कोरोना का कहर : देश में यह दुस्समय शोक और अस्पृश्यता का सामाजिक यथार्थ बन गया है

कोरोना का कहर : देश में यह दुस्समय शोक और अस्पृश्यता का सामाजिक यथार्थ बन गया है

सबसे पहले यह इंटरव्यू करना था। लेकिन हमारी भाभीजी बरेली बेटी के यहां से आकर क्वारंटाइन हो गई 14 दिनों के लिए।

हालात बेहद खराब हैं। कोरोना का कहर (Havoc of corona) थम नहीं रहा। उत्तराखण्ड में अपने भी जान बेमौत गंवाने लगे हैं। सुबह ही शंकर चक्रवर्ती का फोन आया। कोरोना की वजह से मौत (Death due to corona) होने के कारण मां का अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए। मुखाग्नि की बजाय चिता को अग्नि देनी पड़ी हल्द्वानी में तय श्मशानघाट पर। रुद्रपुर के मेयर ने पार्थिव शरीर रुद्रपुर लाकर अंतिम संस्कार की तैयारी कर दी लेकिन इजाजत नहीं मिली। बॉण्ड अलग लिखकर देना पड़ा कि बाकी कर्मकांड की सिर्फ रस्म अदायगी होगी। फूल भी चुने नहीं जा सके।

देश में यह दुस्समय शोक और अस्पृश्यता का सामाजिक यथार्थ बन गया है। आर्थिक मोर्चे पर संकट अलग है। हम इससे रोज़ दो चार हो रहे हैं।

दिनेशपुर और उत्तराखण्ड के बंगाली समाज (Bengali society of Dineshpur and Uttarakhand) में हमारे इस मिशन को लेकर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं है। बंगाल और बांग्लादेश में है। सभी समुदायों का प्यार और समर्थन मिल रहा है। उनके प्यार और सहयोग के भरोसे हैं।

आज सुबह भी हम 12 पेज बढ़ाने पर विचार करते रहे ताकि नियमित स्तम्भ रोकना न पड़ें। कविताओं कहानियों और गज़लों को ज्यादा झग़ दे सके, उपन्यास धारावाहिक छाप सके। कम से कम दस हजार प्रतियां छाप सके तो उत्तराखण्ड में सर्वत्र बांट सके। लेकिन हमारे पास पैसे हैं नही और आम जनता के पास रोज़ी रोटी के संकट के अलावा कुछ नहीं है।प्रे स का बकाया बढ़ता ही जा रहा है। दो-दो स्कूल बंद होने के कगार पर हैं।

इतने घनघोर संकट में भी हम अपने संकल्प पर अडिग हैं क्योंकि हमारी आस्था आपके बेपनाह प्यार में है।

आज राधाकांतपुर ने संयुक्त उत्तरप्रदेश में बंगाली समाज के पहले ग्रेजुएट रोहिताश्व मल्लिक और उनकी पत्नी गीता भाभी का इंटरव्यू करते हुए आप सभी के प्यार का अहसास फिर एक बार गहराई से हुआ।

आज फोकस तराई बसने की कथा (Legend of Terai Settlement) पर था। तराई बसाने वाले पुरखों की स्मृति पर था।

बार-बार आंखें छलक गईं।

इस संकट में भी रूपेश ने आज एक और संकल्प कर डाला। रोहिताश्व दा और गीता भाभी ने मेरे पिता पुलिन बाबू पर भी किताब निकलने की बात कही तो उस जिगरवाले ने बिना हमसे चर्चा किये हाँ कर दी।

मेहनत हम कम नहीं कर रहे। कोरोना काल में भी रोज़ दौड़ रहे हैं दूसरे लोग आतंकित हैं, हम नहीं।

लेकिन पैसा कहाँ से आएगा? बिन पैसे कब तक हम प्रेरणा अंशु निकल पाएंगे? दो किताबें मार्च तक निकालनी हैं और अब तीसरी किताब भी?

हमारी हिम्मत आपसे हैं और हो सके तो आप रास्ता बताएं।

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