कॉर्पोरेट के खिलाफ किसानों का पहला आंदोलन, किसान समझ गया सरकार की पूंजीपतियों के साथ गिरोहबंदी

Bharat Bandh Farmers on the streets throughout Chhattisgarh

The first agitation of the farmers against the corporate, the peasants understood the government’s gangbing with the capitalists

तेरे वादे पर जिये हम….

किसानों से सरकार के वादे | Government promises to farmers

किसान कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन (Movement of farmers against farmer laws) दिन प्रति दिन तेज होता जा रहा है। यह आंदोलन सरकार के खिलाफ तो है ही, सरकार की पीठ पर हांथ रखे कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ भी होता जा रहा है। इससे यह बात साबित हो रही है कि, किसान या जनता अब यह समझने लगी है कि, सरकार का झुकाव, जनहित में नहीं बल्कि कॉरपोरेट और उसमें भी कुछ चुनिंदा पूंजीपति घरानों की ओर है।

किसानों का यह विरोध सरकार के खिलाफ तो है, साथ ही, यह सरकार के साथ दुरभिसंधि करके सरकार के क्रोनी बन चुके गिरोहबंद पूंजीवाद के खिलाफ हो गया है।

खबर आ रही है कि, पंजाब के किसानों ने रिलायंस के मॉल, पेट्रोल पंप और उनके आउटलेट पर कब्ज़ा कर लिया है। यही काम किसानों ने अडानी के बन रहे अनाज के गोदामों पर भी किया है। हो सकता है यह प्रतिरोध प्रतीकात्मक ही हो, पर यह प्रतीक भी पहली बार ही नज़र आया है।

कॉर्पोरेट के खिलाफ किसानों का यह पहला आंदोलन है | This is the first agitation of farmers against corporate.

किसान अब यह बात समझ रहा है कि सरकार बिचौलियों को खत्म करने की आड़ में पूरा कृषि उत्पाद, अपने कॉरपोरेट मित्रों को सौंप देना चाहती है। सरकार किसान और मजदूर विरोधी है। 2014 के बाद सत्ता के आते ही, सरकार, पहला विधेयक भूमि अधिग्रहण का लेकर आयी थी। उस विधेयक का प्रबल विरोध हुआ और उसे सरकार को वापस लेना पड़ा। फिर जिओ को प्रोमोट करने के लिये बीएसएनएल को धीरे-धीरे बर्बादी की राह पर लाया गया। अन्य निजी क्षेत्र की टेलीकॉम कंपनियों को भी नुकसान उठाना पड़ा।

पहले भी सरकारें पूंजीपतियों के हित में काम करती थीं। पूंजीपतियों के समूह, सरकार को घेरे रहते थे। पर अब तो लगता है कि सरकार का हर कदम कुछ चुने हुए पूंजीपति घरानों के हित मे ही उठता है। एयरपोर्ट, रेलवे, बंदरगाह, बड़ी बड़ी सरकारी कंपनिया जो लंबे समय से लाभ कमा रही हैं, इन कॉरपोरेट लुटेरों को औने पौने भाव बेच दी जा रही हैं। अब यही कृत्य खेती के कॉरपोरेटीकरण के रूप में सामने आ रहा है।

पिछले सालों में किसानों से बहुत से वादे किए गए पर वे वादे या तो अधूरे रहे या सरकार ने उनपर कोई काम भी नहीं किया। इन वादों पर आर्थिक पत्रकार पी. साईंनाथ ने लगातार लिखा है। उनके और श्रुति जनार्थन के कुछ लेखों के आधार पर किसानों से किये गए वायदों की एक समीक्षा इस लेख में प्रस्तुत है।

वादों की इस फेहरिस्त में कुछ वादे अभी कागज़ों पर हैं तो कुछ आधे अधूरे तो कुछ जुमलों में बदल गये हैं। अपने ही किये वादों के प्रति सरकार का रवैया, सरकार की किसानों के प्रति उसके लापरवाही भरे दृष्टिकोण को बताता है।

जानिए किसानों से सरकार के वादे

वादा-1: कृषि और ग्रामीण विकास में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना।

सरकार ने ग्रामीण विकास में सार्वजनिक निवेश (Public Investment in Rural Development) को बढ़ाने का वादा किया था लेकिन यह वादा अब तक आधा अधूरा ही रहा। 30 जनवरी 2019 को, मिंट वेबसाइट में छपे एक लेख के अनुसार, कुल बजट के एक हिस्से के रूप में ग्रामीण मंत्रालयों पर सार्वजनिक खर्च, बजट के अंतर्गत कुछ बढ़ा है। लेकिन यह इतना नहीं है कि यह वादा पूरा किया जा सके। .

