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ज्ञान, विज्ञान और अज्ञान

Gyan, Vigyan Aur Agyan  

यदि रोबोट में संवेदना भी हो तो क्या होगा ?

रोबोट के आविष्कार से संबंधित कई लोकप्रिय उपन्यासों और फिल्मों में यह सवाल उठाया जा चुका है कि यदि रोबोट में संवेदना भी हो, भावनाएं भी हों तो रोबोट खतरनाक भी हो सकते हैं और अपने ही आविष्कार मानव के विरुद्ध विद्रोह तक कर सकते हैं।

यह सवाल आज तक भी सवाल ही है और आज तक इसका कोई सर्वमान्य हल सामने नहीं आया है। विज्ञान के बहुत से आविष्कार हमेशा से बहस का विषय बनते रहे हैं। जैसे-जैसे विज्ञान तरक्की करेगा, नए आविष्कार सामने आयेंगे और उनके प्रभावों-दुष्प्रभावों पर बहस जारी रहेगी। हाल ही के एक और आविष्कार ने समाज में एक नई बहस को जन्म दिया है।

हर कोई सुविधा-संपन्न जीवन जीना चाहता है और जीवन में आगे बढ़ना चाहता है। आधुनिक होते समाज में जब महिलाओं ने घर की चारदीवारी से बाहर कदम निकाले और अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया, तो वे अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं और बहुत सी दूसरी महिलाओं ने भी घर की जि़म्मेदारियों के साथ-साथ करिअर पर भी ध्यान केंद्रित किया। पुरुष प्रधान समाज में भी इस बदलाव का इसलिए स्वागत हुआ कि कामकाजी महिलाओं के कारण घर की आय बढ़ी और जीवन ज़्यादा सुविधाजनक होता चला गया।

महिलाओं के कामकाजी होने से जहां आय बढ़ी और परिवार की कई आवश्यकताओं की पूर्ति संभव हो सकी, वहीं कई बार अहम का टकराव या बच्चों को समय न दे पाने की समस्या भी सामने आई। कई मामलों में तो यह भी हुआ कि बच्चों को समय की जगह अधिक खिलौने, अथवा बढ़ा हुआ जेबखर्च देकर कर्तव्य का निर्वाह किया जाने लगा। इनमें से कुछ बच्चे बेलगाम होकर या नशे के आदी हो गये या अपराध की राह पर चल निकले और मां-बाप को तब पता चला जब घर में पुलिस का फेरा लगा।

भारत में उदारवाद आया, बहुराष्ट्रीय कंपनियां आईं, नई नौकरियां आईं और बहुत से परिवारों की आय का स्तर एकदम से बढ़ गया। कार्पोरेट जगत के बढ़ते प्रभाव और ऊंची तनखाहों ने सरकारी नौकरी का आकर्षण फीका कर दिया। कार्पोरेट जगत ने जहां ऊंचे वेतन वाली नौकरी और शीघ्र पदोन्नति की संभावनाओं के द्वार खोलकर युवाओं की महत्वाकांक्षांओं को हवा दी, वहीं कार्य-संस्कृति ऐसी बना दी कि कर्मचारियों को घर जाकर भी कार्यालय के काम में व्यस्त रहना आवश्यक हो गया। इसके अलावा आम कर्मचारी के वेतन और विशेषज्ञ अधिकारी के वेतन में इतना अधिक अंतर आ गया कि पदोन्नति के लिए दिन रात की मेहनत के अलावा अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता भी एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई। परिणामस्वरूप न केवल विशेषज्ञता पाने के लिए पढ़ाई के कई साल बढ़ गए, बल्कि नौकरी के शुरुआती बहुत से साल भी करिअर की आपाधापी में ही गुज़रने लगे, जिसका सीधा-सा परिणाम यह हुआ कि करिअरिस्ट बच्चों की शादी में देर होने लगी और कार्पोरेट क्षेत्र में कार्यरत युवाओं की शादी की आम उम्र तीस के आसपास की हो गई। परंतु परेशानी यहां ही खत्म नहीं हुई।

नौकरी के पहले दस साल सीखने, कुछ कर दिखाने और आगे बढ़ने के साल होते हैं और इसी दौरान यदि शादी हो जाए तो पति अथवा ससुराल पक्ष ही नहीं, कई बार महिला के मायके वालों की तरफ से भी दबाव होता है कि महिला को शीघ्र ही मां बनना चाहिए।

यही नहीं, चिकित्सकीय दृष्टि से भी तीस साल की उम्र से पहले महिला के लिए मां बनना ज़्यादा आसान ही नहीं, स्वास्थ्यकर भी होता है, इसलिए भी समय रहते मातृत्व सुख पा लेना हितकर माना जाता रहा है। चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से 35 वर्ष की आयु के बाद महिला के अंडे पहले जैसे उर्वर नहीं रह जाते और उनके मां बनने के संयोग कमतर होते चले जाते हैं।

