में प्रस्तावित विधेयक तथा इसको संसद के पटल पर रखने वाले मंत्री महोदय मौन हैं.

हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को ऐसे विषैले कूड़ा-करकट के बारे में सचेत करना अति-आवश्यक है. सामान्यतया ऐसे न्युक्लियर प्लांट व इससे जुड़े उद्योग-धंधे कम घनत्व वाली बस्तियों तथा अति दुर्गम इलाकों में स्थापित करने का चलन है. ऐसे में सीमा क्षेत्र में रेडियोधर्मी पदार्थों की अवैध कालेबाजारी व आतंकवादी गतिविधियों का आरोप-प्रत्यारोप दो देशों के बीच भयंकर कटुता पैदा कर सकता है. इसको स्थापित करने की संभावना केवल हिमालयी क्षेत्र में ही नहीं तराई में भी हो सकती है. जहाँ अवैध कालेबाजारी, तस्करी, आतंकवादी गतिविधिओं में संलग्नता का आरोप लगाने का क्रम बहुत लम्बा चौड़ा है, इस तरह इस प्रस्तावित विधेयक से पहले से ही त्रसित मधेसी जनता के जीवन में दुःख के एक नए अध्याय की वृद्धि हो सकती है.

कम्युनिस्ट सरकार ने अपने इस कदम के बारे में बहस कराने के नाम पर एकाध स्वनामधन्य व्यक्तियों को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी (आईएईए) द्वारा काठमांडू में एक विशेष कार्यशाला आयोजित करा कर हुई. सरकार ने यह पहले से ही मान लिया कि इस कार्यशाला के एक सत्र में सभी राजनीतिक दलों व जिम्मेवार इकाइयों को ‘सांकेतिक प्रतिनिधित्व’ दिया गया है. इस प्रकार पहले से बिना किसी पूर्व सूचना के व पारदर्शी तथा व्यापक जनस्तर पर होने वाली बहस को दरकिनार कर शिक्षा, विज्ञान व प्रविधि मंत्री ने हद दर्जे की धूर्तता दिखाई है.

इस कार्यशाला में उन्होंने आस्ट्रिया के आईएईए के महानिदेशक को दिए गए अपने आश्वासन को गर्व के साथ उदघृत करते हुए कहा कि, “हम आपको यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि संसद के इस शीतकालीन सत्र में ही हम यह न्युक्लियर एक्ट पास कर लेंगे”.

राजेंद्र महर्जन (Rajendra Maharjan) नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

एकात्मक केंद्रीकृत राज्य के स्थान पर बने संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र व ‘समाजवाद उन्मुख संविधान’ लागू करने के लिए लड़ने वाला व्यक्ति द्वारा ऐसी प्रतिबद्धता व्यक्त करना उसके राजनीतिक अधःपतन की ओर इशारा करता है. क्या नेपाल में संसद नहीं है? या सांसद व संसदीय समिति नहीं हैं. यदि ऐसा है तो उनकी यह उपेक्षा कहाँ तक उचित है? क्या इसमें प्रदेशों तथा स्थानीय निकायों की कोई सहमति का मोई मतलब नहीं?

मंत्री महोदय ने आईएईए की स्थापना काल के समय बने घोषणापत्र के मूल उद्देश्यों व लक्ष्यों से अपनी सहमति दिखाई है. नेपाल में उसे लागू करने के लिए वे यह मानते हैं कि देश के नागरिकों को मात्र न्युक्लियर प्रविधि के सकारात्मक पक्षों की ही वकालत करनी चाहिए. आईएईए का मूल उद्देश्य है- न्युक्लियर प्रविधि को संसार के कोने-कोने में तथा जीवन के हरेक क्षेत्र में विस्तार करना. विश्लेषकों के अनुसार, इसी वजह से यह संस्था न्युक्लियर उद्योगपतियों की दलाल संस्था के नाम से जानी जाती है.

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(दो भागों में लिखा गए इस लेख का पहला भाग “नेपालमा आणविक उद्योग” नामक शीर्षक से 9 जनवरी, 2019 को नेपाली अखबार कांतिपुर दैनिक में प्रकाशित हुआ था. पटना से निकलने वाली हिंदी पत्रिका फिलहाल के जनवरी, २०२० अंक में इसके दोनों भाग प्रकाशित हुए हैं. नेपाल में अमेरिकन प्रोजेक्ट एमसीसी के खिलाफ अभी हो रहे देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के सन्दर्भ में यह लेख प्रासंगिक है. डॉ. मेरी डेशेन प्रख्यात मानवशास्त्री हैं व राजेंद्र महर्जन नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

 

 

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