वादा-2: उत्पादन लागत पर न्यूनतम 50 प्रतिशत लाभ सुनिश्चित करना।

यह वादा अब तक केवल काग़ज़ों पर ही है। 2018-19 के बजट में, मोदी सरकार ने किसानों के लिए, अनाज का, उत्पादन लागत से 50 प्रतिशत ऊपर का न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एमरसपी ) बढ़ाने का वादा किया था। हालांकि, इसमें भुगतान लागतों की प्रतिबंधात्मक परिभाषा का उपयोग करके उत्पादन लागत की गणना की गयी। व्यापक लागतों का उपयोग करने के बजाय, जिसे सी 2 के रूप में जाना जाता है, परिवार के श्रम की प्रतिबाधित लागत, जिसे ए 2 + एफएल के रूप में जाना जाता है, का उपयोग किया गया। 2018-19 के खरीफ सीजन के लिए, इसका मतलब यह था कि अधिकांश फसलों के लिए एमएसपी सी 2 से तीन और बाईस प्रतिशत के बीच थी, जबकि एक मात्र बाजरा 50 प्रतिशत लाभ के साथ-साथ सी 2 से 47 प्रतिशत अधिक है.

अब समझिये सी 2 क्या है ? Now understand what is C2?

इसमें कि‍सान की ओर से किया गया सभी तरह का भुगतान चाहे वह कैश में हो या कि‍सी वस्‍तु की शक्‍ल में, बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई का खर्च जोड़ा जाता है।

2+एफएल : इसमें ए2 के अलावा परि‍वार के सदस्‍यों द्वारा खेती में की गई मेहतन का मेहनताना भी जोड़ा जाता है.

सी-2 कंप्रेहेंसिव लॉस : यह लागत ए2+एफएल के ऊपर होती है। लागत जानने का यह फार्मूला किसानों के लिए सबसे अच्छा माना जाता है. इसमें उस जमीन की कीमत (इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कॉस्‍ट) भी जोड़ी जाती है जिसमें फसल उगाई गई. इसमें जमीन का कि‍राया व जमीन तथा खेतीबाड़ी के काम में लगी स्‍थाई पूंजी पर ब्‍याज को भी शामि‍ल कि‍या जाता है. इसमें कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है.

हालांकि, डबलिंग फार्मर्स इनकम कमेटी ( डीएफआई ) के सदस्य विजय पाल तोमर के अनुसार, कोई कुछ भी कहे सरकार तो सी2+50 प्रतिशत फार्मूले से ही फसलों का एमएसपी दे रही है। जो लागत तय करने का फार्मूला है वह आजादी के बाद से ही चल रहा है। उसके ऊपर स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के आधार पर 50 फीसदी और उससे अधिक मुनाफा तय करके सरकार एमएसपी दे रही है।

लेकिन, सरकार का वादा और किसानों की मांग दोनों ही एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का है, जो अब तक अधूरा है।

वादा-3: सस्ती कृषि लागत उपलब्ध करना.

सरकार ने इनपुट लागत पर किसानों को तीन तरीकों से चोट पहुंचाई है। अपने पहले वर्ष में यूरिया आयात को घटाया, जिससे हाल के वर्षों में इसमें सबसे अधिक कमी आई; उच्च अंतर्राष्ट्रीय कीमतों और कमजोर रुपए के कारण बढ़ती उर्वरक कीमतें; और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद ईंधन की कीमतें कम नहीं हुई हैं। इससे कृषि लागत को सस्ता करने की बात तो छोड़ ही दीजिए, सरकार ने लागत और बढ़ा दी है।

वादा-4: मनरेगा को कृषि से जोड़ना.

