हाथरस गैंगरेप, बलात्कार कानून और राजनीति : समझिए हाथरस गैंगरेप घटना की क्रोनोलॉजी

HATHRAS हाथरस गैंगरेप : व्यवस्था और मानवता का अंतिम संस्कार

Hathras gang rape, rape law and politics

अंत में तमाम हंगामों और आरोप-प्रत्यारोप के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने हाथरस गैंगरेप की जांच सीबीआई को (CBI to investigate Hathras gang rape) सुपुर्द कर दी। यह निर्णय पहले ही हो जाना चाहिए था फिर भी देर से हुए इस निर्णय का स्वागत है। सीबीआई को जांच सौंपने के पहले 1 अक्टूबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच (Lucknow bench of the Allahabad High Court) ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए अपने ग्यारह पृष्ठों के आर्डर में जो बात कही है, वह एक निर्वाचित सरकार पर आक्षेप की तरह से है।

The main objection of the High Court is regarding the funeral of the dead body.

इस मामले के दो पहलू हैं। पहला, गुड़िया के साथ मारपीट और दुष्कर्म (Dolls assaulted and raped) होने की घटना और दूसरी रात के अंधकार में उसके शव का बिना उसके परिवार की सहमति से अंतिम संस्कार कर दिया जाना। हाईकोर्ट की मुख्य आपत्ति शव के अंतिम संस्कार को लेकर है। हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान का यही कारण बताया है, ‘अधिकारियों की घोर लापरवाही और उनके इस कदाचार से न केवल शव के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है, बल्कि, पीड़िता के पूरे परिवार के मौलिक अधिकारों को आघात पहुंचा है।’ अब इस मामले में 12 अक्टूबर को पुनः अदालत इसकी सुनवाई करेगी।

यह भी कहा जा रहा है कि सरकार का जो दृष्टिकोण पहले सख्त था, वह इसलिए भी नरम हो गया क्योंकि इस बात की आशंका थी कि हो सकता है अदालत ही सीबीआई जांच का आदेश कर दे। जो भी हो, अब यह जांच राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गयी है और जो भी होगा वह अब सीबीआई द्वारा ही किया जायेगा।

महात्मा गांधी के जन्मदिन के एक दिन पहले दिए गए अपने आदेश में, हाईकोर्ट ने गांधी जी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि,

“तुम्हें एक जन्तर देता हूँ। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाओ :

जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो वह उस आदमी के लिये कितना उपयोगी होगा? क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानि क्या उसे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ?

तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त होता जा रहा है।”

अब हाथरस गैंगरेप घटना की क्रोनोलॉजी (Chronology of Hathras gangrape incident) पर एक नज़र डालते हैं।

● 14 सितंबर की सुबह पीड़िता अपनी मां के साथ चारा काटने के लिए खेत पर गई थी। उसकी मां ने बताया, ”सुबह करीब 9:45 बजे मैंने देखा कि मेरी बेटी वहां नहीं है. मैंने सोचा कि वो घर चली गई होगी लेकिन फिर मैंने उसकी चप्पलें देखीं. हमने कुछ वक्त तक उसे तलाशा और फिर हमें वो एक पेड़ के पास मिली.”

● इसके बाद पीड़िता स्थानीय अस्पताल भेजी गयी, फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज रेफर की गयी फिर वहां से उसे दिल्ली सफदरजंग हॉस्पिटल भेजा गया जहाँ 29 सितंबर को उसकी मृत्यु हो गयी।

● तब तक उस मुकदमे की विवेचना स्थानीय पुलिस ही करती रही। अभियुक्त पकड़े भी गए और पीड़िता का अंतिम बयान भी दर्ज कराया गया जो अब क़ानून के अनुसार, मृत्युपूर्व बयान माना जा सकता है।

