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ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 : भारत शीर्ष दस देशों में शामिल

Global Climate Risk Index 2021: India ranks in the top ten countries

हमारे आपके समाज में आज भी ऐसे तमाम लोग हैं जो जलवायु परिवर्तन को अपनी समस्या नहीं मानते और किसी दूर देश की परेशानी समझते हैं। लेकिन ऐसे लोगों के लिए आज जारी ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 यक़ीनन हैरान करने वाला होगा।

क्या है ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स

क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स इंडेक्स बताता है कि जलवायु परिवर्तन (Climate change,) को ले कर कौन सा देश कितने ख़तरे में है। तो बात जब जलवायु परिवर्तन की वजह से उपजे ख़तरों की हो तो आपको जान कर हैरानी होगी कि इन ख़तरों के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष दस देशों में शामिल है।

ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 : सातवें पायदान पर भारत

भारत जलवायु जोखिम सूचकांक की सातवीं पायदान पर है और मोजाम्बिक यहाँ शीर्ष पर है। भारत के ऊपर हैं ज़िम्बाब्वे, जापान, और पांचवा मलावी जैसे देश। शीर्ष के पांच देशों में तीन अफ्रीका से हैं।

जहाँ मोज़ाम्बीक, ज़िम्बाब्वे और बहामास को भारी तूफानों और उनके सीधे प्रभाव ने 2019 में सबसे ज़्यादा चोट पहुंचाई, वहीँ पोर्ट-रिको, म्यांमार और हैती में 2000 – 2019 की अवधि में सबसे अधिक मौसम संबंधी नुकसान हुआ।

दुनिया भर में दिखाई देते हैं जलवायु परिवर्तन के प्रभाव (The effects of climate change are visible worldwide)

विकासशील देशों में कमज़ोर लोग/समूह तूफान, बाढ़ और गर्मी की लहरों जैसी चरम मौसम की घटनाओं से सबसे अधिक पीड़ित होते हैं, जबकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दुनिया भर में दिखाई देते हैं। दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर में सबसे घातक और महंगे उष्णकटिबंधीय चक्रवात (tropical cyclone) इडाई, को संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस द्वारा “अफ्रीका के इतिहास में सबसे खराब मौसम से संबंधित तबाही में से एक” करार दिया गया। इसने विनाशकारी क्षति और मानवीय संकट पैदा किया, जिससे मोज़ाम्बीक और ज़िम्बाब्वे, 2019 में, दो सबसे अधिक प्रभावित देश रहे। तूफान डोरियन की तबाही के उपरांत बहामास तीसरे स्थान पर है। पिछले 20 वर्षों (2000 – 2019) में, पुएर्टो रीको, म्यांमार और हैती ऐसे मौसम की घटनाओं के प्रभावों से सबसे अधिक प्रभावित देश थे।

ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 (वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक 2021) के कुछ मुख्य नतीजे आज अंतर्राष्ट्रीय जलवायु अडाप्टेशन शिखर सम्मेलन शुरू होने से कुछ घंटे पहले, पर्यावरण थिंक टैंक जर्मन वॉच द्वारा प्रकाशित किए गए हैं।

भारत का इस सूचकांक में जगह बनाने पर भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी के रिसर्च डायरेक्टर और एडजंक्ट एसोसिएट प्रोफेसर, IPCC (आईपीसीसी) की महासागरों और क्रायोस्फीयर पर विशेष रिपोर्ट के कोऑर्डिनेटिंग लीड (प्रमुख) लेखक, और IPCC की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट के वर्किंग ग्रुप 2 में लीड लेखक, डॉ.अंजल प्रकाश, कहते हैं,

“यह जानना आश्चर्यजनक नहीं है कि भारत 2021 के वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक में शीर्ष 10 सबसे प्रभावित देशों में शामिल है। भारत पारिस्थितिकीय विविधता से धन्य है – ग्लेशियर, ऊंचे पहाड़, लंबी तटरेखा और साथ ही बड़े पैमाने पर अर्ध-शुष्क क्षेत्र जो जलवायु परिवर्तन के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से चक्रवातों की आवृत्ति में वृद्धि, ग्लेशियरों के पिघलने की गति में तेज़ी, और हीटवेव हो रहें हैं।”