यह वादा अब तक नहीं निभाया गया है। मनरेगा को कृषि से नहीं जोड़ा गया है। नीति आयोग ने ऐसा करने के लिए इसकी व्यवहारिकता की जांच के लिए मुख्यमंत्रियों की सात-सदस्यीय समिति का गठन किया था। उनकी सिफारिश भी सरकार को मिल गयीं, लेकिन उन सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

वादा-5: बुजुर्ग और सीमांत किसानों, और खेत मजदूरों के लिए कल्याणकारी उपाय करना.

मोदी सरकार द्वारा इस वादे को पूरा करने के लिये कोई भी कदम नहीं उठाया गया है।

वादा-6: कम पानी की खपत वाली फसलों में, सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना.

यह वादा भी आधा-अधूरा रहा। 1 जुलाई 2015 को सरकार ने देश में हर खेत में सिंचाई सुनिश्चित करने के लिए निवेश योग्य क्षेत्र का विस्तार करने और पानी तक पहुंच के उद्देश्य से प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना शुरू की। 5300 करोड़ रुपए के शुरुआती परिव्यय के साथ परियोजना को पांच साल की अवधि के लिए 50000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। भूमि संसाधन विभाग इस योजना के तहत 39 राज्यों में 39.07 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले 8,214 जल-विकास कार्यक्रमों को लागू कर रहा है। लेकिन इसका लाभ क्या हुआ, यह सरकार आज तक बता नहीं पा रही है।

वादा-7 : मृदा-मूल्यांकन-आधारित फसल योजना शुरू करना और मोबाइल मृदा-परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित करना।

फरवरी 2015 से मोदी सरकार दो साल में एक बार सभी किसानों को मृदा-स्वास्थ्य कार्ड जारी करती है। गुजरात के अनुभव से निर्मित इस योजना के पीछे यह विचार था कि किसान मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी का अच्छा उपयोग करेंगे और उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की आवश्यकता के अनुसार होगा। अधिकांश राज्यों ने इस योजना के लिए केवल हल्की प्रतिक्रिया दिखाई है। परिणामस्वरूप, उर्वरक की उपयुक्त खुराक के आवेदन के अपेक्षित लाभ अर्जित नहीं हुए हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और बिहार ने मिट्टी के नमूनों के परीक्षण में खराब प्रदर्शन किया है।

वादा-8 : कीट-प्रबंधन और नियंत्रण कार्यक्रमों को पुन: प्रस्तुत करना.

यह वादा अभी कागज़ों पर ही है। सरकार द्वारा कीट-प्रबंधन और नियंत्रण कार्यक्रमों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया गया है। 3 अप्रैल 2018 को लोकसभा में उठाए गए एक प्रश्न के जवाब में सरकार के जवाब के अनुसार, सरकार भारत योजना में कीट प्रबंधन दृष्टिकोण के सुदृढ़ीकरण और आधुनिकीकरण को लागू कर रही थी, जिसे मनमोहन सिंह सरकार ने पेश किया था।

वादा-9 : खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की स्थापना को लागू करना और प्रोत्साहित करना।

यह वादा भी आधा-अधूरा रहा है। 3 मई 2017 को कैबिनेट ने कृषि-समुद्री प्रसंस्करण और कृषि-प्रसंस्करण समूहों के विकास के लिए योजना या संपदा को मंजूरी दी। 2016—20 में 6000 करोड़ रुपए के आवंटन के साथ खाद्य-प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने के लिए मौजूदा उपायों को शामिल करते हुए एक विस्तृत योजना बनाई गयी।

वादा-10 : भारत की जैविक खेती और उर्वरक निगम की स्थापना।

यह वादा अभी कागजों पर ही है। सरकार ने ऐसा कोई निगम अब तक स्थापित नहीं किया है।

वादा-11 : हर्बल उत्पादों के लिए चक्रीय खेती का परिचय।

हर्बल उत्पादों के लिए चक्रीय खेती को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने अब तक कोई पहल नहीं की है।

वादा-12 : फसल नुकसान का ख्याल रखने के लिए खेत-बीमा योजना लागू करना.

