Home » Latest » लॉकडाउन : आत्मनिर्भर भारत में मजदूरों की आत्मनिर्भरता
Migrants On The Road

लॉकडाउन : आत्मनिर्भर भारत में मजदूरों की आत्मनिर्भरता

लॉकडाउन में मजदूरों की आर्थिक स्थिति पर ग्राउंड रिपोर्ट | Ground report on the economic status of workers in lockdown

Lockdown: Self-reliance of laborers in self-sufficient India

दिल्ली, मुंबई, जैसे महानगरों में हर साल बिहार, उत्तर-प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश से लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर आत्मनिर्भर बनने के लिए आते है वे दिन-रात कमा कर अपने बच्चों के भविष्य को संवारकर एक बेहतर और आत्मनिर्भर जिन्दगी का सपना देखते हैं। लेकिन कोरोना के प्रसार और भारत में लॉकडाउन ने मजदूरों की स्थिति ऐसी कर दी की अब उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए सरकार के ऊपर निर्भर होना पड़ रहा है।

लॉकडाउन होने के बाद फैक्ट्री मालिकों ने मजदूरों को काम से निकाल दिया, लाखों प्रवासी मजदूर अपने सपनों को साथ लेकर जान जोखिम में डाल कर वापिस वहीं जाने का मजबूर हो गये जहां से सपनों को पूरा के लिए शहर आए थे।

एक तरफ हमारे देश के प्रधानमंत्री ‘आत्मनिर्भरता’ की बात करते रहे और दूसरी ओर प्रवासी मजदूर अपने घर जाने के लिए अपनी जान गंवाते रहे, जिन मजदूरों ने मेहनत कर पैसा जोड़कर किसी तरह दिल्ली जैसे शहरों में अपना मकान बना लिया आज उनकी भी हालत अच्छी नहीं कही जा सकती है। वे लोग भी रोजी-रोटी की जुगाड़ के लिए रोज रोज संघर्ष कर रहे हैं।

किरारी प्रेम नगर अगर नगर ऐसा ही एक क्षेत्र है जहां बिहार, उत्तर प्रदेश के बहुसंख्यक प्रवासी मजदूर अपना घर बना कर रहते हैं, लेकिन लॉकडाउन के पश्चात उन मजदूरों के हालत खराब हो गई है।

पूनम देवी (35) रोहतास, बिहार की रहने वाली हैं। वह पिछले 12-13 सालों से अगर नगर प्रेम नगर किरारी में रहती हैं और साप्ताहिक बाजारों में बच्चों और महिलाओं के कपड़े बेचने का काम करती हैं। उनके पति भी उनके साथ यही काम करते थे जिसमें हर बाजार में वे 1500 से 2000 तक बिक्री कर लेती थीं। लेकिन लॉकडाउन हो जाने के कारण साप्ताहिक बाजार बंद हो गये हैं, जिससे कि उनका कपड़ा बेचना बन्द हो गया है।

चौथे लॉकडाउन के बाद जब सरकार ने कुछ ढील दी तो उन्होंने फिर कपड़े बेचने का काम शुरु किया लेकिन इस बार वह साप्ताहिक बाजार में नहीं गलियों में सुबह नौ बजे से दो बजे तक कपड़े को ठेले पर रखकर इस गली से उस गली घूमती हैं। उसके बाद मुश्किल से 200 रुपये का ही बेच पाती हैं जिसमें परिवार चलाना मुश्किल है।

पूनम कहती हैं कि लोगों के पास खाने के लिए पैसे नहीं हैं तो कपड़े कहां से खरीदेंगे। उनका बेटा सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा का छात्र है। शिक्षा के डिजटलीकरण के बाद से उसकी पढ़ाई नहीं हो पा रही है।

स्कूलों में टीचर क्या पढ़ा रहे हैं, क्या काम दे रहे हैं न तो उनके बेटे को पता है ना ही उसके किसी दोस्त को। वह चिंतित हैं कि बेटा पढ़ने में कमजोर हो जायेगा क्योंकि अभी ट्यूशन भी बंद है। उनके बेटे या उनके किसी दोस्त को यह भी पता नहीं है कि पढ़ाई के लिए कोई ग्रुप बना है कि नहीं बना है। इन छात्रों के पास टीचर का फोन नम्बर भी नहीं है और ना ही टीचर के पास इन बच्चों का नम्बर है, ऐसे में बच्चे कैसे पढ़ सकते हैं?