हर महिला मां बनना चाहती है और अपने बच्चे को ज़्यादा से ज़्यादा प्यार देना चाहती है। मां बनना इतना बड़ा सुख है कि उसके बिना औरत का जीवन अधूरा माना जाता है। सवाल सिर्फ यह था कि मां बनने का निर्णय लेने पर महिलाओं के करिअर में व्यवधान आ जाता है, बहुत सी महिलाएं मातृत्व सुख के बाद काम छोड़ कर घर बैठ जाती हैं। कुछ महिलाएं उसके बाद या तो पार्ट-टाइम जॉब स्वीकार कर लेती हैं या ऐसे जॉब स्वीकार करती हैं जिसमें कार्यालय जाना अनिवार्य न हो। कुछ और ज़्यादा हिम्मत वाली महिलाएं उद्यमी बन जाती हैं और अपने घर से ही कोई काम-धंधा आरंभ कर लेती हैं। कुछ अन्य महिलाएं बच्चों के कुछ बड़ा हो जाने पर दोबारा काम पर लौट आती हैं। तो भी पति, परिवार और बच्चों की जि़म्मेदारी बहुत-सी महिलाओं के कामकाजी जीवन का अंत साबित होता है। बहुत सी महिलाओं को यह स्थिति स्वीकार नहीं थी पर उनके पास इसका कोई कारगर विकल्प नहीं था।

कार्यालय जाने के लिए तैयार होने तथा कार्यालय में लोगों से मिलने-जुलने से कामकाजी महिलाओं में चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है और अपना अलग वेतन होने से आर्थिक स्वतंत्रता भी मिलती है। जिस प्रकार रिटायर होने के कुछ समय बाद ही पुरुष ज्यादा बूढ़े लगने लगते हैं उसी प्रकार नौकरी छोड़ देने के बाद बहुत सी महिलाओं की चुस्ती-फुर्ती पहले-सी नहीं रह जाती। उसके बावजूद महिलाएं मातृत्व सुख से वंचित नहीं होना चाहतीं, लेकिन अब विज्ञान के एक नये आविष्कार ने कामकाजी महिलाओं के लिए एक और विकल्प पेश किया है।

विज्ञान वरदान या अभिशाप

अब यह संभव हो गया है कि कोई महिला समय रहते अपना उर्वरता, यानी मां बनने के सर्वोत्तम सालों में अपने अंडकोष के कुछ अंडों को सुरक्षित रखवा ले और जब वह मां बनना चाहे तो उन्हें अपने शरीर में रोपित करवा ले और मातृत्व का आनंद ले। तकनीक यह है कि वे महिलाएं जो मां बन सकती हैं, लेकिन वे अभी बच्चा नहीं चाहतीं, कुछ समय तक हाई-डोज़ हारमोन लेती हैं जिससे उनके अंडकोष में एक साथ कई अंडे बन जाते हैं।

इन अंडों के एक विशेष आकार तक बढ़ जाने पर उन्हें शरीर से निकाल कर जमाव बिंदु से लगभग 200 डिग्री सेल्सियस  नीचे के तापमान पर सुरक्षित रख लिया जाता है। इस तकनीक में और भी प्रगति के कारण अब 90 प्रतिशत तक सुरक्षित अंडे जीवित बचे रह सकते हैं। इस प्रकार महिला जब मां बनने के लिए तैयार हो तो इन्हीं स्वस्थ अंडों का प्रयोग करके मातृत्व सुख प्राप्त कर सकती है। इस तकनीक  के कारण अब यह संभव हो गया है कि महिला का पेशेवर जीवन भी चलता रहे और उसे मातृत्व सुख से भी वंचित न रहना पड़े।

पश्चिम में कई प्रसिद्ध महिलाओं ने इस तकनीक को अपनाया है जबकि भारतवर्ष में यह अभी बहुत शुरुआती स्तर पर है।

यह कहना अभी मुश्किल है कि भारतीय समाज इस सुविधा के लिए महिलाओं को कितनी स्वीकृति देगा। इसके अलावा एक सवाल यह भी है कि प्रकृति के नियमों से छेड़छाड़ के वास्तविक परिणाम क्या होंगे। ज्ञान से विज्ञान आता है, लेकिन अज्ञानवश विज्ञान का दुरुपयोग अभिशाप भी बन सकता है। समय ही बताएगा कि विज्ञान का यह आविष्कार समाज के लिए वरदान बनता है या अभिशाप।

पी. के. खुराना

लेखक एक हैपीनेस गुरू और मोटिवेशनल स्पीकर हैं।

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