2016 में, सरकार ने मौजूदा फसल बीमा योजनाओं को प्रधान मंत्री बीमा योजना के साथ बदल दिया। इसे पुरानी योजना की सभी कमियों को दूर करते हुए इस नई योजना में, पहले की योजनाओं की सर्वोत्तम विशेषताओं को शामिल करते हुए विज्ञापित किया गया था। वेबसाइट स्क्रॉल की एक रिपोर्ट के अनुसार, योजनाओं के लिए नामांकन संख्या शुरू में अधिक होने के बावजूद, वे बाद के वर्ष में कम हो गई। इसका लाभ किसानों को नहीं मिल पाया।

वादा-13 : ग्रामीण ऋण सुविधाओं को मजबूत करना और उनका विस्तार करना।

9 मार्च 2018 को, लोकसभा में उठाए गए एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने बताया कि, भारतीय रिजर्व बैंक ने घरेलू वाणिज्यिक बैंकों को छोटे और सीमांत किसानों के लिए आठ प्रतिशत के उप-लक्ष्य के साथ कृषि के प्रति अपने समायोजित नेट बैंक ऋण का 18 प्रतिशत प्रत्यक्ष प्रदान करने का निर्देश दिया। सरकार ने ऋण के लिए ब्याज-सबमिशन योजनाएं भी शुरू कीं, जिसमें तीन लाख रुपए तक के ऋण की ब्याज दर सात की बजाय पांच प्रतिशत थी। इसके अलावा समय पर किश्तों को चुकाने वाले किसानों के लिए अतिरिक्त तीन प्रतिशत-बिंदु प्रोत्साहन को भी शामिल किया गया।

वादा-14: बागवानी, फूलों की खेती, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन और मछली पालन को बढ़ावा देना.

मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर के तहत चार हेक्टेयर तक के खेतों को सब्सिडी प्रदान की जाती है। एमआईडीएच के तहत, मधुमक्खी पालन और फूलों की खेती के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाती है. 2016 में, मोदी सरकार ने किसानों के लिए विदेशी प्रत्यक्ष-निवेश की सीमा को बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया। लेकिन इसका धरातल पर कोई लाभ नहीं हुआ है।

वादा-15: मछुआरों के कल्याण के लिए उपाय (Measures for the welfare of fishermen) करना।

2017 में, सरकार ने नीली क्रांति (Blue revolution) के नाम से, एक व्यापक योजना शुरू की थी, जो मौजूदा योजनाओं, जैसे मछुआरों के कल्याण पर राष्ट्रीय योजना, और अंतर्देशीय मत्स्य पालन और जलीय कृषि, समुद्री मत्स्य पालन और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए लक्ष्यों सम्मिलित करती है। लेकिन यह भी अभी कागज़ों पर ही है।

वादा-16 : क्लस्टर आधारित भंडारण प्रणाली बनाना।

सरकार ने क्लस्टर आधारित भंडारण प्रणाली (Cluster based storage system) बनाने के लिए कोई उपक्रम नहीं किया है.

वादा-17: एक उपभोक्ता-अनुकूल किसानों के बाजार की अवधारणा को प्रस्तुत करना।

प्रधानमंत्री ने 2016 में ई-एनएएम के रूप में ज्ञात एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (Electronic trading platform) के रूप में राष्ट्रीय कृषि बाजार का शुभारंभ किया है, जो कार्यरूप में नहीं हो पाया है।

वादा-18: एपीएमसी अधिनियम में सुधार।

24 अप्रैल 2017 को, सरकार ने एक मॉडल कृषि उपज और पशुधन विपणन (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम जारी किया, जिसने कृषि-उपज विपणन समितियों के कामकाज में सुधार किया. कई राज्यों ने मॉडल कानून को ध्यान में रखते हुए अपने एपीएमसी कानून में संशोधन (Amended apmc law) किया है। लेकिन इन तीन किसान कानूनों ने एपीएमसी के सिस्टम को ही संदेह के घेरे में ला दिया है।

वादा-19: बीज-संस्कृति और कृषि-नवाचार प्रयोगशाला स्थापित करने के लिए राज्यों के साथ मिलकर काम करना।

23 अक्टूबर 2018 को इकोनॉमिक टाइम्स ने बताया कि कृषि मंत्रालय बीज-परीक्षण प्रयोगशालाओं की संख्या 130 से बढ़ाकर 7183 करने की योजना बना रहा था। हालांकि, प्रयोगशालाओं की स्थापना पर कोई प्रगति नहीं हुई है, और 2019-20 के अंतरिम बजट में इन उपायों का उल्लेख नहीं किया गया था यह वादा कागज़ पर ही है।

वादा-20: क्षेत्रीय किसान टीवी चैनल स्थापित करना.