पूनम देवी शादी के बाद पितृसत्ता की चादर को ओढ़ने के बजाय उसको उतारने का सोचा और पति के कमाई पर निर्भर नहीं रहना चाहती थी, इसलिए उन्हो,ने आत्मनिर्भर बनने के लिए पहले ठेली पर साग-सब्जी बेचा फिर कुछ समय तक भुट्टा (छल्ली) भी बेचा।

मन में तरक्की की आशा लिए हुए पूनम और अच्छी कमाई करना चाहती थीं। वह लेडीज वियर और बच्चों के कपड़ों को साप्ताहिक बाजार में बेचने लगीं, बाजार में सर्दियों में तीन बजे से सात बजे तक ठेली लगाती थीं और गर्मियों में पांच से नौ बजे तक बाजार लगाती थी, जिसमें करीब दो हजार तक की बिक्री हो जाती थी, जिसमें लागत निकालकर 400-500 रू. का मुनामा प्राप्त कर लेती थीं। इतना ही उनके पति भी कमा लेते थे। पति-पत्नी की कमाई से थोड़ी-थोड़ी बचत करके अगर नगर में ही एक पच्चीस गज का मकान खरीद लिया, जिससे किराये के मकान पर न रहना पड़े और दो पैसे की बचत हो पाये।

हस्तक्षेप के संचालन में मदद करें!! 10 वर्ष से सत्ता को दर्पण दिखाने वाली पत्रकारिता, जो कॉरपोरेट और राजनीति के नियंत्रण से मुक्त भी हो, के संचालन में हमारी मदद कीजिये. डोनेट करिये.
 
 भारत से बाहर के साथी पे पल के माध्यम से मदद कर सकते हैं। (Friends from outside India can help through PayPal.) https://www.paypal.me/AmalenduUpadhyaya
पूनम के अनुसार पूनम और उनका परिवार खुशहाल जीवन बिता रहा था, लेकिन इस लॉकडाउन के कारण जिन्दगी से खुशियां गायब हो गईं, मानो कि जिन्दगी एक झटके में खत्म हो गई हो। जो परिवार हंसता हुआ जी रहा था उनके होठों से हंसी गायब हो चुकी है।

पूनम बताती हैं कि ‘‘हमारी मां भी यही किराये के मकान में रहती हैं हम तो उनसे भी कोई मदद नहीं ले सकते। गांव में हमारा कुछ भी नही है जो मुश्किल समय में गांव जाकर रह सकें। हमें तो जीना भी यहीं है और मरना भी यही, लॉकडाउन खुले या नहीं खुले हम कहीं नहीं जा सकते। पहले रोजगार था, परेशानी नहीं थी अब तो सारा दिन चिलचिलाती गर्मी और धूप से भटक कर केवल दो सौ रुपये का ही कपड़ा बेच पा रही हैं जिसमें से 30-40 रू. की कमाई हो पाती है। इतने कम पैसे में जिन्दगी की और जरूरतों को पूरा करना तो दूर, हम भरपेट खा भी नहीं सकते। पहले से जो बचत था वह लॉकडाउन दो माह के दौरान खतम हो चुका है अब तो चिंता ही खाये जा रही है। लोगों के पास पैसे नहीं है बहुत जरूरत पड़ने पर ही वह कपड़ों की खरीदारी करते हैं और पैसे कम होने के कारण मोल-तोल ज्यादा करते हैं। हम पहले से ही कम मुनाफे पर बेच रहे हैं और ग्राहकों की जेब में पैसा नहीं होने के कारण कम से कम मुनाफे में माल को निकालना पड़ रहा है नहीं तो यह माल पुराना पड़ जायेगा ।