● 29-30 सितंबर की रात लगभग ढाई बजे हाथरस में पीड़िता का अंतिम संस्कार किया गया।

● प्रशासन पर यह आरोप है कि, पीड़िता के परिवार को घर में बंद कर दिया गया था और शव उन्हें देखने तक नहीं दिया गया था।

● 30 सितंबर की सुबह मुख्यमंत्री लखनऊ में, एसआईटी की घोषणा करते हैं और एसआईटी को जांच रिपोर्ट देने के लिये सात दिन का समय दिया गया।

● 1 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी, जो पीड़ित परिवार से मिलने हाथरस जा रहे थे, को ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर हिरासत में ले लिया गया।

● उन्हें पीड़ित परिवार के परिजनों से मिलने के लिये जाने नहीं दिया गया।

● 1 अक्टूबर को ही एडीजी प्रशांत कुमार ने लखनऊ में कहा कि, एसएफएल रिपोर्ट में शुक्राणु मिलने की पुष्टि नहीं हुई है जिससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार नहीं किया गया था।

● 2 अक्टूबर की शाम 4 बजे एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को दी।

● इस रिपोर्ट के बाद, हाथरस के एसपी, डीएसपी समेत 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया। दोनों पक्षों का नार्को टेस्ट कराने का फैसला योगी सरकार ने लिया।

● मीडिया को 3 अक्टूबर की सुबह 10 बजे पीड़िता के परिजनों से मिलने की इजाजत मिली। उसके पहले मीडिया को वहां जाने नहीं दिया जा रहा था।

● 3 अक्टूबर को राहुल और प्रियंका गांधी हाथरस गए और उन्होंने परिजनों से मुलाकात की।

● 3 अक्टूबर की रात सरकार ने यह मामला सीबीआई को सौंपने का फैसला किया ।

● लेकिन तब तक सरकार की क्षवि का जो नुकसान और फजीहत होनी थी वह हो चुकी थी।

Now it will be the decision of CBI whether to conduct narco test or not

सरकार ने कहा है कि, हाथरस गैंगरेप मामले में उसके घर वालों, वादी और अन्य का नार्को टेस्ट कराया जाएगा। लेकिन अब जांच एजेंसी बदल चुकी है तो अब यह सीबीआई का निर्णय होगा कि, नार्को टेस्ट कराया जाय अथवा नहीं

हाथरस गैंगरेप में पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट (Medical report of the victim in Hathras gangrape), उसे लगी चोटें, चोटों के काऱण हुई मृत्यु से यह तो प्रमाणित है ही कि, उसके साथ एक हिंसक घटना घटी है। अब सवाल उठता है बलात्कार हुआ है या नहीं ? और यह हिंसक घटना किसके द्वारा की गयी है ? अभियुक्तों की नामजदगी सही है या गलत। यह सब विवेचना में देखा ही जायेगा।

फोरेंसिक रिपोर्ट (Forensic report) के आधार पर, एडीजी लॉ एंड ऑर्डर का कहना है कि सैम्पल में वीर्य नहीं मिला है इसलिए बलात्कार की पुष्टि नहीं की जा सकती है। लेकिन, एडीजी धारा 375 आईपीसी जिसमें बलात्कार की परिभाषा दी गयी है, में 2013 के पहले की परिभाषा का पाठ कर रहे हैं। 2013 मे इस धारा में संशोधन हो गया है और अब वीर्य मिले या न मिले, योनि में प्रवेशन ( पेनिट्रेशन ) हुआ हो या न हुआ हो, इसे बलात्कार का अपराध माना जायेगा ।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि, पीड़िता ने अपने बयान में क्या कहा है। जो कुछ भी उस बयान में कहा गया होगा वह अब पीड़िता की मृत्यु के बाद उसके मृत्युपूर्व बयान में बदल जायेगा जो, साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत एक प्रबल साक्ष्य माना जाता है। मुकदमे का यह एक प्रमुख आधार बनेगा।

अब एक नज़र बलात्कार कानून के इतिहास और संशोधनों (History and amendments of rape law) पर

