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क्‍या सीओपी 27 ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वाकई जीत हासिल कर ली है? 

क्‍या सीओपी 27 ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वाकई जीत हासिल कर ली है? 

मिस्र के शर्म-अल-शेख में सीओपी27 जलवायु शिखर वार्ता (COP27 Climate Summit in Sharm-El-Sheikh, Egypt) संपन्न होने के फौरन बाद कतर में फुटबॉल विश्व कप टूर्नामेंट (football world cup tournament in qatar) की शुरुआत हुई है। यह दिलचस्प है कि इन दोनों अलग-अलग कार्यक्रमों में कई तरह की समानताएं भी हैं। जिन्हें कमजोर समझा जा रहा था वे नामचीन टीमों को टक्कर देने की कोशिश कर रही हैं। दरअसल वास्तविक खेल को एक बड़ा कारोबार घेरे हुए हैं और इसका नतीजा खेल का रुख पलटने वाले पल लेकर आ सकता है। 

सीओपी27 का असली विजेता कौन है?

सीओपी27 का स्पष्ट विजेता जलवायु परिवर्तन के लिहाज से जोखिम से घिरे देशों का वह समूह है जो जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न दुष्प्रभावों की प्रतिपूर्ति के लिए विशेष कोष तैयार करने में कामयाब रहा। दशकों तक ये देश उन समस्याओं को लेकर लाचारी की स्थिति का सामना करते रहे, जिनके लिए वे कभी जिम्मेदार नहीं थे। इन देशों ने दुनिया के उन सबसे अमीर मुल्कों के खिलाफ एक बड़ा अंतर पैदा किया जो इस मुद्दे को शिखर वार्ता की एजेंडा तक में भी शामिल करने से इंकार कर चुके थे। 

हाल ही में दो ऐसी चीजें हुई है जिन्होंने इन विकासशील देशों के सरोकार को मजबूती दी है। पहला, जलवायु वैज्ञानिकों ने ऐसी पद्धतियां विकसित की है जिनसे किसी चरम मौसमी घटना की संभावना को खास तौर पर ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ा जा सके। इस नए विज्ञान की वजह से हम अब यह जान गए हैं कि वर्ष 2022 में उत्तर भारत में पड़ी प्रचंड ताप लहर की संभावना सब जलवायु परिवर्तन की वजह से ही 30 गुना ज्यादा हो गई थी। दूसरा, दो क्षेत्रीय सरकारों यानी ब्रिटेन के स्कॉटलैंड और बेल्जियम के वेलोनिया ने अपनी केंद्रीय सरकारों के रुख से अलग जाते हुए जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए सबसे पहले कदम बढ़ाते हुए आर्थिक योगदान किया। इससे कुछ अन्य औद्योगिकीकृत देशों पर यह वित्तपोषण करने की प्रतिज्ञा लेने का दबाव पड़ा।

भारत के लिए आखिर इसके क्या मायने हैं?

भारत ने पूर्व चेतावनी प्रणालियों की दिशा में कई बड़ी कामयाबियां हासिल की हैं और उसने प्राकृतिक आपदाओं में विरले ही अंतरराष्ट्रीय मदद मांगी है। शायद हमारे लिए यह और ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए कि हम स्वार्थ पूर्ति के रास्ते तलाशने के बजाय जोखिम से घिरे अन्य देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहें।

सीओपी27 में तमाम बाधाओं के बीच ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ नाम से नया कोष बनाना वाकई एक बड़ी जीत है।

इस साल की यह जलवायु शिखर वार्ता युद्ध और ऊर्जा असुरक्षा के बीच आयोजित हुई। अक्षय ऊर्जा एक बड़ा कारोबार बन गई है और इसमें रिकॉर्ड स्तर पर वृद्धि हो रही है।

cop27
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वर्ष 2019 से 2021 के बीच दुनिया में सौर ऊर्जा उत्पादन 47% बढ़ा है जबकि पवन बिजली के उत्पादन में 31% का इजाफा हुआ है, मगर वैश्विक ऊर्जा मिश्रण में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी पिछले 20 वर्षों से करीब 35% पर ही अटकी हुई है।

वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखते हुए बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वर्ष 2030 तक कुल उत्पादित बिजली में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी को बढ़ाकर 75% करने की जरूरत होगी। 

इसका मतलब यह है कि अक्षय ऊर्जा में बढ़ोत्तरी करने के बाद भी जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को चरणबद्ध ढंग से समाप्त करना होगा। पिछले साल ग्लास्गो में आयोजित सीओपी में कोयले के इस्तेमाल को चरणबद्ध ढंग से खत्म करने की प्रतिज्ञा ली गई थी और इस साल भारत ने सभी तरह के जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को धीरे-धीरे बंद करने के प्रति संकल्पबद्धता जाहिर करने के लिए सभी देशों को चुनौती दी है। हालांकि सीओपी में जारी किए जाने वाले अंतिम बयान में विविधीकृत ऊर्जा मिश्रण के लिए ही आह्वान किया जाता है जो एक तरह से गैस के इस्तेमाल के निरंतर विस्तार का समर्थन ही है। 

नेट जीरो उत्सर्जन के लिए भारत को कितने धन की आवश्यकता है?