इसी प्रकार प्रवेश नगर में रह रहे भजनलाल की कहानी है। प्रवेश विहार में रहते हुए उन्हें 21 साल हो गए, वे पेंट सिलने की फैक्ट्ररी मे काम करते थे, जिसमें वे रोज के 500 रुपये कमा लिया करते थे, लेकिन लॉकडाउन में वह फैक्ट्री बन्द हो गई इस बीच पीस रेट पर थैला सिलने का काम करने लगे जिसमें माल मिलने पर 200 रुपये रोज का कमा पाते हैं, लेकिन यह काम भी रोज नहीं मिल पाता है।

थैला सिलने का काम उस कॉलोनी में काफी लोग कर रहे हैं क्योंकि यही एक काम है जो लॉकडाउन में भी मिल रहा है। रोज का 200 भी न कमा पाने के कारण भजनलाल का मन है कि वे गांव चले जाएं लेकिन लॉकडाउन में घर जाना इतना आसान नही है। इंतजार कर रहे हैं कि कब स्थिति सामान्य हो और वो अपने गांव जा सकें।

इसी तरह अगर नगर में रह रहे ओमप्रकाश दरियागंज में किताब बेचने का काम किया करते थे, लेकिन दो महीने से लॉकडाउन होने और शीशमहल दरियागंज का क्षेत्र हॉटस्पाट में आने के कारण दोबारा काम शुरू होने के आसार नहीं दिख रहे इसलिए उन्होंने रोजी-रोटी के लिए मजदूरी करने का सोचा है अभी वो सोच रहे हैं कि अगर मजदूरी मिल गई तो ठीक नहीं तो कहीं पर ठेला लगाकर कुछ सामान बेचे।

2017 के अनुसार देश में कुल श्रमिकों की संख्या 465 मिलियन है, जिसमें 52प्रतिशत लोग स्वरोजगार, 25प्रतिशत दिहाड़ी मजदूर और 13प्रतिशत अनौपचारिक क्षेत्र में बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के काम में लगे हुए हैं। इस श्रमशक्ति का मात्र 10प्रतिशत हिस्सा सामाजिक सुरक्षा के साथ काम कर रहा है।

कोरोना के बढ़ते मामले के बीच अब सरकार को आत्मनिर्भर भारत बनाने की चिंता सताने लगी इसलिए दो महीने से बंद भारत के बीच उद्योगपतियों के घाटे की भरपाई करने के लिए बीस लाख करोड़ (जिसमें प्रवासी मजदूरों के हितों के लिए एक रुपये भी नहीं है) के पैकेज की घोषणा उद्योगों को बढ़ावा और आर्थिक मजबूती की ओर पूरी तरह ध्यान केन्द्रित कर लिया। सरकार के अनुसार ये राहत पैकेज चौतरफा लाभ पंहुचाने और आर्थिक गति को पटरी पर लाने के लिए बनाया गया है, तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को राहत पैकेज में शामिल किया गया है। सरकार के अनुसार तीन लाख करोड़ रुपये श्रमिकों और कृषि की मदद के लिए हैं, लेकिन गौरतलब है कि इस राहत पैकेज में तत्काल राहत की बात कही पर नहीं की गई है, जबकि सच्चाई यह है कि आज मजदूरों को रोज-रोज रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और उनके पास जमापूंजी खत्म हो गई है। सरकारी मदद के नाम पर स्कूल से पका भोजन और राशन पर निर्भर है, लेकिन वर्तमान परिस्थिति में ये प्रवासी मजदूर इस बात की उम्मीद छोड़ चुके हैं कि सरकार उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कोई प्रयास करेगी इसलिए जो शहर में रह रहे हैं वे अब खुद से रोजी-रोटी के जुगाड़ में लगे हुए जो भी काम करने का सामर्थ्य है वो काम कर रहे हैं।

डॉ. अशोक कुमारी

हस्तक्षेप के संचालन में मदद करें!! सत्ता को दर्पण दिखाने वाली पत्रकारिता, जो कॉरपोरेट और राजनीति के नियंत्रण से मुक्त भी हो, के संचालन में हमारी मदद कीजिये. डोनेट करिये.
 

हमारे बारे में hastakshep

Check Also

artificial intelligence

घातक हो सकती है ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’

बीते कुछ सालों में तकनीकी जगत में एक शब्द बड़ा आम हो गया है – …