भारत में बलात्कार को स्पष्ट तौर पर भारतीय दंड संहिता आईपीसी में परिभाषित अपराध की श्रेणी में वर्ष 1860 में शामिल किया गया। आईपीसी की धारा 375 में बलात्कार को परिभाषित किया गया तथा इसे एक दंडनीय अपराध बनाया गया। इसी पेनल कोड की धारा 376 के अंतर्गत बलात्कार जैसे अपराध के लिये न्यूनतम सात वर्ष तथा अधिकतम आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया।

कानून में बलात्कार की परिभाषा (Definition of rape in law) में निम्नलिखित बातें शामिल की गई हैं :

● किसी पुरुष द्वारा किसी महिला की इच्छा या सहमति के विरुद्ध किया गया शारीरिक संबंध।

● जब हत्या या चोट पहुँचाने का भय दिखाकर दबाव में संभोग के लिये किसी महिला की सहमति हासिल की गई हो।

● 18 वर्ष से कम उम्र की किसी महिला के साथ उसकी सहमति या बिना सहमति के किया गया संभोग।

● इसमें अपवाद के तौर पर किसी पुरुष द्वारा उसकी पत्नी के साथ किये गये संभोग, जिसकी उम्र 15 वर्ष से कम न हो, को बलात्कार की श्रेणी में नहीं शामिल किया जाता है।

26 मार्च, 1972 को महाराष्ट्र के देसाईगंज पुलिस स्टेशन में मथुरा नामक एक आदिवासी महिला के साथ पुलिस कस्टडी में हुए एक बलात्कार के मामले में, सेशन कोर्ट ने आरोपी पुलिसकर्मियों को इस आधार पर बरी कर दिया था कि उस महिला के साथ पुलिस स्टेशन में संभोग तो हुआ था किंतु बलात्कार होने के कोई प्रमाण नहीं मिले थे और वह महिला यौन संबंधों की आदी थी। सेशन कोर्ट के इस फैसले के विपरीत उच्च न्यायालय ने आरोपियों के बरी होने के निर्णय को वापस ले लिया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने फिर उच्च न्यायालय के फैसले को बदलते हुए यह कहा कि इस मामले में बलात्कार के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं उपलब्ध है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि महिला के शरीर पर कोई घाव या चोट के निशान मौजूद नहीं है जिसका अर्थ है कि तथाकथित संबंध उसकी मर्ज़ी से स्थापित किये गए थे। मथुरा मामले के बाद देश में बलात्कार से संबंधित कानूनों में तत्काल बदलाव की मांग होने लगी। परिणामस्वरूप आपराधिक कानून (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1983 पारित किया गया। 1983 में आईपीसी में धारा 228A जोड़ी गई जिसके अनुसार, बलात्कार जैसे कुछ अपराधों में पीड़ित की पहचान गुप्त रखी जाए तथा ऐसा न करना दंडनीय अपराध माना जाय।

दिसंबर 2012 में निर्भया कांड के बाद 2013 में इस एक्ट में संशोधन कर के बलात्कार की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाया तथा दंड के प्रावधानों को कठोर किया गया। कुछ मामलों में मृत्युदंड का भी प्रावधान किया जिनमें पीड़ित की मौत हो या उसकी अवस्था मृतप्राय हो जाए। साथ ही, कुछ नए प्रावधान भी जोड़े गए, जैसे,

● आपराधिक इरादे से बलपूर्वक किसी महिला के कपड़े उतारना,

● यौन संकेत देना तथा पीछा करना आदि शामिल हैं।

● सामूहिक बलात्कार के मामले में सज़ा को 10 वर्ष से बढ़ाकर 20 वर्ष या आजीवन कारावास कर दिया गया।

● अवांछनीय शारीरिक स्पर्श, शब्द या संकेत तथा यौन अनुग्रह (Sexual Favour) करने की मांग करना आदि को भी यौन अपराध में शामिल किया गया।