जहां तक भारत का सवाल है तो नेट जीरो उत्सर्जन वाले भविष्य में रूपांतरण के लिए उसे अगले 3 दशकों के दौरान करीब 3 ट्रिलियन डॉलर के अतिरिक्त निवेश की जरूरत पड़ेगी। हमें अक्षय ऊर्जा उत्पन्न करने, उसे स्टोर करने, उसे पारेषित करने और इलेक्ट्रिक वाहनों को चलाने में इस्तेमाल करने तथा उद्योगों के लिए ग्रीन हाइड्रोजन उत्पन्न करने के लिए एक मूलभूत ढांचा बनाने की जरूरत है। तुलना करने के लिए भारत का कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करीब 100 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष है। 

जलवायु परिवर्तन से निपटने की कार्यवाही के लिए रियायती दर पर वित्त पोषण उपलब्ध कराने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में सुधार का आह्वान सीओपी में खेल बदलने वाला कदम हो सकता है। 

कोविड-19 महामारी के दौरान अनेक विकासशील देशों को जलवायु सततता के निर्माण के लिए अपने घरेलू निवेशों में मजबूरन कटौती करनी पड़ी थी। उदाहरण के लिए फिजी को 40%, इंडोनेशिया को 20% और बांग्लादेश को 7% कटौती के लिए मजबूर होना पड़ा था। अन्य विकासशील देश कर्ज के और भी बड़े बोझ से दब गए क्योंकि अमीर देशों से कर्ज के रूप में उन्होंने जो जलवायु वित्त हासिल किया था वह उन्हें विदेशी मुद्रा के रुप में लौटाना पड़ा।

विकासशील देशों को अपनी साफ ऊर्जा संबंधी परियोजनाओं के लिए ऊंची दर पर पूंजी उधार लेनी पड़ती है। कृषि, पानी तथा स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के जलवायु संबंधी जोखिमों के प्रति अनुकूलन पर कुल उपलब्ध जलवायु वित्त का सिर्फ 20% हिस्सा ही खर्च होता है। इसके लिए कर्ज से ज्यादा अनुदान की जरूरत है। पिछले साल ग्लास्गो में हुए सीओपी सम्मेलन में यह वादा किया गया था कि वर्ष 2025 तक अनुकूलन पर वित्तपोषण की मात्रा को दोगुना किया जाएगा। 

जलवायु वित्त उपलब्ध कराने के मामले में धनी देशों का निराशाजनक रिकॉर्ड एक नाराजगी को भी जन्म दे रहा है।

बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटले ने कहा “हम वह हैं जिनके खून, पसीने और आंसुओं ने औद्योगिक क्रांति को वित्त पोषित किया है। क्या औद्योगिक क्रांति के कारण पैदा होने वाली उन ग्रीन हाउस गैसों की कीमत चुकाने के लिए अब हमें दोहरे संकट का सामना करना पड़ेगा?

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की कार्य पद्धतियों में सुधार करके उनमें धन का नया संचार करना सीओपी27 की वास्तविक धरोहर होगा। उससे भारत जैसे देशों की हरित विकास संबंधी आकांक्षाओं को माली मदद मिलती है। भारत ने इस महीने दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के संगठन जी-20 की अध्यक्षता संभाली है। जी20 देश विश्व की कुल जीडीपी में 85% और कुल व्यापार में 75% हिस्सेदारी रखते हैं। जी20 के अध्यक्ष के रूप में भारत के पास सतत ऊर्जा रूपांतरण के एजेंडे को आगे बढ़ाने, स्वच्छ प्रौद्योगिकी साझेदारियां बनाने और कहां पर किस तरह के जलवायु वित्त की सबसे ज्यादा जरूरत है, इसे सामने रखने का एक अनोखा मंच होगा। 

उल्‍का केलकर

(उल्का केलकर वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट इंडिया में जलवायु कार्यक्रम की निदेशक हैं। यह लेखिका के निजी विचार हैं। )

ulka kelkar. उल्का केलकर वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट इंडिया में जलवायु कार्यक्रम की निदेशक हैं।
उल्का केलकर वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट इंडिया में जलवायु कार्यक्रम की निदेशक हैं।

Has COP 27 really won a victory against climate change?

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