26 मई 2015 को, दूरदर्शन ने किसानों के लिए समर्पित एक टेलीविजन चैनल डीडी किसान का शुभारंभ किया है, पर क्षेत्रीय चैनल स्थापित नहीं किए गए हैं।

वादा-21: ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन को उच्च प्राथमिकता देना.

26 जुलाई 2018 को, लोकसभा में उठाए गए एक प्रश्न के सरकार के जवाब के अनुसार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, दीनदयाल अंत्योदय योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम को लागू करके ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी (Poverty in rural areas) को कम करने के लिए काम कर रही है. ये सभी योजनाएं पिछली सरकारों के तहत शुरू की गई थीं। इनसे कितनी गरीबी कम हुयी है इसका कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है।

वादा-22 : वैज्ञानिक मूल्यांकन के बिना आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य पदार्थों को अनुमति नहीं देना.

सरकार ने आनुवंशिक रूप से संशोधित भोजन के वैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए एक व्यापक प्रक्रिया स्थापित नहीं की है। 9 मार्च 2018 को लोकसभा में उठाए गए एक प्रश्न के जवाब में सरकार के अनुसार, जीएम फसलों की मामले दर मामले की जांच की जाती है, जैसे विभिन्न संस्थानों, संस्थागत जैव सुरक्षा समिति, आनुवांशिक कार्यसाधन पर समीक्षा समिति और जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति, उपलब्ध से पहले उत्पाद की समीक्षा करना. जीएम फसलों को अभी भी पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के नियमों के तहत विनियमित किया जाता है। लेकिन धरातल पर यह नहीं है।

वादा-23: एक राष्ट्रीय भूमि-उपयोग नीति अपनाना।

कृषि मंत्रालय ने 2015 में राष्ट्रीय भूमि-उपयोग नीति का मसौदा (Draft national land use policy) तैयार किया, लेकिन इसके आगे इस मामले में कुछ भी नहीं हो पाया। यह वादा अधूरा है।

इन वादों से एक बात तय है कि सरकार ने भारी भरकम और आकर्षक नाम वाली योजनाओं को शुरू तो किया पर उसका लाभ किसानों को नहीं पहुंच पाया। इससे किसानों के मन में सरकार के खिलाफ अविश्वास पैदा हुआ और इसीलिए आज जब सरकार यह कह रही है कि मंडियां खत्म नहीं होंगी औऱ एमरसपी जारी रहेगी तो किसानों को भरोसा नहीं हो रहा है और वे इसे कानून में लिखत पढ़त में चाहते हैं।

सरकार कॉरपोरेट घरानों के हित में, श्रम कानूनों में बदलाव कर रही है, खेती और किसानों को चौपट करने के लिये किसान विरोधी और पूंजीपति वर्ग के हित में नए कानून पारित कर चुकी है, कह रही है एमएसपी जारी रहेगी, पर इस वादे को कानून में शामिल नहीं कर रही है। आवश्यक वस्तु अधिनियम ईसी एक्ट को संशोधित कर के जमाखोरी को बढ़ावा दे रही है। सरकार का हर कदम जनविरोधी और हर सांस कॉरपोरेट के हित में दिख रही है।

न सिर्फ किसानों को, बल्कि मजदूरों, और संगठित क्षेत्र के उन कामगारों को भी निजीकरण की आड़ में संविदा कर्मी के रूप में बदल देने का दुष्चक्र चल रहा है। इस संगठित दुष्चक्र के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना पड़ेगा। अन्यथा यह देश कुछ चंद गिरोहबंद पूंजीपतियों की निजी जागीर बन कर रह जायेगा। सरकार तो उनके समक्ष नतमस्तक और साष्टांग हो ही चुकी है।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

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