● लड़की का पीछा करना करने पर तीन वर्ष की सज़ा ।

● एसिड अटैक के मामले में सज़ा को दस वर्ष से बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दिया गया।

● 16 वर्ष से कम आयु की किसी लड़की के साथ हुए बलात्कार के लिये न्यूनतम 20 वर्ष का कारावास तथा अधिकतम उम्र कैद का प्रावधान भी जोड़ा गया।

● न्यूनतम सज़ा के प्रावधान को सात वर्ष से बढ़ाकर अब 10 वर्ष कर दिया गया है।

हाथरस गैंगरेप की घटना को लेकर विपक्ष सक्रिय और लामबंद हुआ तो सरकार ने न केवल सीबीआई जांच के आदेश किये बल्कि हाथरस के एसपी सहित कुछ पुलिस अधिकारियों को भी निलंबित किया। लेकिन सरकार का सबसे अपरिपक्व कदम था, घटनास्थल और गांव में मीडिया को प्रतिबंधित कर देना और पीड़िता के घर वालों के साथ, जिला मैजिस्ट्रेट का आपत्तिजनक व्यवहार। ऐसे मामले में डीएम का यह कहना कि यह मीडिया वाले तो आज हैं कल नहीं रहेंगे, लेकिन हम तो कल भी रहेंगे, एक बचकाना कथन था। निश्चित ही मीडिया को प्रतिबंधित करने के लिये सरकार की तरफ से ही कोई निर्देश दिया गया होगा। तभी जब इस बात पर किरकिरी हुई तो सरकार ने उच्च स्तर पर प्रशासनिक परिवर्तन किए। सरकार का दृष्टिकोण भी कुछ नरम पड़ा और विपक्षी नेताओं को पीड़िता के घर पर जाने की अनुमति भी दी गयी।

यह भी खबर है कि प्रधानमंत्री जी ने भी इस घटना में हस्तक्षेप किया और तब जाकर सरकार की रणनीति बदली। भाजपा के अंदर भी इस घटना को लेकर मंथन हुआ और बिहार के आसन्न चुनाव ने सरकार को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया।

इस प्रकरण में सबसे बड़ी गलती यह हुई कि, पीड़िता के शव का रात के अंधेरे में बिना उसके परिवारीजन द्वारा पूछे अंतिम संस्कार कर देना। इससे प्रशासन सीधे कठघरे में आ गया। लेकिन इसके बाद भी, प्रशासनिक गलतियां या मिसहैंडलिंग एक-एक कर के होती रहीं, जैसे, डीएम का पीड़िता के घर वालो को धमकी देना, एडीजी लॉ एंड ऑर्डर का बलात्कार के अपराध को, फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर एक जजमेंटल तऱीके से नकार देना, विपक्षी नेताओं, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ बदसलूकी, पहले न जाने देना, फिर उन्हें जाने देने की अनुमति देना, टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन और आरएलडी के जयंत चौधरी पर लाठीचार्ज, मीडिया कर्मियों के साथ जगह-जगह रोकटोक आदि अनेक कारण ऐसे हैं जो इस घटना को लगातार सुर्ख़ियों में बनाये रहे और इन सबकी एक विपरीत प्रतिक्रिया ही होती रही।

सबसे बड़ी भूल प्रशासन की यह रही कि, उसने पीड़िता के दादा के हस्ताक्षर से एक टाइपशुदा बयान ले लिया कि, वे पुलिस कार्यवाही से संतुष्ट हैं। इस कागज़ ने प्रशासन की भूमिका को और संदिग्ध कर दिया। अगर पीड़िता के दादा पुलिस तथा प्रशासनिक कार्यवाही से संतुष्ट हैं भी, तो भी इसका कोई भी असर इस मुकदमे पर नहीं पड़ने जा रहा है।

