यहां किसान आंदोलन कर नहीं रहे हैं, आंदोलन को जी रहे हैं

A report from the Kisan Andolan Tikari Border : वैसे पकोड़े वाला रोजगार नौजवानों को मोदी साहब ने ही तो दिया था। अब मोदी के दरवाजे पर आकर पकौड़ों का डैमो नौजवान देने आए हुए हैं तो साहब डर कर बिल में छुपे हुए हैं।

किसान आंदोलन : टिकरी बॉर्डर दिल्ली से एक रिपोर्ट……

दिल्ली के बॉर्डर से बहादुरगढ़ बाईपास (दिल्ली के बॉर्डर से बहादुरगढ़ बाईपास) तक बीस किलोमीटर में फैला आंदोलनकारी किसानों का काफिला। काफिले में आये हुए अलग-अलग गांव के किसान, जिन्होंने अपने लाव-लश्कर सत्ता की सड़क पर डाले हुए हैं। किसान जो गरीब भारत का हिस्सा है। किसान जो मेहनत करके पूरे मुल्क का पेट भरता है। किसान और मिट्टी जो पर्यायवाची शब्द हैं, वो लुटेरी दिल्ली की सत्ता से खुद को व अपनी मिट्टी को बचाने के लिए युद्ध के मैदान में आ डटा है। किसान दिल्ली की सत्ता को ललकार रहा है, उसका साफ ऐलान है सत्ता को, किसान सत्ता के शिकारी दांतों और पंजों को तोड़े बिना वापिस नहीं जाएगा।

यहां किसान आंदोलन कर नहीं रहे है, आंदोलन को जी रहे है

किसानों के टेंट बहादुरगढ़ बाईपास से थोड़ा पहले से ही शुरू हो जाते हैं।

आज की शुरुआत हरियाणा के भिवानी जिले के मिताथल गांव के टेंट से खाने से हुई।

ठेठ हरियाणवी खाना, साथ में लस्सी, खाने के बाद हरियाणा के किसानों की शान हुक्का मिल जाए तो सोने पर सुहागा। बड़े ही प्यार से मिताथल गांव के किसानों ने हमको खाना खिलाया। उनके भोजन और प्यार का जितना धन्यवाद किया जाए शायद कम ही होगा। मेरे पड़ोसी गांव कुम्भा वालों का भी टेंट पास में ही था, वो ताश खेलने में मशगूल थे।

खाने के बाद आगे बढ़े तो चौक पर मेडिकल कैम्प व लंगर चलता मिला। थोड़ा ओर आगे बढ़े तो चाय पकौड़े की सेवा चल रही थी। उसके बाद आगे गर्म-गर्म जलेबी थुराना (हांसी) वालों ने बड़े प्यार से खिलाई। जलेबी खा ही रहे थे कि एक pikp गाड़ी वाला ताजा मेथी व धनिया बांट रहा था। गाड़ी वाला जो अपने खेत से मेथी-धनिया किसानों के लिए लेकर आया था। उसको भी गर्म-गर्म जलेबी खिलाई गयी। आगे एक गाड़ी वाला गोभी बांट रहा था तो एक ट्रेक्टर वाला मूली बांट रहा था। लस्सी-दूध बांटने वाली गाड़ियां भी सुबह-सुबह अपना काम कर जाती हैं। सब्जी, दूध, लकड़ी, लस्सी बांटने वाले ये सभी किसान दिल्ली के साथ लगते गांव से आते हैं जो इस आंदोलन में अपनी सेवा दे रहे हैं।

ऐसे ही प्रत्येक आधा किलोमीटर पर किसी न किसी ने कुछ खाने की सेवा लगाई हुई थी। कोई चाय-पकौड़ा खिला रहा था तो कोई गर्म जलेबियां खिला रहा था। वैसे पकोड़े वाला रोजगार नौजवानों को मोदी साहब ने ही तो दिया था। अब मोदी के दरवाजे पर आकर पकौड़ों का डैमो नौजवान देने आए हुए हैं तो साहब डर कर बिल में छुपे हुए हैं।

Ground Report From Tikri Border | टिकरी बॉर्डर दिल्ली से एक रिपोर्ट

हरियाणा और पंजाब का आपसी प्यार अगर देखना है तो इस आंदोलन से अच्छी कोई जगह नहीं हो सकती है। इंसान को इंसान देख कर हरा (खुश) हो रहा है। पेटवाड़ (हांसी) के किसान तो गाड़ी के आगे ही खड़े हो गए, बोले जलेबी खाओगे तो ही आगे जाने देंगे।

राखी खास के डॉक्टर टीम ने मेडिकल कैम्प लगाया हुआ था। ऐसे ही बणी (सिरसा) के डॉक्टर भी अपनी टीम के साथ मेडिकल कैम्प लगाए हुए थे। संगरूर (पंजाब) के नौजवानों ने लाइब्रेरी स्थापित की हुई थी। लाइब्रेरी के साथी ही जरूरतमन्द आंदोलनकारियों को जूते और जुराब भी दे रहे थे।