वो आगे कहते हैं,

“अधिकांश भारतीय आबादी कृषि पर निर्भर है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इस वर्ष, भारत ने अपने कई शहरों को मानसून प्रणाली की परिवर्तनशीलता के कारण डूबते देखा। IPCC रिपोर्ट सहित कई वैश्विक रिपोर्टें साल दर साल इस ओर इशारा करती रहीं हैं।

अपनी बात को विस्तार देते हुए डॉ प्रकाश एक सवाल उठाते हुए कहते हैं,

“अपने लोगों की सुरक्षा के लिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के ख़िलाफ सरकार की प्रतिक्रिया की कमी क्या है? 2008 में एक राष्ट्रीय अडॉप्टेशन योजना तैयार की गई थी, जिसके बाद राज्य की योजनाएं बनाई गई थी। पर अधिकांश योजनाओं में संसाधनों की कमी है, इसलिए वे जिला विकास और आपदा जोखिम में कमी लाने की योजनाओं में एकीकृत हो जाती हैं। वो समय आ चूका है कि सरकार इस जानकारी का अधिक विभाजन करने के लिए भारत के राज्य / ज़िला विशिष्ट जलवायु-जोखिम मानचित्रों को आयोगित करती है ताकि यह समझ सकें कि किन क्षेत्रों पर औरों से ज़्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है।”

इस सूचकांक पर जर्मन वाच के डेविड एकस्टीन कहते हैं,

“ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स से पता चलता है कि ग़रीब और कमज़ोर देश चरम मौसम की घटनाओं के परिणामों से निपटने में विशेष रूप से बड़ी चुनौतियों का सामना करते हैं। उन्हें वित्तीय और तकनीकी सहायता की तत्काल आवश्यकता है। इसलिए, हाल के अध्ययनों से ये पता चलना कि, पहले, औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा प्रतिज्ञा किया गया 100 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष का लक्ष्य नहीं पहुँचा जाएगा, और दूसरा यह कि जलवायु अनुकूलन के लिए इसका केवल एक छोटा सा अनुपात प्रदान किया गया है। आज से शुरू होने वाले जलवायु अडाप्टेशन शिखर सम्मेलन को इन समस्याओं का समाधान करना चाहिए।”

2000 और 2019 के बीच सबसे अधिक प्रभावित दस देशों में से प्रति व्यक्ति कम या निम्न मध्यम आय वाले विकासशील देश हैं।

Poor countries suffer the most

जर्मनवाच की वेरा कुएन्ज़ेल बताती हैं,

गरीब देशों को सबसे ज़्यादा हानि पहुँचती है क्योंकि वे खतरों के हानिकारक प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं और उनकी क्षमता कम होती है। हैती, फिलीपींस और पाकिस्तान जैसे देश बार-बार चरम मौसम की घटनाओं की चपेट में हैं और अगली घटना के होने से पहले उन्हें पूरी तरह से ठीक होने का समय नहीं मिलता है। इसलिए, उनके लचीलेपन को मजबूत करने के लिए, न केवल अडाप्टेशन को संबोधित करना चाहिए, बल्कि नुकसान और नुकसान से निपटने के लिए आवश्यक सहायता भी प्रदान करना चाहिए। ”

2000 से लगभग 480.000 लोग 11.000 से अधिक चरम मौसम की घटनाओं के परिणामस्वरूप मारे गए

पिछले 20 वर्षों में, वैश्विक रूप से लगभग 480.000 घातक परिणाम सीधे तौर से 11.000 से अधिक हुई चरम मौसम की घटनाओं से जुड़े थे। आर्थिक क्षति लगभग यूएस-डॉलर 2.56 ट्रिलियन (क्रय-शक्ति समता, पीपीपी (पर्चासिंग पावर पैरिटी), में गणना की गई) – एक वर्ष पहले की तुलना में फिर से वृद्धि।