अधिकतर टीवी चैनल जो अमूमन सरकार के साथ खड़े दिखते हैं, वे इस मामले में सरकार के आशानुरूप इस घटना की रिपोर्टिंग नहीं कर पाए। टीवी मीडिया और सोशल मीडिया पर लगातार हो रही इस घटना की कवरेज ने सरकार को निरन्तर सवालों के घेरे में बनाये रखा। विपक्षी नेताओं को न जाने देने का निर्णय, सरकार के लिये ही आफ़ते जाँ बन गया। क्योंकि सरकार को दो ही दिन में प्रबल विरोध के कारण अपने मीडिया और विपक्षी नेताओं के हाथरस न जाने देने के आदेश वापस लेने पड़े। मीडिया को प्रतिबंधित करने का निर्णय जिस किसी का भी हो वह बेहद त्रुटिपूर्ण रहा। इससे न केवल मीडिया खिलाफ हो गया, बल्कि सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप पर भी सवाल उठने लगे।

अब यह कहा जा रहा है कि हाथरस गैंगरेप मामले पर राजनीति हो रही है। अगर यह राजनीति है तो ऐसी राजनीति का स्वागत किया जाना चाहिए। हर उस विधिविरुद्ध, संविधान के विपरीत और देश तथा समाज को हानि पहुंचाने के लिये किये जा रहे ऐसे कृत्यों पर राजनीति की जानी चाहिए और उसकी खामियों को उजागर किया जाना चाहिए। केवल पूंजीपतियों से चंदा लेकर, लफ्फाजी और लंतरानी भरी वाचाल मुद्रा में चुनाव सभाओं में जनता से झूठे वादे कर के सत्ता में आ जाना, फिर उन सब वादों को निर्लज्जता से जुमला कह उन्हें भूल जाना और उनकी याद दिलाने वालों को, राजनीतिक शुचिता का उपदेश देना, ही राजनीति नहीं होती है !

जब राजनीति के कारण ही सरकारें, सत्ता में आती है और सत्ता से बाहर फेंक दी जातीं हैं, जब अफसरों की पोस्टिंग और तबादले राजनीति के आधार पर होते हैं, जब जांच के आदेश और जांच के निष्कर्ष पर कार्यवाही राजनीति के मद्देनजर होती है, जब गनर शैडो और सुरक्षा कर्मी राजनीति के आधार पर लोगों को दिए और लिए जाते हैं, जब मीडिया का हेडलाइन मैनेजमेंट राजनीति के आधार पर तय होता है, तो अगर एक लड़की जिसे बेहद बर्बर तऱीके से तड़पा- तड़पा कर मार दिया गया है, तो फिर ऐसे गर्हित अपराध पर राजनीति क्यों नहीं होनी चाहिए ? अगर राजनीति ऐसे अवसर पर मूक और बांझ हो जाय तो, ऐसी निकम्मी और निरुद्देश्य राजनीति का कोई अर्थ नहीं है, बल्कि, अन्याय, अत्याचार, संस्थागत एकाधिकारवाद यानी तानाशाही, राजनीतिक वादा फरामोशी, झूठ और जुमले परोसने आदि के खिलाफ खड़ा होना भी राजनीति है।

सच कहें तो, राजनीति का उद्देश्य भी यही है कि समाज को एक सार्थक दिशा की ओर ले जाया जाय। जब भी कभी आदिम समाज में सभ्यता के अंकुर फूटे होंगे और समाज को व्यवस्थित करने की बात सोची गयी होगी और इस दिशा में कदम बढ़ाया गया होगा तो राजनीति का जन्म हुआ होगा। राजनीति देश और समाज को संवारती है और उसे प्रगतिपथ पर आगे भी ले जाती है और वही राजनीति जब गर्हित उद्देश्य से दुष्प्रेरित होती है तो देश समाज और अंत में सत्ता को भी गर्त में धकेल देती है। फिर उसी गर्त से कोई उठता है, मसीहा सा दिखता है, और फिर एक नयी राजनीति शुरू होती है। वह एक नए दिन का प्रत्यूष होता है।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर एवं कानून विशेषज्ञ हैं।

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