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जब घूंघट बना इंक़लाब का परचम : हिजाब, नारीवाद और निरंकुशता

जब घूंघट बना इंक़लाब का परचम : हिजाब, नारीवाद और निरंकुशता

सदियों से पुरुष प्रधान समाज महिलाओं पर विभिन्न प्रकार की रोक लगाता जा रहा है – कभी पहनावे को लेकर, कभी आने जाने पर, कभी पढ़ाई या काम करने पर रोक को लेकर। हर बार पुरुष यह तय करते हैं कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए, कैसे रहना चाहिए, कहाँ जाना चाहिए, कब या किस से विवाह करें इत्यादि, यह गलत है। जब धर्म, समाज और सरकारें, सब मिलकर महिलाओं को जंजीरों में बांधने पर तुले हैं और उन पर तरह-तरह से प्रतिबंध लगा रहे हैं, तब महिलाएं उन जंजीरों को तोड़ रहीं हैं और क्रांति के नए रास्ते बना रहीं हैं। और अब फिर से एक बार हिजाब को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है । हाल ही में हिजाब को लेकर कई निरंकुश सरकारें महिलाओं पर प्रतिबंध लगा रहीं हैं और अब इसे लेकर एक क्रांति हो रही है, जब घूंघट या हिजाब बन रहा है परचम इंक़लाब का।

तानाशाही के विरुद्ध क्रांति की लहरें

ईरान की कुख्यात “नैतिक पुलिस” द्वारा तेहरान में गिरफ्तार किए जाने के बाद मारी गई एक 22 साल की युवती महसा अमिनी की मौत के विरोध में ईरानी महिलाएं अपने हिजाब जला रही हैं और अपने बाल कटवा रही हैं।

अमिनी की मौत पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस की प्रतिक्रिया नृशंस है। विरोध प्रदर्शनों में पूरे ईरान में कई लोगों के मारे जाने की ख़बर है।

जब ईरान की सरकार ड्रेस-कोड कानून लागू कर रही है, वो भी प्रतिबंधों की एक नई सूची के साथ, तब महिलाओं के नेतृत्व में आंदोलन हो रहा है, जो इस क्रांतिकारी कार्य को कर रही हैं। वे सशस्त्र नहीं हैं। यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है। इस क्रांति का केंद्रीय नारा है “नारी, जीवन, स्वतंत्रता।” इस क्रांतिकारी आंदोलन का मूल, महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता को पुनः प्राप्त करना है। यह आंदोलन नेतृत्वविहीन है, इसका कोई एक नेता नहीं है और यह इसकी ताकत का एक बिंदु है।

अफगानिस्तान में भी महिलाएं इसी मुद्दे पर तालिबान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। पिछले साल तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से, अफगानिस्तान के कई प्रांतों में किशोर लड़कियां स्कूल में जाने में असमर्थ हैं। इसके अतिरिक्त, मंत्रालयों और निदेशालयों ने अधिकांश महिलाओं को उनकी सरकारी नौकरियों में लौटने से रोक दिया गया है। अफगानिस्तान की महिलाएं इस समय बुनियादी चीजें मांगने में व्यस्त हैं जैसे लड़कियों के लिए शिक्षा का अधिकार, महिलाओं के लिए काम करने का अधिकार, बिना किसी डर के यात्रा करने का अधिकार। जब तालिबान ने घोषणा की कि सभी महिलाओं को अपने चेहरे को ढंकना चाहिए या तो पूरे काले अरब शैली के नकाब में या स्थानीय नीली चादर में, या बुर्का पहनना चाहिए, तो महिलाओं ने विरोध किया, जिसे तालिबान ने रोकने का प्रयास किया। लेकिन महिलाएं तालिबान की क्रूर ताकत के समक्ष खुद को अभिव्यक्त करने से नहीं रोक सकीं और तब क्रांति का सिलसिला आरम्भ हुआ। ये सभी महिलाएं विरोध कर रहीं हैं हिजाब और अन्य रूढ़िवादी तरीकों का, उन निरंकुश सरकारों के खिलाफ, जो महिलाओं के पहनावे पर अपनी संकुचित सोच लाद रहें हैं और महिलाओं को पढ़ने और काम करने से रोक रहें हैं।

पर भारत जो एक धर्मनिरपेक्ष देश है, यहां लड़कियों ने 2022 में सरकार के विरुद्ध इसलिए प्रदर्शन किया क्यूंकि वो हिजाब पहन के पढ़ना चाहती थी। 5 फरवरी 2022 को, कर्नाटक राज्य सरकार ने एक कॉलेज में हिजाब पहनने पर रोक लगाने वाला एक परिपत्र जारी किया। कई लड़कियों ने इस आदेश को कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी। 15 मार्च 2022 को तीन जजों की बेंच ने फैसला सुनाया कि इस्लाम के तहत हिजाब पहनने की जरूरी प्रथा नहीं है। अदालत ने लड़कियों को उनकी पसंद के कपड़े पहनने के लिए दंडित करते हुए लड़कियों के शिक्षा के अधिकार की तुलना में ‘वर्दी में एकरूपता’ को प्राथमिकता दी।

women are the first victims of fundamentalist bigotry
women are the first victims of fundamentalist bigotry

हिजाब बहस में, महिलाओं के शिक्षा के अधिकार के बजाय धार्मिकता पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रतिबंध के समर्थकों ने कक्षा में एकरूपता की इच्छा व्यक्त की, लेकिन ड्रेस कोड को अचानक लागू करने के बारे में बहुत कम कहा गया।

याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हेमंत गुप्ता और सुधांशु धूलिया ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध से संबंधित एक मामले में अलग-अलग फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति गुप्ता ने उच्च न्यायालय प्रतिबंध को बरकरार रखा और सभी अपीलों को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति धूलिया ने सभी अपीलों को स्वीकार कर लिया, कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। अब ये मामला चीफ जस्टिस के समक्ष लंबित है।

परन्तु न्यायमूर्ति धूलिया ने कहा कि “एक विद्यालय द्वारा छात्रा को उसके स्कूल के गेट पर हिजाब उतारने के लिए कहना, उसकी निजता और गरिमा पर आक्रमण है” और मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। यह भी तर्क दिया कि इस मामले में सबसे बड़ी चिंता लड़कियों की शिक्षा है, उन्होंने कहा : “एक बालिका को शिक्षा प्राप्त करने में एक लड़के की तुलना में कई गुना अधिक बाधाएँ और कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। इसलिए इस मामले को एक बालिका के सामने अपने स्कूल तक पहुँचने में आने वाली चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए। इसलिए यह अदालत खुद के सामने यह सवाल रखेगी कि क्या हम केवल हिजाब पहनने के कारण लड़कियों को शिक्षा से वंचित करके उनके जीवन को बेहतर बना रहे हैं!”

भारत में, हिजाब से सम्बंधित बहस को देश के सांप्रदायिक इतिहास और अल्पसंख्यक राजनीति में मुस्लिम other “अन्य” की छवि को लेकर चल रहे विवाद के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। मुसलमानों के प्रति निराशा और शत्रुता को परिधान के विरुद्ध आसानी से चैनल किया गया। हिजाब विरोध के बाद सरकारी शिक्षण केंद्रों में अल्पसंख्यक छात्रों की संख्या में 50% से अधिक की गिरावट दर्ज की गयी।

संक्षेप में कहा जा सकता है की प्रत्येक देश में घूंघट या हिजाब के बारे में प्रदर्शनों को समझने की कोशिश करते समय वहां के विशिष्ट ऐतिहासिक और सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ जानने महत्वपूर्ण होते हैं। बेशक, हिजाब पोशाक का एक प्रकार माना जा सकता है। फिर भी, इस्लाम से जुड़े होने के कारण, इस पर लंबे समय से एक राजनीतिक बहस छिड़ी है। हिजाब का प्रयोग राजनीतिक और सामाजिक दमन के रूप में किया जा रहा है। अलग-अलग देशों में निरंकुश सरकारें या शासन, विभिन्न प्रकार से हिजाब को हथियार बना कर महिलाओं के अधिकारों में हस्तक्षेप कर रहें है।

महिलाओं की स्वायत्तता (women’s autonomy) अनिवार्य है

चाहे ईरान हो, अफगानिस्तान या भारत, सवाल यह नहीं है कि कोई हिजाब के पक्ष में है या उसके खिलाफ। सवाल यह है कि कैसे शासन महिलाओं के अस्तित्व और शरीर को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं और यह तय करने की कोशिश करते हैं कि महिलाओं को अपना जीवन कैसे जीना चाहिए। प्रगतिशील समाजों और मानव अधिकारों के मूल्यों के अनुसार यह महिलाओं की पसंद है कि वह तय करें कि उन्हें क्या पहनना है और क्या नहीं पहनना है। इसलिए हिजाब के मामलों में आंदोलन महिलाओं के अधिकार के बारे में है। इन क्रांतिकारी आंदोलनों का मूल, महिलाओं की स्वायत्तता autonomy के बारे में है।

समस्या घूंघट या हिजाब नहीं है, लेकिन कानून के जबरदस्ती लागू करने में निहित है। महिला नागरिकों को स्वायत्तता के उनके मूल अधिकार से वंचित करने के लिए इसे धर्म के साथ जोड़ दिया गया है।

धर्म के नाम पर महिलाओं को घूंघट या हिजाब पर कोई भी फैसला धार्मिक कट्टरवाद के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। इसका प्रयोजन रूढ़िवादी सोच को बढ़ाना और विकास को पीछे धकेलना है। संक्षेप में, कानून एक नागरिक को उसके धर्म और उसके अधिकारों के बीच चयन करने के लिए मजबूर कर रहा है।

सभी जगह निरंकुशता के उदय के साथ, नारीवाद का एक अलग रूप उभर रहा है, जहां भारत में मुस्लिम लड़कियां और अफगानिस्तान, ईरान वे अन्य देशों में महिलाएं अपने अधिकारों और स्वायत्तता को प्राप्त करने के लिए सरकारों को चुनौती दे रही हैं। महिलाएं, जहाँ भी हों, बंधनों को तोड़ कर आगे बढ़ रहीं हैं, पितृसत्ता को लगातार चुनौती दे रहीं हैं और उसे नष्ट कर रही हैं। इस प्रक्रिया में घूंघट या हिजाब क्रांति के प्रतीक के रूप में उभर रहा है।

सभी महिलाओं की डिमांड है कि नागरिक के रूप में उन्हें ‘बचाने’ के लिए पितृसत्तात्मक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उनकी आवाज़, उनका अस्तित्व और एजेंसी agency को पहचानने की आवश्यकता है।

बेखौफ आजादी – ये सब महिलाओं की मांग है – आजादी अपने फैसले खुद लेने की, आज़ादी बेख़ौफ़ रहने की, पढ़ने की, काम करने की, आज़ादी खुली हवा में सांस लेने की, और आजादी सपने देखने और उन्हें पूरा करने की।

एडवोकेट डॉ शालू निगम

लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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