तूफान और उनके प्रत्यक्ष निहितार्थ Hurricanes and their direct implications

प्रेसिपीटशन (वर्षा, बर्फ़ आदि की पड़ी मात्रा), बाढ़ और भूस्खलन – 2019 में क्षति के प्रमुख कारण थे। 2019 में दस सबसे अधिक प्रभावित देशों में से छह उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से प्रभावित थे। हाल के विज्ञान से अनुमानित है कि न केवल गंभीरता, बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में वृद्धि के हर दसवें डिग्री के साथ गंभीर उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या में वृद्धि होगी।

जर्मनवाच की लॉरा शेफर कहती हैं,

“वैश्विक कोविड-19 महामारी ने इस तथ्य को दोहराया है कि कमज़ोर देश विभिन्न प्रकार के जोखिम – जलवायु, भूभौतिकीय, आर्थिक और स्वास्थ्य से संबंधित – के संपर्क में हैं और यह भेद्यता प्रणालीगत है और परस्पर संबंधित है। इसलिए इन अंतर्संबंधों पर ध्यान डालना महत्वपूर्ण है। देशों की जलवायु लचीलापन को मज़बूत करना इस चुनौती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जलवायु अडाप्टेशन शिखर सम्मेलन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने का अवसर प्रदान करता है।”

बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी से जलवायु वैज्ञानिक और जल और बाढ़ प्रबंधन संस्थान के निदेशक, डॉ. एम. शाहजहां मोंडल, ने कहा,

“बांग्लादेश, अपने भूभौतिकीय स्थान की वजह से, हमेशा चरम मौसम की घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील रहा है। हमारा देश हिमालयी क्षेत्र और तीन विशाल नदियों (पद्मा, जिसे भारत में गंगा कहा जाता है, मेघना और जमुना) के नीचें बहाव की ओर में है, जो मानसून के मौसम में उत्तर की ओर से सभी बाढ़ के पानी को नीचे ले आतें है, जिससे विनाशकारी बाढ़ आती है। सबसे हाल ही में 2020 में, हमने ऐसी विनाशकारी बाढ़ का अनुभव किया जिसमें देश का एक चौथाई से अधिक हिस्सा पानी के भीतर हो था।

दूसरी ओर, बंगाल की खाड़ी, दुनिया का सबसे बड़ा जल क्षेत्र है जिसे खाड़ी कहा जाता है, और उष्णकटिबंधीय चक्रवात जो विशेष रूप से इस फ़नल-आकार की खाड़ी में बनते हैं, घातक होते हैं। पिछले साल हमने चक्रवात एम्फैन का अनुभव किया था, जो 270 किमी प्रति घंटे की हवा की गति के साथ सबसे शक्तिशाली में से एक था, और सबसे महंगा [में से एक] था, इसमें कुल नुकसान का अनुमान यूएस $ 13 बिलियन से अधिक था। यह वैज्ञानिक प्रमाणों से स्पष्ट है कि ग्लोबल वार्मिंग ऐसे चरम चक्रवातों के साथ-साथ अनियमित और लंबे समय से होने वाली बारिश का एक कारण है।”

आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि जर्मनवॉच सालाना ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स की गणना के लिए म्यूनिख रे पुनर्बीमा कंपनी की नैटकैटसर्विस डाटाबेस और अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष (IMF) के सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों से अपना डेटा प्राप्त करता है। भले ही बढ़ते नुकसान और घातकताओं का मूल्यांकन इन घटनाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर सरल निष्कर्ष की अनुमति नहीं देता है, यह भारी आपदाओं की वृद्धि को दर्शाता है और राज्यों और क्षेत्रों की प्रभावितता का एक अच्छा अनुमान देता है। 2006 से 2019 तक जर्मनवॉच ने वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन (सीओपी/कौप) में सूचकांक प्रस्तुत किया है, सीओपी/कौप 26 के स्थगन के कारण इस बार सूचकांक को जलवायु अडाप्टेशन शिखर सम्मेलन से ठीक पहले प्रकाशित किया गया है।

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