एक जगह गर्म कम्बल बांटे जा रहे थे। एक गाड़ी वाला बुजर्गों को जुराबें बाँट रहा था। कुछ लोग गोंद और मावा से बनी मिठाई जो बाजार में 500 से 600 रुपये किलो मिलती है। वो बांट रहे थे। उन्होंने उनके लड्डू बनाये हुए थे। उन्होंने हमको बताया कि 2500 किलो गोंद के लड्डू हमने बनवाये हैं।

20 किलोमीटर के काफिले में सैकड़ों स्टाल चाय, पकौड़े, जलेबी, बिस्कुट, नमकीन बुजिया, भोजन की मिली। ये सेवा बिल्कुल फ्री थी जो किसानों ने आपसी सहयोग से चलाई हुई थी।

पूरे काफिले में कहीं भी निराशा नहीं देखने को मिली। किसान पूरे जोश में मजबूती से जंग-ए-मैदान में खूँटा गाड़े हुए है।

लाखों लोग होने के बावजूद सफाई का विशेष ध्यान आंदोलनकारियों ने रखा हुआ है।

झाड़ू निकालने से लेकर सब्जी काटने, लहसुन छीलने, प्याज काटने का काम, सब्जी-रोटी बनाने काम आंदोलनकारी खुशी-खुशी कर रहे हैं।

सुबह उठते ही सबने अपना काम बांटा हुआ है। चाय बनाने से लेकर गर्म पानी करना, सब्जी काटना, लहसुन छीलना, आटा गूँथना, रोटी बनाना और सफाई करना ये सब काम आंदोलन में शामिल सभी खुशी-खुशी कर रहे हैं।

हरियाणा के तम्बुओं में ताश खेलते और हुक्का गुड़गुड़ाते किसानों को देख कर उनके हरियाणवी ठाठ-बाठ का अंदाजा बेहतर लगा सकते हो।

शाम होते-होते नौजवान अलग-अलग टोलियों में पैदल भी व ट्रक्टरों से भी नारे लगाते हुए रोष मार्च निकाल रहे हैं।

टिकरी बॉर्डर के नजदीक, पंडित श्री राम शर्मा मेट्रो स्टेशन के पास आंदोलनकारी किसानों ने एक बहुत बड़ा पांडाल लगाया हुआ है, जिसमें सिनेमा की तर्ज पर प्रोजेक्टर से फ़िल्म दिखाई जाती है। आज गुरु गोबिंद सिंह के जीवन पर फ़िल्म दिखाई जा रही है।

हरियाणा किसान मंच का लंगर मेट्रो पिलर 786 पर लगातार चला हुआ है। मंच ने ही हरियाणा के सिरसा से पक्के मोर्चे की शुरुआत की थी। लंगर में हजारों किसानों का खाना दोनों समय बनाया जा रहा है। मंच के राज्य नेता प्रल्हाद सिंह भारूखेड़ा जो इस आंदोलन की बागडोर सम्भाले हुए हैं, उनकी मेहनत और जोश काबिले तारीफ है।

छात्र एकता मंच और प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फ्रंट की छात्र टीम लगातार अपने क्रांतिकारी गीतों व पर्चों से किसानों को सत्ता की जनविरोधी नीतियों से अवगत करा रही है।

इस बॉर्डर पर सबसे बड़ा किसानों का काफिला भारतीय किसान यूनियन (उग्राहा) का है। इससे अलग भी किसान संगठन मजबूती से डटे हुए हैं। पंजाब के किसानों में महिला किसानों की संख्या भी बहुत है। काबिले तारीफ बात ये भी है कि किसानों में न आपस में कोई झगड़ा है, न कोई बहस इस मुद्दे पर कि किसका संगठन बेहतर है। बहुमत किसान छोटी जोत का किसान हमको यहां देखने को मिला, जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने यहां आया हुआ है।

सत्ता ने किसानों को पंजाब/हरियाणा व हरियाणा के किसानों को जाट/गैर जाट के नाम पर आपस में लड़ाने की जितनी कोशिश की, सत्ता हाशिये पर जाती गयी।

सत्ता ने किसानों को अलगावादी, खालिस्तानी, माओवादी, पाकिस्तान प्रायोजित कहा, सत्ता के ये शब्द किसी भी आन्दोलनों को बदनाम करने के अचूक हथियार रहे हैं। इससे पहले के सभी आन्दोलनों पर ये हथियार कामयाबी हासिल कर चुके थे, लेकिन इस बार इन सब हथियारों को किसानों ने व मुल्क की जनता ने नकारा ही नहीं उल्टा सत्ता के मुँह पर दे मारा है।

सत्ता के नफरती वायरस को नकारते हुए नफरत बढ़ने की बजाए किसानों में एक अटूट मोहब्बत एक दूसरे किसान के प्रति बढ़ती गयी।

इस किसान आंदोलन ने राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग करके भी मुल्क को जल-जंगल-जमीन बचाने की लड़ाई लड़ने का संदेश दिया है।

लाखों की तादात में अनुशासन से लबरेज किसान इस आंदोलन को जीत चुका है। फासीवादी सत्ता बुरी तरह हार चुकी है। तानशाह मोदी व संघ परिवार जिसको लगता था कि इस मुल्क की खेती को लुटेरे पूंजीपतियों के हाथों में बेच दोगे उनका ये बेचने-खरीदने वाला एजेंडा किसानों ने दफना दिया है।

ये लड़ाई इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिखी जा चुकी है।

Udey Che

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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